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रूस–यूक्रेन युद्ध अभी जारी है
रूस ने 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर पहली बार हमला किया। इसके बाद से यह लड़ाई अनवरत जारी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय इलाके की ये सबसे बड़ी जंग है। लगभग 3 साल बाद 29 नवम्बर को यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अमरीकी न्यूज चैनल स्काई न्यूज को बताया कि वह रूस के साथ युद्ध रोकने के लिए तैयार है। इसके लिए रूस के कब्जे की जमीन भी छोड़ देंगे। इससे पहले अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी संकेत दिया था कि रूस को कीव के दावे की जमीन इस शर्त पर दी जा सकती है कि यूक्रेन को नाटो सदस्य बने रहने की छूट मिल जाये। वैसे तो युद्ध का समाप्त होना रूस–यूक्रेन के साथ–साथ पूरी दुनिया के लिए शुभ संकेत है, क्योंकि इस युद्ध से इतना नुकसान हुआ है कि उससे कई नये देश बसाये जा सकते थे। रूस ने थल सेना से...
आगे पढ़ें..2,26,800 करोड़ रुपये का मासिक व्यापार घाटा
सितम्बर महीने में व्यापार घाटा 1,74,552 करोड़ रुपये (20.78 अरब डॉलर) था जिसको लेकर सरकार और मीडिया ने खूब ढिंढोरा पीटा कि भारत का व्यापार घाटा तेजी से कम हो रहा है। यह भी दावा किया गया कि पिछले साल की तुलना में अक्टूबर महीने में इस साल का व्यापार घाटा सबसे कम होगा। इस पर मोदी जी की दूरदर्शिता का खूब बखान किया गया। ऐसा अनुमान लगाया गया था कि अक्टूबर में देश का व्यापार घाटा 1,84,800 करोड़ रुपये रहेगा। लेकिन इस सब हवाबाजी की पोल–पट्टी तब खुल गयी जब अक्टूबर के आकड़े सामने आए। इसमें पता चला कि व्यापार घाटा तो बढ़कर 2,26,800 करोड़ रुपये हो गया है, जो अनुमान से करीब 42,000 करोड़ रुपये ज्यादा था। इस पर सरकार और उससे सम्बद्ध मीडिया घरानों की घिग्गी बँध गयी। इन आँकड़ों को देखकर उनके मुँह से चू भी नहीं निकली। अगर पिछले कुछ महीनों की तुलना की...
आगे पढ़ें..रूस की समाजवादी शिक्षा-व्यवस्था दुनिया के लिए बनी मिसाल
भारत की आजादी के 70 दशक हो चुके हैं फिर भी हमारी सरकारें देश की जनता को शिक्षा और स्वस्थ्य का समान अधिकार देने में नाकाम रहीं हैं। हिंदुस्तान जैसे-जैसे जवान होता गया देश की शिक्षा-स्वस्थ्य व्यवस्था पूंजीपतियों या यूं कहें कि निजी हाथों की कठपुतली बनती गई । आलम ये है कि सरकारी संस्थानों में आज लोग अपने बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते । हम आरक्षण की मांग करते हैं, राजनीतिक दल आरक्षण के मायाजाल में देश की जनता को उलझाए रखना चाहते हैं, क्या हमने कभी समान शिक्षा और समान स्वास्थ्य के लिए कोई आवाज उठाई या आंदोलन किया । नहीं किया क्योंकि हर कोई जानता है कि समान शिक्षा होने से हर कोई जागरुक हो जाएगा, अमीर-गरीब का भेद बहुत कम हो जाएगा, लोग हर कदम पर हक की बात करने लगेंगे, लिहाजा जितने धीरे-धीरे देश की जनता साक्षर होगी उतना ही आसान होगा उन्हें गुमराह करना।...
आगे पढ़ें..बुद्धिजीवी की भूमिका
(विश्वविख्यात पुस्तक 'ओरियंटलिज्म़` (प्राच्यवाद) के लेखक एडवर्ड सईद (१ नवंबर, १९३५-२५ सिंतबर, २००३) लंबे समय तक कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अंग्रेजी भाषा और तुलनात्मक साहित्य के प्रोफेसर रहे। फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष के लिए राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाले सईद की प्रतिष्ठा उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांतकार व साहित्य-आलोचक के रूप में है।-सं०) मैं लगभग चालीस वर्षों से अध्यापन का कार्य कर रहा हूं। बतौर विद्यार्थी और बाद में एक अध्यापक की हैसियत से अपने जीवन का ज्यादातर हिस्सा मैंने विश्वविद्यालय की चहारदीवारी के अंदर गुजारा है। विश्वविद्यालय मेरे लिए, जैसा कि मेरा विश्वास है हम सब के लिए, चाहे जिस हैसियत से भी आप इससे जुड़े हों, एक बेमिसाल जगह है। एक ऐसा आदर्श स्थान, जहां सोचने की आजादी, परखने की आजादी तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही सारतत्त्व होते हैं। वास्तव में, हम जानते हैं कि विश्वविद्यालय किस हद तक ज्ञान व विद्वता का भी केन्द्र होता है। कई सवालों में...
आगे पढ़ें..‘ट्रेजेडी ऑफ कॉमन्स’ का मिथक
क्या साझा संसाधनों का हमेशा दुरुपयोग और अत्यधिक उपयोग किया जाएगा ? क्या जमीन, वन और मत्स्य पालन पर सामुदायिक मालिकाना पारिस्थितिक आपदा का निश्चित राह है ? क्या निजीकरण पर्यावरण की रक्षा और तीसरी दुनिया की गरीबी को खत्म करने का एकमात्र तरीका है ? अधिकांश अर्थशास्त्री और विकास योजनाकार इसके जवाब में “हाँ” कहेंगे और इसके प्रमाण के लिए वे उन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर लिखे गये अब तक के सबसे प्रभावशाली लेख की ओर इशारा करेंगे । दिसम्बर 1968 में साइंसजर्नल में प्रकाशित होने के बाद से, “द ट्रेजेडी ऑफ द कॉमन्स” को कम से कम 111 पुस्तकों में संकलित किया गया है, जिससे यह किसी भी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित होने वाले सबसे अधिक पुनर्मुद्रित लेखों में से एक बन गया है । यह सबसे अधिक उद्धृत लेखों में से एक है । हाल ही में गूगल–खोज में “ट्रेजेडी ऑफ द कॉमन्स” वाक्यांश के लिए “लगभग 3,02,000”...
आगे पढ़ें..शीशमबाडा कचरा प्लांट का सर्वे
देहरादून की पछवादून घाटी में एक बेहद खूबसूरत जगह है–– बायाखाला । यह आसन नदी के किनारे पर है और इसके ठीक सामने पछवादून की हरी–भरी रसीली पहाड़ियाँ हैं । कुछ सालों पहले तक यह इलाका एक विशाल खूबसूरत पेंटिंग जैसा दिखता था । बरसात के मौसम में बासमती धान की सीढ़ीदार पट्टियाँ इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देती थी । लेकिन कुछ ही सालों में यह इलाका एक बदबूदार नरक में तब्दील कर दिया गया है । आसन नदी के खूबसूरत तट से लेकर बायाखाला और शीशमबाडा गाँव की दहलीजों तक की कई बीघे जमीन पर कूड़े का पहाड़ खड़ा कर दिया गया है । (फोटो इन्टरनेट न्यू हिन्दुस्तान से साभार) इससे हर समय इतनी भयानक और जहरीली बदबू निकलती रहती है कि बाहर से गये किसी इंसान के लिए एक मिनट खड़ा होना भी दूभर हो...
आगे पढ़ें..इसराइल के खिलाफ लड़े जा रहे बीडीएस आन्दोलन का समर्थन करें
फिलिस्तीन की जनता पर इजरायल का साम्राज्यवादी हमला लगातार जारी है। आज के फिलिस्तीन की सच्चाई को जानने के लिए 1948 के फिलिस्तीन के हालात को समझना जरूरी है, जब ब्रिटेन जैसे साम्राज्यवादी देशों ने इजरायल के निर्माण का समर्थन किया था। इस जायोनी राज्य ने फिलिस्तीनियों की जमीन पर कब्जा करके यहूदियों के एक राष्ट्र का निर्माण किया, उन्हें जबरन उजाड़ा, कत्ल किया और उनके तमाम अधिकार छीने। आज फिलिस्तीनियों का जो कत्लेआम हो रहा है, वह 1948 के ‘नकबा’ के दौरान फिलिस्तीनियों के जातीय संहार की याद दिलाता है, जिसमें 7.5 लाख से ज्यादा फिलिस्तीनियों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया गया था और जिसे इजरायल अपनी स्वतंत्रता मानता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे समय में साम्राज्यवाद सबसे विनाशकारी विचारधारा है जिसने फिलिस्तीनियों के सीधे नरसंहार को जन्म दिया है। गाजा पट्टी पर इजरायल...
आगे पढ़ें..हिंदी में अच्छा लेख कैसे लिखें?
हिंदी में लेख लिखना एक कला है जिसे समय लगाकर और अभ्यास के साथ सीखा जा सकता है। कहावत है-- "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान / रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान।” नये प्रशिक्षु लेखकों को इस सामग्री को ध्यान से पढ़ना चाहिए और इस पर अमल करना चाहिए। 1. जरूरी उपकरण: एक अच्छा लेख लिखने के लिए आपको कुछ बुनियादी उपकरणों की जरूरत होती है, जैसे कि मोबाइल या लैपटॉप, एक अच्छा कीबोर्ड और कॉपी-कलम। सबसे जरुरी चीज है-- रचनात्मक दिमाग का होना और पर्याप्त समय। 2. सामग्री खोजना: आपको इंटरनेट, अखबार और पत्रिकाओं की मदद से अपने विषय से सम्बन्धित सामग्री जुटानी चाहिए। अगर आप कठिन श्रम करके सामग्री नहीं जुटाते तो आपका लेख उथला रहेगा और उसमें दम नहीं होगा तथा वह वस्तुगत सच को पूरी तरह प्रतिबिम्बित नहीं करेगा। सामग्री प्रमाणित स्रोतों से ही जुटायें ताकि लेख में विश्वसनीयता और गहराई बनी रह सके।...
आगे पढ़ें..फासीवाद का भविष्य: कार्लो गिन्ज़बर्ग से जोसेफ कन्फावरेक्स की बातचीत
(यह बातचीत ‘मीडियापार्ट’ में सबसे पहले 20 सितम्बर, 2022 में फ्रेंच में- ‘Le fascisme a un futur’ शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसका अनुवाद ‘वर्सोबुक्स’ के लिए डेविडफर्नबाख ने अंग्रेजी में किया और जिसे 4 नवम्बर, 2022 को प्रकाशित किया गया। यहीं से इसका अनुवाद हिंदी में समालोचन के लिए सौरव कुमार राय ने किया है। अपनी ओर से इसे बोधगम्य बनाने के लिए उन्होंने कुछ पाद टिप्पणियाँ भी जोड़ी हैं। यह इटली के चुनाव में दक्षिणपंथी ‘जियोर्जिया मेलोनी’ की बढ़त और जीत की पृष्ठभूमि में लिया गया है। इसमें इतिहास उसके लेखन और लोकप्रिय-इतिहास जैसे मुद्दों पर गम्भीरता से विचार हुआ है।) कार्लो गिन्ज़बर्ग हमारे दौर के ‘लिविंग लीजेंड’ हैं। अपने अध्ययनों के माध्यम से उन्होंने इतिहास विषय की समकालीन महत्ता को लगातार स्थापित किया है। उनकी किताब ‘द चीज़ एंड द वर्म्स’ को ऐतिहासिक अध्ययन की दुनिया में ‘कल्ट’ का दर्जा प्राप्त है। ‘सूक्ष्म इतिहास’ अथवा ‘माइक्रोहिस्ट्री’...
आगे पढ़ें..सृजनशीलता हमेशा सामजिक होती है।
शीर्षक 'सृजनशीलता हमेशा सामजिक होती है' से लिखा गया यह लेख एजाज अहमद की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है। उन्होंने सृजनशीलता जैसे गूढ़ विषय को अपने अनुभव और सरल अंदाज से किसी भी आम पाठक के लिए बेहद रोचक और जिज्ञासा पैदा करने वाला बना दिया है। दार्शनिक शब्दाडम्बरों या अमूर्त उदाहरण के बजाय उन्होंने सृजनशीलता को रोजमर्रा की जिदगी से जोड़कर बताया है। उन्होंने बताया कि भाषा मनुष्य की पहली सृजनता है, बच्चा पैदा होने के बाद दो-तीन साल में अपने आसपास के लोगों की भाषा सीख लेता है। इस भाषा के जरिए वह संवाद करता है और सामाजिक रिश्ते बनाता है। इन रिश्तों में दोस्ती, प्रेम, नफ़रत सभी शामिल हैं। और यह सब सृजनशीलता ही है। उन्हीं के शब्दों में- "इसका अर्थ यह है कि सृजनशीलता केवल कवियों, गायकों, चित्राकारों या किसी और तरह के कलाकारों में ही नहीं, बल्कि सभी मनुष्यों में होती है और वह...
आगे पढ़ें..अपने बेटे के लिए उसके पहले जन्मदिन पर गाजा में लिखा एक पत्र
चाहे जो हो, मेरे बच्चे, हम तुम्हारा पहला जन्मदिन मनाएंगे। जब से तुम पैदा हुए हो, कैस, मैंने पिता के रूप में जिंदगी के उद्देश्य को और गहराई से महसूस किया. जिंदगी के इस क्षण तक पहुँचने के लिए मैंने खुद को काफी समय पहले से तैयार किया हुआ था. मैं तुम्हारी अच्छी परवरिश करने के लिए उत्सुक हूं ताकि मैं भविष्य में गर्व से इसकी समीक्षा कर सकूं। जब से तुम पैदा हुए हो, तुम्हारी माँ ने हर महीने एक छोटा जन्मदिन मनाया, इस बात को शिद्दत से महसूस करने के लिए कि तुमने हमारी जिंदगियों को रौशन किया। मैं इन छोटी पार्टियों में शामिल रहा, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर, मैं कुछ बड़ा करने के लिए तुम्हारे पहले जन्मदिन का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। मैंने पूरे परिवार, विशेष रूप से तुम्हारे चाचा, चाची और चचेरे भाई को आमंत्रित करने का...
आगे पढ़ें..उन्नीसवीं सदी का भारतीय पुनर्जागरण : यथार्थ या मिथक
(एक) पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से मैं इस पर सोचता रहा हूं और इस विषय पर कुछ खंड लिख भी चुका हूं. 19वीं सदी के गुजराती साहित्य में और विशेष रूप से नवलराम और गोवर्धनराम के लेखन में मेरी रूचि है. मगर दुर्भाग्य से गोवर्धनराम का सरस्वतीचंद्र हिंदी में उपलब्ध नहीं है. यहां मैं गोवर्धनराम के उस भाषण का खास तौर पर उल्लेख करना चाहता हूं, जो उन्होंने 1892 में विल्सन कॉलेज की लिटरेरी सोसाइटी में अंग्रेजी में दिया था. विषय था-क्लासिकल पोयट्स ऑफ गुजरात. नरसी मेहता, अखो और प्रेमानंद पर वहां उन्होंने भाषण दिया था. 17वीं शताब्दी के दो प्रसिद्ध कवियों प्रेमानंद और शामल भट्ट पर विशेष रूप से उन्होंने टीका प्रस्तुत की थी. मैं यह देखकर आश्चर्यचकित था कि केवल पचास वर्षों के अंतराल के बाद ही कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी किताब गुजराती साहित्य का इतिहास में उनके विचारों...
आगे पढ़ें..परम पूँजीवाद
फ्रांसीसी कवि चार्ल्स बुडले ने 1864 में लिखा था कि ‘शैतान का सबसे चालाक प्रपंच होता है आपको यह समझाना कि उसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है।’(1) मैं यहाँ यह कहूँगा कि यह कथन आज के नवउदारवादियों पर बिलकुल फिट बैठता है जिनका शैतानी प्रपंच है यह जताना कि उनका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है। नवउदारवाद को इक्कीसवीं सदी के पूँजीवाद की केन्द्रीय राजनीतिक–विचारधारागत परियोजना माना जाता है। यह मान्यता बड़ी व्यापक है। लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल सत्ताधीश शायद ही कभी करते हैं। अमरीकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने तो नवउदारवाद के नहीं होने को आधिकारिक आधार ही दे दिया था जब उसने 2005 में एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था–– ‘नियोलिबरलिज्म? इट डज नॉट एक्जीस्ट’(2) (नवउदारवाद? इसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है)। इस शैतान के प्रपंच के पीछे है एक बड़ी ही व्यथित कर देने वाली और कह सकते हैं कि एक...
आगे पढ़ें..'मंथली रिव्यू' और पर्यावरण
माह की समीक्षा जॉन बेलामी फोस्टर और बटुहान सरिकन द्वारा (नवंबर 01, 2023) जॉन बेलामी फोस्टर मंथली रिव्यू के संपादक और ओरेगॉन विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के एमेरिटस प्रोफेसर हैं। बटुहान सरिकन, गैस्ट्रो एको के संपादकीय निदेशक हैं, जो तुर्की में स्थित भोजन और पारिस्थितिकी पर केंद्रित समाचार वेबसाइट है। यह 23 सितंबर, 2023 को गैस्ट्रो एको, gastroeko.com पर प्रकाशित एक साक्षात्कार का थोड़ा संशोधित संस्करण है। बटुहान सरिकन : जॉन, प्रकृति के साथ आपका रिश्ता कैसे शुरू हुआ? आपको अपने बचपन से इसके बारे में क्या याद है? जॉन बेलामी फोस्टर : मैं संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रशांत नॉर्थवेस्ट में पला-बढ़ा हूँ, जो अपने जंगलों और सामान्य पर्यावरण के लिए प्रसिद्ध है। मेरा जन्म सिएटल में हुआ था, लेकिन जब मैं 1 से 5 साल के बीच था, हम एक लकड़ी के शहर, रेमंड, वाशिंगटन में रहते थे, जहाँ मेरे पिता एक शिक्षक...
आगे पढ़ें..बिना कपड़ोंवाले दार्शनिक: 'द वॉर अगेंस्ट मार्क्सिज्म' की समीक्षा
(20 नवंबर, 2021 को पोस्ट किया गया) मूल रूप से प्रकाशित: काउंटरफ़ायर, 11 नवंबर, 221 को क्रिस नाइनहैम द्वारा | मार्क्सवाद के विरुद्ध युद्ध , टोनी मैककेना यह पुस्तक नयी है और लंबे समय से प्रतीक्षित है। इसके दो मुख्य गुण हैं. सबसे पहले, यह अकादमिक मार्क्सवाद और आलोचनात्मक सिद्धांत की कुछ फैशनेबल मूर्तियों-- जिनमें थियोडोर एडोर्नो, लुई अल्थुजर, चैंटल माउफ़े, अर्नेस्टो लैक्लाऊ और स्लावोज ज़िज़ेक शामिल हैं-- को एक ओर अश्लीलतावादी होने और दूसरी ओर अक्सर गहराई से गुमराह करनेवाला कहने का साहस करती है। दूसरा, यह क्रांतिकारी मार्क्सवाद के दार्शनिक आधार को बहुत स्पष्ट और जुझारू तरीके से सामने रखती है और उसका बचाव करती है। दाँव पर बहुत ऊंची चीज लगी हुई है। मैककेना जिन मुद्दों को संबोधित करते हैं वे मुख्यतः सैद्धांतिक हैं, लेकिन अमूर्तता से बहुत दूर हैं। वे इस बात से चिंतित हैं कि लोग पूंजीवाद, वर्ग का महत्व और पूंजीवाद विरोधी प्रतिरोध की संभावना...
आगे पढ़ें..सीआईए और फ्रैंकफर्ट स्कूल का साम्यवाद विरोध
वैश्विक सिद्धांत उद्योग की बुनियाद फ्रांसीसी सिद्धांत के साथ-साथ फ्रैंकफर्ट स्कूल (Frankfurt School) का आलोचनात्मक सिद्धांत (Critical Theory) वैश्विक सिद्धांत उद्योग (Global Theory Industry) के सबसे अधिक बिकनेवाले मालों (hottest commodities) में से एक रहा है। साथ में, वे (आलोचनात्मक सिद्धांत और फ्रांसीसी सिद्धांत) सैद्धांतिक आलोचना की कई प्रवृत्तियों को दिशा देने और उसे सेट करनेवाले रूपों के लिए सामान्य स्रोत की तरह कार्य करते हैं। आज वे पूंजीवादी दुनिया के अकादमिक बाजार-- उत्तर-औपनिवेशिक (postcolonial) और विऔपनिवेशिक सिद्धांत (decolonial theory) से लेकर क्वियर सिद्धांत (queer theory), अफ़्रीकी-निराशावाद (Afro-pessimism) और उससे आगे तक पर हावी हैं। इसलिए फ्रैंकफर्ट स्कूल के राजनीतिक रुझान का वैश्वीकृत पश्चिमी बुद्धिजीवियों (globalized Western intelligentsia) पर बुनियादी असर पड़ा है। इस लेख के केंद्र में रहेंगे-- इंस्टिट्यूट फॉर सोशल रिसर्च के पहली पीढ़ी के मशहूर लोग, खासकर थियोडोर अडोर्नो और मैक्स होर्खाइमर। ये सभी उस क्षेत्र की ऊँची हस्ती हैं जिसे पश्चिमी मार्क्सवाद या सांस्कृतिक मार्क्सवाद...
आगे पढ़ें..डिजिटल युग में मीडिया
डिजिटल मीडिया तेजी से हमारे जीवन पर कब्जा कर रहा है - चाहे वह सोशल मीडिया हो, डिजिटल क्लासरूम हो या नेटफ्लिक्स जैसे ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म। यहां तक कि विश्व कप का प्रसारण भी न केवल टीवी बल्कि विभिन्न ऐप के माध्यम से भी किया जा रहा है। आज के नौजवानों का अपने मोबाइल फोन के साथ एक भावनात्मक रिश्ता है, वे हमें केवल उनकी मोबाइल स्क्रीन के लोड होने तक के बीच ही समय देते हैं। डिजिटल मीडिया के उभार के साथ, हमें ताकतवर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का भी उभार देखने को मिलता है जो तेजी से यह तय करता है कि हम अपने समाचार और मनोरंजन कैसे हासिल करें और साथ ही यह दुनिया के सबसे बड़े एकाधिकारियों में से एक बने। जबकि अक्सर इन डिजिटल प्लेटफॉर्म, जैसे कि गूगल और फेसबुक/मेटा, को मीडिया से अलग करते हुए सोशल मीडिया कहा जाता है, आज हमें यह पहचानने...
आगे पढ़ें..एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री 1862 संस्करण की भूमिका
जस्टस फॉन लिबिग ने 1862 में अपनी ‘आर्गेनिक केमिस्ट्री इन इट्स एप्लीकेशन टू एग्रीकल्चर एंड फिजियोलॉजी’ का 7वां संस्करण प्रकाशित की थी, जिसे अक्सर ‘एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री’ के नाम से जाना जाता है। लिबिग के किसी भी काम का तुरंत अंग्रेजी में अनुवादित होना आम था । हालाँकि, एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री के 1862 संस्करण के पहले खण्ड में, खासकर इसके लम्बे और उत्तेजक परिचय में, उन्नत ब्रिटिश कृषि पद्धति की विस्तृत आलोचना भी शामिल था। लीबिग के अंग्रेज प्रकाशक वाल्टन ने इसे “अपमानजनक” करार देते हुए अपनी प्रति को नष्ट कर दिया था। इसलिए, अंग्रेजी में कभी इसकी सम्पूर्ण कृति छपी ही नहीं। हालांकि, 1863 में इस किताब के दूसरे खण्ड का अनुवाद आयरिश वैज्ञानिक जॉन ब्लीथ ने ‘द नेचुरल लॉ ऑफ़ हसबेंडरी’ के नाम से किया और इसे न्यू यॉर्क की अप्पलटन ने प्रकशित की । उस किताब में 1862 संस्करण की भूमिका शामिल थी, लेकिन संक्षिप्त और नरम लहजे का...
आगे पढ़ें..विध्वंश, पुनर्वितरण या योजना के द्वारा-- चीन की पतनशीलता ?
हाल के वर्षों में, डीग्रोथ (गिरावट) सिद्धांत ने पारिस्थितिक अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या के बीच लोकप्रियता हासिल की है। डीग्रोथ सिद्धांतकारों का तर्क है कि मानवता द्वारा भौतिक संसाधनों की खपत और पर्यावरण पर प्रभाव ने पृथ्वी की पारिस्थितिक क्षमता को खत्म कर दिया है, और पारिस्थितिक स्थिरता की बहाली के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में सामग्री और ऊर्जा थ्रूपुट की तेजी से और बड़े पैमाने पर कमी की आवश्यकता है। अनुभवजन्य साक्ष्य से पता चलता है कि सकारात्मक आर्थिक विकास आमतौर पर बढ़ती सामग्री खपत और पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़ा हुआ है। आर्थिक विकास और पर्यावरणीय प्रभाव के बीच "पूर्ण विघटन" (अर्थात, ऐसी स्थिति जिसमें सकारात्मक आर्थिक विकास दर होती है, संसाधनों की खपत और पर्यावरणीय प्रभाव में पूर्ण कमी के साथ) केवल विशिष्ट देशों में अपेक्षाकृत कम समय के दौरान हुआ है, और वैश्विक स्तर पर पर्याप्त तीव्र गति से होने की संभावना नहीं है। डीग्रोथ सिद्धांतकारों का मानना है कि...
आगे पढ़ें..सूडान में जारी गृहयुद्ध: अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका
सूडान में पिछले तीन महीनों से गृहयुद्ध जारी है। यह गृहयुद्ध सेना प्रमुख जनरल अब्दल फतह अल-बुरहान और रेपिड सपोर्ट फोर्स के मुखिया मोहम्मद हामदान डगालो के बीच सूडान पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए है। अल-बुरहान संप्रभु परिषद के नेता हैं और वस्तुतः सरकार पर उनका नियंत्रण है। अर्द्ध-सैनिक बल रेपिड सपोर्ट फोर्स के मुखिया मोहम्मद हामदान डगालो अभी तक संप्रभु परिषद के उपनेता हैं। यह संघर्ष उस समय शुरू हुआ जब सेना में रेपिड सपोर्ट फोर्स के विलय के बारे में प्रक्रिया शुरू होने वाली थी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 जुलाई को चेतावनी दी कि सैन्य बल और अर्द्ध सैन्य बल के बीच हथियारबंद टकराहटों से ग्रस्त सूडान व्यापक गृहयुद्ध के कगार पर खड़ा है। संयुक्त राष्ट्र ने यह चेतावनी उस समय दी जब एक आवासीय इलाके में हवाई हमले से करीब दो दर्जन नागरिकों की जान चली गयी। इससे समूचे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा...
आगे पढ़ें..कल्पना कीजिए अगर आज आप मुस्लिम हों, अरुंधति रॉय ने कहा
लेखिका और टिप्पणीकार अरुंधति रॉय ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर गंभीर चिंता व्यक्त की है – खास तौर से इस बात पर कि इसे उन महिलाओं द्वारा ऐसी हिंसा को बढ़ावा दिए जाने पर जो अपराधियों के धर्म के आधार पर उनका समर्थन या विरोध करती हैं। “आज हम ऐसी स्थिति में हैं जहां महिलाएं बलात्कार को उचित ठहरा रही हैं, जहां महिलाएं पुरुषों को दूसरी महिलाओं के साथ बलात्कार करने के लिए कह रही हैं। मैं सिर्फ मणिपुर की बात नहीं कर रही हूं। मैं बहुत सारे मामलों के बारे में बात कर रही हूं - चाहे वह हाथरस में हो, चाहे वह जम्मू और कश्मीर में हो।“ बुकर पुरस्कार विजेता ने नवमलयाली सांस्कृतिक पुरस्कार प्राप्त करने के बाद रविवार को केरल के त्रिशूर में यह बात कही। “कौन किसका बलात्कार कर रहा है, इसके आधार पर महिलाएं उस (विशेष) समुदाय के समर्थन में खड़ी होती हैं।...
आगे पढ़ें..वर्ग न्याय
(क्रिस्टोफर नोलन द्वारा लिखित, निर्मित और निर्देशित ‘ओपेनहाइमर’ फिल्म के आने से परमाणु बम के विभिन्न पहलुओं के ऊपर बहस शुरू हो गयी है। यह फिल्म वैज्ञानिक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने मैनहट्टन प्रोजेक्ट पर पहले परमाणु हथियार विकसित करने में सहायता की थी। पूंजीवादी खुफियातंत्र और अदालत के पैंतरे के बावजूद ओपनहाइमर निर्दोष साबित हुए। लेकिन 1953 में परमाणु बम के फॉर्मूले सोवियत संघ पहुंचाने के 'अपराध ' में जूलियस और एथन रोजेनबर्ग को बिजली के झटके से मौत की सजा देने से अमरीकी व्यवस्था पीछे नहीं हटी। उससे पहले 1950 में जर्मन भौतिक विज्ञानी क्लाउस फूच्स खुद गवाही दे चुके थे कि उन्होंने ही सोवियत संघ को यह फॉर्मूला सौंप दिया था। फुच्स के बचाव में वकील ने यह तर्क दिया था कि दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैंड और सोवियत संघ मित्र थे इसलिए फॉर्मूला दुश्मन के हाथ नहीं, बल्कि दोस्त के हाथ सौंपा गया...
आगे पढ़ें..साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की नयी गुलामी के खिलाफ संघर्ष के लिए एकजुट हो!
हमारा देश, समाज और मजदूर आंदोलन एक अभूतपूर्व परिस्थिति से गुजर रहा है. वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण जैसे मनमोहक नारों की आड़ में देश की मेहनतकश जनता पर गुलामी का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है. हर तरफ अफरा-तफरी और बेचैनी का आलम है. रही-सही श्रम सुरक्षा और वेतन-भत्तों में कटौती, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षा के कारण देश की बहुसंख्य जनता में असंतोष व्याप्त है. अच्छे दिन के सुनहरे सपने बदहाली के शिकार मेहनतकश जनता को मुंह चिढ़ा रहे हैं. पिछले दस वर्षो के दौरान मनमोहन सिंह की सरकार ने नवउदारवादी नीतियों को जिस बेरहमी से लागू किया था, उसने एक तरफ जहाँ आम मेहनतकश जनता के जीवन को नरक से भी बदतर हालात में धकेल दिया था वहीं दूसरी ओर उसने भ्रष्टाचार और घोटाले के नये-नये रेकॉर्ड भी कायम किये थे. जनता के मन में कांग्रेस सरकार के प्रति नफरत और गुस्से का लाभ उठा कर, बड़े-बड़े...
आगे पढ़ें..मणिपुर हिंसा : भाजपा की विभाजनकारी नीतियों का दुष्परिणाम
बीते 3 मई को भारत का उत्तरपूर्वी राज्य मणिपुर दंगों से दहक उठा। दो समुदायों के बीच हुए इस दंगे में अभी तक लगभग 90 लोगों की जान जा चुकी है। हजारों घर जलकर खाक हो गये। कितने ही लोगों को अपनी जान बचाकर आसपास के गाँव या दूसरे राज्य में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा है। अपने घर–परिवार से उजड़े लोग भूखे–प्यासे राहत कैम्पों में रहने को मजबूर हैं। हिंसा को काबू में करने के लिए राज्य सरकार ने कितने ही जिलों में कर्फ्यू लगाकर इन्टरनेट सेवा भी बन्द कर दी। लेकिन यह हिंसा पूरे राज्य को अपनी चपेट में लेती चली गयी। इस घटना के एक हफ्ते बाद दुबारा हिंसा की छुटपुट घटनाएँ देखने को मिल रही हैं। इस हिंसा के पीछे का तात्कालिक कारण हाईकोर्ट का एक आदेश है। दरअसल, मणिपुर हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान...
आगे पढ़ें..पेंशन की रक्षा के लिए लाखों लोगों के विरोध से फ्रांस जल उठा
मूल रूप से प्रकाशित: स्ट्रगल-ला लुचा26 मार्च 2023 को गैरी विल्सन द्वारा ( Struggle-La Lucha द्वारा और अधिक ) |( 29 मार्च, 2023 को पोस्ट किया गया ) 23 मार्च 2023, एक आम हड़ताल की कार्रवाई का एक राष्ट्रीय दिवस बन गया, जिसे फ़्रांस में श्रमिक संघों द्वारा आयोजित किया गया। पीपल्स डिस्पैच की रिपोर्ट के अनुसार और संघ के अनुमान के अनुसार, उस दिन पूरे फ्रांस में 250 से अधिक स्थानों पर लगभग 35 लाख लोग सड़कों पर उतरे। श्रमिकों ने ऊर्जा, परिवहन, रेलवे, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, उद्योगों, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों, अपशिष्ट प्रबंधन सहित नगरपालिका सेवाओं सहित महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम रोक दिया, और प्रमुख शहरों की मुख्य सड़कों, पुलों और चौकों की नाकेबंदी कड़ी कर दी है। एक दिन पहले, 22 मार्च को, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन राष्ट्रीय टीवी पर बिना वोट के नेशनल असेंबली के माध्यम से पेंशन में कटौती के अपने फैसले को दोहराने...
आगे पढ़ें..फ्रांस और ब्रिटेन: दो विद्रोहों की कहानी
26 मार्च 2023 फ्रांसीसी विद्रोह और ब्रिटेन में संघर्ष पर लिंडसे जर्मन यह अक्सर नहीं होता है कि शाही परिवार की राजकीय यात्रा अंतिम समय में रद्द कर दी जाये। ऐसा अभी भी कम ही होता है कि इसे रद्द कर दिया जाता है क्योंकि देश में व्यापक हड़ताल की लहर चल रही है। लेकिन किंग चार्ल्स और फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रॉन को अपने पूर्व निर्धारित शिखर सम्मेलन को रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उन्हें डर था कि स्थिति बहुत डावांडोल थी। इसके अलावा, वर्साय के हॉल ऑफ मिरर्स में भव्य भोज को उस समय एक बुरा रूप माना गया जब फ्रांसीसी श्रमिकों को बताया जा रहा था कि उन्हें अपनी पेंशन पाने के लिए अधिक समय तक काम करना होगा। आखिरकार, 1789 में फ्रांसीसी क्रांति तब शुरू हुई, जब पेरिस की...
आगे पढ़ें..थॉमस रो : ब्रिटिश राजदूत जिसने भारत की गुलामी की नींव रखी थी
‘ईमानदार टॉम’, जैसा उसे प्रिंस ऑफ़ वेल्स की बहन एलिज़ाबेथ कहती थी, को राजदूत बनना अपने जीवन का उद्देश्य लगा. सो उसने इंग्लैंड के राजा के लिए वह काम कर दिया जो उसके पहले कोई भी ब्रिटिश राजदूत नहीं कर पाया था. वह हिंदुस्तान को थाली में परोसकर अपने राजा के पास ले आया. अंग्रेज़ी शासन भारत से व्यापार करने के लिए आतुर हुआ जा रहा था. 1599 में ईस्ट इंडिया कंपनी इंग्लैंड की रानी से हुक्मनामा लेकर हिंदुस्तान से व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर चुकी थी, पर बात नहीं बन पा रही थी. अकबर काल के दौरान और उसके बाद विलियम हॉकिन्स कंपनी के जहाजों को 1609 में भारत तो ले आया था, उसे जहांगीर के दरबार में जगह भी मिल गई थी, पर वह व्यापारिक संधि नहीं करवा पाया था. फिर कंपनी ने 1615 में थॉमस रो को 600 पौंड...
आगे पढ़ें..एकान्त के सौ वर्ष: एक परिचय
गाब्रिएल गार्सीया मार्केज के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'एकान्त के सौ वर्ष' का हिन्दी अनुवाद राजकमल से प्रकाशित हुआ है। इस महाकाव्यात्मक उपन्यास को पढ़ना अधिक अर्थपूर्ण बनाने के लिए यह टिप्पणी दी जा रही है। हमें अगर पुर्तगाल और स्पेन की आइबेरियन संस्कृति, सामाजिक जीवन और उससे जुड़ी हुई दूसरी चीजों की जानकारी हो तो इसका आनन्द उठाने में अधिक आसानी होगी। साथ ही यदि हम इस बात की कल्पना करें कि सामन्तवाद से व्यापारिक पूँजीवाद में संक्रमण के युग का आदमी किस प्रकार का था, उस समय के चरित्र जैसे समुद्री डाकू (पाइरेट्स), लुच्चे-लफंगे बदमाश, घुमन्तु (जिप्सी) और काउब्वाय वगैरह कैसे थे तो भी हमें इस उपन्यास को पढ़ने में आसानी होगी। स्पेनी औपनिवेशीकरण के समय लातिन अमरीका में किस तरह लोग अलग-अलग जगह से आकर बसे और किस तरह विभिन्न संस्कृतियों के बीच घात-प्रतिघात और मिश्रण हुआ और स्पेनी,...
आगे पढ़ें..दूसरे इंटरनेशनल की टकराव से परिपूर्ण विरासत
वस्तुतः आज के सभी समाजवादी दूसरे इंटरनेशनल (1889 से 1914) के प्रत्यक्ष वंशज हैं। इसे सोशलिस्ट इंटरनेशनल के रूप में भी जाना जाता है, इस आंदोलन ने दुनिया के संगठित मजदूर वर्ग के बड़े हिस्से को समाजवादी क्रांति के बैनर के नीचे एकताबद्ध किया, और हर जगह पूंजीपतियों द्वारा इसे उनके अस्तित्व के खतरे के रूप में देखा गया। फिर भी इक्कीसवीं सदी के समाजवादी लोग इस संगठन के इतिहास या इसके प्रतिनिधित्व के बारे में अपेक्षाकृत कम जानते हैं। विशेष रूप से वामपंथी समाजवादियों के लिए, दूसरा इंटरनेशनल प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत में, 1914 में अंतरराष्ट्रीयतावाद के साथ अपने विश्वासघात से लगभग अनन्य रूप से जुड़ा हुआ है। उस समय दूसरे इंटरनेशनल को एक अपमानजनक पतन का सामना करना पड़ा, क्योंकि इसके प्रमुख दलों ने समाजवादी सिद्धांतों को त्याग दिया और अपनी-अपनी सरकारों के युद्ध प्रयासों को खुला समर्थन दिया। तथ्य यह है कि 1919 में पूंजीवादी व्यवस्था को...
आगे पढ़ें..संघ-भाजपा का फासीवाद और भारतीय लोकतंत्र
संघ और भाजपा का अश्वमेघ का घोड़ा थम नहीं रहा है। संसदीय राजनीतिक विकल्प की दूर-दूर तक कोई संभावना दिखायी नहीं देती क्योंकि न तो विपक्षी पार्टियों के पास करने के लिए कोई अलग कार्यसूची है और न ही संघ-भाजपा से उनके कोई गहन वैचारिक मतभेद हैं। इसलिए जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं, वहाँ भी वे बुनियादी तौर पर कुछ अलग कर दिखाने में असमर्थ हैं। भारतीय क्रान्तिकारी और प्रगतिशील लोग भी अपने कार्यक्रम को लेकर बेहद दुविधाग्रस्त हैं। संघ और भाजपा के मौजूदा उभार को फासीवाद की आहट के तौर पर देखा जा रहा है। लोकतांत्रिक संस्थाओं के सरकार द्वारा इस्तेमाल, पुलिस-प्रशासन द्वारा संघ-भाजपा के लम्पट तत्वों और गुण्डों को संरक्षण, मीडिया के सरकारी प्रवक्ता बन जाने और न्यायपालिका के भीतर भी संघ-भाजपा के बढ़ते वर्चस्व के चलते बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसे लोकतंत्र...
आगे पढ़ें..मार्क्स-एंगेल्स के लेखन से जूझने की कोशिशें और नया समय
सभी जानते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स के लेखन का संपादन-प्रकाशन भी कम से कम मार्क्सवादियों के लिए व्यावहारिक आंदोलन जैसी ही महत्वपूर्ण चीज रही है। खुद 'कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र' की एक भूमिका में मार्क्स-एंगेल्स ने इसकी लोकप्रियता में उतार चढ़ाव को संबद्ध देश में मजदूर आंदोलन की हालत का पैमाना कहा था। असल में मार्क्स को जिन भौतिक हालात में काम करना पड़ा वे लिखे-पढ़े को अधिक सहेज कर रखने की अनुमति नहीं देते थे। दूसरे, जिस सामाजिक समुदाय के हित में उन्होंने ताउम्र लिखा वह तत्कालीन समाज में सब कुछ मूल्यवान पैदा करने के बावजूद प्रभुताप्राप्त ताकतों द्वारा समाज की हाशिए की ताकत बना दिया गया था। इसलिए अपने नेता की लिखित-प्रकाशित सामग्री के संरक्षण की कोई व्यवस्था उसके पास नहीं थी। तीसरे मार्क्स ने अपने ऊपर काम बहुत ले लिया था और जिंदगी ने उन्हें वक्त...
आगे पढ़ें..लघु-पत्रिका ‘धरती’
“आज मुख्यधारा की पत्रिकाएँ और अखबार कारपोरेट जगत और साम्राज्यवादी ताकतों के प्रभाव में समाहित हो रही हैं। इस वजह से देश के चौथे स्तंभ के प्रति पाठकों में संशय उत्पन्न होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में लघु-पत्रिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघु-पत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघु-पत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। लघु-पत्रिकाएँ पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। लघु-पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, ये पत्रिकाएँ मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो या वैश्वीकरण (ग्लोबलाईजेशन) का प्रश्न हो मुख्य धारा की व्यावसायिक पत्रिकाएँ सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श और...
आगे पढ़ें..औपनिवेशिक जनता यूक्रेन संकट को कैसे समझे
ब्लैक अलायंस फॉर पीस (बीएपी) जोर देकर यह घोषणा करता है कि दुनिया पर राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व के लिए यूरोपिय संघ, नाटो और अमरीका के निरन्तर और एकतरफा अभियान के चलते ही यूक्रेन में टकराव के हालात पैदा हुए हैं। जैसा कि बीएपी ने पहले ही जोर देकर कहा है कि मौजूदा संकट की जड़ें 2014 में यूक्रेन की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गयी सरकार के अमरीकी समर्थन से हुए तख्तापलट में हैं और यूरोपिय संघ, नाटो और अमरीका, जो “प्रभुत्व की धुरी” हैं, उनका दृढ़ संकल्प है कि यूक्रेन एक जबरदस्त जंगी अमले वाले नाटो सदस्य देश में बदल जाये, जो हमेशा रूस की सीमा पर घात लगाये बैठा रहे। 1999 से ही, जब बिल क्लिन्टन ने वारसा सन्धि के भूतपूर्व देशों को शामिल करने के लिए नाटों की सदस्यता बढ़ाने की आधिकारिक प्रक्रिया की शुरुआत की थी, तभी से नाटो...
आगे पढ़ें..पद्म श्री के नाम पर वन संरक्षक आदिवासियों के साथ भद्दा मजाक
पृथ्वी एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पर जीवन सम्भव है। यहाँ जीवों की उत्पत्ति और वृद्धि के लिए एक बेहतर पारिस्थितिकीय तंत्र है। मानव इस तंत्र का सबसे श्रेष्ठ जीव है जो धरती पर और उसके पारिस्थितिकीय तंत्र पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव डालता है। हमारे बीच ही ऐसे बहुत से लोग मौजूद है, जो पारिस्थितिकीय तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव के लिए अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। वे मानवता के सच्चे सेवक हैं। वे बिना किसी लोभ–लालच के यह काम करते रहते हंै, लेकिन सरकारें उनकी इस निस्वार्थ सेवा को भी भुनाने के लिए तत्पर रहती हैं। सरकारें धुर–विरोधी सोच के ऐसे लोगों को बड़े–बड़े सम्मानों से नवाज कर अपने पर्यावरण विरोधी कुकर्मों की कालिख कम करने की कोशिश करती हैं। हाल ही में भारत सरकार ने तुलसी गोडा को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया है। तुलसी गोडा कर्नाटक के अंकोला तालूका जिले के...
आगे पढ़ें..सीबीआई और इडी के निदेशकों का सेवा विस्तार
वर्ष 2021 के संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले केन्द्र सरकार द्वारा दो अध्यादेश पारित किये गये। 9 दिसम्बर को इन्हें संसद मेंे ध्वनि मत से पास भी करा लिया गया। पहला अध्यादेश केन्द्रीय सर्तकता आयोग संशोधन (2021) और दूसरा अध्यादेश दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन संशोधन (2021) है। केन्द्रीय सर्तकता आयोग संशोधन में इडी प्रवर्तन विभाग और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन संशोधन में सीबीआई के निदेशकों का कार्यकाल 5 साल तक बढ़ाने का प्रावधान है। जिसमें गत वर्षों के रिकॉर्ड के आधार पर निदेशकों का कार्यकाल बढ़ाया जायगा। जब अध्यादेशों को पास किया गया, तब लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह ने बताया कि यह अध्यादेश सीबीआई और इडी के निदेशकों का कार्यकाल 5 साल तक सीमित करने के लिए है। इन अध्यादेशों से पहले सीबीआई और इडी के निदेशकों का कार्यकाल 2 साल का था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भ्रष्टाचार और घुसखोरी की जाँच के...
आगे पढ़ें..बेरोजगारों पर प्रयागराज में बरसी पुलिस की लाठियाँ
(प्रयागराज में तैयारी कर रहे छात्रों की आपबीती पर ग्राउंड रिपोर्ट) 24 जनवरी 2022 को पुलिस द्वारा बेरोजगारी का दंश झेल रहे छात्रों की बर्बर पिटाई पूरे देश ने देखी। देश भर में इसके लिए शासन–प्रशासन तंत्र की भर्त्सना की गयी। नौजवान देश के कर्णधार कहे जाते हैं। देश की प्रगति में सार्थक ऊर्जा लगा सकते हैं। वे नौकरी के लिए ही आन्दोलन कर रहे थे, जिसके लिए उनके साथ आतंकवादियों जैसा बर्ताव किया गया। उन्हें मां–बहन की गालियाँ दी गयीं। जब गालियाँ देने पर भी वे हॉस्टल से बाहर नहीं आये तो उनके हॉस्टल के दरवाजे–खिड़कियाँ तोड़कर उन्हें बाहर निकाला गया। सड़क पर दौड़ा–दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया। यह कोई अंग्रेजी राज की घटना नहीं, बल्कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाने और विश्व गुरु का दावा करने वाले समय की घटना है। इस घटना की कल्पना मात्र ही सहमा देने...
आगे पढ़ें..कलाकार: ‘आप, उत्पल दत्त के बारे में कम जानते हैं’
‘‘मैं तटस्थ नहीं पक्षधर हूं और मैं राजनीतिक संघर्ष में विश्वास करता हूं। जिस दिन मैं राजनीतिक संघर्ष में हिस्सा लेना बंद कर दूंगा, मैं एक कलाकार के रूप में भी मर जाऊंगा।’’ हिंदी पट्टी की बहुधा आबादी उत्पल दत्त को एक हास्य कलाकार के रूप में जानती है। जिन्होंने ‘गोलमाल’, ‘चुपके चुपके’, ‘रंग बिरंगी’, ‘शौकीन’ और ‘अंगूर’ जैसी फ़िल्मों में जबर्दस्त कॉमेडी की। एक इंक़लाबी रंगकर्मी के तौर पर वे उनसे शायद ही वाकिफ़ हों। जबकि एक दौर था, जब उत्पल दत्त ने अपने क्रांतिकारी रंगकर्म से सरकारों तक को हिला दिया था। अपनी क्रांतिकारी सरगर्मियों की वजह से वे आजा़द हिंदुस्तान में दो बार जे़ल भी गए। एक दौर था,जब वे देश की सबसे बड़ी थिएटर हस्तियों में से एक थे। आज़ादी के बाद उत्पल दत्त, भारतीय रंगमंच के अग्रदूतों में से एक थे। उन्होंने नाटककार, अभिनेता, थिएटर निर्देशक...
आगे पढ़ें..‘रोही’ विकास पर कुर्बान एक गाँव की दास्तान
(फोटो साभार गूगल से) “अपनी मिट्टी को छिपाएँ आसमानों में कहां, उस गली में भी न जब अपना ठिकाना हो सका” 25 नवम्बर को मुझे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जेवर रैली में जाने का मौका मिला। इसी दिन प्रधानमंत्री ने नोएडा इण्टरनेशनल एयरपोर्ट जेवर का शिलान्यास किया। हमेशा की तरह ही प्रधानमंत्री की इस रैली की चकाचौन्ध भी निराली थी और हमेशा की तरह ही उन्होने अपने भाषण में विकास, समृद्धि, रोजगार के लम्बें चौड़े दावे भी किये। रैली से वापस लौटते हुए, रैली स्थल से बामुश्किल एक किलोमीटर दूर मुझे एक डरावना मंजर नजर आया। मैं जेवर हवाई अड्डे पर कुर्बान हो गये रोही गाँव के पास से गुजर रहा था। सड़क के किनारे खड़े होकर देखने से ऐसा लगता है जैसे खुदाई में निकली कोई बस्ती हो। धीरे–धीरे आप इसके नजदीक जायेंगे तो आपको गलियाँ, कुएँ, चौराहें, मकानों की अदखुदी नींवे,...
आगे पढ़ें..बुद्धि को भ्रष्ट कर रहा फेसबुकी प्रेत
एनएन नेटवर्क पर एसएसआरएस प्लेटफॉर्म द्वारा किये गये एक हालिया सर्वेक्षण में पाया गया कि चार में से तीन अमरीकी वयस्कों का कहना है कि फेसबुक अमरीकी समाज को तबाह कर रहा है। 55 फीसदी लोगों ने इस प्लेटफॉर्म का उपयोग करने वाले लोगों को ही इसका दोषी माना है। जबकि 45 फीसदी का कहना है कि यह सब फेसबुक के काम करने के तरीके का ही परिणाम है। 49 फीसदी अमरीकियों ने बताया है कि वे कम से कम एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो फेसबुक पर उपलब्ध सामग्री के कारण साजिश के सिद्धान्त में विश्वास करने लगा है। ऐसी सोच रखने वालों में युवा लोगों की संख्या अधिक है। 35 साल से कम उम्र के 61 फीसदी वयस्कों का कहना है कि फेसबुक पर परोसी गयी सामग्री के कारण उनकी पहचान का कोई न कोई व्यक्ति इस तरह की साजिश...
आगे पढ़ें..एजाज अहमद से बातचीत : “राजसत्ता पर अन्दर से कब्जा हुआ है”
(दुनिया के जाने-माने विद्वान एजाज़ अहमद का निधन हो गया है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजली। पेश हैं दुनिया के बारे में उनके विचार जो कुछ साल पहले देश विदेश के अंक 33 में के एक लेख में छपा था.) * * * एजाज अहमद भारतीय मूल के मार्क्सवादी विचारक तथा आधुनिक इतिहास, राजनीति और संस्कृति के अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठाप्राप्त सिद्धान्तकार हैं। वे भारत, कनाडा और अमरीका के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ा चुके हैं और फिलहाल कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इर्विन के तुलनात्मक साहित्य विभाग में यशस्वी प्रोफेसर हैं जहाँ वे आलोचनात्मक सिद्धान्त पढ़ाते हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार के एक बड़े भाग का सम्बन्ध हिन्दुत्व की साम्प्रदायिकता, फासीवाद, धर्मनिरपेक्षता और भारतीय सन्दर्भ में वामपंथ के लिए मौजूद सम्भावनाओं से है। दूसरे हिस्सों में वे वैश्वीकरण, वामपंथ के लिए वैश्विक सम्भावनाओं, अन्तोनियो ग्राम्शी के...
आगे पढ़ें..कनाडा: कोविड टीका की अनिवार्यता के खिलाफ ट्रक ड्राइवरों का प्रदर्शन, राजधानी ओटावा को घेरा
“फ्रीडम कॉन्वॉय” आंदोलन में हजारों कनाडाई नागरिक भी शामिल हैं,घबड़ाई सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी है तो कोर्ट ने 10 दिनों के लिए निषेधाज्ञा लागू कर दी है। मांग पूरी होने तक वापस न लौटने पर अडिग हैं आंदोलनकारी कोविड प्रतिबंधों और ड्राइवरों को अनिवार्य तौर पर कोविड टीका लगाने के फरमान के खिलाफ कनाडा के ट्रक ड्राइवरों का अमेरिकी सीमा से लगी राजधानी ओटावा में प्रदर्शन लगातार जारी है। आंदोलन को तमाम देशों के लोगों का समर्थन मिल रहा है। इससे घबड़ाई कनाडा की सरकार ने रविवार को राजधानी में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। जबकि सोमवार को कनाडा की एक अदालत ने ओटावा शहर में वाहनों के हार्न के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए 10 दिनों के लिए अस्थायी रूप से निषेधाज्ञा लागू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शनकारी कनाडा संसद के बाहर जमे हुए हैं।...
आगे पढ़ें..अमेरिकी युद्ध अपराधों का संक्षिप्त विवरण
एक “व्हिसलब्लोअर” की कहानी पर आधारित [इनपुट : अमेरिकी पत्रिका ‘ट्रुथआउट’ में प्रकाशित मार्जोरी कोहन का एक निबंध] अमेरिकी सैनिकों द्वारा ड्रोन हमले बड़े पैमाने पर हो रहे हैं. इतिहास बताता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अमेरिका का राष्ट्रपति कौन है – कोई रिपब्लिकन या फिर कोई डेमोक्रेट। एक अनुमान के अनुसार, “2004 के बाद से अमेरिकी सैन्य और सीआईए ड्रोन अभियानों में 9,000 से 17,000 लोग मारे गए हैं, जिनमें 2,200 बच्चे और यहां तक कि कई अमेरिकी नागरिक भी शामिल हैं। ओबामा के 8 साल के कार्यकाल के दौरान कुल 1878 ड्रोन हमले हुए। जब डोनाल्ड ट्रम्प कार्यालय में आए, तो उनके पहले दो वर्षों के दौरान ही 2,243 ड्रोन हमले किए गए। अब जो बिडेन आये हैं. उन्होंने भी ड्रोन हमले की नीति को जारी रखने का वादा किया है, यहां तक कि अफगानिस्तान में...
आगे पढ़ें..पूंजी, प्रौद्योगिकी और मानव नियति!
पुस्तक-समीक्षा : ‘सैपियन्स – अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ मैनकाइंड’ एवं ‘21 लेसन्स फॉर द 21स्ट सेंचुरी’ - युवाल नोह हरारे पूंजीवादी सभ्यता के स्वर वर्तमान मानव सभ्यता को विभिन्न कसौटियों पर परखने और सकारात्मक या नकारात्मक दिशा में उसकी प्रगति को समझने के बड़े प्रयास काफी पहले से होते रहे हैं। 19वीं सदी में विकसित औद्योगिक पूंजीवाद के चरित्र और सर्वहारा के शोषण की पृष्ठभूमि में पहली बार राज्य के मूलभूत संगठन और उसके आर्थिक ढांचे के बीच सम्बन्धों और उसके सामाजिक निहितार्थों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। निसंदेह यह कार्ल मार्क्स ही थे जिन्होंने अपने महान ग्रंथ ‘दास कैपिटल’(1867) में मानव सभ्यता के विभिन्न चरणो में उत्पादन के स्वरूप और उसके सम्बन्धों पर पहला गंभीर और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। इसके अनंतर मानव संवेदनाओं के स्तर पर इस आर्थिक व्यवहार को सम्यक रूप से समझते हुए...
आगे पढ़ें..फासीवाद का काला साया
नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमले, सत्ता के घनीभूत केंद्रीकरण के लिए राज्य के पुनर्गठन और भय के सर्वव्यापी प्रसार के मामले में मोदी के शासन के वर्ष इंदिरा गांधी द्वारा लगायी गयी इमरजेंसी के समान ही हैं। लेकिन समानता यहीं खत्म हो जाती है। दरअसल, दोनों में कई तरह की बुनियादी असमानताएं हैं। पहली, इमरजेंसी के समय लोगों को आतंकित करने और उन्हें ‘‘राष्ट्रवाद’’ का पाठ पढ़ाने के लिए पीट-पीटकर मार डालने वाली हिंसक-उन्मादी भीड़ और गली के गुण्डे नहीं थे। तब राज्य खुद ही लोगों का दमन कर रहा था। लेकिन आज हिन्दुत्व के लफंगे गिरोह भी सरकार के आलोचकों को उनके ‘‘तुच्छ जुर्मों’’ के लिए माफी मांगने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इसके अलावा, इन भयाक्रांत आलोचकों के सिर पर गिरफ्तारी की तलवार भी लटकी हुई है। कोई उस बेचैन करने वाले दृश्य को कैसे भूल सकता है जिसमें एक...
आगे पढ़ें..विज्ञान और “संस्कृति” का विच्छेद
एक वक्त था जब वैज्ञानिक अपने कार्य को व्यापक रूप से बोधगम्य बनाने की कोशिशों में जी-जान से लगे रहते थे। लेकिन, आज की दुनिया में ऐसा रुख दिखायी देना नामुमकिन है। आधुनिक विज्ञान के आविष्कारों ने सरकारों के हाथों में अच्छा या बुरा करने की अभूतपूर्व ताकत दे दी है। जबतक इन्हें इस्तेमाल करने वाले राजनेताओं को इन ताकतों की प्रकृति के बारे में बुनियादी समझ न हो, मुश्किल है कि वे इन्हें समझदारी के साथ इस्तेमाल करेंगे। और लोकतान्त्रिक देशों में न सिर्फ राजनेताओं, बल्कि आम लोगों को भी कुछ हद तक वैज्ञानिक समझदारी रखना जरूरी है। अंग्रेजी में पढ़ें... https://users.drew.edu/~jlenz/br-kalinga.html इस समझदारी का व्यापक पैमाने पर प्रसार करना कोई आसान काम नहीं है। जो लोग तकनीकी वैज्ञानिकों और जनता के बीच सम्पर्क स्थापित करने का काम प्रभावी तरीके से कर सकते हैं, दरअसल वे ऐसा काम कर...
आगे पढ़ें..जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का तर्कहीन मसौदा
सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करने वाले हम जैसे कई लोग हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा घोषित-- उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) विधेयक, 2021-- को देखकर पूरी तरह भयभीत भले ही ना हो लेकिन आश्चर्यचकित हैं। यह मुख्यतः दो बच्चे पैदा करने पर केन्द्रित है, जिसमें उल्लंघन के लिए दंड और कानून का पालन करने के लिए कई तरह के प्रोत्साहनों का उल्लेख किया गया है। इसके खिलाफ तेजी से बढ़ रही नकारात्मक प्रतिक्रिया का कारण इसमें निहित विभिन्न खतरें हैं, और साथ ही यह भी कि अधिकतर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि ‘विकास सबसे अच्छा गर्भनिरोधक है' और यह भी कि प्रोत्साहन के द्वारा जनसख्ंया स्थिरीकरण की बात बहुत पहले ही अतार्किक साबित हो चुकी है। 1994 के शुरू में इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट (यूएन 1994) का कार्रवाई का मसौदा, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर...
आगे पढ़ें..रैमजे क्लार्क का निधन: एक महान्यायवादी जो साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े थे
अमरीका के पूर्व अटॉर्नी जनरल और प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता रैमजे क्लार्क, जो दुनिया भर में अमरीकी सैन्य आक्रमण के खिलाफ खड़े थे, 9 अप्रैल को न्यूयॉर्क शहर में अपने घर पर शांतिपूर्वक अनंत में खो गये. 93 वर्ष के रैमजे अपने करीबी परिवार से घिरे हुए थे। अंग्रेजी में पढ़ें .... https://mronline.org/2021/04/15/ramsey-clark-dies-an-attorney-general-who-turned-against-imperialism/ मैं निश्चित रूप से अल्बुकर्क में बड़े होने वाले इस किशोर को नाम से जानती हूँ। उस समय मैं कल्पना नहीं कर सकती थी कि हम दोस्त बन जाएंगे, कि मुझे उनके साथ काम करने और एक महान मानवतावादी रैमजे क्लार्क के बारे में जानने का सम्मान मिलेगा। पहले सहायक और बाद में अमरीकी अटॉर्नी जनरल के रूप में, रैमजे क्लार्क ने 1964 और 1968 के दो ऐतिहासिक मसौदे-- अमरीकी नागरिक अधिकार अधिनियम तथा 1965 के मतदान अधिकार अधिनियम को पारित कराने में मदद की, और वे...
आगे पढ़ें..तथ्य सदैव अटल सत्य होते हैं: “एक्सटर्मिनेट ऑल द ब्रूट्स” डाक्यूमेंट्री फिल्म की समीक्षा
उपनिवेशवाद, गुलामी और नरसंहार पर आधारित राउल पेक की चार भागों की जोरदार डाक्यूमेंट्री फ़िल्म उपनिवेशवाद के अपराधों को पूरी तरह उजागर करती है। “तुम पहले से बहुत कुछ जानते हो और इसलिए मैं भी जानता हूँ। हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है बल्कि जितना हम जानते हैं उसको समझने और उससे निष्कर्ष तक पहुंचने के साहस की कमी है।" --“एक्सटर्मिनेट ऑल द ब्रूट्स”, 1996 में ग्राण्टा द्वारा प्रकाशित स्वेन लिंडक्विस्ट की किताब लिंडक्विस्ट की किताब और राउल पेक की इस फ़िल्म का शीर्षक, जोसेफ कॉनराड़ की किताब “हार्ट ऑफ डार्कनेस" से लिया गया है। अफ्रीका को कैसे सभ्य बनाया जाए, इस बारे में अलग-थलग पड़े श्वेत उपनिवेशवादी कुर्तज़ की अंतिम सलाह थी, “एक्सटर्मिनेट ऑल द ब्रूट्स" यानी सभी पशुओं का विनाश कर दो। पेक, लिंडक्विस्ट के दोस्त और सहकर्मी थे। उनकी इस फ़िल्म को एक...
आगे पढ़ें..ईश्वर का आखिरी सहारा (भाग एक)
मैटर, गॉड एंड द न्यू फिजिक्स : ब्रह्मांड विज्ञानी पॉल डेविस की लोकप्रिय पुस्तकों पर एक समीक्षा निबंध कोरिन्ना लोट्ज़ गेरी गोल्ड फ्रेडरिक एंगेल्स ने, विशेष रूप से एंटी-ड्यूहरिंग में, एक ऐसे दर्शन के विचार का विरोध किया जो विज्ञान से ऊपर खड़ा हो। उन्होंने देख लिया था कि सैद्धांतिक प्राकृतिक विज्ञान का क्रांतिकारी विकास प्राकृतिक प्रक्रियाओं के द्वंद्वात्मक चरित्र को सामने लेकर आयेगा। “पहले के सभी दर्शन से स्वतंत्र, जो अभी भी बचा हुआ है, वह है विचार का विज्ञान और उसके नियम, औपचारिक तर्क और द्वंद्वात्मकता। बाकी सब कुछ प्रकृति और इतिहास के सकारात्मक विज्ञान में समाहित हो गया है।”(1) अब हम यह देखेंगे कि कैसे एंगेल्स द्वारा विकसित दार्शनिक पहुँच आधुनिक विज्ञान की क्रांतिकारी प्रगति से सत्यापित और...
आगे पढ़ें..अदृश्य मजदूर और अदृश्य व्यवस्था
यह लेख मैनचेस्टर आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मेरे छोटे से भाषण पर आधारित है, जिसका शीर्षक है–– ‘कोविड 19 के दौरान हमने रोजगार के बारे में क्या सीखा और हमें क्या बदलाव लाने की जरुरत है?’ मैं क्लेयर गैनवे और अपने सहकर्मियों का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे आमंत्रित किया और इन दो चित्रों के इस्तेमाल की अनुमति दी। मैनचेस्टर आर्ट गैलरी द्वारा की जा रही इस समीक्षा में, कि इसके विशाल संग्रह में से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए किसे चुनना चाहिए, जिससे प्रदर्शित कलाकृति को हमारे लोगों और हमारे समय के लिए और अधिक प्रासंगिक कैसे बनाया जाये, मुझे उनके संग्रह में से कुछ चित्रों का चयन करने के लिए कहा गया था। मैंने दो चित्र चुने और उन पर अपने विचार प्रकट किये।
आगे पढ़ें..यूपी मॉडल, या कैसे महामारी का सामना न करना पड़े
महामारी के दौरान अपनी जरूरतों के लिए आवाज उठाने वाले नागरिकों को डराने के लिए, उनकी निराशा में डर को भी शामिल कर देने के लिए दुनिया में कहीं भी आतंक विरोधी कानून का इस्तेमाल नहीं किया गया। कोविड-19 की दूसरी लहर से प्रभावित राज्यों में यूपी ने उस निष्ठुरता और अयोग्यता के मेल की मिसाल पेश की है जो अक्सर किसी संकट से निपटने में भारतीय राज्य की खासियत होती है। ऑक्सीजन नहीं, वेंटिलेटर नहीं, हॉस्पिटल में बेड नहीं, दवाइयों की कमी, शमशान घाट और कब्रिस्तानों में बेतहाशा भीड़ और कालाबाजारी के रूप में उत्तर प्रदेश कुछ बेहद अमानवीय प्रभावों का गवाह बना है। सरकार ने संकट को और बदतर बनाया है जो यह बताने पर जोर देती है कि यहां कोई कमी नहीं है तथा पॉजिटिव मामलों और मौतो की "अधिकारिक" संख्या कम करके दिखाती है। हाल ही...
आगे पढ़ें..फिलिस्तीन में बगावत
(मई 2021 की शुरुआत में इजरायल और फिलीस्तीनी लोगों के बीच संगर्ष फिर भड़क उठा. इजरायल सेना ने अल-अक्सा मस्जिद पर हमला करके नमाज अदा कर रहे फिलीस्तीनी लोगों पर जुल्म ढाया. इस संघर्ष में सैकड़ों लोग घायल हुए. इजरायल और फिलीस्तीन के बीच का संघर्ष दशकों पुराना है, इसकी जड़ें इतिहास में हैं, अक्टूबर 1988 में मंथली रिव्यु में छपा यह लेख आज भी इस संघर्ष की प्रकृति को समझने में हमारी मदद करता है.) गाजा के वेस्ट बैंक में रह रहे फिलिस्तीनियों के प्रतिरोध ने इजराइली कब्जे के बाद लगभग इक्कीस वर्षों के दौरान अलग–अलग रूप अख्तियार किये हैं। मौजूदा बगावत का पैमाना और चरित्र, जो एकदम जुदा और नया है, जनता के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की छाप लिये हुए है। विद्रोह के आकार और तीव्रता का अनुमान इसके फलस्वरूप होने वाली मौतों से लगाया जा सकता है। विद्रोह के शुरुआती नौ महीनों में ही...
आगे पढ़ें..पृथ्वी का दुरुपयोग और अगली महामारी
चित्र: प्रीति गुलाटी कॉक्स द्वारा "ह्यूमन मिस्मा": खादी कपड़े पर कढ़ाई और ग्रेफाइट मानवता के द्वारा पर्यावरणीय सीमाओं के अतिक्रमण ने बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया है, जिसमें जलवायु संकटकाल, जैव विविधता की विनाशकारी तबाही और दुनियाभर में बड़े पैमाने पर मिट्टी का व्यापक क्षरण शामिल है। कोविड-19 महामारी की वजह भी पृथ्वी का दुरुपयोग ही है और गंभीर संभावना है कि नए रोगजनकों (बीमारी पैदा करनेवाले) का अन्य जानवरों की प्रजातियों से मनुष्यों तक संक्रमण आगे भी जारी रहेगा। खेती, जंगल की कटाई, खनन, पशु-पालन और अन्य गतिविधियाँ वन्यजीवों के आवास को दूषित और तबाह कर देती हैं, जिससे जानवरों के आगे मनुष्यों के करीब आने के सिवा कोई विकल्प...
आगे पढ़ें..केवल सरकार विफल नहीं हुई है, हम मानवता के खिलाफ अपराधों के गवाह बन रहे हैं…
संकट पैदा करने वाली यह मशीन, जिसे हम अपनी सरकार कहते हैं, हमें इस तबाही से निकाल पाने के क़ाबिल नहीं है। ख़ाससकर इसलिए कि इस सरकार में एक आदमी अकेले फ़ैसले करता है, जो ख़तरनाक है- और बहुत समझदार नहीं है। स्थितियां बेशक संभलेंगी, लेकिन हम नहीं जानते कि उसे देखने के लिए हममें से कौन बचा रहेगा। उत्तर प्रदेश में 2017 में सांप्रदायिक रूप से एक बहुत ही बंटे हुए चुनावी अभियान के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मैदान में उतरे तो हालात की उत्तेजना और बढ़ गई। एक सार्वजनिक मंच से उन्होंने राज्य सरकार- जो एक विपक्षी दल के हाथ में थी- पर आरोप लगाया कि वह श्मशानों की तुलना में कब्रिस्तानों पर अधिक खर्च करके मुसलमानों को खुश कर रही है। अपने हमेशा के हिकारत भरे अंदाज में, जिसमें हरेक ताना और चुभती हुई बात एक डरावनी...
आगे पढ़ें..टाइम्स नाउ के अपमानित और मोहभंग कर्मचारियों का खुला खत
सेवा में, राहुल शिवशंकर, नविका कुमार, पद्मजा जोशी द्वारा, टाइम्स नाउ के अपमानित और मोहभंग कर्मचारी आदरणीय सर / मैडम हम, टाइम्स नाउ के पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों ने कभी नहीं सोचा था कि हम ऐसी स्थिति में खड़े होंगे जहाँ हमें चैनल के सम्पादकों को पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों और मान्यताओं की याद दिलाने के लिए एक खुला पत्र लिखना पड़ेगा। हमारे चारों तरफ जो हो रहा है उसे देख कर हम थक चुके हैं, निराश, परेशान, गुस्सा हैं और हमारा मोहभंग हुआ है। हमने कभी खुद को इतना असहाय महसूस नहीं किया है। बतौर पत्रकार हमें एक बात सिखाई गई थी : हमेशा जनता के पक्ष में खड़ा होना। हमेशा मानवता के पक्ष में रहना। ताकतवर लोगों की उनके किये—धरे के लिए जवाबदेही सामने लाना। लेकिन टाइम्स नाउ इन दिनों "पत्रकारिता" के नाम पर जो कुछ कर रहा है, वह एक...
आगे पढ़ें..मोदी के प्रति हमारी अंधभक्ति से विकराल हुआ कोविड संकट
26 अप्रैल को दिल्ली के एक श्मशान का दृश्य। हर दिन यह कोविड मामलों का नया रिकॉर्ड बना रहा है। 25 अप्रैल को भारत में 352951 नए कोविड के मामले सामने आए थे और 2812 लोगों की मौत हुई थी। (दाएँ फोटो, अदनान आबिदी) फिलहाल भारत एक जीता-जागता नरक बना हुआ है। हर दिन यह कोविड मामलों का नया रिकॉर्ड बना रहा है। 25 अप्रैल को भारत में 3,52,951 नए कोविड के मामले सामने आए थे और 2812 लोगों की मौत हुई थी। अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से मरीज मर रहे हैं। 21 अप्रैल को महाराष्ट्र के नासिक के एक अस्पताल में तकरीबन 24 मरीज ऑक्सीजन की कमी से मर गए और उसके दो दिन बाद दिल्ली में इसी कारण से 25 लोगों की जान गई। लेकिन अगले...
आगे पढ़ें..भारत की महाशक्ति बनने की महत्वकांक्षा को अमरीका क्यों शह देता है?
(7 अप्रैल को अमरीका का युद्धपोत भारत सरकार को बताये बिना (इजाजत लेने की बात ही दूर की है) देश के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में घुस गया। यह देश की सुरक्षा के लिए भारी चिंता का विषय है। इसके बाद भी देश की मीडिया ने इस खबर को छिपाने की कोशिश की। हालाँकि भारत सरकार ने 9 अप्रैल को अमेरिकी नौसेना को इस मामले में अपनी चिंताओं से अवगत करा दिया था, लेकिन अमरीकी नौसेना ने अपनी इस कार्रवाई को "नेविगेशन ऑपरेशन की स्वतंत्रता" के रूप में जायज ठहराया। भारत-और अमरीका की नौसेना इससे पहले संयुक्त युद्ध अभ्यास करती रही हैं। उसके पीछे अमरीका की एक सोची-समझी रणनीति है, इसीलिए वह भारत की महाशक्ति बनने को शह देता है। लगभग डेढ़ दशक पहले इस मुद्दे पर केन्द्रित देश-विदेश पत्रिका में छपा लेख इस मामले में आज भी प्रासंगिक है। पढ़ें...) मार्च...
आगे पढ़ें..भारत की महाशक्ति बनने की महत्वकांक्षा को अमरीका क्यों शह देता है?
(7 अप्रैल को अमरीका का युद्धपोत भारत सरकार को बताये बिना (इजाजत लेने की बात ही दूर की है) देश के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में घुस गया। यह देश की सुरक्षा के लिए भारी चिंता का विषय है। इसके बाद भी देश की मीडिया ने इस खबर को छिपाने की कोशसिह की। हालाँकि भारत सरकार ने 9 अप्रैल को अमेरिकी नौसेना को इस मामले में अपनी चिंताओं से अवगत करा दिया था, लेकिन अमरीकी नौसेना ने अपनी इस कार्रवाई को "नेविगेशन ऑपरेशन की स्वतंत्रता" के रूप में जायज ठहराया। भारत-और अमरीका की नौसेना इससे पहले संयुक्त युद्ध अभ्यास करती रही हैं। उसके पीछे अमरीका की एक सोची-समझी रणनीति है, इसीलिए वह भारत की महाशक्ति बनने को शह देता है। लगभग डेढ़ दशक पहले देश-विदेश पत्रिका में छपा लेख इस मामले में आज भी प्रासंगिक है।) मार्च 2005 में, अमरीकी विदेशमन्त्री कोण्डलीसा...
आगे पढ़ें..पंजाब का कृषि क्षेत्र बदलती जमीनी हकीकत और संघर्ष का निशाना
पंजाब विकसित खेतीवाला राज्य है जहाँ लगभग एक करोड़ एकड़ (40 लाख हैक्टेयर) जमीन पर खेती की जाती है। यहाँ की जमीन पूरी तरह से समतल है। दूसरे राज्यों के बनिस्पत इसके समतलपन में एक खासियत है। पिछले दशकों का रिकार्ड बताता है कि यहाँ की पैदावार देश के औसत से काफी अधिक है। बाढ़ आये, चाहे सूखा पड़े, यह राज्य दोनों हालातों में पैदावार को बनाये रखता है। बाढ़ के दौरान ऊँचे स्थानों पर और सूखे के दौरान निचले स्थानों पर हुई फसल, सामान्य परिस्थितियों वाली औसत फसल का रिकॉर्ड दे देती है। कुदरती नुकसान, ओलावृष्टि आदि से होने वाले नुकसान क्षेत्रीय होते हैं। इस बार कपास की फसल की तबाही, बीमारी से निपटने के लिए सरकार और कृषि विभाग की विफलता के साथ–साथ मुनाफे के लिए दवा कम्पनियों, डीलरों और सरकारी अधिकारियों के भ्रष्ट गठजोड़ का नतीजा है। सरकार को...
आगे पढ़ें..भारतीय किसान आन्दोलन के सामने चुनौतियाँ और मुद्दे
मानवीय सभ्यता के विकास के आरम्भिक दौर में पूरे विश्व में कृषि ही इनसानी आबादी के बहुत बड़े हिस्से के लिए आजीविका का साधन थी। लगभग चार शदाब्दियों पहले यूरोप में ज्यों ही औद्योगिक विकास शुरू हुआ और बढ़ने लगा, त्यों ही कृषि से मानवीय आजीविका का बोझ कम होने लगा। आजकल विश्व के विकसित पश्चिमी हिस्से में लगभग 10 फीसदी आबादी ही आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर रह गयी है, हालाँकि कृषि और जमीन का महत्त्व उसी तरह से कायम है। जहाँ तक एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमरीका के विकासशील और अविकसित देशों और क्षेत्रों का सवाल है, इनकी 70 फीसदी आबादी आज भी आजीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर है। इस सन्दर्भ में यदि हम मानवीय इतिहास पर नजर डालें तो पता लगता है कि यह एक तरह से किसान आन्दोलन और संघर्षों का ही इतिहास है। भारत...
आगे पढ़ें..भारत के प्रमुख किसान आंदोलन
आमतौर पर यह माना जाता है कि भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। स्वतंत्रता से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे, लेकिन अब स्वतंत्रता के बाद जो किसानों के नाम पर आंदोलन या उनके आंदोलन हुए वे हिंसक और राजनीति से ज्यादा प्रेरित थे। देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया। आमतौर पर किसानों के...
आगे पढ़ें..आंदोलनरत किसान अतीत से सीख रहे हैं और राष्ट्रवाद की सच्ची परिभाषा के साथ इतिहास रच रहे हैं
निम्नलिखित अंश भगत सिंह के "युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र" (द भगत सिंह, पेज 224-245) से लिया गया है, जो दो फरवरी, 1931 को लिखा गया था। (मूल अंग्रेजी में पढने के लिए क्लिक करें.) "असली क्रांतिकारी सेनाएँ गाँवों और कारखानों में हैं जो किसान और मजदूर हैं। लेकिन हमारे बुर्जुआ नेता चाहकर भी उनका नेतृत्व करने की हिम्मत नहीं कर सकते। सोता हुआ शेर एक बार अपनी नींद से जाग गया तो बेचैन हो जायेगा फिर हमारे नेताओं का लक्ष्य क्या रहेगा। 1920 में अहमदाबाद के मजदूरों के साथ अपने पहले अनुभव के बाद महात्मा गांधी ने घोषणा की थी कि “हमें मजदूरों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। फैक्ट्री के सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक उपयोग करना खतरनाक है ”(द टाइम्स, मई 1921)। उसके बाद उन्होंने कभी भी मजदूरों से संपर्क करने की हिम्मत नहीं की। किसानों के...
आगे पढ़ें..नयी आर्थिक नीति और कृषि संकट
(यह लेख इतिहासबोध पत्रिका (1993) से लिया गया है। लेख उस समय लिखा गया था, जब भारत में वैश्वीकरण की नीतियाँ लागू करने की शुरुआत हो गयी थी। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमरीकी साम्राज्यवाद के आगे नतमस्तक हो सरकार देश भर में वैश्वीकरण के फायदों का ढिंढोरा पीट रही थी। आगे चलकर इसका नतीजा यह हुआ कि वैश्वीकरण के पक्ष में जनमत तैयार हो गया, जिसने वैश्वीकरण की नीतियों को लागू करने की सरकार की राह को आसान बना दिया। लेकिन इसके बावजूद वैश्वीकरण की नीतियों का व्यापक स्तर पर विरोध भी होता रहा और विरोध पक्ष ने जनता के सामने इन नीतियों के स्याह पक्ष को रखा। इस लेख में विरोध पक्ष की वही आवाज मुखर हुई है, जिसमें वैज्ञानिक विश्लेषण के जरिये यह दिखाया गया है कि इन नीतियों के लागू होने के बाद पूँजीवादी विकास तीव्र हो जाएगा, जिसके चलते भारत का कृषि क्षेत्र तबाही...
आगे पढ़ें..विश्वविख्यात फुटबाल खिलाड़ी माराडोना की वापसी
बीते महीने 25 नवम्बर 2020 को हार्ट अटैक के चलते दुनिया के एक महानतम फुटबाल खिलाड़ी डियागो माराडोना की मृत्यु हो गयी। डियागो अरमाण्डो माराडोना ने अपनी आत्मकथा अल डियागो में लिखा है कि जब उसने ब्यूनस आयर्स के विला फायोरिटो जैसे गरीब इलाके में फुटबाल खेलना शुरू किया, उसके सपनों की स्थिति लिबेरो (मुक्ति–योद्धा) जैसी थी। माराडोना बताता है, “पूरी पिच मेरे सामने होती थी, मैं समग्रता में पूरे मैच को महसूस कर सकता था, रणनीति बनाता था और पूरे मैदान में दौड़ता था।” एक फुटबाल खिलाड़ी के रूप में अपने 20 साल के शुरुआती जीवन को मेक्सिको में विश्वकप जीतकर शिखर पर पहुँचाने के बाद वह अपने जीवन के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है-- अपनी जोशीली खेल भावना और उसी पवित्र दृष्टिकोण के साथ, जिसने उसे अपने जीवन के पहले भाग में दुनिया के इस सबसे प्रसिद्ध खेल का सबसे प्रसिद्ध खिलाड़ी बनाया, आज वह एक...
आगे पढ़ें..विज्ञान के दार्शनिक, फ्रेडरिक एंगेल्स को 200 वें जन्मदिवस पर याद करते हुए
उन्नीसवीं सदी के वैज्ञानिक रूप से अत्यधिक प्रबुद्ध व्यक्तियों में से एक बेहद प्रसंशित, एंगेल्स ने प्रकृति के भौतिकवादी इतिहास की राह रौशन की। अब से 200 साल पहले 28 नवंबर 1820 को फ्रेडरिक एंगेल्स का जन्म जर्मनी के बर्मन में हुआ था। ऐसा लगता है कि फ्रेडरिक एंगेल्स कभी खुद को गंभीरता से नहीं लेते थे। एंगेल्स अपनी ‘स्वीकारोक्ति’ में अपनी स्वाभाविक अवस्था में थे, जिसे 1865 में कभी मार्क्स की बेटियों ने रिकॉर्ड किया था, जल्द ही उनके पिता भी ऐसा करने के लिए प्रेरित हुए थे। वे ‘स्वीकारोक्तियाँ’ निश्चित रूप से पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष सामाजिक अनुष्ठान थीं, लेकिन ये आत्म-अन्वेषण पर किसी भी गंभीर प्रयास की तुलना में ड्राइंग-रूम का एक विषयांतर अधिक थीं। फिर भी, मार्क्स पूछे गये सवालों का जवाब देने में बिलकुल संजीदा थे, जबकि विशेष रूप से एंगेल्स बेअदब और मुखर थे। इस तरह,...
आगे पढ़ें..उनके प्रभु और स्वामी
(सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन की जगह खाली कराने को लेकर याचिका दायर की गयी है, जिसकी सुनवाई करते हुए अदालन ने किसानों का पक्ष सुने जाने से पहले जगह खाली कराने का आदेश देने से इंकार कर दिया। अदालत ने सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जरनल तुषार मेहता से एक सवाल भी पूछ लिया कि क्या सरकार भरोसा दे सकती है कि जब तक बातचीत चलेगी तब तक कानून लागू नहीं होगा? तुषार मेहता ने कहा कि इस पर सरकार से आदेश लेने पड़ेगे। अदालत में सरकार की किरकिरी हुई। एक बात और सरकार और उसके मंत्री किसान आन्दोलन पर खालिस्तानी, टुकड़े-टुकड़े गैंग, माओवादी, नक्सलवादी आदि आरोप मढ़कर उसे देश विरोधी साबित करने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन उसने इन मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट के आगे न रखकर साफ़ कर दिया कि यह सब आरोप फर्जी है और किसान आन्दोलन...
आगे पढ़ें..कोविड-19 और आपदा पूंजीवाद
अनुवाद -- ज्ञानेंद्र माल-श्रृंखला और आर्थिक-पर्यावरणीय-महामारी-विज्ञान संकट कोविड-19 ने पूंजीवाद द्वारा थोपी गयी परस्पर संबद्ध दुर्बलताओं-पर्यावरण संबंधी, महामारी-विज्ञान संबंधी और आर्थिक- को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। दुनिया 21वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर रही है और हम आपदा पूंजीवाद का आविर्भाव होते देख रहे हैं। व्यवस्था का ढांचागत संकट वैश्विक आयाम ग्रहण कर चुका है। 20वीं सदी के अंत से पूंजीवादी वैश्वीकरण के दौरान लगातार ऐसी परस्पर संबद्ध माल-श्रृंखलाओं को अपनाया गया है जिनका नियंत्रण बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथ में है। ये श्रृंखलाएं मुख्य रूप से ‘दक्षिण’ में स्थित विभिन्न उत्पादक क्षेत्रों को आमतौर पर ‘उत्तर’ में स्थित वैश्विक उपभोग, वित्त और पूंजी-संचय के सर्वोच्च केंद्रों से जोड़ती हैं। ये माल-श्रृंखलाएं ही पूंजी के वैश्विक माल परिपथों का निर्माण करती हैं और एकाधिकारी-वित्तीय पूंजी के सामान्यीकृत उभार से पहचाने जाने वाले हाल के साम्राज्यवाद की...
आगे पढ़ें..जैव साम्राज्यवाद
(पंजाब से निकला हुआ किसान आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है, यह आन्दोलन देश भर में अपने समर्थक और विरोधी को भी बाँटता जा रहा है, लेकिन इस दौरान दोनों पक्षों ने खेती पर पड़ने वाले साम्राज्यवादी प्रभाव को लगभग भुला दिया है, जिसे लेखक प्रोफेसर नरसिंह दयाल ने अपनी पुस्तक ‘जीन टेक्नोलॉजी और हमारी खेती’ में “जैव साम्राज्यवाद” नाम दिया है। पेश है इस विषय पर उसी किताब का पाँचवाँ अध्याय, जो इसके विविध पहलुओं को सविस्तार हमारे सामने रखता है।) अध्याय 5 : दूसरी हरित क्रान्ति 1980 के आते–आते भारत सहित दक्षिण–पूर्व एशिया के देशों में पहली हरित क्रान्ति की चमक फीकी पड़ने लगी थी और इसका चमकीला हरा रंग पीला हो गया था। हमारी सरकारों और कृषि विज्ञानियों ने इसके दुष्परिणामों को समझना शुरू कर दिया था। किसान तो इसे भुगत ही रहे थे। चावल और गेहूँ की खेती...
आगे पढ़ें..नए कृषि कानून : किसान बड़े निगमों के हवाले
21 सितंबर को देश की संसद ने तीन नए कृषि कानूनों पर मुहर लगा दी। ‘‘सबका साथ, सबका विकास’’ के झंडाबरदार मोदी जी ने इसे किसानों के लिए एक ‘‘वाटरशेड मोमेंट’’ (ऐतिहासिक क्षण) बताया और किसानों की मुक्ति की घोषणा की- अब किसान आजाद है, जहां चाहे, जैसे चाहे, जिसको चाहे, अपनी फसल बेच सकता है। इन कानूनों को पास कराने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का खून बहाया गया- सबसे पहले ‘प्रश्नकाल’ की बलि दी गयी, विचारार्थ सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग ठुकरा दी गयी और मत-विभाजन करवाना जरूरी नहीं समझा गया। इन किसान-विरोधी कानूनों और अगले दिन कुछ श्रमिक-विरोधी कानूनों को असामान्य फुर्ती दिखाते हुए आनन-फानन में पास करवा लेने के बाद, जबकि कई विपक्षी पार्टियों के नेता संसद का बायकाट कर रहे थे और उन्होंने इन महत्वपूर्ण कानूनों को पारित किए...
आगे पढ़ें..नये श्रम कानून मजदूरों को ज्यादा अनिश्चित भविष्य में धकेल देंगे
असल मायनों में, नये श्रम कानूनों का लाजमी जोर श्रम–पूँजी के रिश्तों की एक मिसाल को आम बना देने पर है, जो राज्य की कम दखलंदाजी या कानूनों में ढील और दोतरफा औद्योगिक रिश्तों पर इसके स्वाभाविक प्रभाव पर आधारित है। संसद में तीन नये श्रम कानून पारित किये गये हैं जो मौजूदा 25 श्रम कानूनों की जगह लेंगे। इन तीनों कानूनों का मेल उन श्रम कानूनों के आधिकारिक तौर पर अन्त का प्रतीक है जो हमने बीसवीं सदी के ज्यादातर हिस्से में देखे हैं। ये कानून पहले से मौजूद उन चैखटों को पूरी तरह बदल देते हैं जिनका इस्तेमाल श्रम कानूनों के अमल के दायरे को तय करने के लिए किया गया था, जैसे किसी प्रतिष्ठान में काम करने वाले लोगों की संख्या। उदाहरण के लिए नया औद्योगिक सम्बन्ध कानून 300 मजदूरों तक के प्रतिष्ठान को सरकार की पूर्व अनुमति के बिना मजदूरों को बर्खास्त करने और छँटनी करने...
आगे पढ़ें..नये श्रम कानून मजदूरों को ज्यादा अनिश्चित भविष्य में धकेल देंगे
असल मायनों में, नये श्रम कानूनों का लाजमी जोर श्रम–पूँजी के रिश्तों की एक मिसाल को आम बना देने पर है, जो राज्य की कम दखलंदाजी या कानूनों में ढील और दोतरफा औद्योगिक रिश्तों पर इसके स्वाभाविक प्रभाव पर आधारित है। संसद में तीन नये श्रम कानून पारित किये गये हैं जो मौजूदा 25 श्रम कानूनों की जगह लेंगे। इन तीनों कानूनों का मेल उन श्रम कानूनों के आधिकारिक तौर पर अन्त का प्रतीक है जो हमने बीसवीं सदी के ज्यादातर हिस्से में देखे हैं। ये कानून पहले से मौजूद उन चैखटों को पूरी तरह बदल देते हैं जिनका इस्तेमाल श्रम कानूनों के अमल के दायरे को तय करने के लिए किया गया था, जैसे किसी प्रतिष्ठान में काम करने वाले लोगों की संख्या। उदाहरण के लिए नया औद्योगिक सम्बन्ध कानून 300 मजदूरों तक के प्रतिष्ठान को सरकार की पूर्व अनुमति के बिना मजदूरों को बर्खास्त करने और छँटनी करने...
आगे पढ़ें..अतीत की खोज: भारतीय संस्कृति की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन करने के लिए समित का गठन
विद्वानों और राजनेताओं ने केंद्र सरकार द्वारा भारत के प्राचीन इतिहास का अध्ययन करने के लिए गठित समिति की आलोचना की है। उन्होंने इसके पीछे छिपे एजेंडे पर संदेह व्यक्त किया है। अक्टूबर 2014 में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने गणेश की प्लास्टिक सर्जरी के बारे में प्रसिद्ध टिप्पणी की थी-- “हम सभी महाभारत में कर्ण के बारे में पढ़ते हैं। अगर हम थोड़ा और सोचें तो हमें पता चलता है कि महाभारत कहता है कि कर्ण अपनी माँ के गर्भ से पैदा नहीं हुआ था। इसका मतलब है कि उस समय आनुवांशिक विज्ञान मौजूद था। यही कारण है कि कर्ण अपनी माता के गर्भ से बाहर पैदा हो सका.... हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं। उस समय कुछ प्लास्टिक सर्जन रहे होंगे जिन्होंने एक इंसान के शरीर पर हाथी का सिर लगाया था और प्लास्टिक सर्जरी का अभ्यास शुरू किया था” मोदी ने मुंबई में डॉक्टरों की एक...
आगे पढ़ें..गोदान उपन्यास का सारांश
गोदान, प्रेमचन्द का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। कुछ लोग इसे उनकी सर्वोत्तम कृति भी मानते हैं। इसका प्रकाशन 1936 ई० में हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई द्वारा किया गया था। इसमें भारतीय ग्राम समाज एवं परिवेश का सजीव चित्रण है। गोदान ग्राम्य जीवन और कृषि संस्कृति का महाकाव्य है। इसमें प्रगतिवाद, गांधीवाद और मार्क्सवाद (साम्यवाद) का पूर्ण परिप्रेक्ष्य में चित्रण हुआ है। गोदान हिंदी के उपन्यास-साहित्य के विकास का उज्वलतम प्रकाशस्तंभ है। गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष संस्कृति को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है। प्रेमचंद ने इसे अमर बना दिया है। उपन्यास का सारांश गोदान प्रेमचंद का हिंदी उपन्यास है जिसमें उनकी...
आगे पढ़ें..जैव-चिकित्सा अनुसंधान की मदद कैसे हो
भारत में स्वास्थ्य विज्ञान में अनुसंधान वर्षों के जमीनी काम पर आधारित समस्या-समाधान की दिशा में नहीं किये जा रहे हैं, यही एक ऐसी मुख्य वजह है कि तमाम पुरानी और नयी बीमारियां लगातार हमें अपना शिकार बना रही हैं। कभी भारत स्वास्थ्य अनुसंधान में अग्रणी था। भारत और ब्रिटिश के दिग्गजों ने आजादी से पहले और बाद में भी कुछ दिनों तक मिलकर प्लेग अनुसंधान (1900 के दशक का महान प्लेग आयोग) और मलेरिया अनुसंधान पर शानदार काम किया था। 1900 के दशक में भारतीय अनुसन्धान कोष संस्था की शुरुआत हुई, यह संस्था स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए अनुदान देती थी। आजादी के बाद यही भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) बन गई, जिसके पहले डायरेक्टर डॉक्टर सी जी पंडित बने। हैदराबाद में देश की पहली स्वास्थ्य अनुसंधान संस्था नॅशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ नुट्रिशन की स्थापना हुई, दूसरी संस्था वायरस अनुसन्धान केंद्र (वीआरसी) 1952 में शुरू हुई। आजादी के बाद आईसीएमआर के...
आगे पढ़ें..इनसान की जिन्दगी में मनोविज्ञान का महत्त्व
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) देश के सर्वोत्तम तकनीकी संस्थानों में गिने जाते हैं। एमएचआरडी ने चैंकाने वाली खबर में बताया कि 2014 और 2019 के बीच 10 आईआईटी के सत्ताईस छात्रों ने पिछले पाँच वर्षों में आत्महत्या की है। इस सूचना ने एक बार फिर आत्महत्या, असफलता, अलगाव को समझने में मनोविज्ञान की भूमिका को कार्यसूची पर ला दिया है। अब तक माना जाता था कि देश के किसान और मजदूर अपनी आर्थिक समस्याओं के चलते आत्महत्या करते हैं। हालाँकि इन समस्याओं में आर्थिक पहलू के बावजूद मनोवैज्ञानिक पहलू से इनकार नहीं किया जा सकता। मनोविज्ञान को मानव व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन माना जाता है। आज दुनिया भर में मनोविज्ञान का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। शिक्षा, चिकित्सा विज्ञान, युद्ध और सैन्य मामले, समाज के अध्ययन, भीड़ की बढ़ती हिंसा और कट्टरता को समझने, मीडिया द्वारा लोगों की सोच–समझ को नियन्त्रित करने और सरकारी नीतियों...
आगे पढ़ें..आर्थिक हत्यारे या इकनोमिक हिटमैन
अमरीकी शासक अपनी साम्राज्यवादी लूट को निर्बाध रूप से जारी रखने के लिए पूरी दुनिया पर अधिकार कर लेना चाहते हैं। इसी मंसूबे को पूरा करने के लिए अमरीका ने कई देशों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का जघन्य अपराध किया और लाखों की संख्या में लोगों का कत्लेआम किया। इन खुले कुकृत्यों के अलावा अमरीका ने पर्दे के पीछे भी कूटनीतिक चालों, राजनीतिक षड्यन्त्रों और अन्य कई तरह के घृणित अपराधों को अंजाम दिया जिनके बारे में लोग अभी भी अनजान हैं। ऐसे अपराधों का खुलासा एक भूतपूर्व आर्थिक हत्यारे यइकोनौमिक हिटमैनद्ध जॉन परकिन्स ने अपनी पुस्तक ‘‘एक आर्थिक हत्यारे की स्वीकारोक्ति’’ में किया है। इसे अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा ऐजेन्सी ने 1968 में भर्ती किया था, जब वह स्कूल ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन यबोस्टन विश्वविद्यालयद्ध में अन्तिम वर्ष का छात्र था। तीन साल तक वह दक्षिण अमरीकी शान्ति दल में तैनात रहा।...
आगे पढ़ें..एक सुलझा आदमी
बहुत लोग पूछंते हैं कि मेरी दृष्टि इतनी साफ कैसे हो गयी है और मेरा व्यक्तित्व ऐसा सरल कैसे हो गया हैं। बात यह है कि बहुत साल पहले ही मैंने अपने-आपसे कुछ सीधे सवाल किये थे। तब मेरी अंतरात्मा बहुत निर्मल थी-शेव के पहले के कांच जैसी। कुछ लोगों की अंतरात्मा बुढापे तक वैसी ही रहती है, जैसी पैदा होते वक्त। वे बचपन में अगर बाप का माल निसंकोच खाते हैं, तो सारी उम्र दुनिया भर को बाप समझ-कर उसका माल निसंकोच मुफ्त खाया करते हैं। मेरी निर्मल आत्मा से सीधे सवालों के सीधे जबाब आ गये थे, जैसे बटन दबाने से पंखा चलने लगे। जिन सवालों के जवाब तकलीफ दें उन्हें टालने से आदमी सुखी रहता है। मैंने हमेशा सुखी रहने की कोशिश की है। मैंने इन सवालों के सिवा कोई सवाल नहीं किया और न अपने जवाब बदले। मेरी सुलझो...
आगे पढ़ें..हमारा जार्ज फ्लायड कहाँ है?
क्या भारत के सार्वजनिक जीवन में भी कोई जार्ज फ्लायड जैसी परिघटना होगी? निश्चय ही, यह महज अन्याय की एक घटना के खिलाफ फूट पड़ने वाले आक्रोश तक की ही बात नहीं है बल्कि एक प्रताड़ना के शिकार व्यक्ति के साथ खुद को खड़ा करने की तात्कालिक आवश्यकता को समझने, हाशिए पर फेंक दिए गए लोगों के खिलाफ व्यवस्थित पूर्वाग्रह का अहसास करने और ‘हमारे’ और ‘उनके’ के बीच की दहलीज को पार करने के बारे में है। सबसे ऊपर यह वक्त नागरिकों की पहलकदमी का वक्त है। लेकिन दूसरी ओर, भारत के हाल के अनुभवों से ऐसा लगता है कि हमने अन्याय को लोकतन्त्र पर हमले से लगातार जोड़ कर समझने का अपना आग्रह खो दिया है। पिछले 2 महीने से, पूरे मीडिया में प्रवासी मजदूरों के पलायन और उनकी पीड़ा की छवियाँ छाई हुई हैं। उनकी पीड़ा को लेकर दो बातें चौंकाने वाली हैं : इस मानवीय त्रासदी...
आगे पढ़ें..हम खुद एक ऐसे बीमार समाज में रहते हैं, जिसमें भाईचारे और एकजुटता की भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है
(विश्व प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने दलित कैमरा पोर्टल को एक लंबा साक्षात्कार दिया है। इसमें उन्होंने अमेरिका और यूरोप में चल रहे नस्लभेद विरोधी आंदोलन से लेकर भारत में कोरोना की स्थित तक पर अपने विचार जाहिर किए हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप के मुकाबले भारत में असमानता की जड़ें बेहद गहरी हैं। लेकिन इसके खिलाफ मुकम्मल लड़ाई की अभी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है। इसके साथ ही इस साक्षात्कार में उन्होंने ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल विस्तार से जुड़े सवालों का भी जवाब दिया है। अरुंधति ने मौजूदा निजाम की फासीवादी प्रवृत्तियों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इसके रहते देश में किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती है। मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद अनुवादक और सामाजिक कार्यकर्ता कुमार मुकेश ने किया है। पेश है पूरा साक्षात्कार-संपादक)
आगे पढ़ें..क्या है जो सभी मेहनतकशों में एक समान है?
(25 मई को अमरीका में एक पुलिस अधिकारी ने जार्ज फ्लायड नाम के निर्दोष अश्वेत अमरीकी सख्स की गर्दन दबाकर हत्या कर दी। दम घुटने पर जार्ज फ्लायड ने कहा था कि “आई काण्ट ब्रीद” (मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ)। पुलिस की इस क्रूर कार्रवाई और रंगभेद के खिलाफ “आई काण्ट ब्रीद” और “ब्लैक लाइफ मैटर” नारे के साथ आन्दोलन अमरीका ही नहीं पूरी दुनिया में फैल गया। आन्दोलनकारियों ने न तो कोरोना महामारी की परवाह की और न ही लॉकडाउन की। अमरीका में अश्वेत लोगों के साथ लाखों गोरे नागरिक भी आन्दोलन में शामिल हुए, जिससे घबराकर राष्ट्रपति ट्रम्प ने आन्दोलनकारियों को धमकाने वाले कई बयान दिये। ट्रम्प के नस्लभेदी रवैये और धमकियों ने आग में घी का काम किया और आन्दोलन ने और जोर पकड़ ली। आन्दोलनकारियों ने राष्ट्रपति भवन को घेर लिया। ट्रम्प को भवन के बंकर में छिपकर अपना बचाव करना पड़ा। ऐसा...
आगे पढ़ें..सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता सिर्फ बड़ी उम्रवालों के लिए ही नहीं, बच्चों के लिए भी जरूरी है
अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे बड़ा होकर चिन्तनशील और सक्रिय नागरिक बने तो हमें मौजूदा दौर के सामाजिक बदलाव का हिस्सा बनने में उनकी मदद करनी चाहिए। मैं तेजाबी बारिस (एसिड रेन) के खौफ के बीच बड़ी हुई। यह शब्द अपने आप में ही खौफनाक था और यह मुझे नीन्द से जागते हुए चौंका देता था। क्या यह लोगों के चेहरे को गला देता है? क्या जंगली जानवर इससे बच पायेंगे? मेरे माँ-बाप राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, लेकिन वे अच्छे नागरिक थे जो टीन की पन्नी का दुबारा इस्तेमाल और कँटीले जाल में फँसायी गयी टूना मछली खाने से परहेज करते थे। जब मैंने राष्ट्रपति निक्सन को चिटठी लिखने और अपने सवालों का जवाब माँगने का फैसला किया तो उन्होंने खुशी से ह्वाइट हाउस का पता दे दिया। लेकिन जो चिट्ठी वापस आई उसमें कोई समाधान नहीं...
आगे पढ़ें..एक मज़दूर की बेटी ने पीएम मोदी को लिखी जवाबी चिट्ठी, पूछे पांच सवाल
मज़दूरों के हिस्से सिर्फ संवेदना ही आएगी क्या प्रधानमंत्री जी! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पत्र को पढ़ने के बाद मज़दूर की बेटी ने प्रधानमंत्री से पांच सवाल किए हैं। शनिवार को पीएम मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा कर लिया है। इस मौके पर मोदी ने एक चिट्ठी लिखा था। इसमें उन्होंने मज़दूरों के दर्द के प्रति ‘गहरी संवेदना’ ज़ाहिर की है। इस पत्र के जरिए उन्होंने प्रवासी श्रमिकों, मजदूरों और अन्य लोगों के प्रति संवेदना भी प्रकट की जिन्हें कोरोना संकट के दौरान जबरदस्त पीड़ा झेलनी पड़ी है। उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए कहा है कि ‘भारत आर्थिक पुनरुथान में एक मिसाल कायम करेगा और दुनिया को आश्चर्यचकित कर देगा जैसे उसने कोरोना महामारी के खिलाफ अपनी लड़ाई में किया था।’ अभी भी मज़दूरों के घर जाने का सिलसिला जारी है और उन्हें अभी भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जो पहुंच गए हैं...
आगे पढ़ें..महामारी ने पूंजीवाद की आत्मघाती प्रवृत्तियों को उजागर कर दिया है
जिप्सन जॉन और जितेश पी.एम. ‘ट्राईकांटिनेंटल इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च’ में फैलों हैं. दोनों ने ‘द वायर’ के लिए नोम चोमस्की का साक्षात्कार लिया। चॉम्स्की भाषाविद् और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, जो नवउदारवाद, साम्राज्यवाद और सैन्य-औद्योगिक-मीडिया समूह की आलोचनाओं के लिए विख्यात हैं। * * * जिप्सन और जितेश : विश्व का सबसे धनवान और शक्तिशाली देश अमरीका भी कोरोनावायरस के संक्रमण के प्रसार को रोकने में असफल क्यों रहा? यह असफलता राजनीतिक नेतृत्व की है अथवा व्यवस्थागत? सच तो यह है कि कोविड-19 के संकट के बावजूद भी, मार्च में डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता में वृद्धि हुई. क्या आपको लगता है कि अमरीका के चुनावों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा? नोम चोमस्की : इस महामारी की जड़ों को जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटना होगा. यह महामारी अप्रत्याशित नहीं है. वर्ष 2003 की सार्स महामारी के पश्चात ही वैज्ञानिकों...
आगे पढ़ें..निगरानी, जासूसी और घुसपैठ : संकटकालीन व्यवस्था के बर्बर दमन का हथकंडा
सरकार पिछले कुछ महीनों से सभी दूरसंचार कम्पनियों से उनके सभी ग्राहकों के कॉल रिकॉर्ड्स (सीडीआर) माँग रही है. सरकार यह काम दूरसंचार विभाग (डीओटी) की स्थानीय इकाइयों के मदद से कर रही है, जिसमें दूरसंचार विभाग के अधिकारी कम्पनियों से डेटा माँगते हैं. जबकि सीडीआर की जानकारी सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस (एसपी) या इससे बड़े स्तर के अधिकारी को ही दी जा सकती है और एसपी को इसकी जानकारी हर महीने जिलाधिकारी को देनी पड़ती है. प्रमुख दूरसंचार कम्पनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने बताया कि सीडीआर की जरूरत के कारणों के बारें में दूरसंचार विभाग ने कुछ नहीं लिखा है. जो सुप्रीम कोर्ट के मानदण्डों का सीधा-सीधा उलंघन है. यह निजता के अधिकार (राइट टु प्रिवेसी) का भी हनन करता है, जो प्रत्येक नागरिक का मूलभूत अधिकार है. सीडीआर की सुविधा के जरिये कॉल करने वाले...
आगे पढ़ें..पूँजीपति मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी भी खत्म कर देना चाहते हैं
आईआईटी दिल्ली के ऐकोनोमिक्स के प्रोफ़ेसर जयन जोस थॉमस का ‘द हिन्दू’ में सम्पादकीय छपा. पढ़ने लायक और जानकारी बढ़ाने वाला. यहां उसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की जा रही है. थॉमस लिखते हैं, "भारत में मजदूरों की तनख्वाह बढ़ानी चाहिए, इससे उपभोग बढ़ेगा. ज्यादा उत्पादन करने के लिए ज्यादा मजदूरों को काम पर रखना होगा. इससे हर हाथ को काम मिल जाएगा. बेरोजगारी ख़त्म हो जायेगी और आर्थिक वृद्धि भी हासिल होगी." उन्होंने अपनी बात के पक्ष में तर्क देते हुए लिखा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप ने भी यही मॉडल अपनाया था. युद्ध और मंदी से पीड़ित लोगों को अच्छी तनख्वाहें दी गयीं और एक बार फिर पूंजीवाद का सुनहरा दौर शुरू हो गया. थॉमस ने भारत के शहरी उपभोक्ता वर्ग की हालत का जिक्र करते हुए लिखा, 64.4 प्रतिशत टिकाऊ सामान का उपभोग सिर्फ 5 फीसदी अमीरों द्वारा किया जाता है. निचली 50 फीसदी...
आगे पढ़ें..कोविड-19 की दवा रेमडीसिविर के लिए सरकार और बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की मिलीभगत
पूरे विश्व मे कोरोना से उपजे आतंक का खात्मा होने जा रहा है। अब मीडिया धीरे धीरे कोरोना के पैनिक मोड को कम करना शुरू कर देगा, क्योकि फिलहाल कोरोना की एक दवाई मिल गयी है, जिसमे अमेरिका को उम्मीद की किरण दिख रही है उस दवा का नाम है-- रेमडीसिविर। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कहा है कि इबोला के खात्मे के लिए तैयार की गई दवा रेमडीसिविर कोरोना वायरस के मरीजों पर जादुई असर डाल रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार डॉक्टर एंथनी फाउसी कह रहे हैं, “आंकड़े बताते हैं कि रेमडीसिविर दवा का मरीजों के ठीक होने के समय में बहुत स्पष्ट, प्रभावी और सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।” रेमडीसिविर के बारे में अब अखबार लिख रहे हैं कि 'डॉक्टर फॉउसी के इस ऐलान के बाद पूरी दुनिया में खुशी की लहर फैल गई है। रेमडीसिविर दवा पर हमारी बहुत...
आगे पढ़ें..बोल्सोनारो की नयी मुसीबत
‘शोले’ फिल्म में ‘मौसी’ ने ‘जय’ से कहा, “बेटा आदमी की पहचान उसके यारों-दोस्तों से होती है”। हमारे प्रधानमंत्री जी के दुनिया में बहुत से दोस्त हैं। उनमें से दो खास दोस्त हैं-- इजराइल के राष्ट्रपति नेतेंयाहू और ब्राजील के राष्ट्रपति ज्येर बोल्सोनारो। जी हाँ, वही बोल्सोनारो जिन्हें इस बार गणतंत्र दिवस पर भारत सरकार ने खास मेहमान बनाया था। जो पिछले दिनों कोरोना मामले पर बेहूदी हवाई बयानबाजी करने के चलते दुनिया भर में बदनाम हुए थे। ट्रम्प! जी नहीं, ट्रम्प दोस्त नहीं है। दोस्त धमकाते नहीं। नेतेंयाहू पर इजराइल में भ्रष्टाचार के केसों का अम्बार लगा है। वह किसी तरह राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने में कामयाब तो हो गये हैं लेकिन लगता है ज्यादा दिन वहाँ टिक नहीं पाएँगे। बोल्सोनारो के खिलाफ भी जाँच बैठा दी गयी है और लगता है कि उन्हें राष्ट्रपति भवन छोड़ना पड़ेगा। बोल्सोनारो ने हाल ही में संघीय पुलिस प्रमुख को बर्खास्त कर...
आगे पढ़ें..कोरोना का जवाब विज्ञान है नौटंकी नहीं
09 मई 2020 को विद्या कृष्णन ने ‘कारवाँ’ पत्रिका में छपे अपने लेख “कोरोना का जवाब विज्ञान है नौटंकी नहीं, महामारी पर गलत साबित हुई केंद्र सरकार” में सरकार के कामकाजों का वैज्ञानिक लेखा-जोखा लिया है. वे लिखती हैं कि “कई वैज्ञानिकों ने, जिनसे मैंने लॉकडाउन बढ़ाए जाने के बाद बातचीत की, इस सार्वजनिक-स्वास्थ्य संकट के दौरान विज्ञान को राजनीति और नौटंकी के नीचे रखे जाने पर अपनी निराशा और बेचैनी व्यक्त की. नौटंकीबाजी से आशय भारतीय वायुसेना और भारतीय नौसेना द्वारा 3 मई को किए गए फ्लाइ-पास्ट्स था, जिसमें हेलीकॉप्टरों से भारत के अस्पतालों पर फूल बरसाए गए. इससे पहले थाली और ताली बजाई गई थी और दिये जलाए गए थे. “महामारी के दौरान सरकार के लिए अपने सार्वजनिक-स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है. ऐसा करने में विफलता वेंटीलेटर, बेड, परीक्षण किट और अन्य सुविधाओं को तैयार रखने के मामले में भारत की...
आगे पढ़ें..प्यूचे : आत्महत्या के बारे में
कोरोना आपदा काल में तमाम हादसों की तरह आत्महत्या भी अपने चरम पर है। एक उदीयमान, प्रखर पत्रकार युवती की आत्महत्या ने हम-सबको बहुत विचलित और मर्माहत कर दिया है। वाराणसी की रहने वाली 25 वर्षीय एक पत्रकार ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। एक छोटी सी पुस्तिका गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी-- प्यूचे : आत्महत्या के बारे में। इसके लेखक कार्ल मार्क्स हैं। इसकी भूमिका में लिखा है-- "सचमुच यह कैसा समाज है जहाँ कोई व्यक्ति लाखों की भीड़ में खुद को गहन एकांत में पाता है; जहाँ कोई व्यक्ति अपने आपको मार डालने की अदम्य इच्छा से अभिभूत हो जाता है और किसी को इसका पता तक नहीं चलता? यह समाज समाज नहीं, बल्कि एक रेगिस्तान है जहाँ जंगली जानवर बसते हैं, जैसा कि रूसो ने कहा था।" -- जाक प्यूचे फ्राँसीसी क्रान्ति (1789) के 40 साल बाद उस...
आगे पढ़ें..96 प्रतिशत प्रवासी श्रमिकों को सरकार से राशन नहीं मिला, 90 प्रतिशत को लॉकडाउन के दौरान मजदूरी नहीं मिली: एक सर्वेक्षण
विभिन्न राज्यों में फंसे 11,159 प्रवासी श्रमिकों के सर्वेक्षण में पाया गया कि 8 अप्रैल से 13 अप्रैल के बीच, 90 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों को सरकार से कोई राशन नहीं मिला। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत को उनके नियोक्ताओं ने कोई भुगतान नहीं किया है। 27 मार्च से 13 अप्रैल के बीच हुए सर्वेक्षण में शामिल 70 प्रतिशत श्रमिकों के पास 200 से भी कम रूपये बचे थे। भोजन और धन में गिरावट चार्ट में उन प्रवासी श्रमिकों का प्रतिशत दिखाया गया है, जिन्हें सरकार या अन्य स्रोतों से, राशन या पका हुआ भोजन नहीं मिला और जिन्हें 8 अप्रैल से 13 अप्रैल के बीच नियोक्ताओं ने कोई भुगतान नहीं किया। जबकि इस दौरान जिन श्रमिकों को सरकार या अन्य स्रोतों से पका हुआ भोजन मिला उनके प्रतिशत में मामूली सुधार हुआ, इनमें से अधिकांश को सरकार से राशन या अपने नियोक्ताओं से मजदूरी नहीं मिली। क्या फंसे हुए...
आगे पढ़ें..सामाजिक जनवाद की सनक
अमरीका में सामाजिक जनवाद के बड़े चेहरे ‘बर्नी सैंडर्स’ को अंत में राष्ट्रपति के प्रत्याशी से खुद को हटा देना पड़ा। यह उन ताकतों के लिए जोरदार झटका है, जो मौजूदा नवउदारवादी दौर में सामाजिक जनवाद का झण्डा उठाए हुये हैं। दूसरी ओर, कोरोना महामारी के दौर में लॉकडाउन के चलते दुनिया भर के मजदूर वर्ग और दूसरे गरीब तबकों पर भारी मार पड़ी है, उनकी मदद के लिए एक बार फिर कल्याणकारी लोक-लुभावनवादी कार्यक्रमों की माँग उठ रही है। इस तरह पूंजीवाद के अंदर ही समस्या के समाधान को पेश किया जा रहा है। इससे जरूर ही सामाजिक जनवादी तर्कों को बल मिलेगा। लेकिन लेखक ने यहाँ साफ तौर पर दिखाया है कि ऐतिहासिक रूप से सामाजिक जनवाद दिवालिया हो चुका है और वह दुनिया को कोई बेहतर भविष्य उपलब्ध नहीं करा सकता, सिवाय पूंजीवाद के सेज पर खुद को नग्न परोसने...
आगे पढ़ें..लातिन अमरीका के मूलनिवासियों, अफ्रीकी मूल के लोगों और लातिन अमरीकी संगठनों का आह्वान
कोविड– 19 ने पूरी दुनिया में जो संकट पैदा किया है उसने आबया-याला यानी लातिन अमरीकी लोगों को एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। लोकप्रिय जन-संगठन व्यवस्था के सड़ांध की बदतरीन इजहारों के खिलाफ प्रतिरोध की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं। हम एक चौतरफा संकट से गुजर रहे हैं, जिसने जीवन को उसके सभी रूपों समेत खतरे में डाल दिया है। कोविड– 19 एक ऐसे समय में महामारी बन गया है, जब पूंजीवादी संकट घनीभूत हो रहा है और आर्थिक ताकतें कॉर्पोरेट मुनाफा दर के भार को मजदूर वर्ग के कंधों पर डाल दे रही हैं। नवउदारवादी बदलाओं के फलस्वरूप यह स्वास्थ्य प्रणालियों के कमजोर पड़ने, निर्वाह की परिस्थितियों के बिगड़ने और सार्वजनिक क्षेत्र के विनाश के साथ-साथ घटित हुआ है। विदेशी ऋण, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और सम्प्रभुता के खिलाफ साम्राज्यवाद के स्थायी उत्पीड़न से पीड़ित, हम बहुत गम्भीर नतीजों वाले एक...
आगे पढ़ें..कोविड-19 : आईसीएमआर क्यों नहीं सार्वजनिक कर रही कोविड कार्यबल की बैठकों के मिनट्स
विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. 20 अप्रैल 2020 को कारवाँ मैगजीन में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक है— “कोरोनावायरस : कारवां के सवालों का आईसीएमआर ने नहीं दिया जवाब, क्यों नहीं सार्वजनिक कर रही कोविड कार्यबल की बैठकों के मिनट्स.” इस लेख में उन्होंने अपने 15 अप्रैल को कारवां में अंग्रेजी में छपे लेख का जिक्र भी किया है, जिसका शीर्षक है-- “मोदी सरकार ने कोरोना संबंधी जरूरी फैसलों से पहले आईसीएमआर द्वारा गठित कार्यबल से नहीं ली सलाह.” इन दोनों लेखों के चुनिन्दा अंशों को यहाँ दिया जा रहा है. कोविड-19 के लिए गठित देश के 21 शीर्ष वैज्ञानिकों वाले राष्ट्रीय कार्यबल (टास्क फोर्स), जिसे महामारी के संबंध में नरेन्द्र मोदी सरकार को सलाह देनी थी, उसके चार सदस्यों का कहना है कि देशव्यापी तालाबंदी या लॉकडाउन को बढ़ाने की घोषणा करने से पहले कार्यबल की बैठक ही...
आगे पढ़ें..भारत और कोरोना वायरस
जबकि कोरोना वायरस का प्रभाव यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका पर ज्यादा हुआ है, फिर भी भारत इस बीमारी का सबसे बड़ा शिकार होने का दावा करता है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने संकट का सामना करने के लिए एक शातिर जनसंपर्क अभियान के अलावा बहुत कम काम किया है। वास्तव में दिल्ली द्वारा उठाये गये कई नीतिगत कदमों से इस खतरनाक वायरस के प्रसार की संभावना बढ़ गयी है। जब मोदी ने 24 मार्च को 21 दिन के राष्ट्रव्यापी बंद की घोषणा की, तो उन्होंने इससे पहले कोई चेतावनी नहीं दी। प्रधानमंत्री के बात खत्म करने से पहले ही घबराये हुए शहरी लोग-- ज्यादातर मध्यम वर्ग के लोग-- भोजन और दवाएं जमा करने के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिये गये, जिससे लगभग निश्चित रूप से कोविड-19 के प्रसार में तेजी आयी। लॉकडाउन ने तुरंत करोडों लोगों को बेरोजगार बना दिया,...
आगे पढ़ें..फिदेल कास्त्रो: सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के हिमायती
यह लेख 21 दिसम्बर 2016 को डाउन-टू-अर्थ की वेबसाइट पर छप चुका है। लेकिन कोरोना महामरी के मौजूदा दौर में क्यूबा, फिदेल कास्त्रो और उनकी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था फिर से चर्चा के केंद्र में आ गयी है। इसी को ध्यान में रखते हुए उस लेख के हिंदी अनुवाद को यहाँ फिर से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है। फिदेल एलेजांद्रो कास्त्रो रूज़ का निधन वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। लगभग आधी सदी तक फिदेल क्यूबा के नेता रह। उन्होंने न केवल देश के भीतर स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के अनुकरणीय पहल का नेतृत्व किया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय क्यूबा के डॉक्टर विकासशील देशों में पहुंचकर वहाँ की जनता को अपनी सेवाएं दे सकें। फिदेल के नेतृत्व में क्यूबा के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने बहुत सारी बीमारियों, जिनमें मेनिन्जाइटिस...
आगे पढ़ें..लॉकडाउन, मजदूर वर्ग की बढ़ती मुसीबत और एक नयी दुनिया की सम्भावना
कोरोना संकट पर देश-दुनिया में इतनी ज्यादा उथल-पुथल मची है और रोज दर्जनों ख़बरें आकर हमें चौंका देती हैं कि इस पूरे घटनाक्रम को एक लेख में समेटना लगभग नामुमकिन है। दुनिया के हर देश की अपनी अलग कहानी है। किसी भी इनसान से पूछ लो, उसके पास कोरोना को समझने और समझाने की अपनी न्यारी ही कहानी है। इसलिए हर व्यक्ति से जानकारी लेकर किसी आम राय तक पहुँचना संभव नहीं है। पर जो तथ्य और रिपोर्ट्स सामने आयीं हैं, उनके आधार पर विश्लेषण करके एक आम राय कायम की जा सकती है। कोरोना महामारी ने दुनिया भर की उत्पादन व्यवस्था को लगभग ठप्प कर दिया है। धरती पर सरपट दौड़ने वाली रेलों को जाम कर दिया है। पानी को चीरते हुए समुद्र में घूमने वाले जहाजों को रोक दिया है। आकाश को चूमने वाले हवाई जहाजों को चूहे की तरह अपनी माँद में बैठे रहने को मजबूर...
आगे पढ़ें..कोरोना महामारी के समय ‘वेनिस का व्यापारी’ नाटक की एक तहकीकात
(16वीं सदी में विलियम शेक्सपियर ने वेनिस का व्यापारी (द मर्चेंट ऑफ वेनिस) नाटक की रचना की थी. दुनिया की कई भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है और अपनी रचना काल से अब तक इसका दुनिया भर में अनगिनत बार मंचन किया जा चुका है. कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन जारी है. इस समय का फायदा उठाते हुए लेखक ने इस विश्व प्रसिद्ध और कालजयी रचना पर अपने चन्द शब्द लिखे हैं. इसके माध्यम से यहाँ 21 सदी की दो मुख्य परिघटनाओं पर भी जोर दिया गया है— पहला, वित्तीयकरण जिसे सूदखोरी का ही उन्नत रुप कहा जा सकता है और दूसरा, साम्प्रदायिकता और नस्लवाद. कोरोना महामारी से भी ये परिघटना कहीं नकहीं गहराई से जुडती हैं, जिसका यहाँ केवल संकेत भर किया गया है.) बस्सानियो मौजमस्ती में व्यस्त अमीर घराने का खुशमिजाज नौजवान है, बेलगाम फिजूलखर्ची ने उसे कंगाल कर...
आगे पढ़ें..संकटग्रस्त परिवारों का पेशेवार ब्यौरा
(साभार इन्डियन एक्सप्रेस 11 अप्रैल 2020) (भारतीय उपभोक्ता अर्थव्यवस्था, डाटाबेस 2016-2018)
आगे पढ़ें..कोरोना वायरस, सर्विलेंस राज और राष्ट्रवादी अलगाव के ख़तरे
(युवल नूह हरारी हमारे समय के विद्वान-दार्शनिक हैं, दुनिया को आर-पार देखने का हुनर रखते हैं। उन्होंने “फाइनेंसियल टाइम्स” में एक बेहतरीन लेख लिखा है। कोरोना फैलने के कितने दूरगामी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक असर दुनिया भर में हो सकते हैं, इस पर इतना अच्छा कुछ और पढ़ने को नहीं मिला। अनुवाद कर दिया है। थोड़ा लंबा है, लॉकडाउन के चलते जब मैं घर में बैठकर टाइप कर सकता हूँ, तो आप घर बैठे पढ़ क्यों नहीं सकते? – अनुवादक) दुनिया भर के इंसानों के सामने एक बड़ा संकट है। हमारी पीढ़ी का शायद यह सबसे बड़ा संकट है। आने वाले कुछ दिनों और सप्ताहों में लोग और सरकारें जो फ़ैसले करेंगी, उनके असर से दुनिया का हुलिया आने वाले सालों में बदल जाएगा। ये बदलाव सिर्फ़ स्वास्थ्य सेवा में ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति में भी होंगे। हमें तेज़ी से...
आगे पढ़ें..कोरोना लॉकडाउन : भूख से लड़ें या कोरोना से
25 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश में अचानक लॉकडाउन का एलान कर दिया। कोरोना वायरस हमारे देश में अपने पैर पसार चुका है। देश का मध्यमवर्ग, पूँजीपति और मैनेजर, शासन-प्रशासन में बैठे तमाम पार्टियों के नेता और नौकरशाह (डीएम, एसपी, जज, तहसीलदार आदि) सब घबराये हुए हैं। बौखलाहट में वे तुगलकी फरमान जारी कर रहे हैं या किंकर्तव्यविमूढ़ बैठे हैं— अपने घरों में सुरक्षित बैठे रामायण-महाभारत का आनन्द ले रहे हैं या नवदुर्गा की आराधना में लीन हैं। दूसरी ओर, देश की मेहनतकश आबादी का बड़ा हिस्सा 21 दिन के इस लॉकडाउन का मुकाबला करने के लिए सड़कों पर आ चुका है। बेरोजगार, बेबस, भूखे और लाचार लोग अपने दुधमुंहे बच्चों, गर्भवती औरतों और बूढ़े बुजुर्गों के साथ सैंकड़ों मील चलकर घर जा रहे हैं— इस उम्मीद में कि शायद वहाँ जाकर वे भूखे नहीं मरेंगे या मरेंगे भी तो एक लावारिस मौत नहीं, अपनों के बीच। ...
आगे पढ़ें..वायरस पर नियंत्रण के बहाने दुनिया को एबसर्ड थिएटर में बदलती सरकारें
इस प्रहसन का पटाक्षेप कोरोना संकट की समाप्ति के साथ होगा। सरकार को पता है कि उसकी सारी नाकामयाबियों पर कोरोना भारी पड़ जाएगा। बेरोजगारी, महंगाई, जीडीपी में कमी सबका ठीकरा कोरोना के सिर फूटेगा। लंदन से प्रकाशित दैनिक ‘इंडिपेंडेंट’ ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की है कि कई देशों की सरकारें कोरोना वायरस पर नियंत्रण के बहाने अपने उन कार्यक्रमों को पूरा करने में लग गयी हैं जिन्हें पूरा करने में जन प्रतिरोध या जनमत के दबाव की वजह से वे तमाम तरह की बाधाएं महसूस कर रहीं थीं। रिपोर्ट के अनुसार 16 मार्च को संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध विशेषज्ञों के एक समूह ने एक बयान जारी कर इन देशों को चेतावनी दी कि ऐसे समय सरकारों को आपातकालीन उपायों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक मकसद की पूर्ति के लिए नहीं करना चाहिए। बयान में कहा...
आगे पढ़ें..भगवानपुर खेड़ा, मजदूरों की वह बस्ती जहाँ सूरज की रोशनी भी नहीं जाती!
(कोरोना महामारी के चलते पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा है। जिन्दगी अस्त-व्यस्त हो गयी है। इस लॉकडाउन की सबसे बुरी मार मजदूर वर्ग पर पड़ रही है। जमीनी हालात का पता लगाने के लिए और राहत देने के लिए विकल्प मंच, शाहदरा के कुछ सदस्य 40 किराये के मकानों में गये, जहाँ बड़ी संख्या में मजदूर रहते हैं। वहां जिस तरह के हालात देखने को मिले, वह कल्पना से परे तो हैं ही। साथ ही उसने हमें झकझोर कर रख दिया। यहाँ उसकी ग्राउंड रिपोर्टिंग दी जा रही है। उम्मीद है कि पाठक इससे काफी जानकारी हासिल करेंगे। हमारी आपसे गुजारिश है कि हमें अपनी प्रतिक्रिया से जरुर अवगत कराएं।) गरीबी, कंगाली, जहालत भारी जिंदगी, भिखारी तो देखे थे। मगर मजदूर जो दुनिया का सृजनकर्ता है जिस के दम पर सारी फैक्ट्रियां, नगर निगम के काम, सार्वजनिक साफ़-सफाई, हॉस्पिटल के तमाम...
आगे पढ़ें..कोरोना महामारी से दुनिया में भय का माहौल : मुनाफ़ा नहीं, इंसानियत ही दुनिया को बचा सकती है
अमरीका आर्थिक, तकनीकी और सामरिक मामले में दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका धरती का स्वर्ग माना जाता है और वह ऐसा दावा भी करता है. इस दावे की हवा निकलती दिख रही है. किसने यह सोचा था कि कोरोना के मरीजों की संख्या 80 हजार से ऊपर पहुँच जायेगी. उसके हर अस्पताल के सामने मृतकों का ढेर लग जाएगा. केवल न्यूयार्क में 385 लोगों की मौत हो चुकी है और 37 हजार से अधिक बीमार हैं. कोरोना महामारी के आगे अमरीका की ऐसी दुर्दशा हो रही है कि दुनिया भर के लोग दाँतों टेल ऊँगली दबा ले रहे हैं. यह ट्रम्प प्रशासन की असफलता नहीं है, बल्कि अमरीकी पूँजीवाद की असफलता है, जिसका मॉडल इस तरह विकसित किया गया है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के आगे लाचार नजर आ रहा है. मुनाफे पर केन्द्रित अमरीकी पूँजीवादी व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी...
आगे पढ़ें..छोटे दुकानदार का कारोबार छीन लेगी रिलायंस की जिओ–मार्ट
रिलायंस इण्डस्ट्रीज एक और क्षेत्र में उतरने जा रही है, जहाँ वह ऑनलाइन के खुदरा बाजार में अमेजन, फ्लिपकार्ट, वी–मार्ट आदि कम्पनियों के साथ प्रतियोगिता करेगी । रिलायंस इण्डस्ट्रीज की यह पेशकश रिलायंस रिटेल और रिलायंस जिओ मिलकर चलायेंगी । रिलायंस जिओ अपने ग्राहकों से बिना पूछे उन्हें सीधा रिटेल से जोड़़़ देगी । यह अपने प्रतियोगियों से अलग व्यवस्था करने जा रही है । खुदरा सामानों की डिलीवरी के लिए ग्राहकों को एक एप के जरिए लोकल स्टोर से जोड़ा जायेगा । रिलायंस अपने हाई स्पीड फोर–जी नेटवर्क के जरिए ग्राहक को तत्काल सेवा प्रदान करेगी । मोबाइल एप से ऑर्डर करने पर घर बैठे सामान को स्टोर से ग्राहकों तक पहुँचा दिया जायेगा, मतलब जिओ–मार्ट बिचैलिए का काम करेगी । फिलहाल देश में 15000 स्टोर डिजिटलाइज हुई है । दुकानदारों को ऑफर देगी कि हम आपके धन्धे में निवेश करेंगे और मुनाफे को 20 या 30 प्रतिशत...
आगे पढ़ें..सार्वजनिक कम्पनियों का विनिवेशीकरण या नीलामी
केंद्र सरकार जिन 5 बड़ी कंपनियों के हिस्से को बेचने की योजना बना रही है, उनमें बीपीसीएल, एससीआई, कॉनकोर, एनईईपीसीओ (नीपको) और टीएचडीसीआई शामिल है। इनमें से नीपको और टीएचडीसीआई की पूरी हिस्सेदारी बेचने की योजना बनाई है, जिसके लिए केंद्र सरकार के विनिवेश विभाग ने 12 विज्ञापन जारी किए हैं। इन विज्ञापनों के जरिये एसेट वैल्यूवर, लीगर एड्वाइजर की नियुक्ति और हिस्सा बेचने की बोलियाँ मंगायी गयी है। अगर कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम होती है तो ये कम्पनियाँ कैग और सीवीसी के दायरे से बाहर हो जाएगी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने बताया है कि केंद्र सरकार के पास बिक्री के लिए 46 कंपनियों की एक सूची है और कैबिनेट ने इनमें 24 को बेचने की स्वीकृति दे दी है। दरअसल भारत सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ते-बढ़ते 6.45 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया है। उसे ही पूरा करने के लिए सरकार...
आगे पढ़ें..ऑस्ट्रेलिया की आग का क्या है राज?
बीते दिसम्बर में ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग ने भयानक रूप ले लिया। इसने लगभग सौ करोड़ जीव-जन्तुओं को जलाकर राख कर दिया। इसमें अट्ठाईस जिंदगियां इन्सानों की भी शामिल हैं। ब्रिटेन के विशेषज्ञों का मानना है इस आग के चलते दस हजार करोड़ जानवरों की जिंदगी तबाह हो गयी । इस घटना ने दुनिया को झकझोर दिया और सन्देश दिया कि अब जलवायु आपातकाल पर बहस करने के दिन लद गये हैं । खतरा मुहाने पर नहीं खड़ा है बल्कि हम खतरे से घिरे हुए हैं-- “धरती जल रही है।” ऑस्ट्रलियाई जंगल में लगी आग का इतिहास देखें तो पता चलता है कि साल 1920 के बाद से हर साल तापमान में लगातार वृद्धि होती गयी, जिसमें 1990 के बाद बहुत बड़ी छलांग लगी। 2019 सबसे गर्म साल था। यह साल 2018 की तुलना में औसतन डेढ़ डिग्री अधिक गर्म था।...
आगे पढ़ें..जेफ बेजोस का भारत दौरा और पीयूष गोयल का विवादास्पद बयान
नई दिल्ली में आयोजित वैश्विक संवाद सम्मेलन ‘रायसीना डायलॉग’ में पीयूष गोयल ने कहा, “अमेजन एक अरब डॉलर निवेश कर सकती है... इसलिए ऐसा नहीं है कि वे एक अरब डॉलर का निवेश कर भारत पर कोई एहसान कर रहे हैं।” इस बयान पर कारोबारी जगत में हलचल मच गयी है। इसे जहां एक ओर विदेशी निवेश के लिए घातक माना जा रहा है वहीँ दूसरी ओर, आनलाइन कंपनियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे छोटे दुकानदार को लुभानेवाला बताया जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कहना है कि ‘सरकार का यह बयान भारत के कारोबारी हित में नहीं है। यह भारत में होने वाले विदेशी निवेश पर बुरा असर डालेगा और इससे विदेशी निवेशक देश से पूँजी लेकर जा सकते हैं।’ सरकार का यह बयान देश के हालात के बारे में एक तस्वीर पेश करता है। इस तस्वीर में एक त्रिभुज है—...
आगे पढ़ें..अमरीका ने कासिम सुलेमानी को क्यों मारा?
कासिम सुलेमानी ईरान के कुद्स फौज के कमांडर थे जिन्हें 3 जनवरी 2020 को शुक्रवार के दिन अमरीका ने हवाई हमले में मार दिया। उनकी मौत पर ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने कहा कि अमरीका का यह आतंकवादी कारनामा बहुत ही खतरनाक है और अमरीका को इसके सभी परिणामों को भुगतना होगा, जो उसने अपने गंदे दुस्साहस के चलते पैदा किया है। दूसरी तरफ अमरीका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव की प्रवक्ता नैंसी पेलोसी ने कहा कि सुलेमानी की हत्या पूरे मध्य एशिया के इलाके में हिंसा को बहुत बड़े स्तर पर बढ़ा देगी। दोनों देशों के बीच तनाव आज अपने चरम पर है। अब आइए पिछले दिनों की बड़ी घटनाओं पर एक नजर डालते हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ओबामा प्रशासन के दौरान दोनों पक्षों द्वारा अमरीका-ईरान के बीच बेहद अच्छे संबंध बनाने की कोशिश की गई थी। इसी को ध्यान में रखते हुए...
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