एक दिन सभी मनुष्य समान होंगे

(साल 2025, गीतकार–संगीतकार सलिल चैधरी का जन्मशती वर्ष)

–– ज़ाहिद ख़ान

सलिल चैधरी का नाम लेते ही जे़हन में एक ऐसे संगीतकार का अक्स आता है, जिसके संगीत में पूरब और पश्चिम का एक अनोखा मिश्रण था। शुरुआत में उनके संगीत पर रवीन्द्रनाथ टैगोर, पंकज मल्लिक और ज्योतिरिन्द्र मोइत्रा आदि का असर रहा, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी एक जुदा राह बना ली। उनकी शैली बिल्कुल जुदा थी और यह शैली उन्होंने ख़ुद ईजाद की थी। सलिल चैधरी ने न सिर्फ़ संगीत में नये मुक़ाम क़ायम किये, बल्कि वे एक संस्कृतिकर्मी और इंक़लाबी गीतकार भी थे। उन्होंने भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा के लिए सैकड़ों जनगीत लिखे और उनका संगीत भी तैयार किया। आज़ादी से पहले जहाँ अपने गीतों में सलिल चैधरी ने ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म, दमनकारी नीतियों और नाइन्साफियों की मुख़ालफ़त की, तो वहीं आज़ादी के बाद अवाम के लिए सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरवी की। ये गीत उनके राजनीतिक और सामाजिक विचारों की अक्कासी करते हैं। यही नहीं, आज भी जब नये गीतकार–संगीतकार जनगीत और जनसंगीत की रचना करते हैं, तो सलिल चैधरी की शैली को ही अपनाते हैं।

पश्चिम बंगाल के दक्षिण चैबीस परगना जिले के सुभाष ग्राम में 19 नवम्बर 1925 को जन्मे सलिल चैधरी को संगीत की व्यापक औपचारिक शिक्षा परम्परागत अर्थों में नहीं मिली। उन्होंने संगीत की तालीम अपने आसपास के माहौल से ली। लोगों द्वारा रचित संगीत से, बल्कि लोगों की ज़िन्दगी से भी सीखा। सलिल चैधरी के पिता ज्ञानेन्द्रमोय चैधरी डॉक्टर थे और उनके पास भारतीय, ख़ास तौर पर असम व बंगाल के लोकगीतों और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का विशाल ख़ज़ाना था। सलिल चैधरी के लफ़्ज़ों में “मैं हर रोज़ मोज़ार्ट,  बीथोवेन, चाईकवोस्की की सिम्फनी और जंगल के पौधों–कीट–पतंगों की अद्भुत सिम्फनी सुनता था। मेरे अवचेतन मन में यह याद पूरी उम्र साथ रहीं।” यही वजह है कि सलिल चैधरी के संगीत में हमें विदेशी सिम्फनी और असम के जंगलों और पहाड़ी लोगों की बाँसुरी और लोक संगीत का असर साफ़ दिखाई देता है। सलिल चैधरी ने आठ साल की उम्र से ही बाँसुरी बजाना सीख लिया था। घर में एक पियानो भी था और उस पर भी उन्होंने हाथ आज़माना शुरू कर दिया और जल्द ही उन्होंने दीगर वाद्ययंत्रों को बजाने में महारत हासिल कर ली। सलिल चैधरी के पिता चाय बागान में थे और अक्सर मज़दूरों के दरमियान नाटकों का मंचन करते थे। नाटक मंचन का मक़सद मज़दूरों को जागरूक करना था। चाय बागान में मज़दूरों का जो शोषण होता था, वे उसके जानिब हमेशा फ़िक्रमन्द रहते थे। अपने पिता से ही सलिल चैधरी के मन में ब्रिटिश–विरोधी और समाजवादी भावनाएँ विकसित हुर्इं और बाद में इन्हीं जज्बात ने उन्हें गीत लिखने और इप्टा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भूमिहीन किसानों, भ्रष्ट ब्रिटिश न्याय व्यवस्था और अमीरों द्वारा गरीबों के शोषण के बारे में लगातार लिखा। अपने गीतों में लोगों से संघर्ष करने का आह्वान किया।

सलिल चैधरी की आला तालीम कलकत्ता के ‘बंगबाशी कॉलेज’ में हुई। यह वह दौर था, जब मुल्क में दूसरी आलमी जंग का असर दिखाई देने लगा था। रही सही कसर बंगाल अकाल ने पूरी कर दी, जिसमें उस वक़्त पचास लाख लोग मारे गये थे। हर तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। कोई भी संवेदनशील शख्स इससे मुतास्सिर होगा ही, सलिल चैधरी को भी अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों का गहरा एहसास हुआ। बंगाल में उस वक़्त इप्टा का सांस्कृतिक आन्दोलन अपने चरम पर था, रंगमंच के ज़रिये इस संगठन से जुड़े कलाकार बिनय रॉय, बिजन भट्टाचार्य, देबब्रता बिस्वास, निरंजन सेन, हेमांग विश्वास, ज्योतिरिन्द्र मोइत्रा, हरिपारा कुशारी और हेमन्त मुखर्जी न सिर्फ़ अवाम में बेदारी फैला रहे थे, बल्कि अकाल पीड़ितों की मदद के लिए चन्दा भी इकट्ठा कर रहे थे। सलिल चैधरी इप्टा में तो शामिल हुए ही, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भी मेम्बर बन गये।  1946 से ही वे कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों में सरगर्म थे। पार्टी पर जब पाबन्दी लगी, तो उन्हें दीगर लीडरों के साथ अंडरग्राउंड रहना पड़ा। उन्होंने अपनी नौजवानी के दिनों में किसान संगठन, छात्र संगठन सभी में सक्रिय भूमिका निभाई। ज़िन्दगी के इन्हीं तजुर्बों ने उन्हें गीत लेखन के लिए प्रेरित किया। साल 1943 जब उनकी उम्र महज़ इक्कीस साल थी, तब उन्होंने अपना पहला जनगीत “देश डूबेंछे बाढ़ेर जले–––––”(देश डूबा बाढ़ के पानी में धान नष्ट हो गये, कैसे कहूँ बन्धु तुझे दिल की बात) रचा। इसके बाद उन्होंने चैबीस परगना स्थित सोनारपुर के किसान आन्दोलन में भी हिस्सा लिया। और इस आन्दोलन के लिए उनका गीत था, “होशियार! मज़बूत हाथों से उठा भाई ये लाल निशान।”

उस वक़्त माहौल ही कुछ ऐसा था कि वे ख़ामोश नहीं बैठ सके। उन्होंने कई इंक़लाबी जनगीत लिखे और इप्टा के साथियों के साथ मिलकर उन्हें अवाम तक पहुँचाया। उन्होंने सुदूर गाँव–देहातों और शहरों की यात्रा की और उनके गीत अवाम की आवाज़ बन गये। ये विरोध गीत थे, जिन्होंने लोगों को उनके चारों ओर फैली समाजी और सियासी नाइन्साफी के जानिब बेदार किया। ये गीत बेहद ताक़तवर और प्रेरक बन गये।

दरअसल, सलिल चैधरी हमेशा सामाजिक अन्याय और असमानता के प्रति अपनी गहरी संवेदना रखते थे और अक्सर ऐसे गीत लिखते थे जो उनके साम्यवादी जज्बात को दर्शाते थे। उन्होंने अपने इन गीतों को ‘चेतना और जागृति के गीत’ कहा। साल 1945 से 1950 के दरमियान उन्होंने अपने कुछ सबसे अहम सियासी गीत लिखे और इनको संगीतबद्ध किया। उनके ज्यादातर गीत ब्रिटिश–विरोधी और उपनिवेश–विरोधी जज्बात को बयाँ करते थे और यह विरोध के गीत, क्रान्ति के गीत और किसानों और मज़दूरों के लिए उम्मीद के गीत बन जाते थे। उन्होंने नाविक विद्रोह, अखिल भारतीय मज़दूर हड़ताल, तेभागा आन्दोलन और फिर तेलंगाना के किसान विद्रोह के समय कई इंक़लाबी गीत रचे।

सलिल चैधरी ने 1943 से लेकर 1951 के दौरान तक़रीबन चालीस से अधिक जनगीतों की रचना की। सामूहिक जनगीत का सहज स्वर संगीत और सहज हार्मनी का इस्तेमाल कर वे आर्केस्ट्राईजेशन करने में माहिर थे। उनके कुछ मशहूर जनगीत हैं–– “बिचारपोती तोमर बिचार कोरबे जारा आज जेगेछे आज सेई जनोता” (न्यायमूर्ति! आज तुम्हारे गुनाहों पर ये जनता विचार करेगी, क्योंकि अब वह जनता जाग चुकी है), “हेई सम्हालो हेई सम्हालो धान हो–––” (हे सम्भालो अपने धान को और अपनी हँसिया की धार तेज़ करो; चाहे जान चली जाये, पर अब अपने ख़ून से सींचा हुआ धान हम न देंगे), “ओ आलोर पथो जात्री” (ओ प्रकाश पथ के पथिक), “ढेऊ उठछे कारा टूटते–––” (तूफ़ान उठ रहा है कारागार टूट रहे हैं), “एबार घूरछे चाका रक्तो माखा” (अब घूम रहा है ख़ून से सना चक्का), “ओ आयरे ओ आयरे–––” (इस माटी में जीवन के स्वप्न और आशाओं के बीज बोएँ) आदि। इसके अलावा “उरु टका टका टैगिना टैगिना” बुनियादी तौर पर किसानों द्वारा फसल की बुआई और कटाई की ख़ुशी को बयाँ करने वाला गीत है। ये जनगीत स्वतंत्रता आन्दोलन का हिस्सा बन गये और इतने वर्षों बाद भी पूरे बंगाल में गाये जाते हैं। एक तरह से ये अब बंगाली विरासत का अभिन्न अंग बन चुके हैं।

सलिल चैधरी की गायक–संगीतकार हेमन्त कुमार के साथ बहुत बढ़िया ट्यूनिंग रही। दोनों ने जब भी साथ काम किया, कमाल किया। सलिल चैधरी के संगीत निर्देशन में हेमन्त कुमार ने “कोनो एक गायेर बनाधु”, “रनर”, “अबक पृथ्वी”, “बिद्राहा आज”, “पालकीर गान”, “पाथे एबार नामो साथी” और “धिटांग धिटांग बोले” आदि गीतों को अपनी मखमली आवाज़ में गा कर अमर कर दिया।

सलिल चैधरी गीतकार–संगीतकार होने के साथ–साथ कवि–कथाकार और नाटककार भी थे। उनका पहला नाटक ‘चालचोरे’ था। इसके बाद उन्होंने दो और नाटक ‘जनंतिके’ (1948) और ‘संकेत’ (1949), ‘एई माटीते’ (इसी धरती पर) लिखे। जब वे फ़िल्मों में बिज़ी हो गये, तो उनका नाट्य लेखन पीछे छूट गया। उन्होंने जो भी नाटक लिखे, वे शोषण विरोधी थे। शोषकों यानी ब्रिटिश हुकूमत और स्थानीय ज़मीन्दार, सरमायेदारों के ख़िलाफ़ थे। उनमें स्वतंत्रता की आग थी।

उनकी कविताएँ पढ़ने में जहाँ बहुत सहज और सरल हैं, तो वहीं दूसरी ओर वे बहुत सीधी और दिल को छू लेने वाली हैं। वे अपने गीत–कविताओं में हमेशा आम आदमी की ज़बान का इस्तेमाल करते हैं। साल 1983 में सलिल चैधरी की कविताओं का एकमात्र एल्बम जारी किया गया। इसमें उन्होंने ख़ुद अपनी आवाज़ में कविताओं को संगीतबद्ध कर रिकॉर्ड किया है।

वे एक संवेदनशील कथाकार भी थे। जब उन्होंने अपनी पहली कहानी ‘ड्रेसिंग टेबल’ लिखी, तो साहित्यिक जगत में इसने खलबली मचा दी। वहीं ‘रिक्शावाला’ के बारे में तो हर कोई जानता है। यही वह कहानी है, जिसने उन्हें हिन्दी सिनेमा तक पहुँचाया। उन्होंने इसे 1950 के दशक की शुरुआत में लिखा। वे अपने क़रीबी दोस्तों ऋत्विक घटक और मृणाल सेन के साथ मिलकर उस पर फ़िल्म बनाने का प्लान बना रहे थे। इसी दौरान फ़िल्म डायरेक्टर बिमल रॉय कोलकाता आये हुए थे और उनकी मुलाक़ात सलिल चैधरी से हुई। बिमल रॉय ने उनकी कहानी पढ़ी और उन्हें यह बेहद पसन्द आयी। उन्होंने ‘रिक्शावाला’ पर आधारित एक हिन्दी फ़िल्म बनाने का फै़सला किया और इसकी पटकथा लिखने की ज़िम्मेदारी सलिल को सौंपी। बाद में यह तय हुआ कि सलिल ही इस फ़िल्म का संगीत भी देंगे। यह फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ थी, जो 1953 में रिलीज हुई। ज़मीन और किसानों के सवालों को ज़ोरदार तरीक़े से उठाने वाली यह कहानी दर्शकों को ख़ूब पसन्द आयी। वहीं रिलीज होते ही इस फ़िल्म के गीतों ने भी कमाल कर दिखाया। बाद में इसी कहानी पर बांग्ला फ़िल्म भी बनी, जो हिन्दी की तरह ही कामयाब साबित हुई।

सलिल चैधरी ने फ़िल्म ‘पिंजरे के पंछी’, ‘परख’ की भी कहानियाँ लिखीं। फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ के बाद बिमल रॉय और सलिल चैधरी की जोड़ी ने ‘बिराज बहू’, ‘मधुमती’, ‘परख’ और ‘काबुलीवाला’ जैसी सुपरहिट फ़िल्मों में साथ काम किया और इन फ़िल्मों के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचायी। उनके संगीत से सजी कुछ और क़ाबिले–तारीफ़ फ़िल्में हैं–– ‘मुसाफ़िर’, ‘हाफ़ टिकट’, ‘नौकरी’, ‘माया’, ‘झूला’, ‘अन्नदाता’, ‘जागते रहो’, ‘छाया’, ‘मेरे अपने’, ‘आनन्द’, ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’।

उनके सदाबहार गीतों की फे़हरिस्त कुछ इस तरह है–– ‘धरती कहे पुकार के’ (फ़िल्म : दो बीघा ज़मीन), ‘ओ सजना, बरखा बहार आई’ (फ़िल्म : परख), इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा (फ़िल्म : छाया), ‘साथी––– तुझ बिन जिया उदास रे’ (फ़िल्म : पूनम की रात), ‘आजा रे परदेसी’, ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं’ (फ़िल्म : मधुमती), ऐ मेरे प्यारे वतन (फ़िल्म : काबुलीवाला), ‘जाने वाले सिपाही से पूछो’ (फ़िल्म : उसने कहा था), ‘जागो मोहन प्यारे’, ‘ज़िन्दगी एक ख्वाब है’ (फ़िल्म : जागते रहो),  ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’, ‘जिन्दगी कैसी है पहेली हाय’ (फ़िल्म : आनन्द), ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे’ (फ़िल्म : रजनीगंधा)। यह ऐसे मधुर गीत हैं कि जब भी बजते हैं, लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं।

सलिल चैधरी ने 75 से अधिक हिन्दी फ़िल्मों, क़रीब 45 बांग्ला, 26 मलयालम और कई तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, मराठी, असमिया और उड़िया फ़िल्मों के लिए संगीत तैयार किया। उन्होंने कई फ़िल्मों और डॉक्यूमेंट्री के लिए यादगार बैकग्राउंड म्यूजिक दिया। इन सबके अलावा उन्होंने कई टेली धारावाहिकों और फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिये। उनका एक और कारनामा, सचिन शंकर के बैले यूनिट के लिए संगीत तैयार करना था। आगे चलकर उन्होंने ‘बॉम्बे यूथ क्वायर’ की स्थापना की जिसमें मन्ना डे, मुकेश, लता मंगेशकर, द्विजेन्द्र मुखर्जी, रूमा गांगुली और कई दीगर मशहूर सिंगर शामिल थे। सलिल ने इस समूह के लिए नये गाने रचे और प्रेम धवन और शैलेन्द्र जैसे गीतकारों से गीत लिखवाये।

अपने आख़िरी समय में सलिल चैधरी कलकत्ता चले गये थे और उन्होंने वहाँ अपना एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो शुरू किया। रिकॉर्डिंग स्टूडियो का मक़सद भारतीय सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा, नयी तरह का ओपेरा, लोक संगीत का आधुनिक ऑर्केस्ट्रेशन, शास्त्रीय संगीत के लिए गायन मंडली और विभिन्न प्रकार के भारतीय नृत्यों के लिए बैले संगीत रचना आदि करना था।

उनको अपनी ज़िन्दगी में अवाम से ख़ूब प्यार और मान–सम्मान मिला, लेकिन सरकारों ने उनके काम को नज़रअन्दाज़ ही किया। 5 सितम्बर, 1995 को सलिल चैधरी हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गये। अपने गीत और संगीत से उन्होंने ज़िन्दगी भर समाजवादी राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाया। सलिल चैधरी के गीत–संगीत का अगर मूल्यांकन करें, तो उसमें उन्होंने हमेशा अपने दौर की इच्छा–आकांक्षाओं के मुताबिक़ संगीतमय शैलियों का इस्तेमाल किया। उम्मीदों के गीत लिखे। अवाम में आशा का संचार किया। उनके गीतों और संगीत रचना में आम अवाम को मुस्तक़बिल की एक सुनहरी राह मिलती है। सच बात तो यह है कि सच्ची कला का यही मानवतावादी दृष्टिकोण होता है।

सलिल का प्रिय सपना था, ‘एक दिन सभी मनुष्य समान होंगे।’ गायक–संगीतकार हेमांग बिश्वास ने इप्टा के अपने पुराने साथी सलिल के बारे में कहा है, “सलिल के गीतों का जो भी मूल्यांकन हो, एक बात मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि उन्होंने हमेशा संघर्षरत जनता को प्रेरित किया। उनके सभी गीत सदैव जीवित रहेंगे, क्योंकि संघर्षरत जनता हमेशा ज़िन्दा रहती है।”