देश भर से जब लाखों छात्र अपने घर से इंजिनियर बनने का सपना पूरा करने निकलते हैं तो उनकी ख्वाहिश होती है कि किसी अच्छे कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करें। पर पहले तो कोचिंग की और फिर कॉलेज की फीस ही उन्हें निराश कर देती है। कितने ही छात्र महँगी फीस सुनकर ही अपना सपना बदल लेते हैं। कुछ छात्र शिक्षा के लिए लोन लेकर, अपने माँ–बाप की कुछ सम्पत्ति गिरवी रखकर फीस भर देते हैं। इंजीनियरिंग के पहले साल में कॉलेज का मैनेजमेंट भरोसा दिलाता है कि सबका प्लेसमेंट होगा, हमारे यहाँ बहुत सारी कम्पनियाँ आती हैं। फाइनल ईयर तक आते–आते वही मैनेजमेंट मन्दी (रिसेशन) का रोना शुरू कर देते हैं। कहते हैं–– मार्केट में अभी जॉब ही नहीं है। कहीं भी कैसे भी एक्सपीरियंस हासिल कर लो।

फिर भी कुछ कम्पनियों में छात्रों को बैठने का मौका मिलता है। ज्यादातर कम्पनियाँ नोन टेक में प्लेसमेंट देती हैं। मतलब आपने पढ़ाई सॉफ्टवेर में की है और आपका प्लेसमेंट साबुन बेचने के लिए हो रहा है। कम्पनियाँ छात्रों को बिठाने से पहले एक सर्कुलर जारी करती हैं जिसमें छात्रों की परसेंटेज और अन्य जरूरी योग्यताओं का जिक्र होता है। साथ ही कम्पनी क्या काम करती है, किस प्रोफाइल पर भर्ती करेगी, कितने छात्रों का चयन करेगी, उनको कितनी तनख्वाह देगी और किस शहर में प्लेस करेगी इसकी जानकारी होती है।

प्लेसमेंट होने पर छात्र मिठाई बाँटता है, घरवालों को भी लगता है कि उनके बेटा या बेटी की मेहनत रंग लायी। पर कम्पनी में पहुँचने पर एक बार फिर वह छात्र धोखाधड़ी का शिकार होता है। कम्पनी कहती है कि आप को पहले तीन महीने बिना किसी तनख्वाह के इण्टर्नशिप करनी होगी। अब शहर में तीन महीने रहने का खर्च, आना–जाना, कपड़े आदि के लिए फिर से हजारों रुपये बेरोजगार छात्र की जेब से यह सिस्टम निकलवा लेता है। किसी तरह तीन महीने भी वह इंजीनियर बनने का सपना पूरा होने की उम्मीद में काट लेता है। तीन महीने बाद वही कम्पनी फिर ठेंगा दिखा देती है कि हमें अनुभवी बन्दों की जरूरत है। उधर कॉलेज वाले किसी दूसरी कम्पनी में बैठने नहीं देते, वे कहते हैं कि हमने तो प्लेसमेंट करा दिया है अब हमारी जिम्मेदारी पूरी हो गयी। छात्र हताश–निराश इंजीनियरिंग की डिग्री लिए नोएडा–गुडगाँव की मनहूस इमारतों में अपना बायोडाटा लेकर घूमने को मजबूर हो जाता है।

इंजीनियर बनने का सपना लेकर मँहगी शिक्षा पाने के बाद भी आज लाखों नौजवान दर–दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं। इसका जिम्मेदार कौन है?

–– दीपक