(नेपाल के प्रख्यात कवि और वामपंथी चिन्तक विश्वभक्त दुलाल (आहुति) का यह साक्षात्कार 13 अप्रैल 2026 को नेपालन्यूज–डॉट–कॉम में प्रकाशित हुआ था। आहुति ने 2008 की संविधान सभा में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) का प्रतिनिधित्व किया था। नेपाली समाज की जाति व्यवस्था और दलित मुद्दों पर उनके विश्लेषण को बहुत गम्भीरता से लिया जाता है। फिलहाल वह ‘वैज्ञानिक समाजवादी कम्युनिस्ट पार्टी’ के संयोजक हैं। पत्रकार धु्रवसत्य परियार और विनोद ढकाल ने उनसे बातचीत की और जेन जी आन्दोलन के बाद नेपाल के बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा की। हम यह इंटरव्यू साभार प्रस्तुत कर रहे हैं।)

सवाल: राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार ने अतीत में राज्य द्वारा किये गये जातीय भेदभाव पर दलित समुदाय से माफी माँगी है। आप इस सम्बन्ध में क्या सोचते हैं?  

जवाब: नेपाल सरकार ने दलितों से सम्बन्धित मुद्दों पर बार–बार घोषणाएँ की हैं। दलित ही नहीं बल्कि देशज जनजातियों, महिलाओं और हाशिये पर पड़े अनेक वंचित समूहों के बारे मे भी घोषणाएँ होती रही हैं। जनयुद्ध और एक के बाद एक जनान्दोलनों के बाद राज्य ने संवैधानिक या वैधानिक तौर पर किसी न किसी तरह का सुधार कार्यक्रम शुरू किया है।

बावजूद इसके दलितों के मामले में इस तरह की घोषणाएँ निरन्तर उनकी बुनियादी समस्याओं को सम्बोधित करने में विफल रही हैं। इस तरह की घोषणाएँ कि देश को छुआछूत से मुक्त कर दिया गया महज प्रोपगेण्डा और नाटक से अधिक साबित नहीं हुआ है। आरएसपी और इसकी सरकार द्वारा दलितों से हाल में जो माफी माँगी गयी है वह पूँजीवादी सरकारों द्वारा की जाने वाली अब तक की नाटकबाजी से कुछ भिन्न नहीं है।

यहाँ इस तथ्य को याद करने की जरूरत है कि जनयुद्ध और जनान्दोलनों के बाद जो संविधान तैयार किया गया उसमें पहले ही उन बातों को शामिल कर लिया गया था जिन्हें युगान्तकारी सुधार कहा जा सकता है। इसमें संसद, प्रान्तीय एसेम्बलियों और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व देने से लेकर सरकारी नौकरियों में इन्हें शामिल करने के प्रयासों का जिक्र है।

अगर हम स्थानीय स्तर से लेकर संघीय स्तर तक गारण्टीशुदा समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और मौखिक क्षमा माँगने की तुलना करें तो किसमें ज्यादा वजन है? दलितों, महिलाओं, जनजातियों और अल्पसंख्यक समूहों का राज्य के समूचे ढाँचे में प्रतिनिधित्व सुनिश्चत करना एक ठोस उपलब्धि है। इसके विपरीत क्षमायाचना उस घोषणा से भिन्न नहीं है कि देश को छुआछूत मुक्त कर दिया गया। यह भी एक नाटक ही होगा।

जनयुद्ध के बाद दलितों के लिए जो संवैधानिक व्यवस्थाएँ की गयीं वे अपर्याप्त साबित हुर्इं। माफी माँगने से इसका समाधान नहीं होगा। आरएसपी के अध्यक्ष रवि लामिछाने ने संसद में अपने भाषण के दौरान घोषणा की कि जातीय विभेद एक संगठित अपराध है। अगर सचमुच ऐसा है तो उनके खुद के संगठन ने इसका सामना करने के लिए क्या उपाय किये हैं?

प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के अन्तर्गत आरएसपी के जो भी उम्मीदवार निर्वाचित हुए हैं उनमें से 61 प्रतिशत लोग ब्राम्हण–छेत्री समुदाय के हैं। यहाँ तक कि मधेशी, जनजाति और महिलाओं के निर्वाचन क्षेत्र का जिन लोगों ने नाममात्र प्रतिनिधित्व किया उनमें से भी अधिकांश सवर्ण हिन्दू जाति के हैं। प्रत्यक्ष चुनाव में आरएसपी ने दलितों तथा अन्य वंचित समूहों से कितने प्रतिशत लोगों को उम्मीदवार बनाया? क्या उन्होंने अपनी पार्टी के अन्दर विभिन्न पदों पर दलितों, महिलाओं और जनजाति समूहों का प्रतिनिधित्व किया? आरएसपी में निर्णय लेने की जिम्मेदारी किन लोगों के पास है? और क्या सन्तोष परियार को रोते हुए पार्टी नहीं छोड़ना पड़ा?

ये लोग अपने खुद के संगठन में तब्दीली लाने में असफल रहे हैं।  संसद में आरएसपी की ओर से दलितों का जो प्रतिनिधित्व है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तथाकथित संगठित अपराध को पार्टी ने खुद ही बढ़ावा दिया है। यह महज आरोप नहीं है– तथ्यों को देखें तो इसकी पुष्टि हो जाती है। ऐसे समय महज माफी माँग लेने से कोई भी समाधान नहीं निकल सकता।

सवाल: फिर बालेन शाह की सरकार और आरएसपी को क्या करना चाहिए? 

जवाब: बात केवल उनकी पार्टी का नहीं हैय मामला यह है कि नेपाली राज्य और समाज के समूचे ढाँचे में ही जाति व्यवस्था गहरी पैठ बनाये हुए है। यह व्यवस्था राजनीतिक सत्ता, अर्थव्यवस्था और संस्कृति यानी सब जगह मौजूद है। बावजूद इसके इसे तोड़ने का कोई भी सार्थक प्रयास नहीं किया गया।

अगर हम इसे संगठित अपराध कहते हैं तो यह हर क्षेत्र में फैला हुआ है। राजनीति में सभी राजनीतिक दल और राज्य प्रशासन इसके अंग हैं। आर्थिक क्षेत्र में बैंकों से लेकर वित्तीय संस्थानों तक सभी इसकी चपेट में हैं, कर्ज पाने से लेकर भूस्वामित्व के तरीके तक सब इससे प्रभावित हैं। संस्कृति के क्षेत्र में समाज की संरचना ऐसी की गयी है जिसमें हर व्यक्ति जातिगत श्रेणीबद्धता में सीमित है जिसमें प्रत्येक जाति दूसरी जाति के मुकाबले बड़ी या छोटी है। यहाँ तक कि सांस्कृतिक संगठन भी इसी तर्ज पर काम करते हैं। जरूरत इस बात है कि इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए ठोस कार्यक्रम लिए जायें।

तो भी पार्टी के अन्दर और उनके द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों में यही चलन जारी है। नेपाल में सभी संसदीय पार्टियों की जड़ें जाति व्यवस्था में हैं और किसी के पास इसे चुनौती देने का कोई गम्भीर कार्यक्रम नहीं है। किसी ढाँचागत योजना के बिना माफी माँगना राज्य द्वारा लम्बे समय से किये जा रहे नाटक का ही हिस्सा कहा जाएगा।

सवाल: फिर सरकार को किससे माफी माँगनी चाहिए?

जवाब: माफी माँगने की बात कहने का तात्पर्य है मुक्ति का कार्यक्रम विकसित करना। सड़क चलते अगर गलती से किसी से कोई भूल हो जाती है तो वहाँ ‘‘सॉरी’’ कह कर निकला जा सकता है क्योंकि इस तरह गलती में तुरन्त सुधार कर लिया जाता है। लेकिन ढाँचागत और ऐतिहासिक उत्पीड़न पूरी तरह अलग मामला है। इससे जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई की जानी चाहिए और नीति तथा ढाँचा दोनों स्तरों पर समाधानों को लागू किया जाना चाहिए।

खुद राज्य ने ‘मुलुकी ऐन’ (नागरिक कानून) के प्रावधानों के जरिये जाति व्यवस्था को बरकरार रखा। उस इतिहास के लिए महज सॉरी कह देने से क्षतिपूर्ति नहीं हो जाती। वास्तविक समाधान के लिए जरूरत है आर्थिक क्षतिपूर्ति की, राजनीतिक सत्ता में सार्थक प्रतिनिधित्व की और सांस्कृतिक उन्नयन के लिए ठोस पहल की। इस तरह के उपायों के जरिये ही माफी माँगने का कोई वास्तविक अर्थ हो सकता है।

केवल मौखिक माफी माँगना व्यर्थ की कवायद है। आस्ट्रेलिया या न्यूजीलैण्ड द्वारा देशज समूहों से माफी माँग लिये जाने की घटना से यह भिन्न नहीं है। न्यूजीलैण्ड में इन समूहों से माफी माँगी गयी लेकिन इन समूहों की आज भी जो हालत है उसे देखा जा सकता है। यह एक बहुत चालू तरीका है कि उत्पीड़न के ढाँचे को ज्यों का त्यों छोड़ दो और मौखिक तौर पर माफी माँग लो।

जरूरत केवल शब्दों की नहीं, बल्कि ठोस क्षतिपूर्ति–कार्यक्रमों की है, उस ढाँचे को पूरी तरह तोड़ देने की है जिसने इस उत्पीड़न को पैदा किया।

अब आप सोचिए कि यहाँ क्या हो रहा है। जाति व्यवस्था बिलकुल पहले जैसी बनी हुई है। उसी जाति व्यवस्था के आधार पर राजनीतिक पार्टियों का गठन हो रहा है। इसी आधार पर प्रशासनिक ढाँचा तैयार हुआ है। इसी ढाँचे के अन्तर्गत बैंक और वित्तीय संस्थान काम करते थे। और तुर्रा यह कि मौखिक क्षमा याचना की पेशकश कर दी गयी। सभ्य राजनीति की बुनियादी समझ रखने वाले किसी भी समाज के लिए यह किसी हास्यास्पद स्थिति से भिन्न नहीं है।

सवाल: ऐसी स्थिति में इस सरकार को ऐसा क्या करना चाहिए जिससे उत्पीड़ित समुदायों को न्याय मिल सके?

जवाब: मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था जाति प्रणाली में किसी तरह का बुनियादी परिवर्तन नहीं ला सकती। यह राजनीतिक व्यवस्था जनजातियों, महिलाओं या मजदूर वर्ग को कुछ भी सार्थक नहीं दे सकती। कारण बहुत स्पष्ट है–– यह एक पूँजीवादी संसदीय व्यवस्था है जो यहाँ–वहाँ छोटे–मोटे सुधार कर सकती है लेकिन मजदूर वर्ग के बुनियादी हितों को कभी पूरा नहीं कर सकती।

दरअसल, आज यहाँ एक दलाल पूँजीवादी अर्थव्यवस्था है। नवउदारवाद का यह तर्क है कि उत्पीड़ित राष्ट्रों और विकासशील देशों को सार्थक उत्पादन से बाहर रखा जाये। यह लागत को बढ़ाती है ताकि कृषि को हतोत्साहित किया जाये और घरेलू उद्योंगों के विकास में रुकावट पैदा करती है। नतीजे के तौर पर हम एक उपभोक्तावादी समाज पाते हैं–– एक ऐसा समाज जो बस बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा पैदा किये गये सामानों को खरीदता है और उनका उपभोग करता है। जहाँ घरेलू उत्पादन नहीं होगा, बेरोजगारी अनिवार्य रूप से बढ़ेगी।

ऐसी स्थिति में मजदूरों के पास आधुनिक गुलामों की तरह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारखानों में खटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। उनके वेतन का निर्धारण इन कम्पनियों द्वारा किया जाता है। वे न तो हड़ताल कर सकते हैं, न संगठित हो सकते हैं और न सामूहिक तौर पर मोल–तोल कर सकते हैं। यहाँ तक कि वे सही अर्थों में मजदूर की तरह भी जीवन नहीं बिता सकते–– उनकी हालत आधुनिक दासों वाली हो जाती है। नवउदारवाद सक्रिय तौर पर इसी तरह के समाज का निर्माण कर रहा है। और फिर भी इस व्यवस्था ने और इसके अन्तर्गत काम करने वाली राजनीतिक पार्टियों ने इसी नवउदारवादी एजेण्डा को, जिसे विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बढ़ावा दिया है, अपने निदेशक सिद्धान्त के रूप में अंगीकार किया है। ऐसी हालत में वे मजदूर वर्ग के पक्ष में कैसे काम कर सकते हैं?

सवाल: क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आरएसपी मजदूर वर्ग के हित में काम नहीं कर सकती?

जवाब: पूँजीवाद बुनियादी तौर पर देशज जनजातियों के खिलाफ है। इसकी वजह यह है कि जनजातियों का निर्माण उन तीन विशिष्टताओं से जुड़ा हुआ है जिसे पूँजीवाद अपनी प्रकृति की वजह से नष्ट करना चाहता है। पहला है सामुदायिक जीवन। पूँजीवाद को अधिक से अधिक सामान बेचने की जरूरत होती है और ऐसा करने के लिए जरूरी है कि समुदाय अलग–अलग रहें। जब एक परिवार विभाजित होकर दो हो जाएगा तभी उनके दो टेलीविजन सेट बिकेंगे। जब कोई समुदाय साथ–साथ रहता है तो वह तालाबों और चारागाह की जमीनों में हिस्सा बाँट लेता है और उसे खरीदने की जरूरत नहीं होती। इसलिए उपभोक्ताओं को पैदा करने के लिए पूँजीवाद के लिए जरूरी है कि वह सामुदायिक जीवन को तोड़ दे। यही वजह है कि देशज जनजातियाँ इनके निशाने पर होती हैं।

दूसरे कारक का सम्बन्ध प्रकृति के साथ गहरे लगाव से है। देशज लोग हजारों वर्षों से साथ–साथ एक जगह रहते रहे हैं। उन्हें पता होता है कि किस मौसम में कौन सी चिड़िया गाती है। लेकिन मुनाफे की तलाश में जहाँ भी पूँजीवाद जाता है वह प्रकृति का विध्वंस करता है। मुनाफा ही पूँजीवाद की एकमात्र चालक शक्ति है। नेपाल में एमसीसी समझौते का मकसद तामांग बस्तियों को नष्ट करना था। देशज समुदाय चिड़ियों और नदियों के साथ तालमेल बनाकर रखता है–– पूँजीवाद उन नदियों को बेचना चाहता है।

तीसरी बात का सरोकार भाषा से है। देशज भाषाओं में अनेक पीढ़ियों का पारम्परिक ज्ञान और विज्ञान शामिल होता है। लेकिन अपने उत्पादों को बेचने के लिए पूँजीवाद के लिए जरूरी है कि वह स्थानीय ज्ञान को समाप्त कर दे। बुखार के लिए परम्परागत इलाज को नीचा दिखाते हुए कुछ ऐसा किया जाता है कि पैरासिटामॉल को बाजार मिले। पूँजीवाद स्थानीय भाषाओं को खत्म कर देता है। दुनिया के किसी भी हिस्से में पूँजीवाद ने कभी देशज समुदायों के पक्ष में काम नहीं किया है।

पूँजीवाद जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ने से भी इनकार करता है। औद्योगिक क्रान्ति के बाद ब्रिटेन से भारत आये अंग्रेज पूँजीवादी थे। उन्होंने सती प्रथा समाप्त किया जो एक प्राचीन प्रथा थी जिसमें कोई विधवा अपने पति की चिता में कूदकर जान दे देती थी। अंग्रेजों ने दासता के विरोध में लड़ाई लड़ी। लेकिन उन्होंने कभी भी जाति प्रथा को चुनौती नहीं दी। इसकी वजह बहुत साफ थी–– जाति प्रथा की वजह से सस्ते मजदूरों का एक बाजार मौजूद था। अंग्रेजों ने खुद अपने देश में अपने मजदूरों के साथ संघर्ष करके पूँजीवाद का निर्माण किया था। लेकिन भारत में उन्होंने देखा कि यहाँ तो लाखों लोग अछूत के रूप में काम कर रहे हैं। ये ऐसे लोग थे जो ट्रेड यूनियनों का गठन करने या मजदूरी की माँग करने की बात तो दूर, बोल भी नहीं पाते थे। वे गुलामों की तरह रहते थे। अंग्रेजों के लिए ये इतने बहुमूल्य थे कि इन्हें नष्ट करने की जरूरत नहीं थी। इन्हें खत्म करने का कोई इरादा नहीं था। वे बस इनसे मुनाफा कमाना चाहते थे।

75 वर्ष हो गये जब भारत ने नया संविधान बनाया। तो भी स्वराज के साथ जिस पूँजीवाद ने प्रवेश किया उसने जाति व्यवस्था को समाप्त नहीं किया। आज 16 प्रतिशत से भी अधिक भारतीय जाति व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर हैं। और बात केवल उनकी ही नहीं है–– हर जाति जो उनसे ऊपर है इस व्यवस्था में किसी न किसी रूप में उत्पीड़न झेल रही है। भारत का खुद का आँकड़ा बताता है कि 5 प्रतिशत दलित आबादी भी मध्यवर्ग तक नहीं पहुँच पायी है। इससे भी बुरी बात यह है कि जाति आधारित राजनीतिक दलों के उदय ने जाति व्यवस्था को भारतीय समाज का एक स्थायी हिस्सा बना रखा है।

नेपाल और भारत दोनों देशों में पूँजीवाद ने बगैर किसी पूँजीवादी क्रान्ति के प्रवेश किया। यहाँ के सामन्ती तत्वों ने कारोबार और व्यापार के जरिये खुद को पूँजीवादी के रूप में नया अवतार दे दिया। नतीजतन, दोनों देशों के पूँजीपति वर्ग की एक बहुत स्पष्ट विशिष्टता है–– यह गहन रूप से जातिवादी है। यहाँ तक कि शादी–ब्याह में वे अपनी जाति ढूँढते हैं। किसी पूँजीपति को अपनी प्रकृति के अनुसार पूँजी की तलाश करनी चाहिए लेकिन वह तो जाति की तलाश करता है। इस प्रकार जाति आधारित परम्पराएँ और संस्कृति पूरी तरह जस की तस बनी रहीं। दलाल पूँजीवादी व्यवस्था बस सुधारों की बात करती है, भ्रमों का निर्माण करती है और जनता को धोखे में रखती है।

सवाल: प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने अपने पद की शपथ लेते समय कुछ धार्मिक अनुष्ठान किये। इस पर आपकी क्या टिप्पणी है?

जवाब: सारी दुनिया में विफल प्रणालियों और अधूरे वायदों की पीठ पर सवार होकर ही लोकप्रियतावाद का उदय होता है। जर्मनी में प्रथम विश्वयुद्ध से उत्पन्न निराशा के फलस्वरूप हिटलर का उभार हुआ। नेपाल इससे भिन्न नहीं है। संसदीय प्रणाली यहाँ विफल साबित हुई है। नवउदारवाद के जरिये भी देश की बुनियादी समस्याओं को यह हल नहीं कर सकी। जो पुरानी पार्टियाँ हैं वे उन सीमित सुधारों को भी, जिनकी इजाजत नवउदारवाद देता है, लागू करना नहीं चाहती थीं या उन्हें लागू करने में अक्षम थीं।

इस हताशा और क्षोभ से वैश्विक साम्राज्यवाद को एक रास्ता मिला। इसका उद्देश्य है नेपाली समाज को एक उपभोक्तावादी और ऐसे विचारशून्य समाज का रूप देना जिसमें विदेशी हस्तक्षेप आसानी से जड़ जमा सके। एमसीसी की पहले ही पुष्टि कर दी गयी है। अब इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि कैसे एसपीई (स्टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम) में शामिल हुआ जाये। नेपाल को व्यापक भू–राजनीतिक अखाड़े में खींचकर लाने का उनका इरादा बड़ी तेजी से स्पष्ट हो रहा है। इस तालमेल के जरिये ही लोकप्रियतावाद ने नेपाल में प्रवेश किया–– ‘नीली क्रान्ति’ की बात करना, दूसरों पर उँगली उठाना लेकिन कोई वास्तविक समाधान न देना।

यह लोकप्रियतावाद बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं ढूँढ सकता। जिस दिन इसने सत्ता की बागडोर सम्भाली, ठीक उसी दिन सरकार ने 28 अरब रुपये का कर्ज लिया। यह कर्ज उत्पादक क्षेत्र में निवेश के लिए नहीं, बल्कि डिजिटल नेपाल के नाम पर लिया गया। यह पैसा नेपाली समाज के बुनियादी वर्गों का कोई हित नहीं करेगा। इसका मकसद ही मध्यवर्ग को सन्तुष्ट करना है। और एक बार टेलीविजन, रेडियो, अखबारों और स्मार्ट फोनों के जरिये मध्यवर्ग पर काबू पा लिया गया तो फिर मजदूर वर्ग को गुमराह करना और आसान हो जाता है। यहाँ से एकाधिकारवाद या आसान शब्दों में कहें तो तानाशाही के शासन का रास्ता खुल जाता है। ऊपर से जो लोकप्रियतावाद दिखायी देता है वह अन्दर से निरंकुशतावाद ही होता है। भारत में जो कुछ अभी हो रहा है वह पहले से ही नेपाल में शुरू हो गया है।

धार्मिक अन्धविश्वास को निरंकुशतावाद के एक अविभाज्य अंग के रूप में समझा जाना चाहिए। प्रत्येक निरंकुशतावादी प्रोजेक्ट के लिए किसी विचारधारा की जरूरत होती है और धार्मिक अन्धभक्ति ने ऐतिहासिक तौर पर उस उद्देश्य की पूर्ति की है। भारत में आबादी के 80–81 प्रतिशत लोगों के हिन्दू होने के दावे का इस्तेमाल हिन्दुत्व को बढ़ाने और अल्पसंख्यकों का दमन करने के लिए किया जाता रहा है। यही ढाँचा अब नेपाल में प्रकट हो गया है। अनुष्ठान आधारित शपथ ग्रहण समारोह बेहद आपत्तिजनक है क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता के नेपाल के संवैधानिक सिद्धान्तों का उल्लंघन करता है। नेपाली जनता द्वारा जिन धर्मों का पालन किया जाता है उनमें से कोई भी विदेश से आयात नहीं किया गया है। ये धर्म और विश्वास ऐसे हैं जिनका सदियों से अलग–अलग समुदायों ने पालन किया है। जब राज्य के किसी समारोह में किसी खास धर्म को बढ़ावा दिया जाता हो और दूसरे धर्मों को किनारे कर दिया जाता हो तो यह कोई हानि रहित परम्परा नहीं है। यह एक संकेत है। यह संकेत है लोकप्रियतावादी तानाशाही का और यह धार्मिक अन्धभक्ति को सक्रिय तौर पर बढ़ावा देता है।

सवाल: बीआर अम्बेडकर ने ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का उन्मूलन) की जो अवधारणा व्यक्त की थी वह नेपाल में कहाँ तक सम्भव है?

जवाब: अम्बेडकर को दो तरह से देखे जाने की जरूरत है। इस दृष्टि से उनका योगदान निश्चित तौर पर सराहनीय है कि तकरीबन एक सौ साल पहले उन्होंने जाति व्यवस्था का गहराई से अध्ययन किया और भारतीय राजनीति का मुख्य मुद्दा बनाने में उन्हें कामयाबी मिली। उनकी यह उपलब्धि अत्यन्त प्रशंसनीय है।

लेकिन जाति के उन्मूलन के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना वह अन्ततोगत्वा विफल हो गया। उनकी जो दृष्टि थी उसका सार तत्व उनके इन शब्दों में अच्छी तरह प्रकट हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि वह एक हिन्दू के रूप में पैदा हुए लेकिन हिन्दू के रूप में मरेंगे नहीं। उन्होंने इससे निकलने के रास्ते के रूप में धर्मान्तरण का संकेत दिया। इसके साथ ही उन्होंने जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू जैसे व्यक्तियों का सहारा लिया। ये दोनों क्रमश: सामन्तवाद के प्रतिनिधि और ब्रिटिश सरकार के एजेंट थे। शुरू से अम्बेडकर के नजरिये में यह अन्तर्विरोध दिखायी देता है।

धर्मान्तरण से मामूली सी तब्दीली आयी। यह वैसे ही है जैसे कोई कड़ाही से उछल कर आग में कूद जाये। पूँजीवादी ढाँचे में रहते हुए जाति व्यवस्था का उन्मूलन नहीं किया जा सकता। अम्बेडकर ने जो रास्ता तैयार किया उसकी यह बुनियादी खामी थी। भारत ने पिछले 75 वर्षों से उसी रास्ते का अनुसरण किया है। जाति व्यवस्था बनी हुई है। जाति आधारित राजनीतिक पार्टियों ने बस जाति को और भी ज्यादा स्थायी तथा संस्थागत रूप दे दिया है। इसलिए जाति के उन्मूलन के लिए कहीं और भी जबर्दस्त प्रयास की जरूरत है–– एक नयी अर्थव्यवस्था, एक नयी राजनीतिक प्रणाली और एक नया संस्कृतिक आन्दोलन।

सवाल: नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों से उम्मीद की जाती थी कि वे जाति व्यवस्था को समाप्त कर देंगी, लेकिन चुनाव में उनका प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा। आज किस तरह की व्यवस्था की जरूरत है?

जवाब: पाँच साल पहले ही हमने कहा था और स्पष्ट तौर पर कहा था कि नेपाल में पुराना कम्युनिस्ट आन्दोलन दम तोड़ रहा है। यह पूँजीवाद को उसके नये रूप में देखने में विफल रहा है और इस पूँजीवाद का मुकाबला करने के लिए वह कोई रणनीति या विचार विकसित करने में अक्षम है। यह केवल नेपाल के लिए अनूठी समस्या नहीं है। सारी दुनिया में इसी कारण कम्युनिस्ट आन्दोलन अपनी आधारभूमि खोते जा रहे हैं। आज जरूरत साम्यवाद के अन्दर ऐसे नये विचारों की है जो समकालीन पूँजीवाद का मुकाबला करने में समर्थ हो।

पुराने कम्युनिस्ट आन्दोलन ने दो बुनियादी गलतियाँ कीं। एक तो वह लगातार पुराने सिद्धान्तों को बगैर किसी सुधार के दोहराता रहा, गोया दुनिया में कोई परिवर्तन ही न हुआ हो। दूसरे, इसने संसदीय प्रणाली में प्रवेश किया और ऐसा करते समय वह आहिस्ता–आहिस्ता उन्हीं पूँजीवादी पार्टियों की तरह हो गया जिनका वह कभी विरोध करता था। संसद पूँजीवाद का सबसे बड़ा मंच होता है। कम्युनिस्टों ने उसी मंच में प्रवेश किया, एमसीसी की पुष्टि की और फिर जनता की तरफ मुखातिब होकर दावा करते रहे कि वे अभी भी कम्युनिस्ट हैं। पूँजीपति वर्ग ने इसे बड़ी बारीकी से देखा। महज नकल करके कम्युनिस्टों ने पूँजीवाद के मैदान में अपने पाँव कमजोर कर दिये और पूँजीपति वर्ग को विश्वास हो गया कि वे नहीं टिक सकते।

सवाल: 8–9 सितम्बर 2025 के जेन जी आन्दोलन ने देश को हिलाकर रख दिया। आपकी निगाह में यह आन्दोलन किसका प्रतिनिधित्व करता था और किसका नहीं?

जवाब: जेन जी आन्दोलन देश की समस्याओं का पुरानी संसदीय प्रणाली द्वारा समाधान ढूँढने में विफल होने का प्रत्यक्ष नतीजा था। यह प्रणाली बेरोजगारी दूर करने की तो बात ही छोड़िये, इसे कम भी नहीं कर सकी। संसदीय नेतागण ‘फ्री वीसा’ जैसे नारों का सहारा लेते रहे। ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसमें घर की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए 80 लाख लोगों को देश छोड़कर बाहर जाना पड़ा।

संसदीय प्रणाली चार बुनियादी मोर्चों पर विफल साबित हुई है। यह वर्गों या महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दों को सम्बोधित करने के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं ला सकी। यह जाति व्यवस्था को नहीं तोड़ सकी या देशज भाषाओं के विध्वंस को नहीं रोक सकी। महिलाओं का खुलेआम बलात्कार होता रहा और आततायी भयमुक्त होकर घूमते रहे। बुनियादी रूपान्तरण की तो बात ही छोड़िये यह प्रणाली तो महिलाओं के दर्द को ही नहीं समझ सकी।

इन सारी विफलताओं का मिलाजुला असर व्यापक असन्तोष में दिखायी दिया जिसकी अभिव्यक्ति जेन जी विद्रोह में देखने को मिली। लेकिन विफलता केवल बुनियादी मुद्दों तक सीमित नहीं थी–– बुनियादी प्रशासनिक सुधारों की भी उपेक्षा हुई। मिसाल के तौर पर टेस्ट में पास हो जाने के बावजूद वर्षों तक ड्राइविंग लाइसेंस कार्ड भी घर नहीं पहुँचता था। ऐसा इसलिए नहीं कि सरकार के पास बजट नहीं था बल्कि इसलिए कि छपे हुए कार्ड उपलब्ध नहीं थे। इस तरह की बुनियादी अकर्मण्यता ने जनता के गुस्से में और भी ज्यादा इजाफा किया।

एक और पहलू है जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हमारे विश्वविद्यालय छात्रों को यह नहीं पढ़ाते कि साम्राज्यवादी ताकतें विश्व बैंक या उन संस्थाओं के जरिये, जो वे यहाँ स्थापित करना चाहते हैं, नेपाल में क्या हासिल करने में लगे हैं। इन मामलों पर छात्रों को शोध नहीं कराया जाता। इस बीच अन्तरराष्ट्रीय ताकतें बड़ी खामोशी के साथ युवा नेपालियों को प्रशिक्षण देने में लगी हैं। वे इस संसदीय ढाँचे के अन्दर ही युवा काउंसिलों के जरिये यह काम कर रही हैं। प्रतिवर्ष 150 से अधिक युवकों को चुना जाता है, प्रशिक्षण दिया जाता है और अमरीका या यूरोप की यात्रा करने के लिए वीजा दिया जाता है। उनके जरिये इण्टरनेशनल नॉन गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन (एनजीओ) का देश भर में जाल बिछाया जाता है। इन सबका मकसद जनता के असन्तोष को भुनाना है और नेपाल को एक कठपुतली राज्य का रूप देना है। जेन जी आन्दोलन शुरू होने तक असन्तोष चरम बिन्दु पर पहुँच गया था। दशहरे से पहले जैसे ही सोशल मीडिया पर रोक लगायी गयी लाखों की संख्या में युवक गुस्से में सड़कों पर आ गये। मध्यवर्गीय युवकों के एक विशाल हिस्से के लिए सोशल मीडिया महज मनोरंजन का साधन नहीं है–– यह आय का भी साधन है। इन सारी चीजों ने मिलकर जेन जी विद्रोह का रूप ले लिया।

सवाल: एक दूसरे सन्दर्भ में मैं जानना चाहूँगा कि नेपाली कांग्रेस और एमाले जैसी पुरानी पार्टियों को कर्नाली तथा सुदूर पश्चिम में सफलता मिली जबकि श्रम संस्कृति पार्टी जैसा नया दल पूर्व की पहाड़ियों में काफी प्रभावशाली रहा। इससे किस बात का संकेत मिलता है?

जवाब: यह इस बात का ठोस प्रमाण है कि पुरानी संसदीय पार्टियाँ अब चुक गयी हैं। जेन जी विद्रोह की जो मूल भावना है उसका सम्मान पूरी तरह इस प्रणाली से अलग रखकर किया जा सकता है। यथास्थिति पर नया रंगरोगन लगाकर नेपाल की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं मिलेगा। यह देश धीरे–धीरे तानाशाही की ओर ढकेला जा रहा है और यहाँ की पूरी व्यवस्था जनता को उनके अधिकारों से वंचित करके ही अपना अस्तित्व बनाये रख सकती है।

श्रम संस्कृति पार्टी का मजदूरों का आह्वान एक सकारात्मक बात है। लेकिन इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि यह मौजूदा प्रणाली के अन्दर ही होना चाहिए। और इस प्रणाली के अन्दर बुनियादी समस्याएँ हल नहीं की जा सकतीं। तराई में 41 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं। पहाड़ी इलाके में 66 प्रतिशत खेती योग्य जमीन के मामले में भूमिहीन हैं। और इसमें उन लोगों को शामिल किया गया है जिनके पास 20 रोपनी से कम जमीन है। भूमिहीन किसानों के पास भूस्वामियों के यहाँ काम करने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

इसलिए श्रम का नारा बुनियादी तौर पर मध्यवर्ग की बात करता है–– ऐसे मध्यवर्ग की जो काम करना पसन्द करता हो। यह उन मजदूरों तक नहीं पहुँचता जो भूस्वामियों के यहाँ अपना श्रम दे रहे हैं या उन तक नहीं पहुँचता जो खाड़ी के देशों में जाने के लिए मजबूर हुए। उनके लिए यह नारा पर्याप्त नहीं है। समूची व्यवस्था को बदलना ही होगा।

(अनुवाद–– आनन्द स्वरूप वर्मा)