भारत की चिकित्सा व्यवस्था में एक बुनियादी समस्या है, जो सभी पूँजीवादी देशों में ही मौजूद है, जहाँ मजदूर वर्ग के लिए सब्सिडी वाली स्वास्थ्य सेवा उजड़े हुए सरकारी अस्पतालों में दी जाती हैं। पूँजीवाद के तहत, मेहनतकश वर्ग को समाज पर बोझ माना जाता है और उनकी स्वास्थ्य देखभाल को करदाताओं के पैसे की बर्बादी समझा जाता है। इससे भी बदतर, इन सरकारी अस्पतालों की किस्मत का फैसला एक अमीर और धनाढ्य अभिजात वर्ग, जैसे–– मंत्री और अफसरों द्वारा किया जाता है, जो खुद निजी कॉर्पाेरेट स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च उठा सकते हैं। नतीजतन, सरकारी अस्पताल अपर्याप्त सुविधाओं के शिकार हो जाते हैं। फण्ड की कमी हो जाती है, बिल्डिंग्स जर्जर हो जाती हैं, मशीनें कम पड़ जाती हैं या इतनी पुरानी होती हैं कि उनकी रिपोर्ट के भरोसे इलाज भी सम्भव नहीं होता। इससे सरकारी अस्पतालों में सब कुछ अव्यवस्थित होने लगता है, स्टाफ की कमी हो जाती हैं। सामान्य बीमारियों का भी ठीक से उपचार नहीं हो पाता।

योग्य चिकित्सकों की कमी को पूरा करने के लिए, लगभग सभी बड़े सरकारी अस्पताल मेडिकल कॉलेजों का भी काम करते हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध होने का भ्रम पैदा होता है। ये संस्थान बीमारियों के “व्यापक अनुभव” का दावा करते हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि वे उन मजबूर मरीजों से भरे होते हैं जिनके पास कोई विकल्प नहीं होता। गरीब मरीज को किसी जूनियर डॉक्टर द्वारा देखे जाने मात्र से ही राहत मिल जाती है।

“अधिक सीखने” के बहाने, भारत के रेजिडेंट डॉक्टरों को अत्यधिक काम का बोझ झेलना पड़ता है, जिससे अतिरिक्त स्टाफ की जरूरत कम हो जाती है और वे प्रभावी रूप से मेडिकल गुलाम बन जाते हैं। अत्यधिक कार्यभार और थकान–– खासकर उनके सीखने के महत्वपूर्ण चरण में–– इन डॉक्टरों को गलतियों के प्रति असंवेदनशील बना देती है, जिसका खामियाजा उनके गरीब मरीजों को भुगतना पड़ता है। भारत में रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घण्टे गुलामों से भी ज्यादा हैं, जहाँ कई जूनियर डॉक्टर अस्पतालों में रात–दिन रहते हैं, बिना रुके, कई बार बिना खाये, बिना सोये काम करते हैं।

इसके विपरीत, भारत का विशेषाधिकार प्राप्त अभिजात वर्ग, अमीरजादा–– जनसंख्या का बमुश्किल 10 प्रतिशत है जो विश्वस्तरीय निजी स्वास्थ्य सुविधाओं का आनन्द लेता है। मुनाफा–केन्द्रित कॉर्पाेरेट अस्पताल, अच्छी तरह से प्रशिक्षित डॉक्टरों को सरकारी अस्पतालों से कहीं ज्यादा वेतन, स्वच्छ वातावरण, हल्का काम और बेहतर कार्य स्थितियों का लालच देकर आकर्षित करते हैं। स्वाभाविक है कि इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा से अच्छे डॉक्टरों का पलायन होता है।

संक्षेप में, आदर्शवादी जूनियर डॉक्टर, जो मजदूर के शरीर पर चिकित्सा सीखता है, अन्तत: अमीरों की सेवा करने लगता है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि डॉक्टर मजदूरों पर तजुर्बा लेे और जब सीखकर व्यापक अनुभव हासिल कर लें तो अमीरों की सेवा करें।

–– डॉ आदिल खान