कर्नाटक सरकार देवनहल्ली के किसानों के साथ विश्वासघात कर रही है
राजनीति–– ललिता
क्या कर्नाटक सरकार किसानों को धोखा देने, देवनहल्ली की उपजाऊ कृषि भूमि को कॉर्पाेरेट और रियल एस्टेट माफिया के हवाले करने पर आमादा है? क्या वह खुद का पतन देखना चाहती है?
देवनहल्ली तालुक के चन्नारायपटना होबली में 13 गाँवों के 800 परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर रहते हैं और मुख्य रूप से खेती पर निर्भर हैं। उन्होंने वर्षों से जमीन को विकसित करने के लिए पसीना और खून बहाया है। यह एक ऐसी जमीन है जो अब बेशकीमती हो गयी है क्योंकि यह बैंगलुरु के अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नजदीक है। कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड (केआईएडीबी) ने पहले ही हरालुरू औद्योगिक क्षेत्र के लिए आसपास के गाँवों से 6000 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली थी। जनवरी 2022 में, तत्कालीन सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने उपरोक्त 13 गाँवों से भी किसानों को जबरन बेदखल करके 1777 एकड़ जमीन और अधिग्रहित करने तथा इसे कॉर्पोरेट्स और रियल एस्टेट माफिया को बेचने का फैसला किया और इस तरह एक नोटिस जारी किया।
पहले के अधिग्रहण में बेदखल किये गये किसानों और ग्रामीणों का दुखद हाल देखकर किसानों ने शुरू से ही अधिग्रहण के प्रयास का डटकर विरोध किया। प्रतिरोध ने विभिन्न रूप धारण किये और ‘केआईएडीबी भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध संघर्ष समिति’ के बैनर तले संघर्ष का रूप ले लिया।
उस समय विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा में भूमि अधिग्रहण के इस कदम पर सवाल उठाये थे, उसके नेता सिद्धारमैया ने संघर्ष स्थल का दौरा किया था और किसानों को आश्वासन दिया था कि सत्ता में आने पर अधिसूचना वापस ले ली जायेगी। लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने अपने पुराने रुख से अलग हटकर भाजपा के नक्शेकदम पर चलते हुए किसानों की जमीनें अधिग्रहित कर लीं।
लगभग 80 प्रतिशत किसानों ने अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया है और वे 1180 दिनों (लगभग 3–5 साल) से अनिश्चितकालीन संघर्ष पर हैं। लेकिन सरकार इन जमीनों को अधिग्रहित करने पर आमादा है। यह केन्द्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लायी गयी “भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास नीति–2013” का सरासर उल्लंघन है।
हाल ही में कर्नाटक सरकार ने किसानों को अन्तिम नोटिस जारी किया और इस तरह संघर्ष का अगला तीव्र चरण शुरू हुआ। संयुक्त होराता कर्नाटक (किसानों, मजदूरों, दलितों, छात्रों, युवाओं और महिला संगठनों की एक समन्वय समिति) जो एसकेएम का एक घटक है, उसने संघर्ष को आगे बढ़ाने का फैसला किया और “देवनहल्ली चलो” का आह्वान किया।
बढ़ते दबाव का सामना करते हुए, सरकार ने आंशिक वापसी की घोषणा की–– तीन गाँवों में 495 एकड़ जमीन को छोड़ दिया जायेगा। अधिकारियों ने घनी आबादी और सिंचाई का हवाला देते हुए ऐसा कहा मानो यह बात उनको तभी समझ में आयी हो। तथ्य यह है कि इन जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ पहले से ही एक मामला लम्बित था क्योंकि यह 1978 के एससी–एसटी अधिनियम का उल्लंघन करता है जो सरकार द्वारा दी गयी जमीनों के हस्तान्तरण पर रोक लगाता है। देवराज उर्स के समय दी गयी जमीन को जब्त करना शर्मनाक है और इसलिए ऐसा कहना एक तरह से इज्जत बचाने का जरिया है। लेकिन 1,232 एकड़ जमीन पर अब भी खतरा मण्डरा रहा है। प्रदर्शनकारियों में से एक नेता नरसिम्हा ने वहाँ के लोगों की भावनाओं को दर्शाते हुए कहा, “हम इसे हमारी एकता को तोड़ने की एक चाल के रूप में देखते हैं, लेकिन हम इसके झाँसे में नहीं आयेंगे।”
24 जून को एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में एमबी पाटिल और मुनियप्पा ने मुआवजे के तौर पर व्यावसायिक भूखण्ड देने की पेशकश की–– प्रति एकड़ 10,771 वर्ग फीट जमीन। लेकिन ग्रामीणों ने इस प्रलोभन को भी ठुकरा दिया। 67 वर्षीय लछम्मा पूछती हैं, “जब हमारे खेत चले जायेंगे तो हम भूखण्डों का क्या करेंगे?” “हमारी तबाही पर दुकानें बनायेंगे?”
देवनहल्ली चलो का आह्वान पूरे कर्नाटक में गूँज उठा तथा हजारों कार्यकर्ता और विभिन्न जन आन्दोलनों के नेता, कलाकार, वकील और लेखक 25 जून को देवनहल्ली में एकत्र हुए। माहौल तनावपूर्ण था, लेकिन विरोध प्रदर्शन बहुत शान्तिपूर्ण था।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ (कर्नाटक राज्य किसान संगठन) के अध्यक्ष बदगलपुरा नागेन्द्र ने कहा कि “सभी पार्टियाँ केवल कॉर्पोरेट्स की दलाल हैं। उनकी एकमात्र नीति कॉर्पोरेट्स की सेवा करना है। वे हमारे किसानों, मजदूरों और दलितों को सड़कों पर फेंकना चाहते हैं जो धन पैदा करते हैं––– हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम ऐसा विकास चाहते हैं जो लोगों की मदद कर सके। ––– शासकों ने ऐसे समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं जो मेहनतकश लोगों के खिलाफ हैं––– वे लोगों की जिन्दगी से खेल रहे हैं––– हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते––– अगर कानून लोगों और उनके संघर्षों के खिलाफ है तो हमें उन्हें तोड़ना होगा–– हमें न्याय चाहिए––– हम जीतेंगे।”
चल रहे संघर्ष को और मजबूती देने वाले जाने–माने बहुभाषी अभिनेता प्रकाश राज ने सरकार पर सवाल उठाये। उन्होंने कहा, “आप राजनेता खुद नहीं जीते हैं। लोगों ने आपको जिताया है। आप शासन करने नहीं आये हैं। आप उन लोगों का प्रतिनिधित्व करने आये हैं जिन्होंने आपको चुना है––– आपने अपना वचन दिया था, है न? क्या आप अपने वचन पर कायम रहेंगे? या आप अपना वचन तोड़ देंगे? आप हमारे किसानों के साथ क्या करेंगे? क्या आप उन्हें फैक्ट्री सुरक्षा गार्ड बना देंगे?” उन्होंने सिद्धारमैया से पूछा, “कृपया अपने कानों से सुनकर और विवेक से जवाब दें। हमें अपनी जमीन, अपने अधिकार, अपनी जिन्दगी चाहिए।”
संयुक्त होराता के समन्वयक और कर्नाटक जनशक्ति के अध्यक्ष नूर श्रीधर ने कहा, “एमबी पाटिल इस भूमि के पीछे क्यों पड़े हैं और कर्नाटक के किसी अन्य बंजर जिले में उद्योग लगाने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं। देवनहल्ली की भूमि पर बुरी नजर क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एक अमूल्य हीरे की तरह है। –––यह न केवल सिद्धारमैया, बल्कि राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी के सामने एक नैतिक, राजनीतिक प्रश्न है। उन्हें जवाब देना चाहिए। उन्हें कहना चाहिए कि 2013 की उनकी अपनी नीति गलत है। इसे लागू नहीं किया जा सकता। वास्तव में नीति केवल भूमि को लूटना, इसे अति धनवानों को देना और मेहनतकश लोगों को नौकरी के लिए भीख माँगने वाले कंगालों में बदलना हो सकती है––– यह संघर्ष रुकने वाला नहीं है।”
प्रभावित लोग जागरूक हैं। उन्हें पता है कि विकास के इस कॉर्पाेरेट मॉडल का मतलब सिर्फ विस्थापन, विनाश और बदहाली है, चाहे वो किसान हों, आदिवासी हों या झुग्गी–झोपड़ी में रहने वाले लोग। इसका मतलब है लोगों का उजड़ना, उनकी मूल संस्कृति की तबाही और पारिस्थितिकी सन्तुलन हमेशा के लिए खत्म हो जाना।
वे कहते हैं, “हम इस जमीन पर निर्भर रहते हैं। हममें से ज्यादातर लोग अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं। हमारे पूर्वजों की कब्रें इसी जमीन पर हैं। हमने अपनी जिन्दगी की सारी कमाई यहाँ सिंचाई और बाग–बगीचों को विकसित करने में लगा दी है। हम डेयरी और मुर्गी पालन जैसे कृषि से जुड़े काम करते हैं तथा अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ रहना चाहते हैं। चाहे कुछ भी हो जाये, हम इस जिन्दगी को खोने के लिए तैयार नहीं हैं।”
उन्होंने कर्नाटक सरकार द्वारा भेजे गये अन्तिम नोटिस को जला दिया और बदले में आन्दोलन की ओर से सरकार को अन्तिम नोटिस जारी किया गया। इसमें साफ तौर पर कहा गया था, ‘सरकार को यह घोषणा करनी चाहिए कि वह इस अधिसूचना को रद्द कर रही है और हमें अपना जीवन जीने देगी। या फिर हम संघर्ष को और तेज करेंगे और आप अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने से पहले हमारे सभी 800 परिवारों को जेल में डाल सकते हैं।’ सरकार को समय सीमा दी गयी थी जिसमें कहा गया था कि “अगर सरकार 24 घण्टे में जवाब नहीं देती है, तो हम तालुक कार्यालय को बन्द कर देंगे।”
सरकार ने शुरू से ही अत्यधिक पुलिस बल का प्रयोग करके देवनहल्ली के किसानों के विरोध को दबाने की कोशिश की और प्रदर्शनकारियों को बर्बर तरीके से घसीट कर हिरासत में ले लिया गया। इससे पूरे इलाके के लोगों में गुस्सा फैल गया।
26 जून को कर्नाटक के कई जिलों और तालुकों में पुलिस के क्रूर व्यवहार की निन्दा करते हुए और डीसीपी सचिन कुमार को निलम्बित करने की माँग को लेकर संघर्ष किया गया। बैंगलुरु में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता प्रकाश राज के नेतृत्व में कलाकारों, लेखकों और प्रगतिशील समुदाय द्वारा मुख्यमन्त्री आवास तक विरोध मार्च भी निकाला गया। मुख्यमन्त्री को आश्वासन देना पड़ा कि सरकार एक सप्ताह के भीतर इस मुद्दे को सुलझा लेगी और 4 जुलाई को जन संगठनों के साथ बैठक तय की गयी है।
संयुक्त होराता का मानना है कि हालाँकि सीएम ने आश्वासन दिया है, लेकिन सकारात्मक समाधान इतनी आसानी से सुनिश्चित नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक और भारी उद्योग मन्त्री एमबी पाटिल एआईसीसी में बहुत प्रभावशाली हैं और अधिग्रहण के साथ आगे बढ़ने पर अड़े हुए हैं। इसलिए, क्या सीएम सिद्धारमैया अपने मन्त्रिमण्डल को मना पायेंगे, भले ही वे ऐसा करना चाहे, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर समग्र रूप से कॉर्पाेरेट की पकड़ को देखते हुए यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
लेकिन संयुक्त होराता ने भी किसी भी बाधा का सामना करते हुए संघर्ष जारी रखने का दृढ़ संकल्प लिया है। देवनहल्ली के कृषक समुदाय ने प्रतिज्ञा की है कि इसे छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं है। कर्नाटक कॉर्पोरेट के पक्ष में भूमि अधिग्रहण के बोझ तले उबल रहा है, जैसा कि देश के कई हिस्सों में हो रहा है। यह ज्वालामुखी की तरह है जो फटने के लिए तैयार है। भूमिहीन और सीमान्त किसानों ने भूमि और आश्रय से वंचितों के लिए समिति द्वारा संगठित होकर पिछले एक दशक से कई दौर के लम्बे, गम्भीर संघर्ष देखे हैं। हालाँकि आंशिक सफलताएँ हासिल हुई हैं, लेकिन अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना है।
कर्नाटक के संघर्षरत लोगों ने इस लड़ाई को इसके तार्किक अन्त तक लड़ने का फैसला किया है। इसलिए यह एक बहुत बड़ा जन आन्दोलन और एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है। इस सन्दर्भ में, संयुक्त होराता ने कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व से भी स्थिति को समझने और यह सुनिश्चित करने का आह्वान किया है कि उनकी पार्टी इस महत्वपूर्ण समय में एक और गम्भीर राजनीतिक गलती करने की हिम्मत न करे। अन्यथा यह केवल अपने पतन का मार्ग प्रशस्त करेगा।
प्रभावित 13 गाँवों के किसानों का जुझारूपन सराहनीय है, जो बड़ी कॉर्पोरेट शक्तियों के खिलाफ डटकर मुकाबला कर रहे हैं। किसानों के साथ मजबूती से खड़े होने और संघर्ष को आगे बढ़ाने में संयुक्त होराता कर्नाटक की वर्तमान प्रमुख भूमिका सराहनीय है।
लड़ना हमारा अधिकार है और इस सराहनीय जन आन्दोलन को सभी आवश्यक समर्थन प्रदान करना हमारी जिम्मेदारी है।
–– अनुवाद: कुलदीप
साभार: काउण्टरकरण्ट्स
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