भगवान की आड़ में मनुवादियों का काला धंधा सदियों से चल रहा है। हजारों देवदासियों की चीखें आज भी न्याय की गुहार लगा रही हैं। कोई है उनकी पुकार सुनने वाला ?

“मुझे निर्वस्त्र करके 100 किलो का पुजारी, इस 11 साल की देवदासी बच्ची के ऊपर चढ़ गया था, मैं साँस तक नहीं ले पा रही थी– – –!” (कहानी की नायिका का बयान)

जिसे आप सब देवदासी के नाम से पुकारते हैं, जिसका अर्थ है “देवता की दासी” यानी–– ईश्वर की सेवा करने वाली पत्नी होता है! पर यह सच से कोसों दूर है। कुछ ऐसे, जैसे–– दिन में तपते सूरज के नीचे बिना किसी आश्रय के बैठ कर आँखों को भींच कर उसका यह मानना कि “मैं चाँदनी की शीतलता महसूस कर रही हूँ, छलावा है।”

अब उसकी ही ज़ुबानी––

झूठ को जीते हुए मुझे 30 साल से अधिक हो गये हैं। पर मेरे जीवन की वह आखिरी बदसूरत शाम मैं आज भी नहीं भूली हूँ।

“आई!!! कोई आया है, बाबा से मिलने।”

“अरे देवा!!!”

माँ आने वाले के चरणों में लेट गयी थी, फिर बोली थी–– “आपने क्यूँ कष्ट किया संदेसा भिजवा देते, हम तुरन्त हाजिर हो जाते।”

तब तक बाबा भी आ गये थे। बाबा भी वही कह और कर रहे थे, जो माँ ने किया था।

आने वाले ने एक नजर मुझे देखा और बोले–– “बहुत भाग्यशाली हो। बड़े महन्त ने तुम्हारी दूसरी बेटी को भी ईश्वर की पत्नी बनाने का सौभाग्य तुम्हें दिया है!”

यह सुन कर मैं भी प्रसन्न हो गयी। इसका मतलब दीदी से मिलूँगी! माँ और बाबा ने सारी तैयारी रात को ही कर ली जाने की।

अगली दोपहर हम मन्दिर के बड़े से प्रांगण में थे। भव्य मन्दिर और ऊपरी हिस्सा सोने से मढ़ा था।

माँ–बाबा मुझे झूठ बोलकर चुपके से छोड़कर गये थे।

गर्भ गृह से एक विशालकाय शरीर और तोंद वाला निकलाय तो सभी लोग सिर झुकाकर घुटने के बल थे। मुझे भी वैसा करने को कहा गया।

रात एक बूढ़ी के साथ रही मैं। अगली सुबह मुझे नहला कर दुल्हन जैसे कपड़े मिले पहनने को, जिसे उसी बूढ़ी अम्मा ने पहनाया जो रात मेरे पास थी। अब मुझे अच्छा लग रहा था। सब मुझे ही देख रहे थे। मेरी खूबसूरती की बलाएँ ले रहे थे।

मेरा विवाह कर दिया गया भगवान की मूर्ति के साथ, जिसे दुनिया पूजती है। अब मैं उसकी पत्नी!! सोच कर प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती थी पूरे शरीर में।

मुझे रात दस बजे एक साफ सुथरे कमरे में। जहाँ पलंग पर सुगन्धित फूल अपनी खुशबू बिखेर रहे थे। बन्द कर दिया गया।

“आज ईश्वर खुद तेरा वरण करेंगे, ध्यान रखना!!! ईश्वर नाराज न होने पाएँ!!!”

वही बूढ़ी अम्मा ने मेरे कमरे में झाँकते हुए कहा– – –पर अन्दर नहीं आयी।

एक डेढ़ घण्टे बाद दरवाजा बन्द होने की आहट से मेरे नींद खुली। मैं तुरन्त उठ कर बैठ गयी। सामने वही बड़े शरीर वाला था। लाल आँखें और सिर्फ एक धोती पहने और भी डरा रहा था मुझे।

“ये क्यूँ आया है ?” मन ने सवाल किया!

“मुझे तो भगवान के साथ सोने के लिए कहा गया था।”

सवाल बहुत थे पर जवाब एक भी नहीं था। वह सीधा मेरे पास आ कर बैठ गया और मैं खुद में सिकुड़ गयी।

मेरे चेहरे को उठा कर बोला––

“मैं प्रधान महन्त हूँ इस मन्दिर का। ऊपर आसमान का भगवान ये है। (कोने में रखी विष्णु की मूर्ति की तरफ इशारा करता हुआ बोला) और इस दुनिया का मैं।”

अब वह मुझे पलंग से खड़ी कर दिया और मेरी साड़ी खोल दी। मेरी नन्हीं मुट्ठियों में इतनी पकड़ नहीं थी कि मैं उसे मेरे कपड़े उतारने, नहीं–– नोंचने से रोक पाती। एक ही मिनट में मैं पूरी तरह नग्न थी और खुद को महन्त कहने वाला भी।

उसनें खींच कर मुझे पलंग पर पटक दिया मेरे हाथों को उसके हाथ ने दबा रखा था। उसके भारी शरीर के नीचे मैं दब गयी थी।

मेरे मुँह के बहुत पास आ कर बोला–– “आज मैं तेरा और ईश्वर का मिलन कराऊँगा। ईश्वर के साथ आज तेरी सुहागरात है। ये मिलन मेरे जरिये होगा। इसलिए चुपचाप मिलन होने देना। व्यवधान मत डालना।”

मैंने बिना समझे सिर हिला दिया। महन्त मुस्कुराया और फिर मेरी भयंकर चीख निकली। मैं दर्द से झटपटा रही थी। साँस नहीं लौटी बहुत देर तक। दुबारा चीख निकली तो महन्त ने मेरा मुँह दबा दिया।

बाहर ढोल मंजीरों की आवाजें आने लगीं। मैं एक हाथ जो छोड़ दिया था। मुँह दबाने पर, मैं उस हाथ से पूरी ताकत लगा कर उस पहाड़ को अपने ऊपर से धकेल रही थी, पर सौ से भी ऊपर का भार क्या 11 साल की लड़की के एक हाथ से हटने वाला था?

मैं दर्द से तड़प रही थी पर वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पूरी शिद्दत से भगवान को मुझसे मिला रहा था। पर उस समय और कुछ नहीं याद था। सिर्फ दर्द, दर्द और बहुत दर्द था।

मैंने नाखून से नोंचना शुरू कर दिया था। पर उसकी खाल पर कोई असर नहीं हो रहा था। मुझे अपने जाँघों के नीचे पहले गर्म गर्म महसूस हुआ और फिर ठंडा ठंडा , वो मेरी योनि के फटने की वजह से निकला खून का फौव्वारा था।

पीड़ा जब असहनीय हो गयी, मुझे मूर्छा आने लगी और कुछ देर बाद मैं पूरी तरह बेहोश हो गयी।

मुझे नहीं पता वो कब तक मेरे शरीर के ऊपर रहा, कब तक ईश्वर से मेरे शरीर का मिलन कराता रहा।

चेहरे पर पानी के छींटों के साथ मेरी बेहोशी टूटी। मेरे ऊपर एक चादर थी और वही बूढ़ी अम्मा मेरे घाव को गर्म पानी से सम्भाल कर धो रही थीं।

“तुने कल महन्त को नाखूनों से नोंच लिया। समझाया था न तुझे, फिर ?”

दु:ख और पीड़ा की वजह से शब्द गले में ही अटक गये थे। सिर्फ इतना ही कह पायी।

“अम्मा मुझे बहुत दर्द लगा था।”

“दो दिन से ज्यादा नहीं बचा पाऊँगी तुझे।”

अम्मा बोली, “महन्त को नाराज नहीं कर सकते, न तुम और न मैं।”

कह कर अम्मा मेरे सिर पर हाथ फेर कर चली गयी। फिर ये चलता रहा। बाद में अन्य तमाम लोग भी, उनसे पुजारी के द्वारा कीमत वसूलने के बाद, मुझे भोगने लगे।

आज भी उस पहली रात को, भगवान से सुहागरात को सोचकर शरीर के रोंये खड़े हो जाते हैंय दर्द और डर से।

मेरी आँखें इस बीच मेरी बहन को ढूँढती रहीं– – – पर वो नहीं मिली– – – किसी को उसका नाम भी नहीं पता था क्योंकि विवाह के समय एक नया नाम दिया जाता है और उसी नाम से सब बुलाते है!

 फिर, इसके बाद मैं जब भी किसी नयी लड़की को देखती मन्दिर प्रांगण में – – – तो मैं मेरी उस रात के दर्द से सिहर जाती थी– – – डर और दहशत की वजह से सो नहीं पाती थी।

उनके दबाव में मैंने इसी बीच नृत्य सीखा– – – और भगवान की मूर्ति के समक्ष खूब झूम–झूम कर नृत्य करती– – – साल में एक बार माँ बाबा मिलने आते– – – क्या कहती उनसे– – – वे स्वयं भी मुझे अब भगवान की पत्नी के रूप में देखते थे।

मैंने भी अपनी नियति से समझौता कर लिया था।

हमारे गुजारे के लिए मन्दिर में आये दान में हिस्सा नहीं लगता था हमारा। नृत्य करके ही कुछ रुपये पा जाती हैं मेरी जैसी तमाम देवदासियाँ– – – जिसमें हमें अपने लिए और अपने छोडे़ हुए परिवार का भी भरण पोषण करना पड़ता है।

मेरे बाद कई लड़कियों आयीं– – – एक के माँ–बाप अच्छा कमा लेते थे, पर भाई अक्सर बीमार रहता था इसलिए पुजारी के कहने पर लड़की को मन्दिर को दान कर दिया गया ताकि बहन भगवान के सीधे सम्पर्क में रहे और उसका भाई स्वस्थ हो जाये– – –

एक और लड़की का चेहरा नहीं भूलता– – – उसकी बड़ी और डरी हुई आँखों का खौफ मुझे आज भी दिखाई दे जाता है मैं जब–जब अतीत के पन्ने पलटती हूँ।

जिस शाम उसका और महन्त के जरिये भगवान से मिलन होना था – – – बस तभी पहली और आखिरी बार देखा था– – – फिर कभी नजर नहीं आयी वो। बहुत दिनों बाद मुझे उसी बूढ़ी अम्मा ने बताया था (किसी को न बताने की शर्त पर) कि उस रात महन्त को उसका ईश्वर से मिलन कराने के बाद नींद आ गयी थी तो वह उसके ऊपर ही सो गये थे– – – और दम घुट जाने से वह मर गयी थी।

सुन कर दो दिन एक निवाला नहीं उतरा हलक से– – – लगा शायद मुझे भी मर जाना चाहिए था उस दिन तो रोज–रोज मरना नहीं पड़ता।

हमें पढ़ने की इजाजत नहीं है– – – हमें सिर्फ अच्छे से अच्छा नृत्य करना होता था और रात में महन्त के बाद बाकी पंडों और पुजारियों और बाहरी ग्राहकों की हवस को भगवान के नाम पर शान्त करना होता था।

हमें समय समय पर गर्भ निरोध की गोलियाँ दी जाती है खाने के लिए ताकि हमारा खूबसूरत शरीर बदसूरत ना हो जाये। फिर भी, कभी कभी किसी को बच्चा रुक ही जाता था ऐसे में यदि वह कम उम्र की होती थी तो उसका वही मन्दिर के पीछे बने कमरे में जबरन गर्भपात करा दिया जाता था।

यह गर्भपात किसी दक्ष डॉक्टर के हाथों नहीं बल्कि किसी आई (दाई) के हाथ कराया जाता था– – – किसी किसी के बारे में पता भी नहीं चल पाता था– – –

कभी 3 महीने से ऊपर का समय हो जाने पर गर्भपात न हो पाने की दशा में बच्चे को जन्म देने की इजाजत मिल जाती थी– – – बच्चा यदि लड़की होती थी तो इस बात की खुशी मनायी जाती थी मन्दिर में शायद उन्हें आने वाली देवदासी दिखाई देती थी उस मासूम में।

मेरी जैसी एक नहीं हजारों हैं। जब पुरी के प्रभु जगन्नाथ का रथ निकलता है, तो मुझ जैसीे हज़ारों की संख्या में देवदासियाँ होती हैं, जो ईश्वर के एक मन्दिर से निकलकर दूसरे मन्दिर जाने तक बिना रुके नृत्य करती हैं।

हम सभी के दर्द एक हैं। सभी के घाव एक जैसे हैं, पर मूक और बघिर जैसे एक दूसरे को देखती हैं बस– – – !

मैं उनकी आँखों का दर्द सुन लेती हूँ और वे मेरी आँखों से छलका दर्द बिन कहे समझ लेती हैं।

यहाँ से निकलने के बाद हमारे पास न तो परिवार होता है– – – न ही कोई बड़ी धनराशि– – – और न कोई ठौर–ठिकाना जहाँ दो वक्त की रोटी और सिर छुपाने की जगह मिल जाये– – –

नतीजा– – – हम एक दलदल से निकलकर दूसरे दलदल में आ जाती हैं, कोठों पर। वहाँ हमारा उपभोग ईश्वर के नाम पर महन्त और पण्डे करते थे– – – और यहाँ हर तरह का व्यक्ति हमारा कस्टमर होता है– – – न वहाँ सम्मान जैसा कुछ था– – – न यहाँ।

मुझ जैसी वहाँ ईश्वर के नाम की वेश्याएँ थीं– – – यहाँ सच की वेश्याएँ हैं– – – यहाँ पर 100 मे से 80 किसी समय देवदासियाँ ही थीं।

आज तमाम तरह के एनजीओ हैं पर किसी भी एनजीओ की वजह से कोई भी लड़की इस नर्क से नहीं निकल पायी।

हजारों साल पहले धर्म के नाम पर चलायी गयी यह रीति लड़कियों के शारीरिक शोषण का एक बहाना मात्र था जिसे भगवान और धर्म के नाम पर मुझ जैसियों को जबरन पहना दिया गया।

एक ऐसी बेड़ी जिसको पहनाने के बाद कभी न खोली जा सकती है और न तोड़ी जा सकती है।

कहने को देवदासी प्रथा बन्द कर दी गयी है और यह अब कानून के खिलाफ है!  पर यह प्रथा ठीक उसी प्रकार बन्द है जैसे दहेज प्रथा कानूनन जुर्म है पर सब देते हैं– – – सब लेते हैं।

यह प्रथा वेश्यावृति को आगे बढ़ाने का पहला चरण है– – – दूसरे चरण वेश्यावृति में और कोई विकल्प न होने की वजह से मेरी जैसी खुद ही चुन लेती हैं।

यहाँ जवानी को स्वाहा करने के बाद बुढ़ापा बेहद कष्टमय गुजरता है देवदासियों का– – – दो वक्त का भोजन तक नसीब नहीं होता– – – जिस मन्दिर में देव की ब्याहता कहलाती थीं उसी मन्दिर की सीढ़ियों में भीख माँगने को मजबूर हैं– – –

पेट की आग सिर्फ रोटी की भाषा समझती है– – – पर बुजुर्ग देवदासियाँ एड़ियाँ रगड़ कर मरने को लाचार हैं– – –  कई बार भूख और बीमारी के चलते उन्हीं सीढ़ियों पर दम तोड़ देती हैं।

और हाँ– – –

एक बात बतानी रह गयी– – – वेश्याओं के बाजार में मुझे मेरी बड़ी बहन भी मिली– – – बहुत बीमार थी वो– – – पता चलने पर मैं लगभग भागती हुई गयी थी उसकी खोली की तरफ– – – पर बहुत भीड़ थी उसके दरवाजे– – –

“लक्ष्मी दीदी”,  कहते हुए मैं अन्दर गयी जो उसका निर्जीव अकड़ा हुआ शरीर पड़ा था, मर तो बहुत पहले ही गयी थी वह भी बस साँसों ने आज साथ छोड़ा था।

छठीं सदी में शुरू यह प्रथा आज 21वीं सदी में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उड़ीसा में खूब फल–फूल रही है।

अशम्मा जैसी 500 साहसी महिलाओं ने हैदराबाद के कोर्ट में इस बात के लिए रिट की है, कि ऐसे सम्बन्धों से पैदा हुए बच्चों की शिक्षा का इन्तजाम किया जाये और रहने के लिए हॉस्टल उपलब्ध कराया जाये।

अकेले महबूबनगर में ऐसे बच्चों की संख्या 5000 से 10000 के बीच है– – – बच्चों का डीएनए टेस्ट करा कर पिता को खोजा जाये और उसकी सम्पत्ति में इन बच्चों को हिस्सा दिया जाये– – –।

पर जब तक कोर्ट का फैसला आएगा तब तक न जाने कितनी अशम्मा और न जाने कितनी मेरी जैसी इस दलदल में फँसी रहेंगी और घुट–घुट कर जीने के लिए मजबूर होती रहेंगी!!

(पुष्पा गुप्ता, फेसबुक से साभार)