किताब परिचय : फ्रांस की क्रान्ति

–– निधि गौतम

अभी हाल ही में मैंने प्रो– लाल बहादुर वर्मा की लिखी एक पतली–सी पुस्तिका ‘फ्रांस की क्रान्ति’ पढ़ी। पुस्तिका छोटी है, लेकिन मुझे बेहद उपयोगी लगी। अगर हम फ्रांस की क्रान्ति के महत्व, उसकी कमियों, उस दौर की परिस्थितियों और क्रान्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वर्गों को समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तिका एक अच्छी शुरुआत हो सकती है।

इस पुस्तिका को पढ़ते हुए एक बात खास तौर पर समझ में आती है कि क्रान्ति अचानक नहीं होती। उससे पहले वैचारिक क्रान्ति की लम्बी तैयारी होती है, लोगों के भीतर सवाल पैदा होते हैं और धीरे–धीरे उन परिस्थितियों का आधार तैयार होता है, जिनसे क्रान्ति जन्म लेती है।

फ्रांस में उस समय समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में बँटा हुआ था–– सामन्ती वर्ग, पादरी वर्ग और तीसरा वर्ग, जिसमें किसान, व्यापारी, मजदूर और आम मेहनतकश लोग शामिल थे। पहले दो वर्गों के पास विशेषाधिकार थे, जबकि तीसरे वर्ग पर करों का बड़ा बोझ था। धीरे–धीरे तीसरे वर्ग के लोग यह समझने लगे कि जिन लोगों ने खुद को ईश्वर और आम इनसान के बीच बिचैलिया बना रखा है, वही उनके शोषण में भी हिस्सेदार हैं। दूसरी तरफ राजा और शासक वर्ग अपनी विलासिता पर भारी खर्च कर रहे थे, जबकि आम जनता आर्थिक बोझ झेल रही थी।

इससे लोगों के भीतर असन्तोष और आक्रोश बढ़ता गया, खासकर उस समय का उभरता हुआ व्यापारी और बुर्जुआ वर्ग जो आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा था। उसके हाथ में आर्थिक ताकत तो आ रही थी, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक ताकत अभी उसके पास नहीं थी। आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक ताकत पाने की चाहत से पैदा हुआ यही टकराव फ्रांस की क्रान्ति के महत्वपूर्ण कारणों में से एक बना।

इस किताब की खास बात यह है कि इसमें फ्रांस की क्रान्ति का इतिहास बहुत विस्तार से नहीं बताया गया है। बल्कि यह हमें क्रान्ति को समझने का एक बुनियादी नजरिया देती है कि क्रान्ति की जरूरत क्यों पड़ती है, किन परिस्थितियों में उसके लिए जमीन तैयार होती है और उसके पीछे कौन–कौन से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण काम करते हैं।

मैं हाल ही में एक अध्ययन चक्र में शामिल हुई। उसके जरिये फ्रांस की क्रान्ति को और करीब से जाना–समझा था। इसलिए जब लाल बहादुर वर्मा जी की यह किताब पढ़ी, तो पहले से सुनी–समझी बातों को जोड़ने और फ्रांस की क्रान्ति के महत्व को सही रूप में समझने में मुझे काफी मदद मिली। मुझे लगता है कि अगर कोई व्यक्ति इस क्रान्ति को बिल्कुल शुरुआत से समझना चाहता है, तो उसे यह किताब पढ़नी चाहिए। इसके बाद दूसरी किताबों के जरिये अपनी समझ को और गहरा किया जा सकता है। इसे पढ़ने के बाद मेरी यह इच्छा है कि मैं दूसरी किताबों के माध्यम से इस क्रान्ति को और गहराई से समझूँ और सिर्फ फ्रांस तक ही सीमित न रहूँ, बल्कि दुनिया के अलग–अलग हिस्सों में हुई दूसरी क्रान्तियों को भी पढ़ूँ और जानूँ।

एक और खास बात इस किताब की यह है कि इसकी शुरुआत भी एक सवाल से होती है और अन्त भी एक सवाल के साथ होती है–– हम अतीत को इतिहास के माध्यम से क्यों जानना चाहते हैं? इसके जरिये मैं यह समझने की कोशिश करना चाहती हूँ कि आज भारत में क्रान्ति की परिस्थितियाँ कितनी बन गयी हैं।

फ्रांस की क्रान्ति का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने समाज और राजनीति के केन्द्र में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों को स्थापित किया। उसने दुनिया के सामने यह विचार रखा कि सत्ता किसी राजा या विशेष वर्ग की जागीर नहीं होनी चाहिए, बल्कि जनता की होनी चाहिए और हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलने चाहिए। इसी विचार ने आगे चलकर दुनिया भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था, समान नागरिक अधिकारों और लोकतंत्र में जनता की भागीदारी की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

फ्रांस की क्रान्ति ने जनवादी अधिकारों और मूल्य–मान्यताओं के लिए एक मशाल जलायी थी। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि फासीवादी निजाम धीरे–धीरे उन्हीं को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। भारत हो या दुनिया का कोई दूसरा देश, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। जिन संस्थाओं का काम जनता के अधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा करना है, उन्हें बेशर्मी से पूँजीपतियों के हित में इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत में चुनाव आयोग, सीबीआई और मीडिया जैसी संस्थाओं को सरकार की कठपुतली बना दिया गया है। वे अब अपनी स्वतंत्र भूमिका निभा नहीं पा रहे हैं, बल्कि सत्ता और पूँजी के दबाव में काम कर रहे हैं।

एक तरफ बड़े पूँजीपतियों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज माफ होने की खबरें सामने आती हैं और दूसरी तरफ आम जनता कर्ज, बेरोजगारी और महँगाई के बोझ से परेशान है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार की नीतियों का लाभ आखिर किस वर्ग को मिल रहा है? लोगों के अन्दर आक्रोश बढ़ रहा है। छात्र, मजदूर, किसान और महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए लगातार आन्दोलन कर रहे हैं और बार–बार इन आन्दोलनों का दमन किया जा रहा है। यह सब फ्रांस की क्रान्ति की याद दिलाता है। ऐसा लगता है कि हम उसकी दहलीज पर खड़े हैं।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि आज की दुनिया में वे परिस्थितियाँ और अन्तर्विरोध लगातार मजबूत हो रहे हैं, जो किसी बड़े सामाजिक परिवर्तन की जमीन तैयार कर सकते हैं। बड़े जन आन्दोलनों का उभार इसी प्रक्रिया का हिस्सा है जैसा फ्रांस की क्रान्ति के वक्त हुआ था। आज भी पूरी दुनिया में दो वर्गों के बीच टकराव पैदा हो गया है। पूँजीवादी व्यवस्था में एक ओर पूँजीपति वर्ग लगातार आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन करने वाला मजदूर वर्ग हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद असुरक्षित और बदहाल जीवन जी रहा है। यही वर्गीय विभाजन असन्तोष को जन्म देता है।

आज भी दो वर्गों के बीच में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संघर्ष नजर आ रहा है। फासीवादियों द्वारा इतिहास के पहिये को पीछे धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए आज फिर से वोल्तेयर, रूसो, दिदेरो, मान्तेस्क्यू आदि महान दार्शनिकों के विचारों को जिन्दा करने की जरूरत है। उन्हें किताबों से उठाकर जिन्दगी में लाने की जरूरत है। आज हमें यूरोपीय पुनर्जागरण, प्रबोधन और फ्रांस की क्रान्ति की रोशनी में अपने जनवादी अधिकारों की रक्षा के लिए लामबन्द होना है और फासीवादी निजाम का सामना करना है।

पुस्तिका का नाम : फ्रांस की क्रान्ति

प्रकाशक : संवाद प्रकाशन

मूल्य : 20 रुपये