बीते 20 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में 130 वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। इस संशोधन के बाद पाँच साल से अधिक सजा के प्रावधान वाले आपराधिक मामलों में अगर किसी राज्य के मंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री 30 दिनों तक जेल में रहते हैं तो 31वें दिन उन्हें पद से हटा दिया जाएगा। इस विधेयक के लोकसभा में पेश होते ही विपक्ष ने इसे लोकतान्त्रिक ढाँचे पर हमला करार दिया। उन्होंने सदन में इसकी प्रतियाँ फाड़कर अपना विरोध जाहिर किया।

गृह मंत्री ने कहा कि इस विधेयक के कानून बनने के बाद किसी भी राज्य का कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री और देश का प्रधानमंत्री जेल से सरकार नही चला पाएगा। इसलिए हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जिस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे हो तो वह किसी पद पर नहीं रहना चाहिए। यह सुनने में तो बड़ा न्यायप्रिय कदम लगता है। लेकिन क्या सच में भाजपा सभी अपराधी नेताओं को जेल में डालना चाहती है? अगस्त में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा में भाजपा के कुल सांसदों में से 26 प्रतिशत गम्भीर मामलों जैसे बलात्कार, हत्या आदि के आरोपी हैं, जो संख्या बाकी पार्टियों की तुलना में सबसे अधिक है। अगर गृह मंत्री की मंशा विधायिका को अपराधमुक्त करने की होती तो उन्हें सबसे पहले भाजपा के सांसदों को पदमुक्त करना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उनकी बातों को ध्यान में रखकर हमें सिलसिलेवार तरीके से पिछले 10 सालों में देश की संस्थाओं, जाँच एजेंसियों की स्वतंत्रता, काम करने के तरीके और देश की न्यायपालिका में चल रहे मामलों का विश्लेषण करना पड़ेगा।

भाजपा सरकार की मंशा को जानने के लिए हमें साल 2014 से 2025 तक इस सरकार द्वारा लिये गये फैसलों का विश्लेषण करना चाहिए। साल 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक’ को संसद के दोनों सदनों में पारित करके अधिनियम बना दिया गया था। इस अधिनियम के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और राज्यों के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम व्यवस्था के जरिये न होकर, सरकार द्वारा बनाये गये आयोग द्वारा की जाएगी। इससे पहले ये नियुक्तियाँ कॉलेजियम व्यवस्था के तहत न्यायाधीशों की वरिष्ठता के क्रम से की जाती थीं, यानी पहले से चली आ रही स्वतंत्र व्यवस्था को खत्म कर सरकार ने उसे अपने अधीन कर लिया था। अगर कोई न्यायाधीश सरकार के खिलाफ फैसले देता तो उसको इस आयोग की मदद से हटाया जा सकता था। हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी समीक्षा करके इसको असंवैधानिक करार दे दिया था। इस अधिनियम को लाने से भाजपा सरकार की देश की स्वतंत्र संस्थाओं को अपने कब्जे में करने की मंशा साफ दिखाई देती है।

साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए केन्द्र की भाजपा सरकार को तीन सदस्यों की एक समिति बनाने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बताया कि ये तीन सदस्य देश का प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत का मुख्य न्यायाधीश होंगे। इस आदेश को अप्रभावी करने के लिए उसी साल के अन्त में भाजपा सरकार द्वारा संसद में एक बिल पास करके इस समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर केन्द्र सरकार के मंत्री को रख दिया गया, यानी मुख्य चुनाव आयुक्त को नियुक्त करने वाले तीन सदस्यों में से दो सदस्य सत्ता पक्ष से हैं। इसके बाद भाजपा बिना किसी परेशानी के जिसे चाहे मुख्य चुनाव आयुक्त बना सकती है। भाजपा का यह कदम स्वायत्त संस्थाओं को अपने नियंत्रण में लेना नहीं तो क्या है।

अब सवाल उठता है कि क्या सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति निष्पक्ष फैसले कर पाएगा? चुनाव आयोग की निष्पक्षता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बयान दिया कि कांग्रेस आपकी सम्पत्ति ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को दे देगी। इसके बाद भी चुनाव आयोग ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। देश के विपक्षी नेताओं द्वारा आरोप लगाया जाता है कि भाजपा ने चुनाव आयोग की मदद से उनके जीते हुए उम्मीदवार को हरा दिया। ऐसा चण्डीगढ़ के मेयर चुनाव में साफ–साफ देखा गया था। इस चुनाव में विपक्षी उमीदवार जीत रहा था लेकिन गिनती करने वाले अधिकारी ने विपक्ष के कुछ वोटों को अवैध घोषित करके भाजपा के उम्मीदवार को जिताया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से विपक्ष के उम्मीदवार को विजयी घोषित किया गया। बिहार में  एसआईआर में हुई धाँधली से पूरा देश वाकिफ है। इससे साफ हो गया है कि देश की स्वायत्त संस्थाएँ अब स्वायत्त नहीं, सत्ता की कठपुतली बन गयी हैं।

सरकार द्वारा 130वाँ संविधान संशोधन इसी सिलसिले की निरन्तरता में लाया गया  है। देश के बुद्धिजीवियों और विपक्ष ने इस कानून के जरिये और देश की एजेंसियों का दुरूपयोग करके विपक्ष को खत्म करने की साजिश की आशंका जताई है। सभी देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने वाली एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) सरकार का तोता बना हुआ है। इण्डियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 से 2022 के बीच ईडी द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के अन्तर्गत देश के 121 बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमें दर्ज किये गये जिनमें से 115 विपक्ष के नेता थे। यानी 95 प्रतिशत से अधिक मुकदमें विपक्ष के नेताओं के खिलाफ किये गये। क्या भाजपा के नेता दूध के धुले हुए हैं? ईडी की हालत को जानने के लिए एक और आँकड़े पर नजर डालते हैं। सरकार द्वारा जारी एक आँकड़े के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में ईडी द्वारा विपक्ष के 193 नेताओं के खिलाफ मुकदमें दर्ज किये गये लेकिन इनमें से अब तक सिर्फ दो पर ही दोष सिद्ध हो पाया है। साफ जाहिर है कि यह सब विपक्ष के नेताओं को डराकर भाजपा में शामिल करने या जनहित के सवाल करने वाले नेताओं को जेल में डालने आपराधिक कार्रवाई है।

मौजूदा विधेयक के जरिये भाजपा विपक्ष के नेताओं में डर पैदा करना चाहती है जिससे वे पद छिन जाने के डर से भाजपा में शामिल हो जायें। पिछले 10 सालों में 25 बड़े विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार के मुकदमें दर्ज किये गये जिनमें से 23 पार्टी बदलकर भाजपा सरकारों में शामिल हो गये और उसके बाद उनके मुकदमें ठण्डे बस्ते में डाल दिये गये। आंध्र प्रदेश के वाई एस चैधरी से लेकर पश्चिम बंगाल के तृणमूल कांग्रेस के सुवेन्दु अधिकारी तक, पिछले 10 वर्षों में ऐसे कितने ही उदाहरण हमारे सामने हैं जिनको ईडी और सीबीआई का डर दिखाकर भाजपा गठबन्धन में शामिल कर लिया गया। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को भी जेल में डालकर उनकी सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की गयी।

ईडी के अन्तर्गत आने वाले कानूनों को और सख्त करने के लिए वर्ष 2019 में पीएमएलए में कई बदलाव किये गये जिसके बाद ईडी द्वारा गिरफ्तार आरोपी को खुद ही साबित करना है कि वह निर्दाेष है। अब ऐसे मामले में तीस दिन के अन्दर जमानत मिलना लगभग नामुमकिन है।

शोषण पर टिकी इस व्यवस्था में देश की मेहनतकश जनता के पास पहले से ही अधिकार लगभग न के बराबर हैं लेकिन एक से अधिक पार्टियों वाली इस पूँजीवादी व्यवस्था में विपक्षी नेता कभी कभी ही सही लेकिन जनता के सवाल पूछते दिखाई पड़ते हैं। यदि ऐसे ही चलता रहा तो हमारे देश में एक ही पार्टी बचेगी। एक ही पार्टी अपनी मर्जी से पूँजीपति वर्ग के हितों के लिए कानून बनाती रहेगी। जनता से कोई सरोकार नहीं होगा और राजनीतिक गलियारे में कोई इन कानूनों का विरोध करने वाला नहीं बचेगा। भाजपा विरोध के बिना जनता पर अपनी तानाशाही जारी रख सकेगी। मौजूदा विधेयक से यही लक्ष्य हासिल करने की कोशिश की जा रही है।

–– नदीम