होर्मुज की लहरें कुछ कहती हैं
कविता भगवान स्वरूप कटियारहोर्मुज, हाँ वही होर्मुज
फारस की खाड़ी का
मात्र सत्तर किलोमीटर चैड़ा समुद्री गलियारा
जहाँ से दुनिया की
एक बड़ी आबादी की साँसें चलती हैं
गैस और पेट्रोलियम, हमारी साँसेंे ही तो हैं
इनका ठहराव यानी हमारी साँसोंे का थम जाना ।
होर्मुज की लहरें कह रही हैं
बहुत हो चुका बस
अब हम नहीं नाचेंगे
वाशिंगटन के इशारों पर
लगभग छ: सौ वर्षों तक
पश्चिमी दुनिया के इन आवारा साड़ों ने
अपने खूँखार सींगों और नुकीले खुरों से
इस धरती को लहूलुहान किया है
हमें रौंदा है, दबाया और लूटा है
किन्तु अब बस
उनके दिन खत्म हो गये
न झुकेंगे, न दबे और डरेंगे
समझौता तो कतई नहीं करेंगे
हमें मरना है तो लड़ते हुए मरेंगे
उनके सींगों को पकड़ कर
उन पर झूम कर ।
दुनिया के इतिहास के सबसे बहशी दरिन्दे
जिन्होंने शहरों को राख में बदल दिया
कैद आबादी को कत्लगाहों तक हाँका
और कब्जाई गयी जमीनों को
सामूहिक कब्रों और लाशों से भर दिया
दुनिया को बाँट दिया
काले–गोरे दो खाँचों में
मकसद वही
बेलगाम हिंसा के जारिये पूर्ण वर्चस्व
एकछत्र राज पूरी धरती पर ।
जिन्हें दबाया गया, गुलाम बनाया गया
वे अब इनसान नहीं जायदाद थे उनकी
हवस और मुनाफे के लिए
इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुएँ
एप्स्टीन फाइल में दर्ज हुक्मरान हों
लिबरल हो या कंजरवेटिव, डेमोक्रेट हों या रिपब्लिक
वालस्ट्रीट के दिग्गज हों या सेलिब्रिटीज या अकादमिक्स
सब सड़े हुए ढाँचे के हिस्से हैं
रिचिस्तान की जन्नत के बासिन्दे
जो नीरो की तरह रंगरेलियाँ मनाते
गन्दे सौदे करते, अरबों डॉलर जमा करते
यहाँ तक कि बच्चों को भी
कचरे की तरह डस्टबिन में फेंक देते ।
हर घिनौने अपराध में लिप्त
इनकी कोई जबाबदेही नहीं होती
इनसान की शक्ल में दरिन्दे हैं ये
अपने असहाय दुश्मन को
अपने पैरों तले कुचलने की कुँठा लिए
इनसानी चेहरे पर फौजी बूट की मार का
वहशी, खौफनाक मंजर रचते ये दरिन्दे
अब हमें बर्दाश्त नहीं हैं ।
लन्दन की जेलों में
विकिलीक्स के जुलियन असान्जे का उत्पीड़न
बताता है कि न्यायपालिकाएँ
अब सत्ता की पिट्ठू हो गयी हैं
वे हमारी जिन्दगी तय करते हैं
वे ऐसी दुनिया चाहते हैं
जहाँ कुछ मालिक हों, बाकी सब गुलाम ।
हमारे पास दो ही रास्ते हैं
प्रतिरोध की जंग या समर्पण
मरना समर्पण में भी है एक कायराना मौत
इसलिए प्रतिरोध की जंग को चुना है
एक बहादुराना शाहदत के वास्ते ।
अब हमें डरी हुई खामोशी
और कायर चुप्पी से
बाहर आना ही होगा
थोपे गये युद्ध के खिलाफ
हमारे तेल और गैस के ठिकानों पर
फासिस्ट कब्जे के खिलाफ
ईरान, लेबनान, गाजा में जारी
वहिशियाना बर्बरता के खिलाफ
सामूहिक कत्लेआम के खिलाफ
अब परचम उठाना ही होगा ।
जिन्होंने युद्ध थोपा है
हम उनसे कीमत वसूलेंगे
हिसाब लेंगे खून के एक–एक कतरे के
मासूम स्कूली बच्चियों के खून का बदला लेंगे
इन इजराइली–अमरीकी जालिमों से
होर्मुज की उठती–गिरती लहरें
जालिमों के नापाक मंसूबों से खफा हैं
वे कहती हैं
अब हम इन्हें रसातल में पहुँचा कर ही
दम लेंगे, अब कदम पीछे नहीं लौटेंगे
इनका अन्त किये बगैर ।