राजनीति में लेखकों की भूमिका
राजनीतिराजनीति में लेखकों की भूमिका1
––न्गुगी वा थ्योंगो
हम उपनिवेशवाद की समस्या को उठाये बगैर देशज संस्कृति की समस्या को नहीं उठा सकते, क्योंकि आज सभी देशज संस्कृतियाँ औपनिवेशिक, अर्ध–औपनिवेशिक और सह–औपनिवेशिक परिस्थितियों के खास प्रभाव के अधीन विकसित हो रही हैं।
––एमे सेजार
एक नाटकीय कविता में, एलएस सेंगहोर ने लिखा है कि, एक श्वेत आदमी ‘चाका’ (थोमस मोफोला द्वारा लिखित उपन्यास) की भाषा की ताकत और महारत से इतना अभिभूत हुआ कि वह हैरानी से कह उठता है–– “मेरे शब्द चाका–– तुम एक कवि हो–– एक राजनीतिज्ञ हो।”
कवि और राजनीतिज्ञ में निश्चित तौर पर कई बातें एक जैसी होती हैं। दोनों ही शब्दों को अहमियत देते हैं। दोनों को ही उनके आसपास का माहौल गढ़ता है। उनकी गतिविधियों और चिन्ताओं का एक ही विषय और उद्देश्य होता है–– इनसान और इनसानी रिश्तें। काल्पनिक साहित्य, जिस हद तक वह मानवीय रिश्तों को जाहिर करता है और लोगों की चेतना और राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता है और जिस हद तक वह समाज में सत्ता के क्रियाकलाप और सत्ता के रिश्तों को जाहिर करता है, ये पहलू एक–दूसरे को प्रतिबिम्बित करते हैं और एक–दूसरे पर असर डाल सकते हैं और डालते भी हैं।
हमारी जिन्दगी का कोई भी हिस्सा, यहाँ तक कि हमारी कल्पना की सीमाएँ भी, समाज के संगठन और सत्ता के पूरे कामकाज और व्यवस्था से अछूते नहीं है–– यानी यह सत्ता कैसे और किसने हासिल की है, इस पर किस वर्ग का कब्जा है और कौन इसे कायम रखता है और इस सत्ता का इस्तेमाल किन मकसदों के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, सत्ताधारी वर्ग न केवल, समाज की उत्पादक शक्तियों, यानी क्या पैदा किया जाता है, कैसे पैदा किया जाता है और उसका बटवारा कैसे किया जाता है, इन सब पर नियंत्रण रखता है, बल्कि सांस्कृतिक विकास पर भी नियंत्रण रखता है। जीवन जीने के साधन और उनका उत्पादन, विनिमय और वितरण कैसे होता है तथा इस पूरी प्रक्रिया से जो सामाजिक संस्थाएँ बनती हैं, ये सब कुछ इनसानों को प्रभावित करती हैं और उनके जीवन–स्तर पर गहरा असर डालती हैं–– जैसे कि वे कैसे खाते हैं, हँसते हैं, खेलते हैं, प्यार–मोहब्बत करते हैं और यहाँ तक कि शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं। मूल्यों के नैतिक महत्व और मानव जीवन की गुणवत्ता का यह विश्व ही वह विषय है जिसके बारे में कल्पनाशील साहित्य होता है। यह विश्व खुद, जीवन जीने की भौतिक प्रक्रिया का एक उत्पाद और प्रतिबिम्ब दोनों है। साहित्य और राजनीति असल में जीते–जागते मनुष्यों, वास्तविक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के बारे में होते हैं, उन लोगों के बारे में जो साँस लेते हैं, खाते हैं, रोते हैं, हँसते हैं, सृजन करते हैं, बढ़ते हैं, मरते हैं, इतिहास के ऐसे मनुष्य, जो खुद इतिहास की पैदाइश और उसके निर्माता दोनों हैं।
समाज में सत्ता की संरचना लेखकों और उनके लेखन को तीन तरीकों से प्रभावित कर सकती है––
एक इनसान के तौर पर लेखक खुद इतिहास, समय और स्थान की पैदाइश है। समाज के एक सदस्य के तौर पर वह एक खास वर्ग से ताल्लुक रखता है और अपने समय के वर्ग–संघर्ष में अनिवार्य रूप से शामिल होता है। किसी समाज में एक लेखक के तौर पर, इस बात से फर्क पड़ता है कि उसे लिखने की इजाजत है या नहीं, उसके लेखन पर कोई नियंत्रण लगाया जाता है या नहीं और वह किस वर्ग का नजरिया अपनाता है।
एक लेखक की विषय–वस्तु इतिहास होता है–– यानी, मनुष्य के प्रकृति पर क्रिया करने और उसे बदलने की प्रक्रिया और ऐसा करते हुए खुद पर भी क्रिया करने और खुद को बदलने की प्रक्रिया। निरन्तर परिवर्तनशील उत्पादन के साधन, पूरी तरह बदलते उत्पादन सम्बन्ध और फलस्वरूप बदलते सत्ता सम्बन्ध ही एक लेखक के साहित्यिक सरोकारों का एक सम्पूर्ण क्षेत्र होता है। जाहिर है, राजनीति इस साहित्यिक क्षेत्र का अभिन्न अंग है।
किसी लेखक की कल्पनाशील भागीदारी का उत्पाद–– जिसे शेक्सपियर ने प्रकृति का आईना कहा था–– समाज का प्रतिबिम्ब बन जाता है, इसके आर्थिक ढाँचे, इसका वर्गीय–गठन का, इसके द्वन्द्व और अन्तर्विरोधों, इसकी वर्गीय सत्ता का राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष का इसके मूल्यों के ढाँचे का, यानी जो मूल्य खत्म होते जा रहे हैं और जो भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं उनके बीच के द्वन्द्व और तनाव का। इसलिए, साहित्य ने अक्सर हमें किसी दौर की बदलती सोच और भावना को, समाज के विकास के उसी दौर से जुड़े सभी ऐतिहासिक और राजनीतिक दस्तावेजों की तुलना में, कहीं ज्यादा गहराई और स्पष्टता से समझने का मौका दिया है। खासकर उपन्यास और उसमें भी आलोचनात्मक यथार्थवादी परम्परा वाला उपन्यास इस मामले में महत्वपूर्ण है–– यह विश्लेषणात्मक और संश्लेषणात्मक दोनों है, यह चीजों को अलग–अलग करके भी देखता है और उन्हें आपस में जोड़ता भी है।
कवि और राजनीतिज्ञ के बीच या लेखकों और राजनीति के बीच का रिश्ता हमारे हालात में खासतौर पर अहम–– हमारी संस्कृतियाँ, हमारा साहित्य, गीत, संगीत और नृत्य, पश्चिमी औद्योगिक और एकाधिकारी वित्तीय पूँजी की दमघोंटू जकड़ और हमारे लोगों द्वारा साँस लेने तक के लिए किये जा रहे कड़े संघर्षों के दौर में विकसित हो रही हैं। अमरीकी वित्तीय पूँजीवाद के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवाद का प्रभाव, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक, हर स्तर पर पूरी तरह फैला हुआ है, इसलिए, इसके खिलाफ हमारे संघर्ष भी हर स्तर पर होने चाहिए। साहित्य और लेखकों को इस लड़ाई के मैदान से अलग नहीं रखा जा सकता।
अफ्रीका में इस रिश्ते ने कई रूप धारण किये हैं। अक्सर, लेखक और राजनीतिज्ञ एक ही व्यक्ति रहे हैं। लोगों की सामूहिक चेतना को जाहिर करने की प्रक्रिया में ही लेखक सक्रिय राजनीतिक संघर्षों में शामिल हो जाता है। एलएस सेंगहोर इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। या फिर, सक्रिय राजनीतिक संघर्ष में डूबा हुआ राजनीतिज्ञ अपनी भागीदारी के एक जरूरी और बेहद अहम हिस्से के तौर पर कलम उठाता है। अगोस्टिनो नेटो2 एक बेहतरीन कवि और राजनीतिज्ञ हैं। उनके लिए बन्दूक, कलम और मंच, सभी का मकसद एक ही रहा है–– अंगोला की पूर्ण मुक्ति। लेकिन, कई अफ्रीकी लेखक, चाहे वे राजनीतिक संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल हों या नहीं, उन्होंने अक्सर पाया है कि उनकी कविताओं और कहानियों की विषय–वस्तु ने ही उन्हें शासक गिरोहों की नजर में गलत पक्ष में खड़ा कर दिया है। ज्यादातर दक्षिण अफ्रीकी लेखक–– जैसे डेनिस ब्रूटस, इजेकिएल म्फाहलेले, ब्लोक मोडिसाने, एलेक्स ला गुमा, माजिसी कुनेने और लुईस न्कोसी–– आज, देश निकाला झेल रहे हैं, दूसरी तरफ वे लोग जो वहीं रह गये थे, जैसे कैन थेम्बा, उन्हें नस्लवादी माहौल और हिंसक दमन की व्यवस्था ने धीरे–धीरे दम घोंटकर मार डाला। उनकी किताबों पर तो पाबन्दी लगी ही है और यह कोई हैरानी की बात नहीं है, पश्चिमी साम्राज्यवाद और एकाधिकारी पूँजीवाद के एक घबराये हुए फासीवादी गढ़ में ऐसा होना स्वाभाविक है, जो ‘ब्लैक ब्यूटी’ (एक घोड़े की कहानी) के ऊपर भी इसलिए रोक लगा देता है, क्योंकि उससे यह सन्देश जा सकता है कि काला रंग भी सुन्दर हो सकता है।
यहाँ तक कि जब कोई लेखक आम तौर पर राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल नहीं होता, यानी ऐसी स्थिति में, जहाँ वह खुद को एक नागरिक के तौर पर या अपने साहित्य के विषय के जरिये राजनीतिक सक्रियता से जुड़ा हुआ नहीं मानता, तब भी वह अचानक उस दौर के गरमा–गरम राजनीतिक सत्ता–संघर्ष की लड़ाई में शामिल हो सकता है। क्रिस्टोफर ओकिग्बो, जिन्होंने कभी कहा था कि वे अपनी कविताएँ सिर्फ कवियों के लिए लिखते हैं और यह भी कहा था कि, लिखने के बजाय वे खुलकर जीना ज्यादा पसन्द करते, बियाफ्रा के अलगाववादी आन्दोलन के लिए लड़ते हुए मारे गये। दूसरे लेखक–– चिनुआ अचेबे, गेब्रियल ओकारा और सिप्रियन एक्वेन्सी, जिन्होंने उम्मीदों से भरे दौर में अफ्रीकी साहित्य को दुनिया के नक्शे पर जगह दिलायी थी, वे सभी बियाफ्रा की राजनीति में सक्रिय थे। इसी जुड़ाव ने अचेबे को 1969 में इस तरह लिखने के लिए प्रेरित किया––
“मेरे लिए यह साफ है कि जो अफ्रीकी लेखक मौजूदा अफ्रीका के बड़े सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से बचने की कोशिश करेगा, उसका हाल भी उस बेतुके आदमी जैसा होगा जो आग से बचकर भाग रहे चूहे के पीछे दौड़ने के चक्कर में, अपना घर जलता हुआ छोड़ देता है, यानी वह पूरी तरह से अप्रासंगिक हो जाएगा।”3
यह एक बहुत सटीक उदाहरण है, जो साहित्य–लेखन में ‘कला के लिए कला’ (यानी समाज या जीवन से कटी हुई कला) के नजरिये को खारिज करता है।
लेकिन चिनुआ अचेबे की बात से सहमत होते हुए भी, मुझे एक बात लगती है कि कल्पनाशील साहित्य का कोई भी लेखक, चाहे वह बहुत बड़ा लेखक हो या औसत दर्जे का, अपने समय के बड़े मुद्दों से नहीं बच सकता, क्योंकि साहित्य को, जहाँ तक कि यह इनसान की फितरत का आईना है, उसे सामाजिक सच्चाई या सामाजिक सच्चाई के कुछ पहलुओं को तो जरूर दिखाना चाहिए। शेक्सपियर, मार्लोव, जॉनसन और राबेले की रचनाओं से हमें सोलहवीं सदी के अंग्रेजी और फ्रांसीसी समाजों की कितनी सुन्दर झलक मिलती है–– उभरती हुई अनुभव संगत भावना, मध्यम–वर्गीय व्यक्तिवाद और सामन्तवाद से जूझती हुई व्यापारिक–पूँजीवादी भावना, जो समुद्रों पर कब्जा करने, नये उपनिवेश बनाने और स्थानीय लोगों को ईसाई बनाने की आजादी चाहती थी और साथ ही एक ही साँस में कहती थी–– मेरा ईश्वर, मेरा सोनाय मेरा सोना, मेरा ईश्वर। उन्नीसवीं सदी के रूसी साहित्य के किरदारों का उन्माद और गुस्से से काँपता हुआ आक्रोश भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह आक्रोश जारशाही सामन्तवाद और पूँजीवाद के खिलाफ किसानों और मजदूरों के संघर्ष की उस ज्वालामुखी जैसी हलचल को जाहिर करता है, जिसने आगे चलकर दुनिया में एक नयी समाजवादी व्यवस्था की नींव रखी। दूसरी तरफ, जेन ऑस्टेन की अक्सर आलोचना की जाती है और उन पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने खुद को अपने समय की बड़ी उथल–पुथल से दूर रखा–– लेकिन फिर भी, अनजाने में ही सही, वे अठारहवीं सदी के इंग्लैंड मेंे आराम–पसन्द, दूसरों पर निर्भर जमीन्दार मध्यम वर्ग की एक शानदार तस्वीर पेश करते हैं। या फिर एमिली ब्रॉन्टे का उदाहरण लें, जो यॉर्कशायर के मूर (ऊँचे–नीचे मैदानी इलाकों) में अलग–थलग रहती थीं और उन्होंने अपने उपन्यास ‘वेदरिंग हाइट्स’ की कहानी भी वहीं के माहौल में बुनी, जहाँ तेज हवाएँ चलती थीं और तूफानी बारिश होती थी, लेकिन इस सबके बीच, उन्होंने औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग (पूँजीपति वर्ग) जो मजदूरों और उपनिवेशों की जनता के शोषण से हासिल की गयी सुख–सुविधाओं के बीच जीता था। इस वर्ग की उन नैतिक मान्यताओं का बहुत गहराई से विश्लेषण किया जो लोगों के लिए अत्याचारी, दमघोंटू और दमनकारी थीं।
लेकिन प्रासंगिकता, सरोकार और समाज के प्रति साहित्य की प्रतिबद्धता के बुनियादी अर्थ में चिनुआ अचेबे ज्यादा सही हैं। सिर्फ यही बात महत्वपूर्ण नहीं है कि लेखक अपने आस–पास के संघर्षों को दिखाने और उन्हें समझने में कितनी ईमानदारी और निष्ठा के साथ लगा हुआ है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उन बड़े सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के प्रति उसका अपना नजरिया क्या है। यह सिर्फ एक लेखक के सामाजिक व्यक्ति होने के नाते बहादुरी भरे रुख की बात नहीं है। हालाँकि, यह बहुत जरूरी और अहम है–– बल्कि यह उनके रचना में झलकने वाले रवैये और विश्वदृष्टि का मामला है, जिसके जरिये वे हमें उस ऐतिहासिक दौर से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिससे उनका समाज गुजर रहा है। हम जिस बात पर चर्चा कर रहे हैं, वह यह, कि क्या हकीकत को समझने की किसी लेखक की कल्पनाशील कोशिश का मकसद समाज के उस संघर्ष में मदद करना है, जो हर तरह के परजीवी और शोषणकारी रिश्तों से मुक्त और बेहतर जीवन–स्तर पाने के लिए हो। यानी रोटी, कपड़ा, मकान और गीत के अधिकार और सुरक्षा के लिए हमारे रोजमर्रा के संघर्ष में साहित्य की क्या अहमियत है और लोगों का अपनी मेहनत की कमाई पर कितना अधिकार है। एक लेखक दुनिया को समझने और उसे बदलने में किस हद तक मदद कर सकता है और करेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह उन वर्गों और मूल्यों को कितनी अच्छी तरह समझता है जो एक नयी व्यवस्था, एक नये समाज और इनसानियत के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं और साथ ही वह उन वर्गों और मूल्यों को भी पहचानता है जो नयी और उम्मीद भरी चीजों के जन्म में मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। जाहिर है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने दौर के इन वर्ग–संघर्षों में किस पक्ष में खड़ा है।
हालाँकि, समाज के प्रति रवैये के आधार पर लेखकों के दो प्रकार बताये गये हैं। कुछ लोग मानते हैं कि समाज मूल रूप से स्थिर और एक जैसा रहता है, ऐसा वे या तो इसलिए सोचते हैं क्योंकि वे ऐसे समय में जी रहे होते हैं जब समाज को आम तौर पर ठहरा हुआ माना जाता है, या फिर इसलिए कि वे अपने ही वर्ग के दायरे में सिमटे होते हैं या प्रभावशाली वर्ग के प्रचार के शिकार होकर समाज के बुनियादी ढाँचागत द्वन्द्वों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। उन्नीसवीं सदी की, जॉर्ज एलियट जैसी अंग्रेज उपन्यासकार अक्सर बुनियादी स्थिर ढाँचे के ऐसे ही स्थायित्व को मानकर चलती हैं। उनकी दुनिया बहुत बड़ी है और वे जिन मुद्दों से जूझ रही हैं, वे भी व्यापक हैं, लेकिन उनके बौद्धिक और नैतिक द्वन्द्व किसी ऐसी बदलती हुई दुनिया की समझ से पैदा नहीं होते–– एक ऐसी दुनिया जो लगातार गतिमान है, जो हमेशा एक रूप से दूसरे रूप में बदल रही है और जिसके कारण नये वर्ग–समीकरण और नयी सामाजिक व्यवस्थाओं की सम्भावनाएँ बन रही हैं। ऐसे लेखकों की दिलचस्पी सिर्फ अपने किरदारों के नैतिक आचरण में होती है, चाहे उनका वर्ग, नस्ल या धार्मिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। ऐसे लेखकों के मन में अक्सर मानवीय स्वभाव या व्यवहार का एक आदर्श होता है, जिसके करीब पहुँचने में अलग–अलग पात्र कम या ज्यादा सफल या असफल होते हैं। अधिक से अधिक ये लेखक तीखी सामाजिक आलोचना वाला साहित्य रच सकते हैं और रचते भी हैं। लेकिन समाज के प्रति ऐसा नजरिया और मानवीय चरित्र तथा नैतिक आदर्शों को उनके वर्गीय ढाँचे और वर्ग–संघर्ष के आधार से अलग करके देखने का तरीका, अक्सर ऐसे साहित्य को जन्म देता है जो समाज की सतही समझ तक ही सीमित रहता है, ऐसे साहित्य को गुमनामी से केवल वे आलोचक ही बचा पाते हैं जिनके पास ‘मानवीय संवेदना’, ‘शाश्वत और सार्वभौमिक’ जैसे घिसे–पिटे और निरर्थक वाक्यांशों के अलावा आलोचना का कोई और साधन नहीं होता। क्या हमने ऐसे आलोचकों की बातें नहीं सुनी हैं जो अफ्रीकी लेखकों से यह माँग करते हैं कि वे उपनिवेशवाद, नस्ल, रंग और शोषण के बारे में लिखना बन्द करें और बस इनसानों के बारे में लिखें? समाज के प्रति ऐसा नजरिया अक्सर कुछ यूरोपीय लेखकों की उस सनक का आधार होता है, जिसमें वे ऐसे इनसान की कल्पना करते हैं जिसका कोई इतिहास नहीं है, जो अकेला और आजाद है और जिसकी जिन्दगी में, समझ में न आने वाली निराशा और तकलीफ है तथा मौत ही इनसानी हालत की आखिरी सच्चाई है।
लेकिन दूसरी तरह के लेखक, या तो जिस दौर में वे रहते हैं उस दौर की प्रकृति के कारण या फिर जीवन और समाज के प्रति अपने सहज या सचेत द्वन्द्वात्मक नजरिये के कारण, किसी स्थिर अवस्था को नहीं मानते। उनके किरदारों का आचरण पूरी तरह से इतिहास और बदलती सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित होता है। बदलती हुई दुनिया को समझते हुए, एस्खलस, शेक्सपियर, तोल्स्तोय, कॉनराड, शोलोखोव और चिनुआ अचेबे जैसे महान लेखकों ने अलग–अलग वर्गों के लोगों के बीच द्वन्द्व को दिखाया है। दुनिया को देखने का इन वर्गों का नजरिया अलग–अलग और अक्सर एक–दूसरे का विरोधी होता है, जैसे कि किसके पास सत्ता है या किसके पास होनी चाहिए, सत्ता का इस्तेमाल किन मकसदों को पूरा करने के लिए किया जाता है और पुरानी व्यवस्था से एक नयी समाज व्यवस्था बनने की क्या सम्भावनाएँ हैं। ओकोन्कवो और एजेउलू की त्रासद दुविधा इतनी गहरी और व्यापक इसलिए है क्योंकि उनके व्यवहार और निर्णयों के मूल में दो ऐसी विश्व–व्यवस्थाएँ हैं जिनके बीच कभी न सुलझने वाला टकराव है–– एक तरफ ओकोन्कवो की दुनिया है जो उभरते सामन्तवाद पर आधारित है, जिसमें परिवार और कुछ हद तक गुलामों के श्रम का इस्तेमाल होता है और दूसरी तरफ यूरोपीय औपनिवेशिक पूँजीवाद और साम्राज्यवाद है, जो नस्लवाद और यूरोपीय पूँजी द्वारा अफ्रीकी मजदूरों के बेरहम शोषण पर टिका है। पुराने वर्गों और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था और उसके पूरे मूल्य–ढाँचे को नये वर्ग और मूल्यों के नये ढाँचे चुनौती देते हैं। जोसेफ कॉनराड के उपन्यास ‘नोस्ट्रोमो’ की कहानी एक काल्पनिक लातिन अमरीकी देश पर आधारित है, इसमें उठाये गये मुद्दे ईसाई नैतिकता या अमरीका के ‘वाइल्ड वेस्ट’ वाले ‘पूरी तरह अच्छे’ (ईश्वर) बनाम ‘पूरी तरह बुरे’ (शैतान) जैसे साधारण मुद्दों जैसे नहीं हैं।
लातिन अमरीका के इस देश में, जहाँ ब्रिटिश और अमरीकी खनन कम्पनियों का दबदबा है, लोगों के लिए कोई स्थायी और सार्वभौमिक आचरण के नियम नहीं बने हैं जिनका वे पालन करें या न करें। यहाँ नैतिकता, धर्म और आचार–विचार वर्ग पर आधारित हैं–– किसी पात्र के व्यवहार और उसके अलगाव को सही तरह से समझने के लिए हमें विरोधी नैतिकताओं और दृष्टिकोणों के पीछे छिपे ऐतिहासिक, आर्थिक, वर्गीय और नस्लीय आधार को जानना जरूरी है। यहाँ, अचेबे के नाइजीरिया की तरह, अच्छाई और बुराई की कोई आध्यात्मिक लड़ाई नहीं है। समस्याओं की असली जड़ साम्राज्यवाद और अन्तरराष्ट्रीय एकाधिकारी पूँजी है, जो उपनिवेशों के आवाम की श्रम–शक्ति और प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करती है। यही वजह है कि कॉनराड के उपन्यासों में कोयला, हाथी–दाँत और चाँदी जैसे बिम्ब बहुतायात में दिखायी देते हैं।
अफ्रीकी लेखक और जोसेफ कॉनराड एक ही दुनिया से जुड़े हैं और इसीलिए कॉनराड की दुनिया इतनी जानी–पहचानी लगती है। दोनों ही, साम्राज्यवाद के दबदबे वाली दुनिया में रहे हैं। उन्होंने होला कैम्प, माई लाई, अल्जीयर्स, शार्पविले और फिलिस्तीन से खदेड़ी गयी अरबी माँ और बच्चे के बारे में जाना है। उन्होंने गर्भवती माताओं के पेट चीरकर खोले जाते हुए देखा है, उन्होंने औपनिवेशिक भाड़े के सैनिकों की उस कलात्मक कुशलता को भी देखे हैं, जिसमें वे संघर्षरत किसानों और मजदूरों के शरीरों को मुनाफे के देवता के लिए उपयुक्त लाशों की तरह काटते–छाँटते थे। उन्होंने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में न्याय का कामकाज देखा है, जिसका आधार पूँजीवाद है, इस व्यवस्था का वर्णन शेक्सपियर ने ‘किंग लियर’ में बहुत अच्छे ढंग से किया है––
पाप पर सोने की परत चढ़ा दो,
और न्याय का मजबूत भाला भी बिना चोट पहुँचाये टूट जाता है,
उसे चिथड़ों से ढक दो, तो किसी बौने का तिनका उसे भेद देता है।
उन्होंने भाड़े के सैनिकों और तख्तापलट को देखा है और वे यह भी जानते हैं कि मैकबेथ का खून से सना खंजर आदर्शवादी सोच रखने वालों के गरम दिमाग की उपज या कोरी कल्पना नहीं है। क्या उन्होंने साम्राज्यवादी युद्ध और दमन के कुत्तों को नहीं देखा, जो नव–औपनिवेशिक शासन–व्यवस्थाओं में लोगों के खून में नहाते हुए खुशी से चिल्ला रहे थे––
कितने युगों बाद
यह हमारा अहंकारी दृश्य
खेला जाएगा,
उन राज्यों में जो अभी जन्मे नहीं हैं और उन भाषाओं में बोला जाएगा,
जो अभी अनजान हैं।
उनकी एक दुनिया है, जहाँ समाज साफ तौर पर बदल रहे हैंय अक्सर मजदूर वर्ग और गरीब किसान, साथ ही छोटे बुर्जुआ वर्ग का एक हिस्सा और ‘लम्पट–सर्वहारा’, स्थानीय बड़े कारोबार और विदेशी कारोबारी हितों के गठजोड़ के खिलाफ तथा यथास्थिति बनाये रखने वाली राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। अलग–अलग वर्गों के बीच होने वाला आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष लेखकों की रचनाओं में भी दिखायी देता है। खासकर औपनिवेशिक दौर में हालात ने कई लेखकों को प्रगतिशील विचारधारा अपनाने के लिए प्रेरित किया। वे एक पूर्ण राष्ट्रीय मुक्ति की गतिशील ताकत और नजरिये से मानो सरोबार थे। इसलिए अफ्रीकी साहित्य का एक बड़ा हिस्सा उपनिवेशवाद–विरोधी और साम्राज्यवाद–विरोधी था––
“तब इनमें से ज्यादातर साहित्य अश्वेतों द्वारा संगठित बेहतर और अधिक समानता–आधारित राज्यों की उम्मीद के माहौल में लिखा गया था। लेकिन कॉनराड की तरह, जिनकी बुर्जुआ अवस्थिति ने उनके नजरिये को संकुचित कर दिया था और जिसके कारण वे, उदाहरण के लिए, ब्रिटिश साम्राज्यवाद को अपराधी नहीं ठहरा सके, उसी तरह अफ्रीकी लेखक की पेटी–बुर्जुआ अवस्थिति भी उन्हें साम्राज्यवाद के स्वरूप और उसके स्थानीय दलाल सहयोगियों के खिलाफ निरन्तर वर्ग–संघर्ष की जरूरत को समझने के रास्ते में बाधा बनी रही। मुझे खुद याद है कि मैंने 1962 में लिखा था कि, मैं उस दिन का इन्तजार कर रहा था जब अफ्रीकी लेखकों का औपनिवेशिक समस्याओं और राजनीति से ध्यान हट जाएगा और हम सब आराम से बैठकर एक–दूसरे पर समझदारी भरा व्यंग्य करेंगे और खुद पर हँसेंगे, चाहे इसका जो भी मतलब हो–– तब हम सामाजिक तौर–तरीकों वाली कॉमेडी (कितना उथला और खोखला बुर्जुआ आदर्श!) का आनन्द लेंगे या फिर समय और असल हालात से कटे हुए अकेले लोगों की तकलीफ भरी दुनिया को समझेंगे।”
अक्सर हम नस्ल या रंग के मुद्दे से आगे नहीं बढ़ पाये। यानी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के संघर्ष को नस्लीय पहलू से आगे नहीं देख पाये, ताकि औपनिवेशिक जुल्म की असली वजह को समझ सकें। असली वजह यह थी कि हम दुनिया–भर में फैली ‘पूँजीवाद’ नाम की उत्पादन प्रणाली का एक अहम हिस्सा थे। औपनिवेशिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हमलों का मकसद आर्थिक क्षेत्र में कब्जे को और मजबूत और टिकाऊ बनाना था। इसलिए, अफ्रीकी लोगों का उपनिवेश–विरोधी संघर्ष महज एक नस्लीय संघर्ष से कहीं ज्यादा था। और उससे भी ज्यादा बुनियादी तौर पर यह उस व्यवस्था के खिलाफ भी था, जिसने चार सौ सालों तक एक पूरे महाद्वीप को तबाह किया था। अफ्रीका ही वह जगह थी जो पूँजीवाद को उसकी शुरुआत यानी गुलामी के दौर से लेकर, औपनिवेशिक दौर और आज के नव–औपनिवेशिक दौर तक जिन्दा रहने के लिए अपना लहू दे रही हैय इसके लिए अफ्रीका से पश्चिमी दुनिया के मुख्य केन्द्रों तक कई जटिल रास्ते और कड़ियाँ जुड़ी हुई हैं।
आज भी अफ्रीकी लेखक अक्सर यह मानने से इनकार करते हैं कि मूल्य, संस्कृति, राजनीति और अर्थव्यवस्था–– ये सभी आपस में जुड़े हुए हैंय वे यह भी नहीं मानते कि हम सार्थक अफ्रीकी मूल्यों की बात तब तक नहीं कर सकते, जब तक हम उन सभी वर्गों के खिलाफ संघर्ष में शामिल न हों, जो उस व्यवस्था से लाभ उठाते हैं और जो खुद उन्हीं मूल्यों को लगातार विकृत करती रहती है। हमें मजदूरों और गरीब किसानों के उन संघर्षों में शामिल होना चाहिए जो दलाल बुर्जुआ वर्ग, जमीन्दारों, सरदारों और अफ्रीका के बड़े कारोबारी वर्गों के परजीवी व्यवहार के खिलाफ हैंय साथ ही, ये वर्ग विदेशी कारोबारी हितों के साथ मिलकर काम करते हैं।
आज अफ्रीका का बुनियादी विरोध एक तरफ साम्राज्यवाद और पूँजीवाद तथा दूसरी तरफ राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवाद के बीच है। यानी अन्तरराष्ट्रीय एकाधिकारी पूँजी से जुड़े स्थानीय ‘सम्पन्न’ वर्ग और मेहनतकश आवाम के बीच। उस वास्तविक और बुनियादी अन्तर्विरोध के भीतर ही शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच और देश के बेहद विकसित हिस्सों तथा पाषाण–काल जैसी हालत वाले इलाकों के बीच का अन्तर्विरोध भी शामिल है। अलग–अलग राष्ट्रीयताओं के उभरते स्थानीय बुर्जुआ वर्ग (पूँजीपति वर्ग) के बीच जबरदस्त होड़ चलती है, वे अपने हितों को पूरे जातीय समूह (राष्ट्रीयता) के हितों के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं, इस होड़ की वजह से अक्सर हम उन ज्यादा वास्तविक और बुनियादी अन्तविरोधों को नहीं देख पाते, जो हमें एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप और अमरीका के वर्ग–संघर्षों से जोड़ते हैं।
इन अन्तर्विरोधों का सामना करते हुए, अफ्रीकी लेखक अक्सर व्यक्तिवाद, रहस्यवाद और रूपवाद की ओर मुड़ सकते हैं। ऐसा कोई अफ्रीकी लेखक, जो अक्सर नव–औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं की कमियों, मूल्यों में आने वाली विकृतियों और कई नव–औपनिवेशिक शासक वर्गों में मौजूद फासीवाद को देख तो सकता है, लेकिन वह साथ ही एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था के तौर पर समाजवाद का सामना करने से भी डरता है। उसे इस बात का डर है कि कहीं मजदूर वर्ग और किसान, उत्पादक शक्तियों पर कब्जा न कर लें और नतीजतन, उत्पादन के साधनों पर कब्जा पाने के एकमात्र रास्ते के तौर पर राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करके उसका इस्तेमाल न करने लगें। दो विकल्पों से बचने के लिए–– एक तो नव–औपनिवेशिक यथास्थिति का बने रहना और दूसरा जनता द्वारा हिंसक तरीके से उस यथास्थिति को उखाड़ फेंकना–– ‘अफ्रीकीपन’, ‘अश्वेतवाद (ब्लैकिज्म), अफ्रीकी अतीत की गरिमा और समस्याओं के प्रति अफ्रीकी पहुँच को एक तरह का पंथ (कल्ट) बना लेता हैय या फिर वह बस निराशावादी हो जाता है और हर चीज का मजाक उड़ाता है, चाहे वह पूँजीवाद और उसका शोषणकारी और दमनकारी सामाजिक ढाँचा हो या फिर आवाम का मुक्ति के लिए संघर्षय या फिर वह अमूर्त मानवतावाद और अमूर्त सार्वभौमिकता के नाम पर हर कोशिश और हर चीज (संघर्ष में हुई जीत और हार) की बिना यह देखे आलोचना कर सकता है कि पूँजीवादी ढाँचों और साम्राज्यवाद के भीतर इनसानों का मुक्त और बेरोकटोक मेल–जोल मुमकिन नहीं हैय कि सच्चा मानवतावाद तब तक मुमकिन नहीं है जब तक अर्थव्यवस्था और उत्पादन के साधनों (जमीन, उद्योग, बैंक वगैरह) पर आवाम का पूरा मालिकाना हक और कब्जा न हो जायेय कि जब तक समाज में वर्ग मौजूद हैं, ऐसे वर्ग जो इस आधार पर तय होते हैं कि अलग–अलग लोग उत्पादन सम्बन्धों में कहाँ या किस स्थिति में हैं, तब तक प्यार, खुशी, हँसी और काम में रचनात्मक सन्तुष्टि के जरिये इनसानों का सच्चा जुड़ाव कभी मुमकिन नहीं हो पाएगा। हम सिर्फ वर्गीय प्यार, वर्गीय खुशी, वर्गीय शादी, वर्गीय परिवार और वर्गीय संस्कृति के बारे में ही सार्थक बात कर सकते हैं।
अफ्रीकी लेखक से जिस काम की अपेक्षा की जाती है, वह आसान नहीं है उससे अपेक्षा की जाती है कि वह साम्राज्यवाद के वैश्विक स्वरूप को पहचाने और साथ ही, उन ताकतों के उस वैश्विक स्वरूप या आयाम को भी समझे जो एक नयी दुनिया बनाने के लिए इसके खिलाफ संघर्ष कर रही हैं। उसे अपने मूल बुर्जुआ वर्ग और उसके नुमाइन्दों से जुड़े अपने सम्बन्धों को पूरी तरह नकारना और छोड़ना होगा और दुनिया की सभी समाजवादी ताकतों के साथ मिलकर, पूरी दुनिया में फैले पैन–अफ्रीकी आवाम के साथ अपने सच्चे रचनात्मक सम्बन्ध स्थापित करने होंगे। बेशक! उसे, बहुत बारीकी से चीजों को देखना होगा और रेत के एक कण से पूरी तरह जुड़ाव रखना होगा, लेकिन साथ ही उस कण में अतीत, वर्तमान और भविष्य की दुनिया को भी देखना होगा। उसे अफ्रीका, अमरीका, एशिया और यूरोप के सभी मेहनतकश लोगों के संघर्षों की धड़कन और हलचल को अपने साथ लेकर लिखना चाहिए। हाँ, उसे अफ्रीकी मजदूर वर्ग और उनके सहयोगी किसान वर्ग के उस संघर्ष का (जो उनकी श्रम–शक्ति की पूर्ण मुक्ति के लिए है) सक्रिय रूप से समर्थन करना चाहिए और उसे अपने लेखन में उतारना चाहिए। हाँ, उसके काम में यह प्रतिबद्धता जाहिर होनी चाहिए, लेकिन न्याय और शान्ति के अमूर्त विचारों के प्रति नहीं, बल्कि सत्ता हासिल करने के लिए अफ्रीकी लोगों के वास्तविक संघर्ष के प्रति, ताकि वे उत्पादक शक्तियों पर कब्जा कर सकें और इस तरह शान्ति और न्याय के लिए एकमात्र सही आधार तैयार कर सकें।
आखिर में, मैं एक ऐसे अफ्रीकी लेखक का जिक्र करना चाहूँगा जो उस तरह के त्याग और समर्पण का बेहतरीन उदाहरण है, जिसकी बात मैं करता रहा हूँ। वे सेनेगल के रहने वाले सेम्बियन उस्मान हैं, जिन्होंने हमें ‘गॉड्स बिट्स ऑफ वुड’ नामक उपन्यास दिया है। इसे पढ़ें–– 1948 में सेनेगल के मजदूरों के संघर्ष का ब्यौरा–– और आप देखेंगे कि वे कैसे विश्लेषण करते हैं और फिर चीजों को जोड़कर एक निष्कर्ष निकालते हैं; वे बिना समय बर्बाद किये कैसे सीधे मुद्दे से जुड़ जाते हैं; आपको महसूस होगा कि वे लोगों के साथ हैं और उनकी दिलचस्पी लोगों की किस्मत और उनकी अन्तिम जीत में है। उन्होंने ‘फिंगर्स’ नाम की एक कविता भी लिखी और यह उस नजरिये को दिखाती है जो उनके काम का आधार है।
संगतराशी में माहिर उँगलियाँ,
संगमरमर पर आकृतियाँ गढ़ने वाली,
विचारों को साकार करने वाली,
प्रभावित करने वाली उँगलियाँ,
कलाकारों की उँगलियाँ।
मोटी और भारी उँगलियाँ,
जो मिट्टी खोदती और जोतती हैं,
और उसे बुआई के लिए तैयार करती हैं,
और हमें आगे बढ़ाती हैं,
किसानों की उँगलियाँ।
ट्रिगर पर टिकी उँगली,
लक्ष्य साधने वाली उँगली पर टिकी निगाह।
अपनी जिन्दगी के आखिरी मोड़ पर खड़े लोग,
अपनी ही उँगली के रहमो–करम पर,
वह उँगली जो जिन्दगी खत्म कर देती है।
एक सैनिक की उँगली।
नदियों और भाषाओं के पार,
यूरोप और एशिया की,
चीन और अफ्रीका की,
भारत और महासागरों की,
आइये हम अपनी उँगलियाँ मिलायें,
उस उँगली की सारी ताकत छीनने के लिए,
जो इनसानियत को मातम में डुबोये रखती है।4
जब तक हम अफ्रीकी लेखक ऐसी सोच नहीं अपनाते। एक ऐसी सोच जो अवाम के संघर्षों में गुंथी हो, तब तक हम हताशा, निराशावाद और व्यक्तिवाद के शिकार होते जाएँगे या फिर हम उस सतही बुर्जुआ तरक्की के मोहजाल में फँस जाएँगे, कार्ल मार्क्स के शब्दों में, जो व्यक्ति और जनता को खून–खराबे, गन्दगी, दुख और बदहाली से गुजारे बिना कभी सम्भव नहीं रही है। उसी लेखक के शब्दों में कहें तो, बुर्जुआ प्रगति उस भयानक विधर्मी प्रतिमा जैसी है जो मारे गये लोगों की खोपड़ियों के अलावा किसी और दूसरी चीज से अमृत नहीं पीती।
अफ्रीका में उस विधर्मी प्रतिमा की सत्ता का खात्मा तय है। अफ्रीकी लेखकों को उस साम्राज्यवादी प्रतिमा और उसके गोरे और काले फरिश्तों के गिरोह को हमेशा के लिए दफनाने में मेहनतकश जनता का साथ देना चाहिए।
टिप्पणी
1– अक्टूबर, 1975 में, साहित्य विभाग की व्याख्यान–माला के अन्तर्गत दिया गया सार्वजनिक व्याख्यान।
2– 1976 में, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ अंगोला के राष्ट्रपति।
3– चिनुआ अचेबे, ‘द अफ्रीकन राइटर एंड द बियाफ्रन कॉज’, मॉर्निंग येट ऑन क्रिएशन डे (हैनमैन, लन्दन, 1975), पृष्ठ–78।
4– सेम्बियन उस्मान, ‘फिंगर्स’, लोटस अवार्ड्स 1971 में उद्धृत, एफ्रो–एशियन राइटर्स के स्थायी ब्यूरो द्वारा प्रकाशित।
हिन्दी अनुवाद–– सोनू पवाँर
लेखक की अन्य रचनाएं/लेख
अवर्गीकृत
- एक अकादमिक अवधारणा 20 Aug, 2022
- किताब परिचय : फ्रांस की क्रान्ति 1 Oct, 2026
- जीडीपी के आँकड़े बनाम आम आदमी की जेब 1 Oct, 2026
- डीएचएफएल घोटाला : नवउदारवाद की एक और झलक 14 Mar, 2019
- फिदेल कास्त्रो सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के हिमायती 10 Jun, 2020
- बायोमेडिकल रिसर्च 14 Jan, 2021
- भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारत को मुसलमानों का महान स्थायी योगदान 23 Sep, 2020
- सर्वोच्च न्यायलय द्वारा याचिकाकर्ता को दण्डित करना, अन्यायपूर्ण है. यह राज्य पर सवाल उठाने वालों के लिए भयावह संकेत है 20 Aug, 2022
- हो ची मिन्ह के देश में 5 May, 2026
सामाजिक-सांस्कृतिक
- अम्बेडकर ने कहा था कि हिन्दू राज भारत के लिए सबसे बड़ी आपदा होगी 4 Jul, 2025
- उपभोक्तावाद की संस्कृति 12 Dec, 2025
- एक आधुनिक कहानी एकलव्य की 23 Sep, 2020
- एपस्टीन की फाइलों से साफ जाहिर होता है कि कुलीन वर्ग कैसे काम करता है 5 May, 2026
- एलन मस्क और महिलाओं की ‘सुरक्षा’ का झूठा दक्षिणपंथी आख्यान 7 Jul, 2025
- किसान आन्दोलन के आह्वान पर मिट्टी सत्याग्रह यात्रा 20 Jun, 2021
- गैर बराबरी की महामारी 20 Aug, 2022
- घोस्ट विलेज : पहाड़ी क्षेत्रों में राज्यप्रेरित पलायन –– मनीषा मीनू 19 Jun, 2023
- चार महीने में चैथी बार : स्मारकों पर हमले का अर्थ 1 Oct, 2026
- दिल्ली के सरकारी स्कूल : नवउदारवाद की प्रयोगशाला 14 Mar, 2019
- पहाड़ में नफरत की खेती –– अखर शेरविन्द 19 Jun, 2023
- सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर राजनीति 14 Dec, 2018
- साम्प्रदायिकता और संस्कृति 20 Aug, 2022
- हमारा जार्ज फ्लायड कहाँ है? 23 Sep, 2020
- ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ पर केन्द्रित ‘कथान्तर’ का विशेषांक 13 Sep, 2024
जीवन और कर्म
- एक दिन सभी मनुष्य समान होंगे 1 Oct, 2026
- दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा 1 Jan, 2025
- रामवृक्ष बेनीपुरी का बाल साहित्य : मनुष्य की अपराजेय शक्ति में आस्था 14 Jan, 2021
राजनीति
- 106 वर्ष प्राचीन पटना संग्रहालय के प्रति बिहार सरकार का शत्रुवत व्यवहार –– पुष्पराज 19 Jun, 2023
- असली परजीवी कौन हैं? 1 Oct, 2026
- इलेक्टोरल बॉण्ड घोटाले पर जानेमाने अर्थशास्त्री डॉक्टर प्रभाकर का सनसनीखेज खुलासा 6 May, 2024
- कर्नाटक सरकार देवनहल्ली के किसानों के साथ विश्वासघात कर रही है 4 Jul, 2025
- कोरोना वायरस, सर्विलांस राज और राष्ट्रवादी अलगाव के खतरे 10 Jun, 2020
- जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का तर्कहीन मसौदा 21 Nov, 2021
- डिजिटल कण्टेण्ट निर्माताओं के लिए लाइसेंस राज 13 Sep, 2024
- नया वन कानून: वन संसाधनों की लूट और हिमालय में आपदाओं को न्यौता 17 Nov, 2023
- नये श्रम कानून मजदूरों को ज्यादा अनिश्चित भविष्य में धकेल देंगे 14 Jan, 2021
- बेरोजगार भारत का युग 20 Aug, 2022
- बॉर्डर्स पर किसान और जवान 16 Nov, 2021
- मोदी के शासनकाल में बढ़ती इजारेदारी 14 Jan, 2021
- राजनीति में लेखकों की भूमिका 1 Oct, 2026
- शिक्षा में घोल दी नफरत की राजनीति (साजिश हिन्दुत्व के नाम पर) 1 Oct, 2026
- सत्ता के नशे में चूर भाजपाई कारकूनों ने लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से रौंदा 23 Nov, 2021
- हरियाणा किसान आन्दोलन की समीक्षा 20 Jun, 2021
समाचार-विचार
- 130वाँ संविधान संशोधन विधेयक–– भाजपा का ‘एक पार्टी एक देश’ की तरफ बढ़ता एक और कदम 12 Dec, 2025
- स्विस बैंक में जमा भारतीय कालेधन में 50 फीसदी की बढ़ोतरी 20 Aug, 2022
- अगले दशक में विश्व युद्ध की आहट 6 May, 2024
- अफगानिस्तान में तैनात और ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों की आत्महत्या 14 Jan, 2021
- अमरीका में ट्रम्प के खिलाफ आन्दोलन 7 Jul, 2025
- अमीरी–गरीबी की बढ़ती खाई और भगत सिंह के विचार 12 Dec, 2025
- अहमदाबाद में क्लीनिकल ट्रायल के जरिये गरीबों का शिकार 12 Dec, 2025
- आरओ जल–फिल्टर कम्पनियों का बढ़ता बाजार 6 May, 2024
- इजराइल–अरब समझौता : डायन और भूत का गठबन्धन 23 Sep, 2020
- उत्तर प्रदेश : लव जेहाद की आड़ में धर्मान्तरण के खिलाफ अध्यादेश 14 Jan, 2021
- उत्तर प्रदेश में मीडिया की घेराबन्दी 13 Apr, 2022
- उत्तराखण्ड के पेपर लीक पर मुख्यमंत्री धामी के नफरती बयान 12 Dec, 2025
- उनके प्रभु और स्वामी 14 Jan, 2021
- एआई : तकनीकी विकास या आजीविका का विनाश 17 Nov, 2023
- एआई तकनीकी विकास और उसके सामाजिक सरोकार 12 Dec, 2025
- काँवड़ के बहाने ढाबों–ढेलों पर नाम लिखाने का साम्प्रदायिक फरमान 13 Sep, 2024
- किसान आन्दोलन : लीक से हटकर एक विमर्श 14 Jan, 2021
- कुम्भ मेले में भगदड़ 7 Jul, 2025
- कोयला खदानों के लिए भारत के सबसे पुराने जंगलों की बलि! 23 Sep, 2020
- कोरोना जाँच और इलाज में निजी लैब–अस्पताल फिसड्डी 10 Jun, 2020
- कोरोना ने सबको रुलाया 20 Jun, 2021
- क्या उत्तर प्रदेश में मुसलमान होना ही गुनाह है? 23 Sep, 2020
- क्यूबा तुम्हारे आगे घुटने नहीं टेकेगा, बाइडेन 16 Nov, 2021
- खाली जेब, खाली पेट, सर पर कर्ज लेकर मजदूर कहाँ जायें 23 Sep, 2020
- खिलौना व्यापारियों के साथ खिलवाड़ 23 Sep, 2020
- गाँव में बढ़ती बीमारी, बेहाल जनता और बदहाल व्यवस्था 12 Dec, 2025
- छल से वन अधिकारों का दमन 15 Jul, 2019
- छात्रों को शोध कार्य के साथ आन्दोलन भी करना होगा 19 Jun, 2023
- जीवन रक्षक दवाइयाँ ही बन रहीं जानलेवा 5 May, 2026
- त्रिपुरा हिंसा की वह घटना जब तस्वीर लेना ही देशद्रोह बन गया! 13 Apr, 2022
- दिल्ली उच्च न्यायलय ने केन्द्र सरकार को केवल पाखण्डी ही नहीं कहा 23 Sep, 2020
- दिल्ली के उत्तम नगर में दंगे की कोशिश नाकाम 5 May, 2026
- दिल्ली दंगे का सबक 11 Jun, 2020
- देश के बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में 14 Dec, 2018
- न्यूज चैनल : जनता को गुमराह करने का हथियार 14 Dec, 2018
- बंगले में लगी आग तो सामने आयी हकीकत 7 Jul, 2025
- बच्चों का बचपन और बड़ों की जवानी छीन रहा है मोबाइल 16 Nov, 2021
- बीमारी से मौत या सामाजिक स्वीकार्यता के साथ व्यवस्था द्वारा की गयी हत्या? 13 Sep, 2024
- बुद्धिजीवियों से नफरत क्यों करते हैं दक्षिणपंथी? 15 Jul, 2019
- बैंकों की बिगड़ती हालत 15 Aug, 2018
- बढ़ते विदेशी मरीज, घटते डॉक्टर 15 Oct, 2019
- भारत देश बना कुष्ठ रोग की राजधानी 20 Aug, 2022
- भारत ने पीओके पर किया हमला : एक और फर्जी खबर 14 Jan, 2021
- भीड़ का हमला या संगठित हिंसा? 15 Aug, 2018
- मजदूरों–कर्मचारियों के हितों पर हमले के खिलाफ नये संघर्षों के लिए कमर कस लें! 10 Jun, 2020
- महाराष्ट्र के कपास किसानों की दुर्दशा उन्हीं की जबानी 23 Sep, 2020
- महाराष्ट्र में कर्मचारी भर्ती का ठेका निजी कम्पनियों के हवाले 17 Nov, 2023
- महाराष्ट्र में चार सालों में 12 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की 15 Jul, 2019
- महालनोबिस ने बनाया और मोदी ने तोड़ा 12 Dec, 2025
- माइक्रोफाइनेंस उद्योग– मुनाफे की भेंट चढ़ती जिन्दगियाँ 12 Dec, 2025
- मानव अंगों की तस्करी का घिनौना व्यापार 13 Sep, 2024
- मौत के घाट उतारती जोमैटो की 10 मिनट ‘इंस्टेण्ट डिलीवरी’ योजना 20 Aug, 2022
- यूपीएससी की तैयारी में लगे छात्रों की दुर्दशा, जिम्मेदार कौन? 13 Sep, 2024
- रक्षा बजट में रिकार्ड बढ़ोतरी किसके लिए 7 Jul, 2025
- राजस्थान में परमाणु पावर प्लाण्ट का भारी विरोध 13 Sep, 2024
- रेलवे का निजीकरण : आपदा को अवसर में बदलने की कला 23 Sep, 2020
- रोजगार के नाम पर धोखाधड़ी 7 Jul, 2025
- लोग पुरानी पेंशन योजना की बहाली के लिए क्यों लड़ रहे हैं 17 Nov, 2023
- विधायिका में महिला आरक्षण की असलियत 17 Nov, 2023
- वैश्विक लिंग असमानता रिपोर्ट 20 Aug, 2022
- श्रीलंका पर दबाव बनाते पकड़े गये अडानी के “मैनेजर” प्रधानमंत्री जी 20 Aug, 2022
- संस्कार भारती, सेवा भारती––– प्रसार भारती 14 Jan, 2021
- सत्ता–सुख भोगने की कला 15 Oct, 2019
- सरकार द्वारा लक्ष्यद्वीप की जनता की संस्कृति पर हमला और दमन 20 Jun, 2021
- सरकार बहादुर कोरोना आपके लिए अवसर लाया है! 10 Jun, 2020
- सरकार, न्यायपालिका, सेना की आलोचना करना राजद्रोह नहीं 15 Oct, 2019
- सरकारी विभागों में ठेका कर्मियों का उत्पीड़न 15 Aug, 2018
- स्मार्ट सिटी टाँय टाँय फिस्स 7 Jul, 2025
- हम इस फर्जी राष्ट्रवाद के सामने नहीं झुकेंगे 13 Apr, 2022
- हाथरस की भगदड़ में मौत का जिम्मेदार कौन 13 Sep, 2024
- हिन्दुत्व के पोस्टर बॉय हिमंता बिस्वा सरमा और भ्रष्टाचार 5 May, 2026
- हुकुम, बताओ क्या कहूँ जो आपको चोट न लगे। 13 Apr, 2022
- ‘मजदूरों के ऊपर तजुर्बा करो, अमीरों की सेवा करो’ 7 Jul, 2025
कविता
- अपने लोगों के लिए 6 May, 2024
- कितने और ल्हासा होंगे 23 Sep, 2020
- गेहुँआ अफ्रीका 5 May, 2026
- चल पड़ा है शहर कुछ गाँवों की राह 23 Sep, 2020
- जी एन साईबाबा की कविताएँ 1 Jan, 2025
- तुच्छ जीवन की महान गाथा 5 May, 2026
- बच्चे काम पर जा रहे हैं 19 Jun, 2023
साक्षात्कार
- कम कहना ही बहुत ज्यादा है : एडुआर्डो गैलियानो 20 Aug, 2022
- चे ग्वेरा की बेटी अलेदा ग्वेरा का साक्षात्कार 14 Dec, 2018
- नेपाल के मौजूदा हालात पर कॉमरेड आहुति से बातचीत 5 May, 2026
- फैज अहमद फैज के नजरिये से कश्मीर समस्या का हल 15 Oct, 2019
- भारत के एक बड़े हिस्से में मर्दवादी विचार हावी 15 Jul, 2019
साहित्य
- अव्यवसायिक अभिनय पर दो निबन्ध –– बर्तोल्त ब्रेख्त 17 Feb, 2023
- औपनिवेशिक सोच के विरुद्ध खड़ी अफ्रीकी कविताएँ 6 May, 2024
- कविता का मूलस्रोत 12 Dec, 2025
- किसान आन्दोलन : समसामयिक परिदृश्य 20 Jun, 2021
- खामोश हो रहे अफगानी सुर 20 Aug, 2022
- चिली में गुप्तवास 7 Jul, 2025
- जनतांत्रिक समालोचना की जरूरी पहल – कविता का जनपक्ष (पुस्तक समीक्षा) 20 Aug, 2022
- जैक लण्डन का उपन्यास ‘आयरन हील’ के बारे में 1 Jan, 2025
- निकोलाई ओस्त्रोव्स्की का उपन्यास ‘अग्निदीक्षा’ 4 Jul, 2025
- निशरीन जाफरी हुसैन का श्वेता भट्ट को एक पत्र 15 Jul, 2019
- फासीवाद के खतरे : गोरी हिरणी के बहाने एक बहस 13 Sep, 2024
- फैज : अँधेरे के विरुद्ध उजाले की कविता 15 Jul, 2019
- श्रम और साहित्य पर दो दिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न 5 May, 2026
- सच लिखने में पाँच कठिनाइयाँ 12 Dec, 2025
- सामाजिक चेतना जगाने में नाटकों की भूमिका : नोबेल विजेता––दारियो लुइगी एंजेलो फो 1 Jan, 2025
- “मैं” और “हम” 14 Dec, 2018
कहानी
- एक देवदासी 12 Dec, 2025
- जामुन का पेड़ 8 Feb, 2020
- पानीपत की चैथी लड़ाई 16 Nov, 2021
- माटी वाली 17 Feb, 2023
- समझौता 13 Sep, 2024
अन्तरराष्ट्रीय
- अमरीका की हथकड़ी–बेड़ी नीति और भारतीय शासकों की बेहयाई 7 Jul, 2025
- अमरीका बनाम चीन : क्या यह एक नये शीत युद्ध की शुरुआत है 23 Sep, 2020
- इजराइल का क्रिस्टालनाख्त नरसंहार 17 Nov, 2023
- क्या लोकतन्त्र का लबादा ओढ़े अमरीका तानाशाही में बदल गया है? 14 Dec, 2018
- नरसंहार पर पर्दा डालने वाले आर्थिक सिद्धान्त के लिए नोबेल 4 Jul, 2025
- पश्चिम एशिया में निर्णायक मोड़ 15 Aug, 2018
- प्रतिबन्धों का मास्को पर कुछ असर नहीं पड़ा है, जबकि यूरोप 4 सरकारें गँवा चुका है: ओरबान 20 Aug, 2022
- बोलीविया में तख्तापलट : एक परिप्रेक्ष्य 8 Feb, 2020
- भारत–इजराइल साझेदारी को मिली एक वैचारिक कड़ी 15 Oct, 2019
- भोजन, खेती और अफ्रीका : बिल गेट्स को एक खुला खत 17 Feb, 2023
- महामारी के बावजूद 2020 में वैश्विक सामरिक खर्च में भारी उछाल 21 Jun, 2021
- लातिन अमरीका के मूलनिवासियों, अफ्रीकी मूल के लोगों और लातिन अमरीकी संगठनों का आह्वान 10 Jun, 2020
- वह दिन जब परमाणु सम्पन्न ईरान का जन्म हुआ 7 Jul, 2025
- सउ़दी अरब की साम्राज्यवादी विरासत 16 Nov, 2021
- ‘जल नस्लभेद’ : इजराइल कैसे गाजा पट्टी में पानी को हथियार बनाता है 17 Nov, 2023
श्रद्धांजलि
राजनीतिक अर्थशास्त्र
व्यंग्य
- अगला आधार पाठ्यपुस्तक पुनर्लेखन –– जी सम्पत 19 Jun, 2023
- आजादी को आपने कहीं देखा है!!! 20 Aug, 2022
- इन दिनों कट्टर हो रहा हूँ मैं––– 20 Aug, 2022
- नुसरत जहाँ : फिर तेरी कहानी याद आयी 15 Jul, 2019
- बडे़ कारनामे हैं बाबाओं के 13 Sep, 2024
विचार-विमर्श
- अतीत और वर्तमान में महामारियों ने बड़े निगमों के उदय को कैसे बढ़ावा दिया है? 23 Sep, 2020
- अस्तित्व बनाम अस्मिता 14 Mar, 2019
- क्या है जो सभी मेहनतकशों में एक समान है? 23 Sep, 2020
- क्रान्तिकारी विरासत और हमारा समय 13 Sep, 2024
- दिल्ली सरकार की ‘स्कूल्स ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सलेंस’ की योजना : एक रिपोर्ट! 16 Nov, 2021
- धर्म की आड़ 17 Nov, 2023
- पलायन मजा या सजा 20 Aug, 2022
- राजनीति में आँधियाँ और लोकतंत्र 14 Jun, 2019
- लीबिया की सच्चाई छिपाता मीडिया 17 Nov, 2023
- लोकतंत्र के पुरोधाओं ने लोकतंत्र के बारे में क्या कहा था? 23 Sep, 2020
- विकास की निरन्तरता में–– गुरबख्श सिंह मोंगा 19 Jun, 2023
- विश्व चैम्पियनशिप में पदक विजेता महिला पहलवान विनेश फोगाट से बातचीत 19 Jun, 2023
- सरकार और न्यायपालिका : सम्बन्धों की प्रकृति क्या है और इसे कैसे विकसित होना चाहिए 15 Aug, 2018
मीडिया
- मीडिया का असली चेहरा 15 Mar, 2019
फिल्म समीक्षा
- समाज की परतें उघाड़ने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ 15 Jul, 2019