लम्बी–लम्बी फेंकने वालों को अक्सर ही रुसवा होना पड़ता है। हालाँकि उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ता, आदत पड़ जाती है। 2014 में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश में 100 स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की थी, इसके खूब ढोल भी पीटे गये थे। 5 साल के भीतर ही 100 स्मार्ट सिटी बनने थे, उन्हें अमरीकी शहरों की तरह चमकना था, जैसे हालीवुड की फिल्मों में दिखाये जाते हैं। इसे मोदी का आधुनिक भारत का सपना बताया गया लेकिन अफसोस! मोदी को अपने हाथों अपने सपने को दफन करना पड़ गया। एक भी स्मार्ट शहर बनाये बिना ही मोदी सरकार ने स्मार्ट सिटी योजना बन्द कर दी है।

स्मार्ट सिटी बनाने के लिए डेढ़ लाख करोड़ रुपये का बजट दिया गया था। मध्यम वर्ग स्मार्ट सिटी के सपने देखकर गदगद था। मोदी जी उसके हीरो बन गये थे। स्मार्ट सिटी को रोजगार के भावी केन्द्र कहा गया था। तब के वित्तमन्त्री स्वर्गीय अरुण जेटली ने कहा था कि स्मार्ट सिटी विदेशी निवेशकों को आकर्षित करेंगे और हमारे लिए अतिरिक्त मुनाफा बटोरने का अवसर होगा। एक ‘राज की बात’ का खूब प्रचार किया गया कि 14 देशों के पूँजीपति, वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेण्ट बैंक जैसी बड़ी–बड़ी वित्तिय संस्थाएँ और खुद सरकार में बैठे मन्त्री इस योजना पर लार टपका रहें हैं।”

इस योजना की घोषणा के बाद राज्य सरकारों में अपने शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की होड़ मच गयी। निवेशक, जनता और विपक्षी पार्टियाँ–– सब स्मार्ट सिटी के नाम पूछ रहे थे, इसके बावजूद शहरों की लिस्ट तैयार करने में ही दो साल लग गये। मजबूरन 100 स्मार्ट सिटी बनाने की अवधि को आगे, मार्च 2025 तक बढ़ाना पड़ा।

अब तक इस योजना में कुल डेढ़ लाख करोड़ रुपया फूँका जा चुका है। लेकिन विदेशी शहरों की तरह चमचमाते और आधुनिक तकनीक से लैस स्मार्ट सिटी कहीं दिखाई नहीं देते। हालाँकि, सरकार का दावा है कि 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है।

आजकल सरकारों के कई मुँह होते है, सरकारी आँकडे ही बता रहे हैं कि अधिकतर शहरों में स्मार्ट सिटी का आधा काम भी नहीं हुआ है–– फरीदाबाद में 10 फीसदी, शिलोंग में 10 फीसदी, सिलवासा में 28 फीसदी, ईटानगर में 31 फीसदी, सहारनपुर में 35 फीसदी काम ही पूरा हुआ है। इन शहरों में साफ पानी, कचरा निस्तारण, स्कूल, अस्पताल, परिवहन जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव अभी भी जस का तस बना हुआ है। स्मार्ट बनाने के नाम पर केवल कुछ दीवारें रंगने और कुछ चैराहों पर एलईडी स्क्रीन लगाने का काम हुआ है। वह भी सिर्फ उन जगहों पर जहाँ ज्यादा लोगों को दिखे। क्या यही था स्मार्ट सिटी बनाने का उद्देश्य, खोदा पहाड़ निकली चुहिया और वह भी मरी हुई। लेकिन डेढ़ लाख करोड़ रुपये कहाँ गये?

स्मार्ट सिटी योजना के तहत 12 औद्योगिक क्षेत्र भी बनाये जाने थे। इन्हें जोड़ने के लिए औद्योगिक गलियारे बनने थे। इसका भारी–भरकम उद्देश्य देश के बुनियादी ढाँचे और विनिर्माण के साथ पारिस्थितिकी तन्त्र को बढ़ावा देना बताया गया था। इसके लिए भी लगभग 3 हजार करोड़ रुपये का बजट दिया गया था, लेकिन यह भी कहीं हवा में गुम हो गया।

सभी जानते है कि इस योजना पर लाखों करोड़ रुपया फूँकने के बावजूद देश में बेरोजगार नौजवानों की संख्या और विदेशी मालों का आयात लगातार बढ़ता गया है। विदेशी निवेशकों की तो कहीं परछाई भी नजर नहीं आती। सवाल उठता है कि इतनी बड़ी रकम जो जनता पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ बढ़ाकर वसूली गयी थी, वह कहाँ गयी। कहीं वह शहर–शहर में भाजपा के स्मार्ट दफ्तर बनाने या हिन्दुवादी संगठनों के लम्पटों को स्मार्ट बनाने पर तो खर्च नहीं कर दी गयी। जो भी हो, आज स्मार्ट सिटी योजना भी टाँय–टाँय फिस्स होकर मोदी जी के जुमलों की लिस्ट में शामिल हो गयी है। जुमलों की लिस्ट काफी लम्बी हो चुकी है लेकिन लगता नहीं कि मोदी जी जुमलेबाजी से बाज आएँगे।

–– कुलदीप