सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 8–2 प्रतिशत रहने पर भाजपा सरकार और उसके समर्थकों का जश्न जारी था, तभी अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का फैसला धीरे–धीरे आया, लेकिन उसका असर एकदम धमाके जैसा था। भारत के आर्थिक आँकड़ों को ‘श्रेणी–सी’ में धकेल दिया गया। यह उन देशों की श्रेणी है जिनके डेटा पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। विकास का जश्न मनाया जाना चाहिए, लेकिन कमजोर आँकड़ों के सहारे टिका विकास अन्तत: अपने ही बोझ के नीचे दब जाता है। अपनी आदत से मजबूर, कई भाजपा समर्थकों ने तुरन्त ‘कांग्रेस की 60 साल की गड़बड़ी’ को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया। उनकी कल्पना की दुनिया में आज भी नेहरू ही राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण चला रहे हैं और मोदी बेचारे सिर्फ एक दर्शक हैं, जो सब कुछ मासूमियत के साथ खड़े होकर देख रहे हैं।

मैं उनके लिए इतिहास की व्याख्या कर सकता था, लेकिन उसका उन पर कोई असर नहीं होगा। वे सुबह की चाय के साथ ही ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाकर भाजपा के आईटी सेल से आँकड़े उठा लेते हैं। दरअसल, शुरुआती वर्षों में भारत की सांख्यिकी प्रणाली न केवल सक्षम थी, बल्कि अपने आप में क्रान्तिकारी थी। मगर इस असहज सच्चाई को वे कभी जान ही नहीं पाएँगे, क्योंकि पढ़ना तो उनके संस्कारों में था ही नहीं।

स्वतंत्रता के तुरन्त बाद, जब अधिकांश नवस्वतंत्र देश बुनियादी प्रशासनिक व्यवस्था बनाने पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे, तब भारत ने प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस की दूरदर्शी परिकल्पना के तहत एक परिष्कृत सांख्यिकी तंत्र का निर्माण किया। यह तंत्र वैज्ञानिक बुनियाद पर आधारित था और इसमें बड़े पैमाने पर नमूना सर्वेक्षण शामिल थे। यह ऐसा ढाँचा था जिसे उपनिवेशवाद से स्वतंत्र हुई दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा था। महालनोबिस की सोच ने भारत को एक अनोखी और अत्याधुनिक सांख्यिकी प्रणाली की दिशा में आगे बढ़ाया, जो उस समय के लिए बेहद उन्नत और क्रान्तिकारी थी। इस प्रणाली ने भारत को दूसरे नवस्वतंत्र देशों से अलग बनाया और आगे भी बढ़ाया।

भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931) बौद्धिक ऊर्जा का केन्द्र बन गया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (1950) ने ऐसे पैमाने पर आँकड़े जुटाने शुरू किये, जिसने अमीर देशों को भी हैरान कर दिया। गाँव के सर्वेक्षणों से लेकर फसल कटाई के मेधावी प्रयोगों तक, उपभोग के सूक्ष्म अध्ययनों से लेकर रोजगार के विस्तृत मानचित्रण तक–– विकासशील दुनिया में कहीं भी इसके बराबर स्तर का कोई प्रयास दिखाई नहीं देता था। और दुनिया ने इस पर गौर किया।

अफ्रीका, एशिया और लातिन अमरीका तक के प्रतिनिधिमंडल हमारे तौर–तरीकों का अध्ययन करने आये। संयुक्त राष्ट्र भारत के सर्वेक्षणों के तौर–तरीकों को कई मंचों पर मॉडल की तरह प्रदर्शित करता था। अन्तरराष्ट्रीय विद्वानों ने भारत के नवाचारों पर खूब बहस–मुबाहिसे किये। महालनोबिस के सांख्यिकी विचारों को यूके, यूएस और यूएसएसआर में पाठ्यक्रम चर्चाओं में शामिल किया गया। भारत पिछड़ने वाला देश नहीं था—यह एक मॉडल था।

इसी आत्मविश्वास ने तकनीकी प्रगति को भी जन्म दिया। नेहरू के समर्थन और होमी भाभा की मदद से महालनोबिस ने शुरुआती कम्प्यूटरीकरण पर जोर दिया। शीतयुद्ध के चलते एक गुट–निरपेक्ष देश को उन्नत मशीनें बेचना पश्चिम को संदिग्ध लगता था। फिर भी भारत ने 1955 में एचईसी–2एम कम्प्यूटर हासिल कर लिया, जो एशिया के शुरुआती कम्प्यूटरों में से एक था और जिसका इस्तेमाल सांख्यिकी प्रसंस्करण में किया गया। इसने भारत को विकासशील दुनिया से दशकों आगे ले गया।

महालनोबिस का कद जितना बड़ा था, नेहरू का समर्थन उतना ही ठोस था। नेहरू ने धन, स्वायत्तता और राजनीतिक सुरक्षा—सब कुछ दिया। जैसा कि निखिल मेनन ने लिखा है, महालनोबिस केवल संख्याएँ इकट्ठा नहीं कर रहे थेय वे ‘एक नये राष्ट्र के लिए स्वयं को जानने का रास्ता तैयार कर रहे थे’। उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा अत्यन्त शानदार थी–– वे संयुक्त राष्ट्र की समितियों में शामिल थेय यूनेस्को और एफएओ उनसे सलाह लेते थेय जॉन रॉबिन्सन, जॉन टिनबर्गेन और सोवियत योजनाकार उनके विचारों के साथ काम कर रहे थे। मेनन उनका वर्णन ऐसे व्यक्ति के रूप में करते हैं जो ‘सांख्यिकी की कल्पना संख्याओं के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दर्पण के रूप में करते थे’। होमी भाभा के बाद वे भारत के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे।

इसीलिए आज का पतन इतना दुखद लगता है, क्योंकि यह वास्तविक ऊँचाई से गहरे गड्ढे में गिरना है। पिछले दशक में हमने देखा है कि 2017–18 का उपभोग सर्वेक्षण सार्वजनिक ही नहीं होने दिया गया, क्योंकि उसके नतीजे उपभोग में गिरावट दिखाते थे।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) की बेरोजगारी रिपोर्ट, जिसमें 45 वर्षों की सबसे ऊँची बेरोजगारी दर्ज थी, उसे 2019 के चुनाव खत्म होने तक दबाकर रखा गया।

• राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के दो सदस्यों ने विरोध में इस्तीफा दे दिया।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के ऐसे ‘संशोधन’ किये गये जिन्हें देखकर मानो जादू ही हो गया—एनडीए के दौर में आँकड़े अचानक ऊपर चढ़ जाते हैं और यूपीए के दौर में नीचे खिसक जाते हैं।

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम कहते हैं कि जीडीपी को 2–5 प्रतिशत अंक तक बढ़ा–चढ़ाकर बताया जा सकता है।

व्यापार, औद्योगिक उत्पादन और कर संग्रह के आँकड़े पहले अचानक उछाल दिखाते हैं और फिर बिना किसी स्पष्ट कारण के धीरे–धीरे नीचे लौट आते हैं।

सांख्यिकी प्रणाली अब इतनी कमजोर हो चुकी है कि रिक्तियों, राजनीतिक हस्तक्षेप और ‘संरेखण’ जैसे दबावों ने इसे भीतर ही भीतर खोखला कर दिया है।

महालनोबिस द्वारा बनाया गया वह घर, जिसकी कभी वैश्विक स्तर पर सराहना होती थी, अब प्रचार के अड्डे में बदल दिया गया है। जो कभी वैज्ञानिक दर्पण था, वह आज राजनीतिक सेल्फी–कैमरा बन चुका है। और यही कारण है कि अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ‘श्रेणी–सी’ चोट करती है। इसलिए नहीं कि दुनिया हमें नीचा दिखाना चाहती थी–– दुनिया भूलती नहीं। उसे आज भी याद है कि हमने कभी कैसी शानदार व्यवस्था खड़ी की थी, और वह उतनी ही स्पष्टता से देख रही है कि हमने उसे कैसे खो दिया।

(जी एस सेडा की फेसबुक वाल से साभार)