सच लिखने में पाँच कठिनाइयाँ
साहित्य–बर्तोल्त ब्रेख्त (1935)
जो कोई भी इन दिनों, झूठ और अज्ञानता से लड़ना चाहता है और सच को लिखना चाहता है उसे कम से कम पाँच कठिनाइयों पर जीत हासिल करनी पड़ेगी। जब सच्चाई का हर जगह विरोध हो रहा हो तो उसके अन्दर सच्चाई को लिखने का साहस होना चाहिएय हालाँकि यह हर जगह छुपी हुई है परन्तु फिर भी इसे पहचानने की समझदारी होनी चाहिएय इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कौशल होना चाहिएय उन लोगों को चुनने का फैसला लेना चाहिए जिनके हाथों में यह असरदार होगाय और ऐसे लोगों के बीच सच्चाई को फैलाने की होशियारी होनी चाहिए। फासीवाद के अधीन जीने वाले लेखकों के लिए ये विकट समस्याएँ हैं, लेकिन ये उन लेखकों के लिए भी मौजूद हैं जो भाग गये हैं या निर्वासित कर दिये गये हैंय ये उन देशों में काम करने वाले लेखकों के लिए भी विद्यमान हैं जहाँ नागरिक स्वतंत्रता कायम है।
1– सच लिखने की हिम्मत
यह साफ जाहिर होता है कि जो कोई भी लिखता है उसे सच लिखना चाहिए, इस अर्थ में कि उसे सच को दबाना या छिपाना नहीं चाहिए या जानबूझकर कुछ झूठ नहीं लिखना चाहिए। उसे ताकतवर के सामने झुकना नहीं चाहिए और न ही कमजोर को धोखा देना चाहिए। निस्संदेह, कमजोर को धोखा देना बहुत फायदेमन्द और ताकतवर के सामने न झुकना बहुत कठिन है। मालिकों को नाराज करने का मतलब है शोषितों में से एक बन जाना। काम के बदले भुगतान का त्याग करना, काम को त्यागने के बराबर हो सकता है, और जब ताकतवर आदमी द्वारा शोहरत की पेशकश की जाती है, तो उसे नकारने करने का मतलब, उसे हमेशा के लिए नकारना हो सकता है। इसके लिए हिम्मत चाहिए।
चरम उत्पीड़न के वक्त आमतौर पर मशहूर और बुलन्द मामलों के बारे में बहुत ज्यादा चर्चा होती है। ऐसे वक्त में मजदूरों के लिए भोजन और आवास जैसे निम्न और निकृष्ट विषयों के बारे में लिखने के लिए हिम्मत की जरूरत होती हैय जब हर कोई बलिदान के अत्यन्त महत्व के बारे में जुमले फेंक रहा हो, तब भी हिम्मत की जरूरत होती है। जब किसानों के ऊपर हर तरह के सम्मानों की बौछार की जाती हो, तो मशीनों और पशुओं के लिए अच्छे चारे का जिक्र करना हिम्मत की बात है, जो उनके ऊपर से उनके सम्मानजनक श्रम का बोझ कम कर देगा। जब हर रेडियो स्टेशन चीख–चीखकर यह कह रहा हो कि ज्ञान और शिक्षा के बिना रहने वाला व्यक्ति, अध्ययन करने वाले व्यक्ति से बेहतर है, तो यह पूछने के लिए हिम्मत चाहिए कि यह किसके लिए बेहतर है? जब सारी बातें पूर्ण और अपूर्ण जातियों के बारे में होती हों, तो यह पूछने के लिए हिम्मत की जरूरत होती है कि क्या भूख, अज्ञानता और युद्ध ही समाज में विकृतियाँ पैदा नहीं करते हैं।
अपने बारे में और अपनी हार के बारे में सच बताने के लिए भी हिम्मत की जरूरत होती है। जुल्मतांे का शिकार हुए कई लोग अपनी गलतियों को देखने की क्षमता खो देते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि उत्पीड़न ही सबसे बड़ा अन्याय है।
उत्पीड़क जालिम हैं क्योंकि वे उत्पीड़न का काम करते हैंय उत्पीड़ित लोग अपनी अच्छाई के चलते कष्ट सहन करते रहते हैं। लेकिन इस अच्छाई को पराजित किया गया, दबा दिया गयाय इसलिए यह एक कमजोर अच्छाई थी, एक बुरी, असमर्थनीय, अविश्वसनीय अच्छाई थी। क्योंकि यह मानना ठीक नहीं होगा कि अच्छाई कमजोर होनी चाहिए, जैसे बारिश गीली होनी चाहिए। “यह कहने के लिए हिम्मत की जरूरत होती है कि अच्छे लोग इसलिए नहीं हारे क्योंकि वे अच्छे थे, बल्कि इसलिए हारे क्योंकि वे कमजोर थे।”
स्वाभाविक रूप से, झूठ के साथ संघर्ष में हमें सच लिखना होगा, और यह सच कोई अतिशयोक्तिपूर्ण और अस्पष्ट सामान्य बात नहीं होनी चाहिए। जब किसी के बारे में कहा जाता है, कि “उसने सच कहा,” तो इसका तात्पर्य यह है कि कुछ लोगों या कई लोगों या कम से कम एक व्यक्ति ने कुछ ऐसा कहा जो सच के विपरीत है–– झूठ या सामान्य बात–– लेकिन उसने सच कहा, उसने कुछ व्यावहारिक, तथ्यात्मक, निर्विवाद, कुछ बिन्दु पर कहा।
दुनिया के उस हिस्से में, जहाँ शिकायत करना अभी भी स्वीकार्य है, दुनिया की दुष्टता और बर्बरता की विजय के बारे में सामान्य शिकायत करने या साहसपूर्वक यह कहने के लिए कि मानव आत्मा की विजय सुनिश्चित है, बहुत कम हिम्मत की जरूरत होती है। ऐसे कई लोग हैं जो यह दिखावा करते हैं कि तोपें उन पर निशाना साध रही हैं, जबकि वास्तव में वे केवल थिएटर की दूरबीन के निशाने पर हैं। वे अपनी सामान्यी—त मांगों को दोस्तों और हानिरहित लोगों की दुनिया के सामने चिल्लाकर कहते हैं। वे सामान्यी—त न्याय पर जोर देते हैं जिसके लिए उन्होंने कभी कुछ नहीं कियाय वे सामान्यी—त आजादी की माँग करते हैं और लूट का हिस्सा मांगते हैं जिसका वे लम्बे समय से आनन्द लेते आ रहे हैं। वे सोचते हैं कि सच केवल वही है जो अच्छा लगता है। यदि सच कुछ सांख्यिकीय, रूखा या तथ्यात्मक निकल आए–कुछ ऐसा जिसे ढूँढना कठिन हो और जिसके लिए अध्ययन की जरूरत हो–तो वे उसे सच मानते ही नहींय वह उन्हें मदहोश नहीं करता। उनके पास केवल सच बात करने वालों का बाह्य आचरण ही होता है। उनके साथ समस्या यह है कि “वे सच नहीं जानते।”
2– सच को पहचानने की समझदारी
चूँकि सच को लिखना मुश्किल है क्योंकि सच को हर जगह दबा दिया जाता है, ज्यादातर लोगों को लगता है कि सच लिखा जाए या न लिखा जाए, यह व्यक्तित्व का सवाल है। उनका मानना है कि अकेले हिम्मत ही काफी है। वे दूसरी बाधा को भूल जाते हैं: सच को ’खोजने’ की मुश्किल। इस बात पर जोर देना असंभव है कि सच का आसानी से पता लगाया जा सकता है।
सबसे पहले हमें यह तय करने में परेशानी होती है कि ‘कौन सा’ सच बताने के लायक है। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया की आँखों के सामने एक के बाद एक महान सभ्य राष्ट्र बर्बरता में गिरते जाते हैं। इसके अलावा, हर कोई जानता है कि सबसे भयानक तरीकों से लड़ा जा रहा गृह युद्ध किसी भी वक्त विदेशी युद्ध में तब्दील हो सकता है और हमारे महाद्वीप को खण्डहरों का ढेर बना सकता है। निस्संदेह, यह एक सच है, लेकिन इसके अलावा और भी कितने ही सच हैं। इस प्रकार, उदाहरण के लिए, यह झूठ नहीं है कि कुर्सियों में सीटें होती हैं और बारिश नीचे की तरफ गिरती है। बहुत से कवि इस तरह की सच्चाइयाँ लिखते हैं। वे एक डूब रहे जहाज की दीवारों को ठहरावग्रस्त जिन्दगी के चित्र से सजाने वाले चित्रकार की तरह हैं। हमारी पहली मुश्किल उन्हें परेशान नहीं करती और उनकी अन्तश्चेतना साफ है। सत्ता में बैठे लोग उन्हें भ्रष्ट नहीं कर सकते, लेकिन वे उत्पीड़ितों की चीखों से व्याकुल भी नहीं होतेय वे चित्रकारी करते रहते हैं। उनके व्यवहार की मूर्खता उनके अन्दर एक “गहरा” निराशावाद पैदा करती है जिसे वे अच्छे दामों पर बेचते हैंय फिर भी ऐसा निराशावाद उन लोगों के लिए ज्यादा मुनासिब होगा जो इन मालिकों और उनकी बिक्री को गौर से देखते हैं। साथ ही यह समझना आसान नहीं है कि उनकी सच्चाइयाँ कुर्सियों या बारिश के बारे में सच्चाइयाँ हैंय वे आमतौर पर जरूरी चीजों के बारे में सच्चाइयाँ लगती हैं। लेकिन करीब से जाँच–पड़ताल करने पर यह देखा जा सकता है कि वे केवल यही कहते हैं: कुर्सी तो कुर्सी हैय और बारिश को गिरने से कोई भी नहीं रोक सकता।
वे उन सच्चाइयों की खोज नहीं कर पाते जिनके बारे में लिखा जाना चाहिए है। दूसरी तरफ, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो केवल बेहद जरूरी कामों को ही निपटाते हैं, गरीबी को अपनाते हैं और शासकों से नहीं डरते, और फिर भी सच का पता नहीं लगा पाते। उनके अन्दर ज्ञान की कमी है। वे कुख्यात पूर्वाग्रह के साथ प्राचीन अंधविश्वासों से भरे हुए हैं, जिन्हें बीते दिनों में अक्सर सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया जाता था। उनके लिए दुनिया बहुत जटिल हैय वे तथ्यों को नहीं जानतेय वे रिश्तों को नहीं समझते। ज्ञान, जिसे अर्जित किया जा सके और विधियाँ, जिन्हें सीखा जा सके, स्वभाव के अलावा, इनकी भी जरूरत होती है। उलझन और तेजी से बदलते इस युग में सभी लेखकों के लिए अर्थव्यवस्था और इतिहास के द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी ज्ञान की जरूरत है। यदि आवश्यक परिश्रम लागू किया जाये तो यह ज्ञान पुस्तकों और व्यावहारिक निर्देशों से प्राप्त किया जा सकता है। कई सच्चाइयों को आसान तरीके से खोजा जा सकता है, या कम से कम सच्चाई के कुछ अंशों को, या ऐसे तथ्यों को जो सच्चाई की खोज की ओर ले जाते हैं। यदि कोई सच की खोज करना चाहता है, तो खोज की विधि होना अच्छा है, लेकिन कोई विधि के बिना भी खोज सकता है, वास्तव में, बिना खोजे भी उसे पा सकता है। लेकिन ऐसी औपचारिक प्रक्रिया से सच की ऐसी प्रस्तुति नहीं होती जो लोगों को उस प्रस्तुति के आधार पर काम करने में सक्षम बनाये। जो लोग केवल छोटे–छोटे तथ्यों को दर्ज करते हैं, वे दुनिया की चीजों को इस तरह व्यवस्थित करने में सक्षम नहीं होते कि उन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा सके। मगर सच का केवल यही काम है, दूसरा कोई नहीं। ऐसे लोग इस जरूरत को पूरा नहीं कर सकते कि वे सच लिखें।
यदि कोई व्यक्ति सच लिखने के लिए तैयार है और उसे पहचानने में सक्षम है, तो उसके सामने तीन और कठिनाइयाँ हैं।
3– सच को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कौशल
सच को कार्रवाई के क्षेत्र में उत्पन्न परिणामों के दृष्टिकोण से बोला जाना चाहिए। सच के एक ऐसे उदाहरण के तौर पर, जिससे कोई परिणाम नहीं निकलता, या गलत परिणाम निकलते हैं, हम इस व्यापक दृष्टिकोण का हवाला दे सकते हैं कि बर्बरता के परिणामस्वरूप कई देशों में खराब हालात बने हुए हैं। इस नजरिये से, फासीवाद बर्बरता की एक लहर है जो कुछ देशों पर एक ‘प्राकृतिक घटना’ की मौलिक शक्ति के साथ उतरी है।
इस नजरिये के अनुसार, फासीवाद पूँजीवाद और समाजवाद के अलावा (और ऊपर) एक नयी, तीसरी शक्ति हैय न केवल समाजवादी आन्दोलन बल्कि पँूजीवाद भी फासीवाद के हस्तक्षेप के बिना जीवित रह सकता था। और इसी तरह, जाहिर है कि यह एक फासीवादी दावा हैय इसे स्वीकार करना फासीवाद के प्रति समर्पण है।
फासीवाद पूँजीवाद का एक ऐतिहासिक चरण हैय इस अर्थ में यह कुछ नया और साथ ही पुराना भी है। फासीवादी देशों में पूँजीवाद अभी भी मौजूद है, लेकिन केवल फासीवाद के रूप मेंय और फासीवाद का मुकाबला केवल पूँजीवाद के रूप में ही किया जा सकता है, “जो पूँजीवाद का सबसे नग्न, सबसे बेशर्म, सबसे दमनकारी और सबसे विश्वासघाती रूप है।”
लेकिन कोई फासीवाद के बारे में सच कैसे बोल सकता है, जब तक कि वह पूँजीवाद के खिलाफ आवाज उठाने के लिए तैयार न हो, जो उसे जन्म देता है? ऐसे सच के व्यावहारिक परिणाम क्या होंगे ?
जो लोग पूँजीवाद के खिलाफ हुए बिना फासीवाद के खिलाफ हैं, जो बर्बरता से पैदा हुई बर्बरता पर विलाप करते हैं, वे उन लोगों के समान हैं जो बछड़े को मारे बिना ही उनका माँस खाना चाहते हैं। वे बछड़े को खाने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन उन्हें खून देखना पसन्द नहीं है। यदि कसाई माँस तौलने से पहले अपने हाथ धो ले तो वे आसानी से सन्तुष्ट हो जाते हैं। वे सम्पत्ति सम्बन्धों के खिलाफ नहीं हैं जो बर्बरता को जन्म देते हैंय वे केवल बर्बरता के खिलाफ हैं। वे बर्बरता के खिलाफ अपनी आवाज उठाते हैं, और वे उन देशों में ऐसा करते हैं जहाँ ठीक वही सम्पत्ति सम्बन्ध प्रचलित होते हैं, लेकिन जहाँ कसाई माँस तौलने से पहले अपने हाथ धोते हैं।
बर्बर उपायों के खिलाफ आवाज तभी तक प्रभावशाली हो सकती है जब तक श्रोता यह मानते रहंेगे कि उनके अपने देश में इस तरह के उपायों की बात हो ही नहीं सकती। कुछ देश अभी तक अपने सम्पत्ति सम्बन्धों को ऐसे तरीकों से बनाये रखने में सक्षम हैं जो दूसरे देशों में इस्तेमाल किये जाने वाले तरीकों की तुलना में कम हिंसक दिखाई देते हैं। इन देशों में लोकतंत्र अभी तक उन परिणामों को प्राप्त करने में मददगार है जिनके लिए अन्य देशों में हिंसा की जरूरत पड़ती होती है, यानी उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की गारंटी देने के लिए। कारखानों, खदानों और जमीन पर निजी एकाधिकार हर जगह बर्बर हालात पैदा करता है, लेकिन कुछ जगहों पर ये हालात इतने जबरदस्त नहीं लगते। बर्बरता केवल तभी नजर आती है जब ऐसा होता है कि एकाधिकार को खुली हिंसा से ही संरक्षित किया जा सकता है।
कुछ देश, जो अभी तक संवैधानिक राज्य की औपचारिक गारंटी के साथ–साथ कला, दर्शन और साहित्य जैसी सुविधाओं को समाप्त करके अपने बर्बर एकाधिकार की रक्षा करना आवश्यक नहीं समझते हैं, वे विशेष रूप से उन आगंतुकों की बात सुनने के लिए उत्सुक हैं जो अपनी जन्मभूमि का दुरुपयोग करते हैं क्योंकि वहाँ उन्हें ये सुविधाएँ नहीं दी जाती हैं। वे खुशी–खुशी सुनते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि भविष्य के युद्धों में वे जो सुनेंगे उससे उन्हें लाभ मिलेगा। क्या हम यह कहें कि उन्होंने सच को पहचान लिया है, उदाहरण के लिए, जो जर्मनी के विरुद्ध एक अनवरत संघर्ष की जोरदार माँग करते हैं “क्योंकि वह देश आज के समय में बुराई का सच्चा घर, नरक का साथी, मसीह विरोधी का निवास स्थान है ?” हमें तो यह कहना चाहिए कि ये मूर्ख और खतरनाक लोग हैं। इस बकवास से यह निष्कर्ष निकलता है कि चूँकि बम और जहरीली गैस अपराधियों को नहीं पकड़ पाते, इसलिए जर्मनी का सफाया कर देना चाहिए–– पूरे देश और उसके सभी लोगों का।
जो व्यक्ति सच को नहीं जानता, वह अपने आप को ऊँचे, सामान्य और अस्पष्ट शब्दों में व्यक्त करता है। वह “जर्मन” के बारे में चिल्लाता है, वह सामान्य रूप से बुराई के बारे में शिकायत करता है, और जो कोई भी उसे सुनता है वह समझ नहीं पाता कि क्या करना है। क्या वह जर्मन नहीं बनने का फैसला करेगा? अगर वह खुद अच्छा है तो क्या नरक गायब हो जाएगा? बर्बरता से निकलने वाली बर्बरता के बारे में मूर्खतापूर्ण बात भी इसी तरह की है। बर्बरता का स्रोत बर्बरता ही है, और इसका मुकाबला संस्कृति द्वारा किया जाता है, जो शिक्षा से आती है। यह सब सामान्य शब्दों में कहा गया हैय इसका उद्देश्य कार्रवाई के लिए मार्गदर्शन देना नहीं है और वास्तव में यह किसी को सम्बोधित नहीं है।
ऐसे अस्पष्ट विवरण कारणों की श्रृंखला में केवल कुछ ही कड़ियों की ओर इशारा करते हैं। उनकी अस्पष्टता आपदा के लिए जिम्मेदार वास्तविक ताकतों को छिपाती है। यदि इस विषय पर प्रकाश डाला जाये तो यह तुरन्त पता चलता है कि आपदाएँ कुछ खास लोगों के कारण होती हैं। क्योंकि हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब मनुष्य का भाग्य मनुष्य द्वारा ही निर्धारित किया जाता है।
फासीवाद कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है जिसे केवल “मानव स्वभाव” के संदर्भ में समझा जा सके। लेकिन जब हम प्राकृतिक आपदाओं से निपट रहे होते हैं, तब भी उन्हें चित्रित करने के ऐसे तरीके होते हैं जो मानव के योग्य होते हैं क्योंकि वे मनुष्य की लड़ाकू भावना को आकर्षित करते हैं।
योकोहामा को तबाह करने वाले एक बड़े भूकम्प के बाद, कई अमरीकी पत्रिकाओं ने ऐसी तस्वीरें प्रकाशित की जो खण्डहरों के ढेर को दिखाती थीं। नीचे कैप्शन में लिखा था–– ‘स्टील स्टूड’ (इस्पात खड़ा रहा)। और, निश्चित रूप से, हालाँकि पहली नजर में सिर्फ खण्डहर ही दिखाई दे सकते हैं, कैप्शन पढ़ने के बाद, आँखें तुरन्त समझ जाती हैं कि कुछ ऊँची इमारतें खड़ी थी। भूकम्प के बारे में दिये जा सकने वाले असंख्य विवरणों में, निर्माण इंजीनियरों द्वारा जमीन में होने वाले बदलावों, तनावों के बल, सर्वोत्तम विकास आदि के सम्बन्ध में तैयार किये गये विवरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे भविष्य में ऐसे निर्माण की ओर ले जाते हैं जो भूकम्पों का सामना कर सकेंगे। यदि कोई फासीवाद और युद्ध को महान आपदाओं के रूप में वर्णित करना चाहता है, जो प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं, तो उसे व्यावहारिक सच के सन्दर्भ में ऐसा करना होगा। उन्हें यह दिखाना होगा कि ये आपदाएँ, उन बहुसंख्यक मजदूरों को नियंत्रित करने के लिए, जिनके पास उत्पादन के साधन नहीं हैं, सम्पत्तिवान वर्गों द्वारा शुरू की जाती हैं।
यदि कोई बुरी परिस्थितियों के बारे में सच्चाई को सफलतापूर्वक लिखना चाहता है, तो उसे लिखना चाहिए ताकि इसके समाधान योग्य कारणों की पहचान की जा सके। यदि रोकथाम योग्य कारणों की पहचान की जा सकती है, तो बुरी स्थितियों से लड़ा जा सकता है।
4– उन लोगों को चुनने का फैसला लेना चाहिए जिनके हाथों में यह असरदार होगा
आलोचनात्मक और वर्णनात्मक लेखन में व्यापार की सदियों पुरानी परम्परा और यह तथ्य कि लेखक को उसके लिखे हुए के गन्तव्य के बारे में चिन्ता से मुक्त कर दिया गया है, ने उसे गलत धारणा के तहत काम करने के लिए प्रेरित किया है। उनका मानना है कि उनका ग्राहक या नियोक्ता, यानी बिचैलिया, उनके द्वारा लिखी गयी बात को सभी तक पहुँचा देता है। लेखक सोचता है–– मैंने बोल दिया है और जो लोग सुनना चाहते हैं वे मुझे सुनेंगे। वास्तव में उन्होंने अपनी बात कही है और जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं वे उनकी बात सुनते हैं। उनके बारे में बहुत कुछ कहा गया है, हालाँकि अभी तक बहुत कम हैय मैं केवल इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि “किसी के लिए लिखना” अब केवल “लेखन” में बदल गया है। लेकिन सच को केवल लिखा नहीं जा सकताय इसे किसी के लिए लिखा जाना चाहिए, किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो इसके साथ कुछ कर सके। सच को पहचानने की प्रक्रिया लेखकों और पाठकों के लिए एक समान है। अच्छी बातें कहने के लिए, व्यक्ति में सुनने की शक्ति अच्छी होनी चाहिए और व्यक्ति को अच्छी बातें सुननी चाहिए। सच को सोच–समझकर बोलना चाहिए और सोच–समझकर सुनना चाहिए। और हम लेखकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम किसे सच बताते हैं और कौन हमें सच बताता है।
हमें बुरी परिस्थितियों के बारे में उन लोगों को सच बताना चाहिए जिनके लिए परिस्थितियाँ सबसे बुरी हैं, और हमें उनसे भी सच सीखना चाहिए। हमें न केवल उन लोगों से बात करनी चाहिए जो कुछ विशेष विचार रखते हैं, बल्कि उन लोगों से भी बात करनी चाहिए जिन्हें अपनी स्थिति के कारण इन विचारों को रखना चाहिए। और दर्शक लगातार बदल रहे हैं। यहाँ तक कि जब फाँसी के लिए भुगतान बन्द हो जाता है या जब काम बहुत खतरनाक हो जाता है तो जल्लादों से भी सम्पर्क किया जा सकता है। बवेरियन किसान हर तरह की क्रान्ति के खिलाफ थे, लेकिन जब युद्ध बहुत लम्बा चला और घर लौटे बेटों को अपने खेतों में जगह नहीं मिली, तो उन्हें क्रान्ति के लिए राजी करना सम्भव हो गया।
लेखक के लिए सच का सच्चा स्वर प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। आमतौर पर, हम जो सुनते हैं वह बहुत ही सौम्य, उदासी भरा स्वर होता है, ऐसे लोगों का स्वर जो किसी मक्खी को भी चोट नहीं पहुँचाना चाहेंगे। यह सुनकर दुखी व्यक्ति और भी दुखी हो जाता है। जो लोग इसका उपयोग करते हैं वे शत्रु तो नहीं हो सकते, लेकिन वे निश्चित रूप से सहयोगी भी नहीं हैं। सच जुझारू होता हैय यह न केवल झूठ के विरुद्ध प्रहार करता है, बल्कि झूठ फैलाने वाले विशेष लोगों के विरुद्ध भी प्रहार करता है।
5– जनता के बीच सच को फैलाने की होशियारी
बहुत से लोग, इस बात पर गर्व करते हैं कि उनके पास सच के लिए जरूरी साहस है, वे इस बात से खुश हैं कि वे इसे खोजने में कामयाब हो गये हैं, शायद इसे व्यावहारिक रूप में लाने के लिए जरूरी श्रम से थक गये हैं और अधीर हैं कि इसे उन लोगों द्वारा समझा जाना चाहिए जिनके हितों का वे समर्थन कर रहे हैं, सच को फैलाने में किसी विशेष होशियारी को लागू करना अनावश्यक समझते हैं। इस कारण से वे अक्सर अपने काम की पूरी प्रभावशीलता को खो देते हैं। हर दौर में जब भी सच को दबाया या छुपाया गया है तो उसे फैलाने के लिए होशियारी का सहारा लेना पड़ा है। कन्फ्यूशियस ने एक पुराने, देशभक्तिपूर्ण ऐतिहासिक कैलेंडर को गलत ठहराया। उसने कुछ शब्द बदल दिये। जहाँ कैलेंडर में लिखा था कि, “हूण के शासक ने दार्शनिक वान को मरवा डाला क्योंकि उसने ऐसा और वैसा कहा था,” कन्फ्यूशियस ने मरवा डालने की जगह हत्या शब्द लिख दिया। जहाँ कैलेंडर में लिखा था कि फलाँ अत्याचारी की हत्या हुई वहाँ हत्या की जगह पर उसने मृत्युदण्ड लिख दिया। इस तरह कन्फ्यूशियस ने इतिहास की एक नयी व्याख्या का रास्ता खोल दिया।
हमारे समय में जो कोई भी लोगों या नस्ल के स्थान पर जनसंख्या और मिट्टी के स्थान पर निजी स्वामित्व वाली भूमि कहता है, उस सरल काम से बहुत सारे झूठों से अपना समर्थन वापस ले लेता है। वह इन शब्दों से उनके सड़े–सड़े, रहस्यमय निहितार्थों को जड़ से उखाड़ देता है। जनता/लोक (वोल्क) शब्द का अर्थ है एक निश्चित एकता और विशेष सामान्य हितय इसका उपयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब हम बहुत से लोक समूहों की बात कर रहे हों, क्योंकि केवल तभी समुदाय के हित की कल्पना की जा सकती है। किसी दिये गये क्षेत्र की आबादी के कई अलग–अलग और यहाँ तक कि विरोधी हित भी हो सकते हैं–– और यह एक सच्चाई है जिसे दबाया जा रहा है। इसी तरह, जो कोई भी मिट्टी की बात करता है और जुताई से नाक और आँखों पर पड़ने वाले सजीव प्रभाव का वर्णन करता हैै, मिट्टी की गंध और रंग पर जोर देता है तो वह शासकों के झूठ का समर्थन कर रहा है। क्योंकि मिट्टी की उर्वरता का सवाल नहीं है, न ही मिट्टी के लिए लोगों के प्यार का, न ही उनके उद्यम काय अनाज की कीमत और श्रम की कीमत का सबसे अधिक महत्व है। जो लोग मिट्टी से मुनाफा निकालते हैं, वे वही लोग नहीं हैं जो इससे अनाज निकालते हैं, और सट्टा बाजारों में मिट्टी के ढेलों की गंध नहीं आती। वहाँ तो किसी और चीज की गंध है। इसके विपरित निजी स्वामित्व वाली भूमि सही अभिव्यक्ति हैय यह कम भ्रामक है।
जहाँ उत्पीड़न मौजूद है, वहाँ अनुशासन के बजाय आज्ञाकारिता शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि शासकों के बिना भी अनुशासन सम्भव है इसलिए वह आज्ञाकारिता से अधिक महान गुण है। और सम्मान से बेहतर शब्द मानवीय गरिमा हैय इससे हमारी दृष्टि के दायरे से व्यक्ति इतनी आसानी से गायब नहीं होता। हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए चिल्लाते हुए किस तरह के बदमाश खुद को आगे बढ़ाते हैं। और वे कितनी उदारता से उन भूखों को सम्मान बाँटते हैं जो उन्हें खिलाते हैं। कन्फ्यूशियस की होशियारी आज भी कामयाब हो सकती है। कन्फ्यूशियस ने राष्ट्रीय घटनाओं के अनुचित आँकलनों को उचित आँकलनों से बदल दिया। थॉमस मूर ने अपने यूटोपिया में एक ऐसे देश का वर्णन किया है जिसमें न्यायपूर्ण परिस्थितियाँ प्रबल थीं। यह उस इंग्लैंड से बहुत अलग देश था जिसमें वह रहते थे, लेकिन यह जीवन की स्थितियों को छोड़कर, इंग्लैंड से बहुत करीब से मिलता–जुलता था।
लेनिन रूसी पँूजीपति वर्ग के सखालिन द्वीप के शोषण और उत्पीड़न का वर्णन करना चाहते थे, लेकिन उनके लिए जार की पुलिस से सावधान रहना जरूरी था। उन्होंने रूस के स्थान पर जापान और सखालिन के स्थान पर कोरिया को रखा। जापानी पूँजीपति वर्ग के तरीकों ने अपने सभी पाठकों को सखालिन में रूसी पूँजीपति वर्ग के तरीकों की याद दिला दी, लेकिन उनकी पुस्तिका पर कोई प्र्रतिबन्ध नहीं लगा क्योंकि जापान और रूस आपसी शत्रु थे। बहुत सी बातें जो जर्मनी में जर्मनी के बारे में नहीं कही जा सकतीं, ऑस्ट्रिया के बारे में कही जा सकती हैं।
ऐसी कई होशियारी हो सकती हैं जिसके द्वारा एक शंकालु राज्य को धोखा दिया जा सकता है। वोल्तेयर ने ऑरलियन्स की कन्या के बारे में एक वीरतापूर्ण कविता लिखकर चमत्कारों पर चर्च के विश्वास को चुनौती दी। उन्होंने उन चमत्कारों का वर्णन किया जो निस्संदेह घटित हुआ होगा तभी तो जोन ऑफ आर्क पुरुषों की एक सेना, अभिजात वर्ग के दरबार और भिक्षुओं के समूह के बीच भी कुँवारी बनी रही। अपनी शैली के लालित्य से, और कामुक कारनामों का वर्णन करके जो शासक वर्ग के विलासितापूर्ण जीवन की विशेषता थी, वाल्तेयर ने उस धर्म का पर्दाफाश किया जिसने उनकी लम्पट जीवनशैली को सम्भव बनाया। वाल्तेयर ने अवैध तरीकों द्वारा उन तक अपने कृत्यों को पहुँचाना भी सम्भव बनाया जिनके लिए उनको लिखा था। पाठकों मंे सत्तासीन भी थे जिन्होंने इस लेखन के प्रसार को प्रोत्साहित या सहन किया। ऐसा करके, उन्होंने पुलिस को बेनकाब कर दिया, जो उनकी ओर से उनके सुखों का बचाव करते थे। और महान ल्यूक्रेतियस स्पष्ट रूप से कहता है कि उनके छन्दों की सुन्दरता एपिक्यूरियन नास्तिकता के प्रसार में मदद करेगी।
यह बात सच है कि किसी दिये गये कथन का उच्च साहित्यिक स्तर उसे सुरक्षा प्रदान कर सकता है। अक्सर, हालाँकि, यह सन्देह भी पैदा करता है। ऐसे मामले में इसे जानबूझकर थोड़ा हल्का करना भी जरूरी हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऐसा तब होता है, जब बुरी परिस्थितियों के विवरण को एक जासूसी कहानी के घृणित रूप में अगोचर रूप से तस्करी कर दिया जाता है। इस तरह का विवरण एक जासूसी कहानी को सही ठहराएगा। महान शेक्सपियर ने जानबूझकर अपने काम के स्तर को बहुत कम महत्व के कारणों से कमजोर कर दिया। जिस दृश्य में कोरिओलेनस की माँ अपने बेटे का सामना करती है, जो अपने पैतृक शहर के लिए रवाना हो रहा है, शेक्सपियर जानबूझकर बेटे का अपना भाषण बहुत कमजोर बनाता है। शेक्सपियर चाहते थे कि कोरिओलेनस अपने इरादे छोड़ दे परन्तु अच्छे कारणों से या भावावेश में नहींय बल्कि उसे एक निश्चित सुस्ती के साथ पुरानी आदत के आगे झुकना आवश्यक था।
शेक्सपियर सच के प्रसार में उपयोग की जाने वाली चालाकी का एक मॉडल भी प्रदान करता है: यह सीजर की लाश के सामने एण्टनी का भाषण है। एण्टनी लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि ब्रूटस एक सम्माननीय व्यक्ति हैं, लेकिन वह कारनामें का भी वर्णन करते हैं, और कारनामें का यह विवरण काम को अंजाम देने वाले के विवरण से अधिक प्रभावशाली है। इस प्रकार वक्ता खुद को तथ्यों से परास्त होने की अनुमति देता हैय वह उन तथ्यों को अपने आप से ताकतवर बना देता है।
मिस्र के एक कवि ने भी इसी तरह की पद्धति अपनायी थी, जो चार हजार साल पहले रहते थे। वह महान वर्ग संघर्षों का समय था। जिस वर्ग ने अब तक शासन किया था, वह अपने महान प्रतिद्वन्द्वी, आबादी का वह हिस्सा जो अब तक उसकी सेवा करता था–– उसके खिलाफ कठिनाई से अपना बचाव कर रहा था। कविता में एक बुद्धिमान व्यक्ति शासक के दरबार में प्रकट होता है और आन्तरिक शत्रु के खिलाफ संघर्ष का आह्वान करता है। उन्होंने निम्न वर्गों के विद्रोह से उत्पन्न अवस्थाओं का एक लम्बा और प्रभावशाली विवरण प्रस्तुत किया है। यह विवरण इस प्रकार है––
तो यह है: रईस विलाप करते हैं और सेवक आनन्दित होते हैं।
हर शहर कहता है: आइए हम अपने बीच से ताकतवारों को बाहर निकाल दें। कार्यालयों को तोड़ दिया जाता है और दस्तावेजों को हटा दिया जाता है। गुलाम मालिक बनते जा रहे हैं।
तो यह है: एक सम्मानित आदमी के बेटे को अब पहचाना नहीं जा सकता है। मालकिन का बच्चा उसकी गुलाम लड़की का बेटा बन जाता है।
तो यह है: बर्गर को चक्की के पत्थरों से बाँध दिया गया है। जिन लोगों ने कभी दिन नहीं देखा, वे रोशनी में चले गये हैं।
तो यह है: आबनूस के गरीब बक्से को तोड़ा जा रहा हैय महान सेस्बन की लकड़ी को काटकर बिस्तरों में बदल दिया जाता है।
देखो, महल एक घंटे में ढह गया है।
देखो, देश के गरीब अमीर हो गये हैं।
देखो, जिसके पास रोटी नहीं थी, उसके पास अब एक खलिहान हैय उसका अन्न भंडार दूसरे की सम्पत्ति से भरा हुआ है।
देखो, मनुष्य के लिये अच्छा है जब वह अपना भोजन खाये।
देखो, जिसके पास अनाज नहीं था, उसके पास अब खलिहान हैंय जिन लोगों ने मकई की भीख माँगी थी, वे अब इसे बाँट रहे हैं।
देखो, जिसके पास बैलों का एक जोड़ा भी नहीं था, अब उसके पास भेड़–बकरियाँ हैंय जो हल खींचने के लिए जानवर नहीं रख सकता था, उसके पास अब साफ–सुथरे मवेशियों के झुण्ड हैं।
देखो, जो अपने लिए कोई झोपड़ी नहीं बना सकता था, उसके पास अब मजबूत चारदीवरंे हो गयी हैं।
देखो, मंत्री अन्न भण्डार में शरण लेते हैं, और जिसे फुटपाथ के ऊपर सोने की अनुमति नहीं थी, उसके पास अब एक बिस्तर है।
देखो, जो अपने लिए एक नाव नहीं बना सकता था, उसके पास अब जहाज हैंय जब उनका मालिक जहाजों को देखता है, तो उसे पता चलता है कि वे अब उसके नहीं हैं।
देखो, जिनके पास कपड़े थे, वे अब चिथड़े पहने हुए हैं, और जिसने अपने लिए कुछ भी नहीं बुना है, उसके पास अब सबसे अच्छा मलमल है। अमीर आदमी बिस्तर पर प्यासा हो जाता है, और जो कभी उससे भीख माँगता था, उसके पास अब तेज बियर है।
देखो, वह जो संगीत के बारे में कुछ भी नहीं समझता था, अब उसके पास वीणा हैय वह जिसके लिए कोई नहीं गाता है, अब संगीत की प्रशंसा करता है।
देखो, जो पत्नी की कमी के कारण अकेला सोता था, उसके पास अब स्त्रियाँ हैंय पानी में अपना चेहरा देखने वालों के पास अब दर्पण हैं।
देखो, अमीर लोग रोजगार के बिना इधर–उधर भागते हैं। अब महान लोगों को कोई सन्देश नहीं जाता है। वह जो कभी एक दूत था, अब दूसरों को अपने संदेश ले जाने के लिए भेजता है––
पाँच पुरुषों को देखो, जिन्हें उनके स्वामी ने भेजा था। कहते हैं: अपने आप बाहर जाओय हम आ गये हैं।
यह महत्वपूर्ण है कि यह एक प्रकार की अव्यवस्था का वर्णन है जो उत्पीड़ितों को बहुत वांछनीय लगना चाहिए। और फिर भी कवि का इरादा पारदर्शी नहीं है। वह स्पष्ट रूप से इन स्थितियों की निन्दा करता है, हालाँकि वह उनकी खराब निन्दा करता है––
जोनाथन स्विफ्ट ने अपने प्रसिद्ध पैम्फलेट में सुझाव दिया कि गरीबों के बच्चों की हत्या करके और उन्हें मांस के रूप में बेचकर भूमि को समृद्धि में बहाल किया जा सकता है। उन्होंने सटीक गणना प्रस्तुत की, जिसमें दिखाया गया था कि यदि शासक वर्ग किसी हद तक जाने को तैयार है तो कौन सी अर्थव्यवस्थायें हासिल हो सकती है।
स्विफ्ट ने मासूमियत का नाटक किया। उन्होंने सोचने के एक ऐसे तरीके का बचाव किया, जिससे वह बहुत अधिक उत्साह और सम्पूर्णता के साथ नफरत करते थे, अपने विषय के रूप में एक ऐसे प्रश्न को लेते थे जो स्पष्ट रूप से सभी के सोचने के तरीके की क्रूरता को उजागर करता था। कोई भी स्विफ्ट से अधिक चतुर हो सकता है, या किसी भी दर पर अधिक मानवीय हो सकता है–– विशेष रूप से वे जो अब तक इस बात पर विचार करने के लिए परेशान नहीं थे कि उनके द्वारा रखे गये विचारों के तार्किक निष्कर्ष क्या थे।
प्रचार जो सोच को उत्तेजित करता है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो, उत्पीड़ितों के लिए उपयोगी है। इस तरह के प्रचार की बहुत आवश्यकता है। शोषण को बढ़ावा देने वाली सरकारों के तहत, विचार को निकृष्ट माना जाता है।
जो कुछ भी उत्पीड़ित लोगों की सेवा करता है उसे निकृष्ट माना जाता है। पेट भरने की लगातार चिन्ता को निकृष्ट माना जाता हैय यह उस देश के रक्षकों को दिये गये सम्मान को अस्वीकार करना निकृष्ट है जिसमें वे रक्षक भूखे रहते हैंय नेता पर सन्देह करना निकृष्ट है जब उसका नेतृत्व दुर्भाग्य की ओर ले जाता हैय ऐसा काम करने के लिए अनिच्छुक होना निकृष्ट है जो काम करने वाले को खिलाता नहीं हैय मूर्खतापूर्ण काम करने की मजबूरी के खिलाफ विद्रोह करना निकृष्ट हैय एक ऐसे परिवार के प्रति उदासीन होना निकृष्ट है जिसके लिए अब किसी भी तरह से चिन्ता करके भी मदद नहीं की जा सकती है। भूखे लोगों को प्रचण्ड भेड़ियों के रूप में बदनाम किया जाता है जिनके पास बचाव करने के लिए कुछ भी नहीं हैय जो लोग अपने उत्पीड़कों पर सन्देह करते हैं, उन पर अपनी ताकत पर सन्देह करने का आरोप लगाया जाता हैय जो लोग अपने श्रम के लिए भुगतान की माँग करते हैं, उन्हें आलसी के रूप में निन्दा की जाती है। ऐसी सरकारों के तहत सामान्य रूप से सोच को निकृष्ट समझा जाता है और उसे बदनाम किया जाता है। सोचना अब कहीं भी नहीं सिखाया जाता है, और जहाँ भी यह उभरता है, उसे सताया जाता है।
फिर भी, कुछ क्षेत्र हमेशा मौजूद होते हैं जिनमें सजा के डर के बिना विचार की जीत पर ध्यान देना सम्भव होता है। ये वे क्षेत्र हैं जिनमें तानाशाहों को सोचने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, सैन्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विचार की जीत का उल्लेख करना सम्भव है। यहाँ तक कि अधिक कुशल संगठन द्वारा और ऊन के विकल्प के अविष्कार से ऊन की आपूर्ति को बढ़ाने जैसे मामलों में भी सोच की जरूरत होती है। खाद्य पदार्थों में मिलावट, युवाओं को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करना–– ऐसी सभी चीजों पर विचार करने की आवश्यकता होती हैय और ऐसे मामलों के सन्दर्भ में विचार की प्रक्रिया का वर्णन किया जा सकता है। युद्ध की प्रशंसा, इस तरह की सोच के स्वचालित लक्ष्य से होशियारी से बचा जा सकता है, और इस तरह से इस सवाल से उत्पन्न होने वाला विचार कि युद्ध को सबसे अच्छे तरीके से कैसे छेड़ा जा सकता है, एक और सवाल को जन्म दिया जा सकता है–– क्या युद्ध का कोई मतलब है। विचार को तब आगे के प्रश्न पर लागू किया जा सकता है: एक मूर्खतापूर्ण युद्ध को कैसे टाला जा सकता है?
स्वाभाविक रूप से, यह प्रश्न शायद ही कभी खुले तौर पर पूछा जा सकता है। ऐसी स्थिति में, क्या हमने जिस सोच को उत्तेजित किया है, उसका उपयोग नहीं किया जा सकता है? यही है, क्या इसे तैयार किया जा सकता है ताकि यह कार्रवाई की ओर ले जाये? यह किया जा सकता है।
ताकि आबादी के एक (बड़े) हिस्से का दूसरे (छोटे) हिस्से द्वारा उत्पीड़न हमारे जैसे समय में जारी रहे, आबादी का एक निश्चित रवैया आवश्यक है, और यह रवैया सभी क्षेत्रों में व्याप्त होना चाहिए। अंग्रेज डार्विन की तरह प्राणीशास्त्र के क्षेत्र में एक खोज, अचानक शोषण को खतरे में डाल सकती है। और फिर भी, कुछ समय के लिए अकेले चर्च चिन्तित थाय लोगों को कुछ भी गलत नहीं लगा। हाल के वर्षों में भौतिकविदों के शोध ने तर्क के क्षेत्र में परिणाम दिये हैं जो उत्पीड़न को जारी रखने वाले कई सिद्धान्तों को खतरे में डाल सकते हैं। तर्क के क्षेत्र में जटिल जाँच–पड़ताल करने वाले प्रशिया राज्य के दार्शनिक हेगेल ने सर्वहारा क्रान्ति के क्लासिक प्रतिपादक मार्क्स और लेनिन को अमूल्य विचार पद्धतियोंं का सुझाव दिया है। विज्ञान का विकास परस्पर जुड़ा हुआ है, लेकिन समकालिक नहीं है, और राज्य कभी भी हर चीज पर अपनी नजर रखने में सक्षम नहीं है। सच का अग्रिम रक्षक अपने लिए रणभूमि का चुनाव कर सकता है जो अपेक्षाकृत अप्रत्यक्ष हैं। सोच के सही तरीके सीखने पर सबकुछ निर्भर करता है, वह सोच जो सभी चीजों और सभी प्रक्रियाओं पर प्रश्नवाचक चिन्ह खड़े करती है और उनकी क्षणभंगुर और परिवर्तनशील प्रकृति की जाँच करने की इच्छा रखती है।
शासकों को महत्वपूर्ण परिवर्तनों के प्रति बहुत घृणा होती है। वे चाहते हैं कि सब कुछ एक जैसा ही बना रहे–– यदि सम्भव हो तो एक हजार वर्षों तक। अगर सूरज और चन्द्रमा स्थिर हो जाये तो उन्हें अच्छा लगेगा। तब कोई भी भूखा नहीं होगा, कोई भी उसका रात का भोजन खाना नहीं चाहेगा। जब शासक गोली चलायें, तो वे नहीं चाहते कि दुश्मन गोली चलाने में सक्षम होय उनका निशाना ही आखिरी होना चाहिए। सोचने का एक तरीका जो परिवर्तन पर जोर देता हो, उत्पीड़ितों को प्रोत्साहित करने का एक अच्छा तरीका है।
एक और दूसरी तरह का विचार, जिसके साथ विजेताओं का सामना किया जा सकता है, वह यह है कि हर चीज और हर स्थिति में, एक अन्तर्विरोध प्रकट होता है और वह लगातार विकसित होता है। इस तरह का दृष्टिकोण (द्वन्द्वात्मकता का यह सिद्धान्त कि सभी चीजें गतिमान होती हैं और बदलती रहती हैं) उन क्षेत्रों में भी विकसित किया जा सकता है जो कुछ समय के लिए शासकों की निगाह से बच जाते हैं। उदाहरण के लिए, इसका उपयोग जीव विज्ञान या रसायन विज्ञान में भी किया जा सकता है। लेकिन इसे किसी परिवार के भाग्य का वर्णन करके भी दिखाया जा सकता है, और यहाँ भी यह ज्यादा ध्यान आकर्षित नहीं करता है। हर चीज का अनेक कारकों पर निर्भर होना, जो लगातार बदलते रहते हैं–– यह विचार तानाशाहों के लिए खतरनाक है, और पुलिस को बिना कोई ठोस सबूत दिये जिस पर वे अपनी उँगली रख सकें, यह विचार कई तरह के रूप धारण कर सकता है। तम्बाकू की दुकान खोलने वाले एक व्यक्ति द्वारा सामना की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं और परिस्थितियों का पूरा विवरण तानाशाही के विरुद्ध प्रहार कर सकता है। जो कोई भी इस पर विचार करेगा उसे शीघ्र ही इसका कारण पता चल जाएगा। वे सरकारें जो जनता को दुख और गरीबी में धकेलती हैं, उन्हें इस बात से बचाव करना पड़ता है कि जनता अपने दुख के वक्त सरकार के बारे में सोचना शुरू न कर दे। ऐसी सरकारें भाग्य के बारे में बहुत बातें करती हैं। सारी पीड़ाओं के लिए वे जिम्मेदार नहीं है, बल्कि सारा दोष भाग्य का है। जो भी व्यक्ति संकट के कारण की जाँच–पड़ताल करता है, उसे इस तथ्य तक पहुँचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया जाता है कि असल में इसके लिए सरकार ही जिम्मेदार है। लेकिन भाग्य से जुड़ी इस सारी बकवास का सामान्य विरोध करना सम्भव हैय यह दिखाया जा सकता है कि मनुष्य का भाग्य मनुष्य द्वारा ही बनाया जाता है।
यह एक और चीज है जो अलग–अलग तरीकों से की जा सकती है। उदाहरण के लिए, कोई किसान के खेत की कहानी बता सकता है–– मान लीजिए आइसलैंड में एक खेत है। पूरा गाँव उस अभिशाप की चर्चा कर रहा है जो इस खेत पर मँडराता रहता है। एक किसान महिला ने कुएँ में छंलाग लगा दीय और खेत के मालिक किसान ने फाँसी लगा ली। एक दिन किसान के बेटे की शादी एक ऐसी लड़की से होती है जिसके दहेज में कई एकड़ बढ़िया जमीन होती है। खेत से मानो अभिशाप हटता हुआ दिखाई दे रहा है। गाँव में इस भाग्यशाली घटनाक्रम के कारण को लेकर मतभेद है। कुछ लोग इसका श्रेय किसान के नौजवान बेटे के जिन्दादिल स्वभाव को देते हैं, तो कुछ लोग उन नये खेतों को, जिन्हें नौजवान पत्नी अपने साथ लेकर आयी है और जिनके कारण अब यह खेत इतना बड़ा हो गया है कि इससे जीविका चल सकती है।
लेकिन एक कविता में भी, जो केवल किसी परिदृश्य का वर्णन करती है, कुछ हासिल किया जा सकता है–– यदि मनुष्य द्वारा निर्मित चीजों को उस परिदृश्य में शामिल किया जाये। सच फैलाने के लिए होशियारी जरूरी है।
सारांश
हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हमारा महाद्वीप बर्बरता की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व हिंसा के माध्यम से कायम रखा जा रहा है। केवल इस सच को पहचान लेना ही काफी नहीं है, किन्तु यदि इसे न पहचाना जाये, तो किसी दूसरे महत्वपूर्ण सच की खोज नहीं की जा सकती। हम जिस हालत में गिरते जा रहे हैं वह बर्बर है (जो कि सच है), यह दिखाने के लिए साहसिक बातें लिख देने से क्या फायदा, यदि यह स्पष्ट न हो कि हम इस हालत में क्यों गिरते जा रहे हैं? हमें यह कहना चाहिए कि यातना का इस्तेमाल सम्पत्ति–सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए किया जाता है। निस्संदेह, जब हम यह कहते हैं तो हम अपने कई दोस्त खो देते हैं–– वे दोस्त जो केवल इसलिए यातना के खिलाफ हैं क्योंकि उनका मानना है कि सम्पत्ति–सम्बन्धों को बिना यातना के भी बनाये रखा जा सकता है, जो कि झूठ है।
हमें अपने देश की बर्बर परिस्थितियों के बारे में सच कहना चाहिए ताकि वह काम किया जा सके जो इन परिस्थितियों का खात्मा करेगा–– यानी वह काम जो सम्पत्ति–सम्बन्धों को बदल देगा।
इसके अलावा, हमें यह सच उन लोगों को बताना चाहिए जो मौजूदा सम्पत्ति–सम्बन्धों में सबसे अधिक पीड़ित हैं और जिनका इन्हें बदलने में सबसे बड़ा हित है–– यानी मजदूरों को, और उन्हें भी जिन्हें हम उनका सहयोगी बना सकते हैं, क्योंकि उत्पादन के साधनों पर उनका भी वास्तविक नियंत्रण नहीं है, चाहे वे मुनाफे में हिस्सा ही क्यों न पाते हों।
और हमें होशियारी के साथ आगे बढ़ना होगा।
इन पाँचों कठिनाइयों पर एक ही समय में जीत हासिल करनी होगी, क्योंकि हम उन लोगों के बारे में सोचे बिना, जो इन बर्बर परिस्थितियों से पीड़ित हैं, उनके बारे में सच की खोज नहीं कर सकतेय कायरता के हर निशान को मिटाये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकतेय और जब हम उन लोगों के सम्बन्ध में वास्तविक स्थिति को पहचानने का प्रयास करते हैं जो हमारे दिये हुए ज्ञान का इस्तेमाल करने के लिए तैयार हैं, तो हमें इस जरूरत पर भी विचार करना होगा कि उन्हें सच ऐसे ढंग से दिया जाये कि वह उनके हाथ में एक हथियार बन सके। और साथ ही हमें यह सब इतनी होशियारी से करना होगा कि दुश्मन को इसका पता न चले और वह सच की हमारी पेशकश में बाधा न डाले।
जब किसी लेखक को सच लिखने के लिए कहा जाता है, तो उससे यही अपेक्षा की जाती है।
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- ‘जल नस्लभेद’ : इजराइल कैसे गाजा पट्टी में पानी को हथियार बनाता है 17 Nov, 2023
श्रद्धांजलि
राजनीति
- 106 वर्ष प्राचीन पटना संग्रहालय के प्रति बिहार सरकार का शत्रुवत व्यवहार –– पुष्पराज 19 Jun, 2023
- इलेक्टोरल बॉण्ड घोटाले पर जानेमाने अर्थशास्त्री डॉक्टर प्रभाकर का सनसनीखेज खुलासा 6 May, 2024
- कर्नाटक सरकार देवनहल्ली के किसानों के साथ विश्वासघात कर रही है 4 Jul, 2025
- कोरोना वायरस, सर्विलांस राज और राष्ट्रवादी अलगाव के खतरे 10 Jun, 2020
- जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का तर्कहीन मसौदा 21 Nov, 2021
- डिजिटल कण्टेण्ट निर्माताओं के लिए लाइसेंस राज 13 Sep, 2024
- नया वन कानून: वन संसाधनों की लूट और हिमालय में आपदाओं को न्यौता 17 Nov, 2023
- नये श्रम कानून मजदूरों को ज्यादा अनिश्चित भविष्य में धकेल देंगे 14 Jan, 2021
- बेरोजगार भारत का युग 20 Aug, 2022
- बॉर्डर्स पर किसान और जवान 16 Nov, 2021
- मोदी के शासनकाल में बढ़ती इजारेदारी 14 Jan, 2021
- सत्ता के नशे में चूर भाजपाई कारकूनों ने लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से रौंदा 23 Nov, 2021
- हरियाणा किसान आन्दोलन की समीक्षा 20 Jun, 2021
जीवन और कर्म
- दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा 1 Jan, 2025
- रामवृक्ष बेनीपुरी का बाल साहित्य : मनुष्य की अपराजेय शक्ति में आस्था 14 Jan, 2021
राजनीतिक अर्थशास्त्र
व्यंग्य
- अगला आधार पाठ्यपुस्तक पुनर्लेखन –– जी सम्पत 19 Jun, 2023
- आजादी को आपने कहीं देखा है!!! 20 Aug, 2022
- इन दिनों कट्टर हो रहा हूँ मैं––– 20 Aug, 2022
- नुसरत जहाँ : फिर तेरी कहानी याद आयी 15 Jul, 2019
- बडे़ कारनामे हैं बाबाओं के 13 Sep, 2024
विचार-विमर्श
- अतीत और वर्तमान में महामारियों ने बड़े निगमों के उदय को कैसे बढ़ावा दिया है? 23 Sep, 2020
- अस्तित्व बनाम अस्मिता 14 Mar, 2019
- क्या है जो सभी मेहनतकशों में एक समान है? 23 Sep, 2020
- क्रान्तिकारी विरासत और हमारा समय 13 Sep, 2024
- दिल्ली सरकार की ‘स्कूल्स ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सलेंस’ की योजना : एक रिपोर्ट! 16 Nov, 2021
- धर्म की आड़ 17 Nov, 2023
- पलायन मजा या सजा 20 Aug, 2022
- राजनीति में आँधियाँ और लोकतंत्र 14 Jun, 2019
- लीबिया की सच्चाई छिपाता मीडिया 17 Nov, 2023
- लोकतंत्र के पुरोधाओं ने लोकतंत्र के बारे में क्या कहा था? 23 Sep, 2020
- विकास की निरन्तरता में–– गुरबख्श सिंह मोंगा 19 Jun, 2023
- विश्व चैम्पियनशिप में पदक विजेता महिला पहलवान विनेश फोगाट से बातचीत 19 Jun, 2023
- सरकार और न्यायपालिका : सम्बन्धों की प्रकृति क्या है और इसे कैसे विकसित होना चाहिए 15 Aug, 2018
मीडिया
- मीडिया का असली चेहरा 15 Mar, 2019
फिल्म समीक्षा
- समाज की परतें उघाड़ने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ 15 Jul, 2019