अनियतकालीन बुलेटिन

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समाचार: राजनीतिक अर्थशास्त्र

8 Jan 2025

2,26,800 करोड़ रुपये का मासिक व्यापार घाटा

सितम्बर महीने में व्यापार घाटा 1,74,552 करोड़ रुपये (20.78 अरब डॉलर) था जिसको लेकर सरकार और मीडिया ने खूब ढिंढोरा पीटा कि भारत का व्यापार घाटा तेजी से कम हो रहा है। यह भी दावा किया गया कि पिछले साल की तुलना में अक्टूबर महीने में इस साल का व्यापार घाटा सबसे कम होगा। इस पर मोदी जी की दूरदर्शिता का खूब बखान किया गया। ऐसा अनुमान लगाया गया था कि अक्टूबर में देश का व्यापार घाटा 1,84,800 करोड़ रुपये रहेगा। लेकिन इस सब हवाबाजी की पोल–पट्टी तब खुल गयी जब अक्टूबर के आकड़े सामने आए। इसमें पता चला कि व्यापार घाटा तो बढ़कर 2,26,800 करोड़ रुपये हो गया है, जो अनुमान से करीब 42,000 करोड़ रुपये ज्यादा था। इस पर सरकार और उससे सम्बद्ध मीडिया घरानों की घिग्गी बँध गयी। इन आँकड़ों को देखकर उनके मुँह से चू भी नहीं निकली।  अगर पिछले कुछ महीनों की तुलना की...

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5 Sep 2024

‘ट्रेजेडी ऑफ कॉमन्स’ का मिथक

क्या साझा संसाधनों का हमेशा दुरुपयोग और अत्यधिक उपयोग किया जाएगा ? क्या जमीन, वन और मत्स्य पालन पर सामुदायिक मालिकाना पारिस्थितिक आपदा का निश्चित राह है ? क्या निजीकरण पर्यावरण की रक्षा और तीसरी दुनिया की गरीबी को खत्म करने का एकमात्र तरीका है ? अधिकांश अर्थशास्त्री और विकास योजनाकार इसके जवाब में “हाँ” कहेंगे और इसके प्रमाण के लिए वे उन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर लिखे गये अब तक के सबसे प्रभावशाली लेख की ओर इशारा करेंगे । दिसम्बर 1968 में साइंसजर्नल में प्रकाशित होने के बाद से, “द ट्रेजेडी ऑफ द कॉमन्स” को कम से कम 111 पुस्तकों में संकलित किया गया है, जिससे यह किसी भी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित होने वाले सबसे अधिक पुनर्मुद्रित लेखों में से एक बन गया है । यह सबसे अधिक उद्धृत लेखों में से एक है । हाल ही में गूगल–खोज में “ट्रेजेडी ऑफ द कॉमन्स” वाक्यांश के लिए “लगभग 3,02,000”...

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2 Dec 2023

परम पूँजीवाद

फ्रांसीसी कवि चार्ल्स बुडले ने 1864 में लिखा था कि ‘शैतान का सबसे चालाक प्रपंच होता है आपको यह समझाना कि उसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है।’(1) मैं यहाँ यह कहूँगा कि यह कथन आज के नवउदारवादियों पर बिलकुल फिट बैठता है जिनका शैतानी प्रपंच है यह जताना कि उनका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है। नवउदारवाद को इक्कीसवीं सदी के पूँजीवाद की केन्द्रीय राजनीतिक–विचारधारागत परियोजना माना जाता है। यह मान्यता बड़ी व्यापक है। लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल सत्ताधीश शायद ही कभी करते हैं। अमरीकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने तो नवउदारवाद के नहीं होने को आधिकारिक आधार ही दे दिया था जब उसने 2005 में एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था–– ‘नियोलिबरलिज्म? इट डज नॉट एक्जीस्ट’(2) (नवउदारवाद? इसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं है)। इस शैतान के प्रपंच के पीछे है एक बड़ी ही व्यथित कर देने वाली और कह सकते हैं कि एक...

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12 Apr 2021

पंजाब का कृषि क्षेत्र बदलती जमीनी हकीकत और संघर्ष का निशाना

पंजाब विकसित खेतीवाला राज्य है जहाँ लगभग एक करोड़ एकड़ (40 लाख हैक्टेयर) जमीन पर खेती की जाती है। यहाँ की जमीन पूरी तरह से समतल है। दूसरे राज्यों के बनिस्पत इसके समतलपन में एक खासियत है। पिछले दशकों का रिकार्ड बताता है कि यहाँ की पैदावार देश के औसत से काफी अधिक है। बाढ़ आये, चाहे सूखा पड़े, यह राज्य दोनों हालातों में पैदावार को बनाये रखता है। बाढ़ के दौरान ऊँचे स्थानों पर और सूखे के दौरान निचले स्थानों पर हुई फसल, सामान्य परिस्थितियों वाली औसत फसल का रिकॉर्ड दे देती है। कुदरती नुकसान, ओलावृष्टि आदि से होने वाले नुकसान क्षेत्रीय होते हैं। इस बार कपास की फसल की तबाही, बीमारी से निपटने के लिए सरकार और कृषि विभाग की विफलता के साथ–साथ मुनाफे के लिए दवा कम्पनियों, डीलरों और सरकारी अधिकारियों के भ्रष्ट गठजोड़ का नतीजा है। सरकार को...

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30 Mar 2021

भारतीय किसान आन्दोलन के सामने चुनौतियाँ और मुद्दे

मानवीय सभ्यता के विकास के आरम्भिक दौर में पूरे विश्व में कृषि ही इनसानी आबादी के बहुत बड़े हिस्से के लिए आजीविका का साधन थी। लगभग चार शदाब्दियों पहले यूरोप में ज्यों ही औद्योगिक विकास शुरू हुआ और बढ़ने लगा, त्यों ही कृषि से मानवीय आजीविका का बोझ कम होने लगा। आजकल विश्व के विकसित पश्चिमी हिस्से में लगभग 10 फीसदी आबादी ही आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर रह गयी है, हालाँकि कृषि और जमीन का महत्त्व उसी तरह से कायम है। जहाँ तक एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमरीका के विकासशील और अविकसित देशों और क्षेत्रों का सवाल है, इनकी 70 फीसदी आबादी आज भी आजीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर है। इस सन्दर्भ में यदि हम मानवीय इतिहास पर नजर डालें तो पता लगता है कि यह एक तरह से किसान आन्दोलन और संघर्षों का ही इतिहास है। भारत...

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30 Jan 2020

सार्वजनिक कम्पनियों का विनिवेशीकरण या  नीलामी

केंद्र सरकार जिन 5 बड़ी कंपनियों के हिस्से को बेचने की योजना बना रही है, उनमें बीपीसीएल, एससीआई, कॉनकोर, एनईईपीसीओ (नीपको) और टीएचडीसीआई शामिल है। इनमें से नीपको और टीएचडीसीआई की पूरी हिस्सेदारी बेचने की योजना बनाई है, जिसके लिए केंद्र सरकार के विनिवेश विभाग ने 12 विज्ञापन जारी किए हैं। इन विज्ञापनों के जरिये एसेट वैल्यूवर, लीगर एड्वाइजर की नियुक्ति और हिस्सा बेचने की बोलियाँ मंगायी गयी है। अगर कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम होती है तो ये कम्पनियाँ कैग और सीवीसी के दायरे से बाहर हो जाएगी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने बताया है कि केंद्र सरकार के पास बिक्री के लिए 46 कंपनियों की एक सूची है और कैबिनेट ने इनमें 24 को बेचने की स्वीकृति दे दी है। दरअसल भारत सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ते-बढ़ते 6.45 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया है। उसे ही पूरा करने के लिए सरकार...

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14 Jan 2020

अमरीका ने कासिम सुलेमानी को क्यों मारा?

कासिम सुलेमानी ईरान के कुद्स फौज के कमांडर थे जिन्हें 3 जनवरी 2020 को शुक्रवार के दिन अमरीका ने हवाई हमले में मार दिया। उनकी मौत पर ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने कहा कि अमरीका का यह आतंकवादी कारनामा बहुत ही खतरनाक है और अमरीका को इसके सभी परिणामों को भुगतना होगा, जो उसने अपने गंदे दुस्साहस के चलते पैदा किया है। दूसरी तरफ अमरीका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव की प्रवक्ता नैंसी पेलोसी ने कहा कि सुलेमानी की हत्या पूरे मध्य एशिया के इलाके में हिंसा को बहुत बड़े स्तर पर बढ़ा देगी। दोनों देशों के बीच तनाव आज अपने चरम पर है। अब आइए पिछले दिनों की बड़ी घटनाओं पर एक नजर डालते हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ओबामा प्रशासन के दौरान दोनों पक्षों द्वारा अमरीका-ईरान के बीच बेहद अच्छे संबंध बनाने की कोशिश की गई थी। इसी को ध्यान में रखते हुए...

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