अक्टूबर में मुम्बई पुलिस ने एक महिला की फर्जी वीडियो वायरल करने के आरोप में माइक्रो–फाइनेंस कम्पनी के एक लोन रिकवरी एजेंट को गिरफ्तार किया था। दरअसल, रिकवरी एजेंट ने कर्ज लेने वाले व्यक्ति के फोन से उसकी पत्नी की फोटो निकाल ली थी। बदनाम करने के लिए फोटो को एडिट कर सोशल मीडिया पर डाल दिया था। यह घटना स्तब्ध करने वाली है।

कम्पनियों के पास कर्ज लेने वाले व्यक्ति की सभी निजी जानकारियाँ होती हैं। इनका गलत इस्तेमाल करके ये किश्त न चुका पाने वाले व्यक्ति को बदनाम करते हैं, जैसे–– लोगों को डराना, धमकाना और मारपीट करना। गुण्डागर्दी की इन्तहा हो गयी है––  देर रात फोन पर परेशान करना, गाली–गलौज करना, कर्जदारों के घर जाकर माहिलाओं के साथ बदसलूकी करना। उत्पीड़न के चलते पिछले साल हापुड़ में एक परिवार के सभी सदस्यों ने आत्महत्या कर ली थी। ऐसे मामले सैंकड़ों में हैं। पिछले 5 सालों में इनके खिलाफ मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के 50 हजार से ज्यादा केस दर्ज हो चुके हैं।

उत्पीड़न के बढ़ते मामलों को देखते हुए आरबीआई ने कई तरह के कानून बनाएँ हैं लेकिन बैंको के एजेंट हमेशा इन्हें दरकिनार करते हैं। जबरन वसूली के चलते 2 साल पहले आरबीएल बैंक पर 2 करोड़ रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगा था। इसी तरह एक्सिस बैंक, कोटक महिन्द्रा बैंक समेत दर्जनों बैंकों और माइक्रो–फाइनेंस कम्पनियों पर कई बार जुर्माना लगने के बाद भी वसूली के नाम पर की जा रही बर्बरता में कोई फर्क नहीं पड़ा है।

न्यूज एजेंसी ट्रिब्यूट की एक खबर के अनुसार, कुछ समय पहले गुरुग्राम पुलिस ने डाबड़ी क्षेत्र में एक बैंक लोन वसूली एजेंसी के कॉल सेंटर का पर्दाफाश किया था। यह कॉल सेंटर पिछले दो साल से चल रहा था, जिसमें काम करने वाले कर्मचारियों को कम्पनी और बैंक द्वारा लोन देने में देरी करने वालों के नम्बर दिये जाते थे। वह इन नम्बरों पर बार–बार मैसेज और कॉल करके उन्हें डराने–धमकाने का काम करते थे। इन्हें वसूली करने के लिए किसी भी हद तक जाने की छूट थी। इन्हें हर वसूली पर बैंक से 17 फीसदी कमीशन मिलता था।

जनवरी 2025 में प्रकाशित ‘टीमलीज सर्विसेज’ रिपोर्ट के अनुसार, 82 हजार बैंकिंग, वित्तीय सेवाएँ और बीमा क्षेत्र में आउटसोर्स कर्मचारियों में से तकरीबन 9 हजार वसूली एजेंट हैं। पिछले एक साल में इनकी संख्या में 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, इण्डियन बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इण्डिया, पंजाब नैशनल बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र आदि बैंको ने पिछले 5 सालों में इन वसूली एजेंटों पर 550 करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च किया है। तमाम बैंकों, लोन देने वाली एजेंसियों, माइक्रो–फाइनेंस कम्पनियों द्वारा यह सफाई दी जाती है कि वे ऐसी जालिमाना हरकतें इसलिए करते है कि बैंक या एजेंसी के पैसों की भरपाई हो सके और संस्था को दिवालिया होने से बचा सकें। वहीं दूसरी तरफ इन्हीं बैंकों या एजेंसियों द्वारा आये दिन बड़े पूँजीपतियों या उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपयों के कर्ज माफ कर दिये जाते हैं।

महँगाई और बेरोजगारी के दौर में व्यक्ति कर्ज के बोझ में दबता जा रहा है। इसके बावजूद, पहले से मौजूद पारम्परिक सहकारी बैंकिंग प्रणाली को खत्म किया जा रहा है। पिछले 10 सालों में 200 से अधिक सहकारी बैंकों के लाइसेंस रद्द किये जा चुके हैं या उन पर प्रतिबन्ध लगाया जा चुका है। सहकारी बैंकों द्वारा दिया जाने वाला कम ब्याज दर पर छोटा कर्ज, जो स्थानीय जरूरतों को पूरा करता था, अब उपलब्ध नहीं है। इसी का फायदा उठाकर फिनटेक कम्पनियों ने 24 से 60 फीसदी तक की ब्याज दरों पर त्वरित ऋण दे कर लोगों को अपने जाल में फँसा लिया है। एक खबर के अनुसार देश की 40 फीसदी से अधिक वयस्क आबादी इन अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर है।

इस खेल में बड़ी संख्या में माइक्रो–फाइनेंस कम्पनियाँ और फिनटेक ऐप्स शामिल हैं। वे आसान लोन के नाम पर अपने जाल में फँसाती हैं। इनकी ब्याज दर सामान्य लोन के मुकाबले कई गुना अधिक होती है। इस समय देश में 200 से अधिक रजिस्टर्ड एनबीएफसी यानी ‘नॉन बैंकिंग फाइनेंसियल कम्पनी’ और हजारों अनियंत्रित फिनटेक ऐप्स कार्यरत हैं। इन कम्पनियों ने 2022–23 में 3–5 लाख करोड़ रूपये से ज्यादा का लोन बाँटा था जिस पर इन्होंने 30 फीसदी से ज्यादा मुनाफा कमाया था। यह एक ऐसे समानान्तर वित्तीय ढाँचे की तरफ इशारा कर रहा है जिसका चरित्र पुराने जमाने के महाजनों और पठानों से भी गन्दा है। फिनटेक ऐप्स ने शुरुआत में डिजिटल भुगतान के लिए एक प्लेटफार्म के रूप में पहचान बनायी थी। लेकिन अब इनका एक बड़ा हिस्सा अत्यधिक ब्याज दरों पर त्वरित ऋण देने के धन्धे में तब्दील हो चुका है। सहकारी बैंकिंग के पतन ने आम लोगों को इसी क्रूर अर्थतंत्र के चंगुल में धकेल दिया है, जहाँ उनकी मजबूरी और विवशता ही सबसे बड़ा व्यापार बन गयी है। इस विनाशकारी खेल को रोकने के लिए एक ऐसी वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली के निर्माण की जरूरत है जो जन केन्द्रित और नैतिक हो।

–– विकास