एआई तकनीकी विकास और उसके सामाजिक सरोकार
समाचार-विचारएआई तकनीक के विकास ने पूरी से उन सवालों को सतह पर ला दिया है जो काफी अर्से पहले तकनीकी विकास के साथ बहस का मुद्दा बना करते थे। मसलन, क्या तकनीकी विकास पर सवाल उठाया जा सकता है? आजकल कुछ लोग ऐसे भी हैं जो तकनीक को इस तरह पूजते हैं जैसे वह खुद जन–कल्याण का कोई परम अवतार हो, जिसपर सवाल खड़े नहीं किये जा सकते “देखो! लैपटॉप, मोबाइल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस–– सब इनसान की भलाई के लिए है!” इन तकनीक–भक्तों को यह सोचने की फुरसत नहीं कि तकनीक आखिर किसके लिए और किसके खिलाफ काम कर रही है। उनके लिए तो हर मशीन, हर ऐप, हर “इनोवेशन” जैसे “मोक्ष” का साधन है!
अब जरा सोचिए, जब अल्ट्रासाउण्ड मशीन आयी थी, तो उसे कहा गया, “अब मातृत्व और जीवन को बचाने वाली तकनीक।” लेकिन भारत में उसी मशीन ने भ्रूण हत्या का हथियार बनकर लाखों बेटियों को पैदा होने से पहले ही मार डाला। तकनीक तो वही थी, बस उसका “उपयोगकर्ता” बदल गया, मुनाफे और पितृसत्ता के गठजोड़ ने उसे इनसानियत का कसाई बना दिया।
इन्हीं तकनीक भक्तों से अगर पूछा जाए कि क्या वे भ्रूण हत्या का भी समर्थन करते हैं, तो वे तुरन्त कहेंगे, “नहीं, नहीं, हम तो प्रगति के पक्षधर हैं।” लेकिन सवाल यही है कि प्रगति किसकी? स्त्री की देह पर नियंत्रण रखने वाले समाज की या उस अजन्मी लड़की की जो दुनिया देखने से पहले ही “तकनीकी विकास” की बलि चढ़ गयी? यही वह बिन्दु है जहाँ तकनीक की पूजा करने वाले लोग अचानक मौन साध लेते हैं।
विज्ञान और तकनीक के प्रति यह अन्धभक्ति नयी नहीं है। हिटलर के दौर में भी वैज्ञानिकों ने गैस चेम्बरों में लाखों यहूदियों को “तकनीकी दक्षता” से मारने का तरीका खोज लिया था। जर्मन इंजीनियर गर्व से कहते थे कि उनकी मशीनें “ज्यादा कुशलता” से मारती हैं। और परमाणु बम? वह तो मानव सभ्यता की सबसे “उन्नत” तकनीक का नमूना था! हिरोशिमा और नागासाकी की राख पर खड़े होकर भी लोग बोले, “देखो, क्या वैज्ञानिक उपलब्धि है!” ऐसी सोच को शर्मसार होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य वह गर्व का विषय बनी हुई है।
आधुनिक तकनीक का असली चेहरा तब दिखता है जब आप देखें कि उसका मालिक कौन है। सच यही है, तकनीक तब तक प्रगतिशील नहीं हो सकती जब तक वह प्रगतिशील शक्तियों के हाथ में नहीं, बल्कि मुनाफाखोर और शोषक सत्ता के हाथ में है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर जेनेटिक एडिटिंग तक, हर नयी तकनीक को उसी श्रद्धा से देखा जा रहा है जैसे कभी तान्त्रिक अपने यन्त्र–मन्त्र को देखते थे, “इस पर सवाल मत करो, वरना पाप लगेगा।”
तकनीक मानव की बौद्धिक प्रगति का नतीजा है, कोई ईश्वरीय सत्ता नहीं कि उस पर प्रश्न न उठाया जा सके। हालाँकि ईश्वरीय सत्ता पर भी प्रश्न उठ चुके हैं। तकनीक इनसान द्वारा निर्मित साधन है, इसलिए इसका मूल्यांकन भी सामाजिक, नैतिक और मानवीय दृष्टि से होना चाहिए। जब तकनीक समाज के हित में प्रयोग होती है, तो वह प्रगति का प्रतीक बनती हैय लेकिन जब वही तकनीक पूँजी, शोषक सत्ता और युद्ध के औजार में बदल जाती है, तो विनाश का कारण भी बन जाती है। विज्ञान के नियम स्वयं में न तो अच्छे हैं न बुरे, वे इस पर निर्भर हैं कि समाज की वर्गीय संरचना में उनका उपयोग किसके हित में किया जा रहा है और किसके खिलाफ।
कोरोना महामारी के दौरान यह बात सबसे स्पष्ट रूप में सामने आयी। दुनिया भर में वैज्ञानिक अनुसंधान ने वैक्सीन, चिकित्सा तकनीक और सूचना प्रणालियों को विकसित किया। लेकिन दूसरी ओर, बहुत से विद्वानों ने यह भी दिखाया कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति में बायोटेक्नोलॉजी और लैब–आधारित प्रयोगों की भूमिका है। यह दिखाता है कि विकसित तकनीक का नियंत्रण जब सैन्य और निजी कॉरपोरेट हाथों में होता है, तो वह मानवता के लिए खतरा बन जाती है। इसलिए वैज्ञानिक प्रगति को नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी से अलग नहीं किया जा सकता।
इसी तरह बायोलॉजिकल वीपन, यानी जैविक हथियार तकनीकी उन्नति का सबसे भयावह और खतरनाक उदाहरण हैं जो धरती से पूरी इनसानियत को खत्म करने की ताकत रखते हैं। वैज्ञानिक ज्ञान का वही हिस्सा, जो मानव स्वास्थ्य सुधारने में इस्तेमाल हो सकता था, उसे युद्ध और विनाश के उपकरण के रूप में ढाला गया। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से लेकर 1980 के दशक में दक्षिण अफ्रीका के “प्रोजेक्ट कोस्ट” तक, हर बड़ी शक्ति ने इस दिशा में गुप्त अनुसंधान किया। इन प्रयोगों ने मानव सभ्यता को यह सिखाया कि तकनीक पर नैतिक नियंत्रण न हो तो यह सभ्यता–विनाश का साधन बन सकती है।
न्यूक्लीयर रिएक्टर भी इसी द्वन्द्व को उजागर करते हैं। आइन्स्टीन जैसे वैज्ञानिक, जिन्होंने सापेक्षता का सिद्धान्त दिया था, बाद में परमाणु बम के निर्माण पर पछताते रहे। हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराये गये बमों ने यह साबित किया कि “विकसित तकनीक” का गौरवशाली रूप नहीं, बल्कि उसकी विनाशकारी क्षमता भी उतनी ही बड़ी होती है। परमाणु बम के जनक ओपेनहाइमर ने 16 जुलाई 1945 को ट्रिनिटी परीक्षण के बाद कहा कि “अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, संसार का विनाशक।” यह वाक्य विज्ञान और तकनीक के नैतिक संकट का शाश्वत प्रतीक बन गया है।
तकनीक पर सवाल उठाना, दरअसल, मानव चेतना की परिपक्वता का लक्षण है। जब कोई व्यक्ति यह पूछता है कि “यह तकनीक किसके लिए, किस उद्देश्य से और किस कीमत पर ?”, तो वह विज्ञान को मानवता के अधीन ला देता है। इसलिए विकसित तकनीक को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करना नकारात्मकता नहीं, बल्कि जिम्मेदार वैज्ञानिक नजरिये का प्रमाण है।
असल में हर तकनीक का मूल्यांकन जरूरी है। लेकिन जो लोग हर मशीन को देवी और हर ऐप को वेद मान लेते हैं, वे यह नहीं देखना चाहते कि यह देवी इनसान का कल्याण कर रही है या उसका नाश। गर्भ में मारी गयी बच्ची शायद यही पूछना चाहती, “क्या यह तकनीकी प्रगति है या सभ्यता की शर्म ?”
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