समाचार: कविता
होर्मुज की लहरें कुछ कहती हैं
होर्मुज, हाँ वही होर्मुज फारस की खाड़ी का मात्र सत्तर किलोमीटर चैड़ा समुद्री गलियारा जहाँ से दुनिया की एक बड़ी आबादी की साँसें चलती हैं गैस और पेट्रोलियम, हमारी साँसेंे ही तो हैं इनका ठहराव यानी हमारी साँसोंे का थम जाना । होर्मुज की लहरें कह रही हैं बहुत हो चुका बस अब हम नहीं नाचेंगे वाशिंगटन के इशारों पर लगभग छ: सौ वर्षों तक पश्चिमी दुनिया के इन आवारा साड़ों ने अपने खूँखार सींगों और नुकीले खुरों से इस धरती को लहूलुहान किया है हमें रौंदा है, दबाया और लूटा है किन्तु अब बस उनके दिन खत्म हो गये न झुकेंगे, न दबे और डरेंगे समझौता तो कतई नहीं करेंगे हमें मरना है तो लड़ते हुए मरेंगे उनके सींगों को पकड़ कर उन पर झूम कर । दुनिया के इतिहास के सबसे बहशी दरिन्दे जिन्होंने शहरों को राख में बदल दिया कैद आबादी को कत्लगाहों तक हाँका ...
आगे पढ़ें..हम कॉकरोच हैं
हम कॉकरोच हैं नौजवान हैं, मचलती हुई सोच हैं निज़ाम के पैरों में आ गई मोच हैं हम कॉकरोच हैं बेरोज़गार हैं दिशाहीन हैं, बहके हुए हैं टूटे हुए करार हैं घरों, परिवारों की हार हैं जीवन को तरसती हुई चाह हैं हम कॉकरोच हैं ग्रैगर समसा1 कभी तू भी कॉकरोच बना था और सबने तुझे नकार दिया पिता ने, बहन ने, भाई ने पूरे समाज ने सरमाये के राज ने हम भी नकारे गए हैं कौन कहता है यह? कौन न्यायाधीश कौन सियासतदान कौन देता है शब्दों का यह 'वरदान' यह अलग बात है लोरका2 ने कभी शायर-कॉकरोच की कल्पना की थी या कॉकरोच-शायर कॉकरोच ब्रह्मांड-जीवन का हिस्सा है मनुष्य उन्हें अपना दुश्मन समझता है मिटा देना चाहता है उनकी हस्ती निज़ाम भी यही चाहता है बेरोज़गारी नहीं बेरोज़गारों की हस्ती मिटाना उन्हें कॉकरोच...
आगे पढ़ें..