चार महीने में चैथी बार : स्मारकों पर हमले का अर्थ
सामाजिक-सांस्कृतिकचार महीने में चैथी बार : स्मारकों पर हमले का अर्थ
–– राजेन्द्र प्रसाद सिंह
स्मारक केवल पत्थर, धातु या सीमेंट से बनी आकृतियाँ नहीं होते। वे किसी समाज की सामूहिक स्मृति के दृश्य प्रतीक होते हैं। इसलिए किसी स्मारक को उखाड़ना, तोड़ना या विकृत करना केवल एक प्रतिमा के साथ की गयी हिंसा नहीं हैय वह उस स्मृति, उस विचार और उस इतिहास पर हमला है, जिसका वह स्मारक प्रतिनिधित्व करता है।
पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में 27 अगस्त 2026 की रात रक्षाबन्धन के कार्यक्रम के लिए अतिरिक्त जगह बनाने के नाम पर हर्षवर्धन रोड स्थित एक प्राथमिक विद्यालय परिसर से पंडित जवाहरलाल नेहरू की आदमकद मूर्ति को क्रेन से उखाड़कर पास के जंगल में फेंक दिया जाना इसी दृष्टि से गम्भीर घटना है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी भूमिका निभाने वाले नेहरू ने लगभग नौ वर्ष अंग्रेजों की जेल में बिताये थे। वे राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक और सामाजिक समानता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि के पक्षधर थे।
ऐसे व्यक्ति की प्रतिमा को इस तरह उखाड़कर फेंक देना क्या महज जगह खाली करने की प्रशासनिक कवायद मानकर छोड़ दिया जाना चाहिए? कांग्रेस नेतृत्व ने इस घटना में भाजपा की संलिप्तता का आरोप लगाते हुए 24 घंटे के भीतर उसी स्थान पर नेहरू की आदमकद प्रतिमा पुन: स्थापित करने की माँग की है। आरोप यह भी है कि स्थानीय विधायक के इशारे पर प्रतिमा को हटाया गया।
किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति को किसी ऐतिहासिक व्यक्ति से वैचारिक असहमति हो सकती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मूलभूत है। लेकिन असहमति का उत्तर प्रतिमा उखाड़कर, स्मारक तोड़कर या किसी विचार के प्रतीक को अपमानित करके दिया जाने लगे तो मामला राजनीति से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक संस्कृति का हो जाता है।
आज पिछले चार महीनों की घटनाओं को एक साथ देखने की जरूरत है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद स्मारकों पर हमले की चैथी बड़ी घटना है। पहली घटना थी–– चुनाव परिणाम आने के तुरन्त बाद मुर्शिदाबाद जिले के जियागंज में विश्व सर्वहारा के महान नेता और सोवियत संघ के रूपकार व्लादिमीर लेनिन के ऐतिहासिक स्मारक को एक संगठित उन्मादी गिरोह द्वारा ध्वस्त किया जाना।
लेनिन से असहमति रखने का पूरा अधिकार किसी को है। उनके विचारों की आलोचना की जा सकती है, उनके राजनीतिक सिद्धान्तों से असहमति व्यक्त की जा सकती है। लेकिन क्या उनके विचारों का उत्तर उनके स्मारक को तोड़ना है?
लेनिन का विश्वास था कि पूँजीवाद अपने घरेलू बाजारों की सीमाओं से बाहर निकलकर उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का रूप ग्रहण करता है और साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने मुनाफे और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए युद्ध करती हैं। मौजूदा हालात में उनके विचारों की प्रासंगिकता पर बहस हो सकती है, लेकिन उनके विचारों से भयभीत होकर उनकी प्रतिमा को नष्ट करना विचार का उत्तर नहीं है। बल्कि यह विचार से भय का संकेत है।
12 जुलाई 2026 की रात पश्चिम बंगाल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन के आदमकद स्मारक को क्रेन से उखाड़कर कहीं फेंक दिया गया। राहुल सांकृत्यायन केवल साहित्यकार नहीं थे। वे इतिहास, दर्शन, भाषा, संस्कृति और समाज के गम्भीर अध्येता थे। उनका प्रसिद्ध आह्वान था–– ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो।’ समस्याओं से पलायन नहीं, उनका सामनाय जड़ता के बजाय परिवर्तनय अंधविश्वास के बजाय तर्क और मानसिक गुलामी से मुक्ति–– राहुल सांकृत्यायन की वैचारिक यात्रा का यही मूल स्वर था। उन्होंने बाहरी परिवर्तन के साथ मानसिक क्रान्ति की जरूरत पर बल दिया।
ऐसे लेखक का स्मारक क्यों असहज करता है? इसलिए कि तार्किक और प्रश्नाकुल चेतना किसी भी निरंकुश व्यवस्था के लिए सहज नहीं होती। जो व्यवस्था यथास्थिति को बनाये रखना चाहती है, उसके लिए परिवर्तन की आवाज हमेशा असुविधाजनक होती है।
अब तीसरी घटना पर आइए। 14 अगस्त 2026 की रात पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के न्यू अलीपुर इलाके के बोटतला मोड़ स्थित नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के स्मारक को विकृत किया गया। नेताजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान स्वप्नद्रष्टाओं में थे, जिन्होंने अपना व्यक्तिगत जीवन राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। उनका आह्वान था–– “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा–––”
नेताजी का राष्ट्रवाद संकीर्ण धार्मिक राष्ट्रवाद नहीं था। वे सभी धर्मों की समानता और सेक्युलर राष्ट्रवाद के समर्थक थे और मुसलमानों सहित सभी भारतीयों को समान नागरिक मानते थे। इसलिए आज जब राष्ट्रवाद को धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिशें तेज हैं, तब नेताजी की विरासत का राजनीतिक अर्थ और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
इन घटनाओं को अलग–अलग करके देखने से शायद उनका वास्तविक अर्थ छूट जाये। नेहरू, लेनिन, राहुल सांकृत्यायन और सुभाष चन्द्र बोस–– इन चारों की राजनीतिक और वैचारिक यात्राएँ अलग थीं। उनके विचारों में भी समानता नहीं थी। लेकिन एक बात उन्हें जोड़ती है–– इन सभी ने स्थापित सत्ता, जड़ता या अन्याय के सामने प्रश्न खड़े किये और मनुष्य तथा समाज को बदलने की आकांक्षा व्यक्त की।
यही वह बिन्दु है जहाँ स्मारक विचार का दृश्य रूप बन जाता है।
जब प्रतिमा गिरायी जाती है तो केवल धातु या पत्थर नहीं गिरता। उसके साथ इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश भी होती है। यह तय करने की कोशिश होती है कि आने वाली पीढ़ियाँ किसे याद करें और किसे भूल जायेंय किस विचार को सम्मान मिले और किस विचार को अपमानित किया जाये।
इसलिए इन घटनाओं को केवल कानून–व्यवस्था की सामान्य घटनाओं की तरह देखना पर्याप्त नहीं होगा।
लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा दायित्व असहमति के लिए जगह बचाये रखना है। जब सत्ता या उसके समर्थक विरोधी विचार को तर्क से परास्त करने के बजाय उसके प्रतीकों को मिटाने लगें, तब यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए गम्भीर चेतावनी होती है। विरोधी विचारों के लिए सार्वजनिक और वैचारिक भूमि सिकुड़ने लगे तो समझना चाहिए कि समस्या केवल प्रतिमाओं की नहीं है।
समस्या उस मानसिकता की है जो एक देश में केवल एक रंग, एक धर्म, एक विचार, एक भाषा और एक संस्कृति देखना चाहती है।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में रही है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक आस्थाएँ हैं, अनेक जीवन–पद्धतियाँ हैं, अनेक राजनीतिक और दार्शनिक परम्पराएँ हैं। इस विविधता को स्वीकार किये बिना भारतीय राष्ट्र की कल्पना अधूरी है। जो राजनीति इस विविधता को अपने लिए बाधा मानती है, वह अन्तत: असहमति को भी बाधा मानने लगती है।
साम्प्रदायिकता बाहर से अक्सर सात्विक और सांस्कृतिक भाषा में प्रवेश करती है। लेकिन उसके भीतर विभाजन की राजनीति पलती रहती है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही वही राजनीति हिंसा, घृणा और बहिष्कार में बदल जाती है।
इसलिए स्मारकों पर हो रहे ये हमले हमें सचेत करते हैं।
यहाँ यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि किसी भी घटना में राजनीतिक संलिप्तता के आरोपों की पुष्टि जाँच के बाद ही हो सकती है। लेकिन यदि लगातार ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं तो हमारा लोकतांत्रिक दायित्व है कि वह उनके पीछे काम कर रही मानसिकता पर प्रश्न उठाये।
देश के मेहनतकश अवाम, प्रगतिशील शक्तियों, धर्मनिरपेक्ष नागरिकों और बौद्धिक वर्ग के लिए यह समय चुप रहने का नहीं है। इतिहास को मिटाने की कोशिशों का उत्तर इतिहास की अधिक गहरी समझ से देना होगा। प्रतिमाओं की रक्षा के साथ उन विचारों की भी रक्षा करनी होगी जिनकी स्मृति वे अपने भीतर सँजोए हुए हैं।
फासीवाद का मुकाबला केवल चुनावी नारों से नहीं होता। उसका मुकाबला विचार से, तर्क से, वैज्ञानिक चेतना से, लोकतांत्रिक मूल्यों से और जनता की संगठित प्रतिरोध–चेतना से होता है।
विचार को क्रेन से उखाड़ा नहीं जा सकता। किसी प्रतिमा को जंगल में फेंका जा सकता है, लेकिन उससे जुड़े प्रश्न को नहीं। किसी स्मारक को विकृत किया जा सकता है, लेकिन इतिहास की स्मृति को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता।
लेनिन, राहुल सांकृत्यायन, सुभाष चन्द्र बोस और नेहरू–– इनके विचारों से सहमति या असहमति अपनी जगह है। लेकिन इनसे संवाद करने की जगह यदि उन्हें मिटाने की कोशिश होने लगे तो यह केवल उन व्यक्तित्वों का नहीं, हमारे समय के लोकतांत्रिक विवेक का भी प्रश्न है।
इसलिए इन घटनाओं को हल्के में लेना भूल होगी। क्योंकि प्रतिमा के गिरने की आवाज हमेशा पत्थर के टूटने की आवाज नहीं होती। कभी–कभी वह आने वाले समय की पदचाप भी होती है। और तब सवाल केवल इतना नहीं रह जाता कि स्मारक किसने तोड़ा। सवाल यह होता है–– अगला निशाना स्मारक होगा या स्मृति? और अन्तत: हमें यह तय करना होगा कि हम इतिहास को मिटते हुए देखते रहेंगे या उसके पक्ष में खड़े होंगे।
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