–– राम शिरोमणि शुक्ल

(यह लेख ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ पत्रिका के नवम्बर 1998 के अंक से साभार लिया गया है। आज मोदी राज में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ गयी है।)

जब केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी थी और इसे संचालित करने के लिए एक राष्ट्रीय एजेण्डा तैयार किया गया था तभी विपक्षी पार्टियों ने बहुत जोर–शोर से यह आवाज उठायी थी कि इस एजेण्डे से इतर भाजपा का अपना ‘हिडेन एजेण्डा’ (गुप्त कार्यसूची) भी है जो देश, उसकी जनता, राजनीति और समाज सभी के लिए बेहद खतरनाक है। तब भाजपा समर्थक लोगों को लगा होगा कि शायद विपक्षी पार्टियाँ जानबूझ कर भाजपा की आलोचना करने में लगी हुई हैं क्योंकि जब उसने सभी की सहमति से एजेण्डा तैयार किया है तो आखिर इस हिडेन एजेण्डे की क्या आवश्यकता रहेगी। लेकिन वह जल्दी ही सामने आने लगे और विपक्षी नेताओं की आशंकायें भी सच साबित होने लगीं। इसका सबसे ज्वलन्त और तात्कालिक उदाहरण पोखरन परीक्षण के रूप में सामने आया था। यह एक कटु सच्चाई हैं कि देश के समक्ष वर्तमान समय में जैसी समस्यायें खड़ी हैं उन्हें सुलझाने की बजाय ऐसे परीक्षण अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाला ही कदम कहा जायेगा। कम से कम उस क्षेत्र को भी, जहाँ परीक्षण किया गया, अगर ध्यान में रखा गया होता तो यह बात अपने आप समझ में आ जाती कि वहाँ पानी की इतनी विकराल समस्या है कि पूरा जन जीवन अस्त–व्यस्त रहता है लेकिन सरकार को यह समस्या गौण लगी और उसने राष्ट्र की सुरक्षा का हौवा खड़ा करके परमाणु विस्फोटों को अंजाम दिया जो हर हाल में पूरी मानवता के विनाश का कारक होता है। इसके बाद तो एक के बाद एक अनेक ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनमें भाजपा ने अपनी इस कोशिश को जारी रखा। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) का उदाहरण अभी लोग पचा नहीं सके थे कि सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के बहाने अपने एक और बेहद खतरनाक इरादे को लादने की कोशिश की।

शिक्षा किसी भी देश और समाज की प्रगति की मानक होती है और इसी के आधार पर यह तय होता है कि कोई देश और समाज किधर जा रहा है। यह नहीं कहा जा सकता कि जो शिक्षा व्यवस्था आज हमारे देश में चल रही है वह जनोपयोगी है लेकिन केवल इसी के नाम पर कोई ऐसी शिक्षा व्यवस्था कैसे लादी जा सकती है जो किसी एक खास धर्म की बनकर रह जाने को अभिशप्त हो और जो मनुष्य और मनुष्य के बीच मतभेद का कारण बन जाये। भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार ने ऐसा ही कुछ खतरनाक कदम उठाने की कोशिश की थी जिसे न केवल विपक्षी पार्टियों बल्कि कई सत्ताधारी गठबंधन की सहयोगी पार्टियों के भारी विरोध की वजह से अंजाम नहीं दिया जा सका। विपक्ष का कहना था कि सरकार शिक्षा का हिन्दूकरण, साम्प्रदायीकरण और धार्मिकीकरण करने की कोशिश में लगी हुई है जो किसी भी तरह से बर्दाश्त नहीं किया जायेगा ओर उसे लागू भी नहीं करने दिया जायेगा जबकि सत्ता पक्ष का कहना था कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है यह तो केवल कुछ उन प्रस्तावों पर विचार–विमर्श करवाना चाहती थी जो अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने प्रस्तुत किये थे। यह अलग बात है कि इस विरोध के चलते और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कूटनीतिक हस्तक्षेप की वजह से फिलहाल उसे स्थगित कर दिया गया है लेकिन अभी भी यह मान लिया जाना ठीक नहीं होगा कि सरकार ने अपने प्रयास बन्द कर दिये हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री ने, जिन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कट्टर अनुयायी माना जाता है, खुद ही कहा है कि विरोध को देखते हुए इसे फिलहाल स्थगित किया गया है, जब उचित वक्त आयेगा तो फिर से इस पर कारगर प्रयास शुरू किये जायेंगे।

देखने की बात यह है कि इस विवाद की शुरुआत कहाँ से और कैसे हुई। दरअसल इस नये विवाद को बेहतर तरीके से समझने के लिए दो बातों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। एक तो यह कि भाजपा सरकार ने सत्ता में आते ही पहला काम यह किया कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में कई ऐसे व्यक्तियों को शामिल कर दिया जो उसको मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़े हुए थे और परिषद से कई ऐसे लोगों को अलग कर दिया गया जो वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम के पक्षधर माने जाते थे। इसके माध्यम से उसकी कोशिश सिर्फ यह रही है कि पाठ्यक्रमों का कैसे भाजपायीकरण और संघीकरण किया जा सके। दूसरी बात यह कि यह सर्वविदित है कि इन धन्नासेठों की पार्टी ने इन्हीं धन्नासेठों के जरिये पूरे देश में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से एक समानान्तर शिक्षातंत्र विकसित कर रखा है जिनके जरिये वह लगातार इस कोशिश को अंजाम देने में लगी है कि कैसे बच्चों और नौजवानों को संघ की परिधि में ला को प्रतिष्ठापित करने वाले पाठ्यक्रम भी शामिल किये गये हैं। अब भाजपा और संघ के मन का पाप उबाल मारने लगा। आखिर सत्ता जो उसके हाथ में आ गयी थी। उसने इसका पूरा लाभ उठाने का मन किसी भी तरह से इन पाठ्यक्रमों को पूरी खड़ा किया जाये। विद्याभारती जैसी इस तरह की संस्थाओं में संघ की विचारधारा बनाया और इस प्रयास में जुट गयी कि शिक्षा पद्धति में ही घुसा दिया जाये जिससे जो काम उसे अपने स्तर पर करना पड़ रहा है वह सरकारी खर्च पर आसानी से हो जाये और यहीं से विवाद खड़ा होना शुरू हो गया।

हुआ यह कि गत अगस्त माह में इसी विद्याभारती की ओर से राष्ट्रीय स्तर का शिक्षा सम्मेलन आयोजत किया गया था। इस सम्मेलन ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ परिवर्तन करने के लिए कई सुझाव दिये थे। इन्हीं सुझावों को संघ और भाजपा शिक्षा पद्धति में शामिल करना चाहते थे। सरकार में इस विभाग के मंत्री डा– मुरली मनोहर जोशी ने गुपचुप तरीके से इसके लिए कोशिश भी शुरु की और राज्यों के शिक्षा मंत्रियों का एक सम्मेंलन बुलाने की योजना बना रखी थी। वे चाहते थे कि इसी के जरिये वे अपनी योजना को अंजाम देंगे। यह सम्मेलन भी उन्हीं दिनों आयोजित किया जाना था और सोचा यह गया था कि राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को इसके लिए मौका ही नहीं मिल पायेगा कि वे इस पर ज्यादा सोच–विचार कर सकेंगे और इस तरह इनमें से कई सुझाव स्वीकार करवा लिए जायेंगे लेकिन सरकार को पहली परेशानी इसी से हुई कि विभिन्न कारणों से यह सम्मेलन अंक्टूबर तक के लिए टलता गया। इस दौरान मानव संसाधन मंत्रालय ने एक प्रपत्र राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को विचारार्थ प्रेषित किया। इस मूल प्रपत्र के साथ मंत्रालय ने एक संलग्नक भी प्रेषित कर दिया जिसमें वही सुझाव थे जो विद्या भारती द्वारा आयोजित सम्मेलन में आये थे। इसी के माध्यम से यह भी बताया गया था कि सम्मेलन में बहस की शुरुआत विद्याभारती के सदस्य व उद्योगपति पी. डी. चितलंगिया के भाषण से होगी।

यहीं से शुरू हो गया विवाद और इसे सबसे पहले उठाया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने। उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक कड़ा पत्र लिख कर चेतावनी दे डाली कि अगर सरकार ने ऐसी कोई कोशिश की तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। इसके बाद तो जैसे विरोध की हवा चल निकली। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बयान जारी कर धमकी दे डाली और द्रमुक अध्यक्ष करुणानिधि ने चेताया कि शिक्षा के साम्प्रदायीकरण के केन्द्र के प्रयास को सफल नहीं होने दिया जायेगा। उसके बाद भाजपा गठबंधन के सहयोगियों जयललिता औरा ममता बनर्जी ने भी सरकार को याद दिलाया कि गठबंधन द्वारा स्वीकृत एंजेण्डे से इतर अगर कुछ भी करने की कोशिश की गयी तो यह ठीक नहीं होगा। अभी सरकार इस विरोध पर कुछ सोच पाती कि वह दिन भी आ गया जब इस सम्मेलन की शुरुआत होनी थी।

सम्मेलन की शुरुआत भारी विरोध और बहिष्कार के बीच हुई। इस पर सबसे पहली आवाज उठायी उस पार्टी के प्रतिनिधि ने जिसके भरोसे पर ही यह सरकार अस्तित्व में आ सकी थी। तेलुगु देशम नेता और आंध्र प्रदेश की शिक्षा मंत्री प्रतिभा भारती ने आवाज उठायी और फिर पंजाब के शिक्षा मंत्री मनजीत सिंह ने सरस्वती वन्दना से सम्मेलन की शुरुआत किये जाने का विरोध किया। सरकार के लिए यह बड़ी परेशानी की बात थी कि उसके सहयोगी दलों के शिक्षा मंत्रियों ने भी बहिष्कार में हिस्सा लिया। गौरतलब है कि यह सब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने हो रहा था जिसे वे चुपचाप देख रहे थे। इस सम्मेलन का उघ्द्घाटन उन्हें करना था और सरकार की योजना के मुताबिक विद्याभारती के सदस्य पी–डी– चितलोंगया के भाषण के माध्यम से बहस की शुरुआत होनी थी। यहाँ यह भी याद रहना बेहद जरूरी होगा कि अगर चितलगिया को भाषण दिलवा पाने में सरकार सफल हो पाती तो यह पहला मौका होता जब शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन की शुरुआत किसी बाहरी व्यक्ति के भाषण से होती। यह तो अच्छा हुआ कि वह अपने मकसद में सफल नहीं हो सकी। इस विरोध का परिणाम यह हुआ कि मजबूरन प्रधानमंत्री को इस विवाद में हस्तक्षेप करना पड़ा और मामले को यह कहकर रफा–दफा करने की कोशिश की गयी कि शिक्षा में धर्मांधता के लिए कोई जगह नहीं होगी। लेकिन क्या वास्तव में यह विवाद सिर्फ इतना कह देने भर से समाप्त मान लिया जाना चाहिए। जाहिर है ऐसा नही है क्यों कि सरकार अपने इस गुप्त एजेण्डे से पीछे नहीं हटी है और अभी भी अपने प्रयास को अंजाम देने में लगी हुई है। ऐसा स्वयं मानव संसाधन विकास मंत्री डा– मुरली मनोहर जोशी के वक्तव्य से भी साफ झलकता है। उन्होंने घोषणा की कि श्री चितलगिया के परचा पढ़ने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि चर्चा केवल कार्यसूची के पहले 20 पेज तक ही सीमित रहेगी और विरोध को देखते हुए विशेषज्ञों की सिफारिश वाले अनुलग्नक को हटा लिया गया है। इसका मतलब है कि उसे सिर्फ इस सम्मेलन से हटाया गया है सरकार के दिमाग से नहीं।

इस विरोध की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी रही कि व्यापक स्तर पर इसमें छात्रों, छात्र संगठनों ओर महिला संगठनों ने हिस्सा लिया। छात्रों का कहना था कि आज जरूरत रोजगार दिलाने वाली शिक्षा का इन्तजाम करने, फीस की बढ़ोत्तरी वापस लेने और शिक्षा का व्यावसायीकरण करने से रोकने की है पर सरकार इसका साम्प्रदायीकरण करने में जुटी है। छात्रों ने डा– मुरली मनोहर जोशी का पुतला जलाया और चेतावनी दी कि अगर ऐसे प्रयासों पर रोक नहीं लगी तो छात्र अगले सत्र में संसद का घेराव करेंगे। जबकि महिला संगठनों का विरोध उस विशेष प्रस्ताव से था जिसमें कहा गया था कि लड़घ्कियों के लिए गृहकार्य विषय को पाठ्यक्रम में अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए। महिला प्रतिनिधियों का कहना था कि लिंग के आधार पर शिक्षा नीति वैसे भी गलत है फिर इससे 1986 में तय की गयी शिक्षा नीति का भी उल्लंघन होता है। उनका यह आरोप था कि डा– जोशी इसके माध्यम से संघ की महिलाओं के प्रति इस सोच को ही प्रभावी बनाना चहते थे जिसमें महिलाओं को घरों के भीतर कैद रखने का सामन्ती तत्व छिपा हुआ है। ऐसे प्रस्तावों पर अल्पसंख्यकों का चिंतित होना भी स्वाभाविक ही था सो उन्होंने अपनी आवाज उठायी। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने कहा कि सम्मेलन में विचार के लिए प्रस्तुत किये गये कई विचार ऐसे हैं जिनसे संविधान के अनुच्छेद 28 और 30 में संशोधन का भी परोक्ष प्रस्ताव है। इन अनुच्छेदों के जरिये अल्पसंख्यकों के शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों की गारण्टी की गयी है। आयोग ने यह भी ध्यान दिलाया कि उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दे रखी है कि अनुच्छेद 30 में मिले अधिकार सम्पूर्ण हैं और इनसे किसी भी तरह की छेड़छाड़ गलत होगी। आयोग के अध्यक्ष ताहिर महमूद का कहना था कि स्कूली पाठ्यक्रम में हिन्दू दर्शन को शामिल करने से विद्यालयों में धार्मिक उपदेश के प्रतिबन्ध से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 28 को खारिज करना होगा।

वास्तविकता यह है कि भारतीय जनता पार्टी अपने पूर्व के अनुभवों से काफी उत्साहित थी और उसे यह लग रहा था वह आसानी से इस काम को अंजाम दे सकेगी। उसने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में अपनी योजना को अंशतरू कारगर बनाया हुआ है। इन राज्यों के पाठ्यक्रमों में उसने ऐसा बहुत कुछ शामिल करवा लिया है जो ‘हिन्दुत्व’ को प्रतिष्ठापित करने में सहायक होंगे। इसके अलावा अनेक शैक्षिक संस्थाओं में ऐसे लोगों को घुसा दिया है जो संघ की विचारधारा के पैरोकार थे। राजस्थान सरकार तो अभी भी इस अभियान को चलाये हुए है और विश्वविद्यालयों के कुलपति वह संघ के प्रचारकों को बना रही है। इसी तरह शिक्षा से जुड़ी अन्य संस्थाओं में ऐसे ही लोगों की नियुक्ति कर रही है जो संघ और भाजपा के विचारों को प्रतिपादित कर सकें। समानान्तर शिक्षण संस्थाओं का जाल तो उसने पहले ही पूरे देश में खड़ा कर रखा था। अब वह इस कोशिश में थी कि पूरी शिक्षा नीति को ही संघ आधारित बना दिया जाय। इससे देश के संघीकरण के उसके प्रयास में आसानी होगी। इसीलिए उसने विद्याभारती के जरिये राष्ट्रीय सम्मेलन आहूत करवाया था और उसके प्रस्तावों को कानूनी जामा पहनाने का प्रयास किया था। विपक्ष के विरोध के मद्देनजर डा. जोशी ने एक संवाददाता सम्मेलन में जो कुछ कहा था वह यह समझने के लिए पर्याप्त होगा कि आखिर वे क्या चाहते हैं। उन्होंने बताया था कि सम्मेलन के आधिकारिक एजेण्डे के साथ भेजे गये अनौपचारिक संलग्नक को लागू किये जाने का अभी वक्त नहीं आया है। यानी कि वक्त आते ही इन्हें लागू किया जाएगा। इसके साथ ही जिसे डा. जोशी विशेषज्ञों की सिफारिश बतला रहे हैं वे आखिर कौन हैं, यह भी देखने की चीज है।

ये विशेषज्ञ वही हैं जो संघ की ही विभिन्न शिक्षण संस्थाओं से सम्बंद्ध हैं और जिन्हें विद्याभारती के सम्मेलन में बुलाया गया था। ऐसे में सहज ही यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि आखिर उन्होंने क्या सुझाव दिये होंगे और उनके माध्यम से कैसी शिक्षा नीति बनेगी। जाहिर है इनकी सिफरिशों के आधार पर बनी शिक्षा नीति संघ की ही शिक्षा नीति होगी।

बहरहाल सम्मेलन समाप्त हो गया और उस विवादास्पद संलग्नक को भी बाहर कर दिया गया। चितलगिया का पर्चा भी नहीं पढ़ा गया पर सरकार और भाजपा ने शिक्षा के हिन्दूकरण के मसले को बड़ी ही खूबसूरती से बगल करने की कोशिश की और सरस्वती वन्दना के बहिष्कार के मामले को उछाल दिया। इसके पीछे भी उसकी सोची समझी रणनीति यह रही कि लोग उसकी कारस्तानी को नजरअन्दाज कर जायं और इन्हें सिर्फ यह लगे कि विरोध सरस्वती वन्दना का किया गया। जबकि सरस्वती वन्दना का बहिष्कार तो प्रतीक मात्र ही था। शिक्षा मंत्रियों का मूल विरोध तो आखिर सरकार की सुनियोजित साजिश से था। बाद में चितलगिया ने भी एक बयान जारी कर यह बताने की असफल कोशिश की कि उनका संघ से कोई जुड़ाव नहीं है। वे तो केवल विद्याभारती से सम्बंद्ध हैं। चूंकि शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं और सरकार ने उनसे सुझाव माँगे थे सो उन्होंने दे दिये थे। सरकार ने ही उनसे पर्चा पढ़ने के लिए भी कहा था इसलिए वे उसके लिए भी तैयार थे। लेकिन इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि हमारा सम्बन्ध संघ या भाजपा से है। पर क्या उनकी यह थोथी दलील आसानी से स्वीकार करने योग्य है। कौन नहीं जानता कि विद्याभारती किसके संरक्षण में चलने वाली संस्था है और किस विचारधारा की पोषक है। ऐसे में यह कहना कि उनका संघ से कोई सम्बन्ध नहीं है न केवल तथ्यों को छिपाने की कोशिश है बल्कि सरकार को बचाने की कोशिश का भी एक हिसा है।