समाचार: पर्यावरण
अरावली पर्वतमाला पर हमला
पर्यावरण अरावली पर्वतमाला की कोई भी संकीर्ण परिभाषा इस बेहद महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर सकती है, जिसके भूजल, कृषि और उत्तर भारत के कई राज्यों में रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। -वितास्ता कौल हरियाणा में अरावली पर्वतमाला का हवाई दृश्य। यह पर्वतमाला उत्तर भारत की जीवित रक्षा प्रणाली के रूप में काम करती है, थार रेगिस्तान से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकती है, भूजल का पुनर्भरण करती है, तापमान को नियंत्रित करती है और इस क्षेत्र की अनूठी वनस्पतियों और जीवों को संरक्षित रखती है। फोटो साभारः एएनआई 20 नवम्बर, 2025 को, सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने अरावली पर्वतमाला के लिए एक तरह से मौत का फरमान जारी कर दिया, जिसे पर्यावरणविदों ने उत्तर भारत के कई राज्यों में फैली अरावली पर्वतमाला के लिए एक तरह का...
आगे पढ़ें..शीशमबाडा कचरा प्लांट का सर्वे
देहरादून की पछवादून घाटी में एक बेहद खूबसूरत जगह है–– बायाखाला । यह आसन नदी के किनारे पर है और इसके ठीक सामने पछवादून की हरी–भरी रसीली पहाड़ियाँ हैं । कुछ सालों पहले तक यह इलाका एक विशाल खूबसूरत पेंटिंग जैसा दिखता था । बरसात के मौसम में बासमती धान की सीढ़ीदार पट्टियाँ इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देती थी । लेकिन कुछ ही सालों में यह इलाका एक बदबूदार नरक में तब्दील कर दिया गया है । आसन नदी के खूबसूरत तट से लेकर बायाखाला और शीशमबाडा गाँव की दहलीजों तक की कई बीघे जमीन पर कूड़े का पहाड़ खड़ा कर दिया गया है । (फोटो इन्टरनेट न्यू हिन्दुस्तान से साभार) इससे हर समय इतनी भयानक और जहरीली बदबू निकलती रहती है कि बाहर से गये किसी इंसान के लिए एक मिनट खड़ा होना भी दूभर हो...
आगे पढ़ें..एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री 1862 संस्करण की भूमिका
जस्टस फॉन लिबिग ने 1862 में अपनी ‘आर्गेनिक केमिस्ट्री इन इट्स एप्लीकेशन टू एग्रीकल्चर एंड फिजियोलॉजी’ का 7वां संस्करण प्रकाशित की थी, जिसे अक्सर ‘एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री’ के नाम से जाना जाता है। लिबिग के किसी भी काम का तुरंत अंग्रेजी में अनुवादित होना आम था । हालाँकि, एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री के 1862 संस्करण के पहले खण्ड में, खासकर इसके लम्बे और उत्तेजक परिचय में, उन्नत ब्रिटिश कृषि पद्धति की विस्तृत आलोचना भी शामिल था। लीबिग के अंग्रेज प्रकाशक वाल्टन ने इसे “अपमानजनक” करार देते हुए अपनी प्रति को नष्ट कर दिया था। इसलिए, अंग्रेजी में कभी इसकी सम्पूर्ण कृति छपी ही नहीं। हालांकि, 1863 में इस किताब के दूसरे खण्ड का अनुवाद आयरिश वैज्ञानिक जॉन ब्लीथ ने ‘द नेचुरल लॉ ऑफ़ हसबेंडरी’ के नाम से किया और इसे न्यू यॉर्क की अप्पलटन ने प्रकशित की । उस किताब में 1862 संस्करण की भूमिका शामिल थी, लेकिन संक्षिप्त और नरम लहजे का...
आगे पढ़ें..ऑस्ट्रेलिया की आग का क्या है राज?
बीते दिसम्बर में ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग ने भयानक रूप ले लिया। इसने लगभग सौ करोड़ जीव-जन्तुओं को जलाकर राख कर दिया। इसमें अट्ठाईस जिंदगियां इन्सानों की भी शामिल हैं। ब्रिटेन के विशेषज्ञों का मानना है इस आग के चलते दस हजार करोड़ जानवरों की जिंदगी तबाह हो गयी । इस घटना ने दुनिया को झकझोर दिया और सन्देश दिया कि अब जलवायु आपातकाल पर बहस करने के दिन लद गये हैं । खतरा मुहाने पर नहीं खड़ा है बल्कि हम खतरे से घिरे हुए हैं-- “धरती जल रही है।” ऑस्ट्रलियाई जंगल में लगी आग का इतिहास देखें तो पता चलता है कि साल 1920 के बाद से हर साल तापमान में लगातार वृद्धि होती गयी, जिसमें 1990 के बाद बहुत बड़ी छलांग लगी। 2019 सबसे गर्म साल था। यह साल 2018 की तुलना में औसतन डेढ़ डिग्री अधिक गर्म था।...
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