‘बिग ब्रदर इज वाचिंग यू’– पिछले 50 सालों के आन्दोलनों का गृह मन्त्री ने माँगा ब्यौरा
राजनीति मोहित पुण्डीर“कहीं गैस का धुआँ है, कहीं गोलियों की बारिश
शब–ए–अहद–ए–कमनिगाही तुझे किस तरह सुनाएँ”
––हबीब जालिब
बीते जुलाई महीने में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पुलिस विभाग और खुफिया एजेंसियों को पिछले 50 साल में हुए सभी महत्वपूर्ण आन्दोलनों का समग्र और व्यवस्थित अध्ययन करने का आदेश दिया है। इस अध्ययन के जरिये 1975 के जेपी आन्दोलन से लेकर अभी तक के सभी बड़े आन्दोलनों का उद्देश्य और उनकी माँगें, उनकी अगुवाई करने वाले प्रमुख व्यक्ति और संगठन, उनका देशव्यापी फैलाव और उनके मजबूत गढ़, आन्दोलन को आर्थिक मदद देने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों का विवरण और इसके साथ ही उन आन्दोलनों की वर्तमान स्थिति और भविष्य में उनकी रणनीति आदि पहलुओं पर विस्तृत रिपोर्ट बनाने को कहा गया है।
अमित शाह ने इस फैसले को एक रूटीन सुरक्षा उपाय बताया है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ इस काम के लिए सरकार एक बहुस्तरीय ढाँचा बना रही है जिसमें इंटेलीजेंस ब्यूरो, प्रवर्तन निर्देशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी समेत दर्जनों विभागों को आन्दोलनों की जाँच–पड़ताल करने और उनकी जासूसी करने का आदेश दिया गया है। इसके साथ ही ‘पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो’ को इस जानकारी के आधार पर एसओपी यानी ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ तैयार करने का भी आदेश दिया है। एसओपी पहले से तैयार एक रणनीति होगी जिसे सरकार किसी भी जन–आन्दोलन को खत्म करने के लिए इस्तेमाल कर सकेगी। क्या सिर्फ एक रूटीन सुरक्षा उपाय के लिए सरकार इस तरह युद्ध–स्तरीय योजना बना रही है? या फिर भविष्य में होने वाले बड़े आन्दोलन जो सरकार को चुनौती दे सकते हैं उन्हें खत्म करने की तैयारी की जा रही है? अमित शाह के इस फरमान को पिछले सालों में हुई अनेक राजनैतिक–आर्थिक घटनाओं की निरन्तरता में देखना होगा तभी हम किसी निर्णायक नतीजे पर पहुँच सकते हैं। इसके लिए तथ्यों की रौशनी में मौजूदा राष्ट्रीय परिस्थिति और सत्ता के चरित्र का मूल्यांकन करना एक जरूरी कार्यभार है।
यह आदेश ऐसे समय में आया है जब एक तरफ हमारे पड़ोसी देशों–– बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका में भयंकर बेरोजगारी और भ्रष्ट शासन के खिलाफ उभरे जन–आन्दोलनों ने वहाँ के सत्ताधारियों को धूल में मिला दिया है। वहीं दूसरी तरफ भारत में नौजवानों, किसानों, मजदूरों समेत अन्य शोषित–पीड़ित जनता के आन्दोलनों की एक नयी लहर सरकार को नाकों चने चबवा रही है। कुछ साल पहले ही जनविरोधी तीन कृषि कानूनों के खिलाफ उभरे देशव्यापी आन्दोलन में किसानों के संकल्प की चट्टान से टकराकर सरकार का गुरूर चकनाचूर हो चुका है। तमाम बाधाओं के बाद भी आन्दोलन ने रफ्तार पकड़ी और आखिरकार सरकार को अपना फैसला वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया। यह मोदी सरकार की पहली हार थी जब किसी जनान्दोलन के दबाव में उसे अपनी पूँजीपरस्त नीतियों से पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा था। इसके बाद से ही सरकार बढ़ते आन्दोलनों को नियंत्रित करने के लिए योजना बना रही थी जिसकी एक कड़ी के रूप में अमित शाह का यह आदेश आया है।
पिछले कुछ सालों में देश अनेक आन्दोलनों का गवाह बना है। इनमें एक तरफ जंगल बचाने और पर्यावरण संकट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों और अपने जनवादी अधिकारों के लिए दलितों और महिलाओं के आन्दोलन हैं। दूसरी तरफ शिक्षा के निजीकरण, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर छात्र और नौजवान सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। समान वेतन और स्थायी रोजगार जैसी माँगों को लेकर विभिन्न प्रान्तों में राज्य कर्मचारियों के आन्दोलन लगातार जारी हैं। खेती और उद्योगों में जनविरोधी नीतियों के खिलाफ किसानों और मजदूरों का बड़ा हिस्सा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहा है। इसके साथ ही बढती महँगाई, भ्रष्टाचार और गैर–बराबरी ने आम जनता को आक्रोशित कर दिया है। इसका नतीजा विरोध और आन्दोलन के रूप में सामने आ रहा है। इन आन्दोलनों का चरित्र क्षेत्रीय सीमा को लांघकर राष्ट्रीय स्तर का बन रहा है। दमनात्मक कार्रवाइयों से इन आन्दोलनों के प्रति सरकार के रवैये को समझा जा सकता है।
मजदूरों, कर्मचारियों, नौजवानों, किसानों, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों समेत सभी शोषित–पीड़ित समुदायों के आन्दोलनों को बढ़ता देख सरकार साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति से उन्हें खत्म करने पर आमादा है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आन्दोलन हो, एनआरसी के खिलाफ आन्दोलन हो या मजदूरों के आन्दोलन, इन सब के प्रति सरकार के रवैये का एक पैटर्न साफ नजर आता है। सबसे पहले सरकार किसी भी आन्दोलन को सीमित करने की कोशिश करती है, उसकी सूचनाओं और खबरों को दबाती है। लेकिन अगर आन्दोलन उसके बाद भी लोगों के बीच पहचान बनाने लगता है तो सरकार आन्दोलनकारियों की असली माँगों से ध्यान भटकाने के लिए जनता के बीच उन्हें बदनाम करने का रास्ता अपनाती है। इस काम में मुख्यधारा का मीडिया सरकार का पूरा साथ दे रहा है। सरकार की यह कूटनीति हर आन्दोलन में देखने को मिल रही है–– छात्रों की जायज माँगों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए उनके नेताओं को अर्बन नक्सल कहकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। इसी तरह किसान आन्दोलन को खालिस्तानी आन्दोलन बताकर या फिर उन्हें विदेशी ताकतों की साजिश बताकर बदनाम करने के हजार प्रयास हो चुके हैं। किसानों के चरित्र के बारे में भाजपा के बड़े–बड़े नेताओं ने भद्दी टिप्पणी तक की है। ‘एनआरसी’ और ‘सीएए’ के खिलाफ हुए आन्दोलन को तो देशद्रोही और उसके नेताओं को आतंकवादी तक घोषित कर दिया गया। वहीं आदिवासियों के आन्दोलनों को नक्सली समर्थक बताकार उनका बर्बर दमन किया जा रहा है। मजदूरों के आन्दोलन को कम्युनिस्टों का षड्यंत्र बताया जाता है। आज भाजपा ने जनान्दोलनों और प्रगतिशील लोगों और जनआन्दोलनों के खिलाफ अफवाह, कुत्सा प्रचार और चरित्र हनन की मुहिम चलाने के लिए एक बड़ी मशीनरी का निर्माण किया है। इसमें सत्ता और मीडिया का अश्लील गठजोड़ तो है ही, साथ में हिन्दुत्ववादी संगठन जमीन पर कुख्यात भूमिका निभा रहे हैं। सरकार का विरोध आज हिन्दुत्व के विरोध का पर्याय बना दिया गया है। इसके चलते सरकार अपने कुकृत्यों में एक बड़े जनसमुदाय की सहमति हासिल कर लेती है और विपक्षियों को अलग–थलग करने में काफी हद तक सफल नजर आ रही है।
अगर आन्दोलन इसके बाद भी जनता का समर्थन हासिल करने में सफल हो जाता है तो सरकार उसके दमन का रास्ता अपना रही है। पिछले दिनों कई दमनात्मक कानूनों को मजबूत करना और उनका दुरूपयोग सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं पर करना इसी कड़ी का हिस्सा है। 2019 में सरकार ने यूएपीए कानून में संसोधन किया था। अंग्रेजों के समय से चले आ रहे इस देशद्रोह के कानून को खत्म करने की माँग उठती रही है, उल्टे भाजपा ने इस काले कानून को और मजबूत किया है। अब सरकार इस कानून के जरिये किसी भी व्यक्ति को केवल शक के आधार पर ही गिराफ्तार कर बिना मुकदमा चलाये वर्षों जेल में बन्द कर सकती है, अपना पक्ष रखने के उसके अधिकार को खत्म कर सकती है।
इसी तरह 2020 में सरकार ने एफसीआरए यानी ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम’ में भी संशोधन कर अनेक जनपक्षधर और मानवाधिकार संगठनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। विदेशी फंडिंग बन्द करवाकर कई संस्थानों की रीढ़ ही तोड़ दी गयी है। 2021 में नये आईटी नियम बनाये गये हैं जिनके तहत सरकार सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अधिक नियंत्रण कर सकती है। वह किसी भी खबर को सोशल मीडिया से हटा सकती है और साथ ही उसे झूठी करार देकर अफवाह घोषित कर सकती है। ऐसे ही अनेक कानून पिछले एक दशक में पारित किये गये हैं। पिछले सालों में इन्हीं कानूनों का दुरूपयोग कर सरकार ने स्वतंत्र पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, छात्रों, विपक्षी नेताजों समेत अनेक लोगों पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उनकी आवज दबाने का काम किया है। सरकार का यही रवैया जनान्दोलनों के प्रति भी देखने को मिल रहा है। हाल में सोनम वान्गचुंग पर देशद्रोह का मुकदमा लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया है। मानवाधिकार वकील सुधा भारद्वाज, प्रोफेसर और लेखक आनन्द तेलतुम्बडे समेत अनेक लोगों को सरकार ने भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा के बाद गिरफ्तार किया था। दरअसल यह सभी लम्बे समय से सरकार की गलत नीतियों का विरोध कर रहे थे। इनमें आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले 75 साल के स्टेन स्वामी भी थे जिनकी हिरासत में ही मौत हो गयी थी। कई सालों तक जेल में रखने के बाद इनमें से अधिकतर बेगुनाह साबित हुए हैं। इसी तरह 2020 में दिल्ली दंगों के बाद कई छात्र नेताओं और सामजिक कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह का कानून लगाया गया। उमर खालिद पिछले 5 साल से जेल में बन्द हैं जिनकी लम्बे समय तक सुनवाई तक नहीं हुई है।
अनेक जनान्दोलन सरकार की दमनात्मक नीति की भेट चढ़ चुके हैं। झारखण्ड का ‘पथलगड़ी’ आन्दोलन इसका एक उदहारण है। अडानी की ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आदिवासियों को जबरन उनकी भूमि से विस्थापित किया गया था। सरकार ने पहले से बने ‘पीसा एक्ट, 1996’ और ‘फारेस्ट राईट एक्ट, 2006’ की अनदेखी करते हुए आदिवासियों से किसी भी तरह की कोई वार्ता नहीं की। स्थानीय आदिवासी समुदायों ने सरकार के इस तानाशाही रवैये का विरोध किया। उन्होंने ग्राम सभा के स्तर पर अपने संगठन बनाकर अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन उनकी समस्या सुनने और समझने की जगह सरकार ने सैंकड़ों आदिवासियों पर गैर–जमानती धाराएँ लगाकर उन्हें जेल में बन्द कर दिया। उनके आन्दोलन के नेताओं को माओवादी कहकर बदनाम किया गया। इसी तरह ओड़िसा का जगतसिंहपुर जंगल बचाओ आन्दोलन, जिसमें हजारों आदिवासियों ने हरे जंगल को काटकर वहाँ कार्बन स्टील प्लाण्ट लगाने का विरोध किया। सरकार ने उनके आन्दोलन को भी बदनाम करने और हिंसात्मक तरीके से कुचलने का प्रयास किया। आज सरकार मजदूरों, नौजवानों के शान्तिपूर्ण आन्दोलन को भी बर्दास्त नहीं कर पा रही है। एक तरफ संविधान हर नागरिक को शान्तिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है, वहीं दूसरी तरफ सरकार पिछले एक दशक से जनता के इस मौलिक अधिकार पर हमलावर नजर आ रही है।
लेकिन कुछ आन्दोलन सरकार के दमनचक्र और उसके चक्रव्यूह को भेदने में सफल हुए हैं। इसके चलते सरकार को अपनी नीतियों से पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा है। गृह मंत्री अमित शाह का यह आदेश इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। अब सरकार सभी आन्दोलनों की निगरानी करेगी ताकि आन्दोलन के प्रभावशील होने से पहले ही उसके नेताओं और सदस्यों को तोड़ा जा सके, सोशल मीडिया अभियान को प्रोपोगेंडा बताकर रोका जा सके। इसके जरिये सरकार भविष्य में होने वाले किसी भी विरोध और आन्दोलन को जन्म लेने से पहले ही कुचलने की योजना बना रही है। यानी हर प्रकार का विरोध चाहे वह कितना भी शान्तिपूर्ण और संवैधानिक क्यों न हो उसे ‘सुरक्षा के लिए खतरा’ घोषित कर दबाने का प्रयास किया जाएगा। सरकार एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रही है जहाँ बाहरी तौर पर चुनाव तो होंगे, लेकिन लोकतंत्र के इस खोल के अन्दर पूँजी और सत्ता की नंगी तानाशाही होगी, जनता के हकों पर हमले होंगे और उसके विरोध को कुचलने का प्रयास किया जाएगा।
सवाल यह उठता है कि आखिर मोदी सरकार अपने ही देश की जनता की दुश्मन क्यों बनी हुई है? मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवेर्नेंस’ का नारा दिया था। एक दशक बाद अब इस नारे की परिणिति हमारे सामने है। इसके तहत सरकार दो तरह की भूमिका निभा रही है। पहला, पूँजी के फैसिलिटेटर की भूमिका यानी पूँजी के लिए अधिकाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करना, जैसे–– पुराने श्रम कानूनों में बदलाव कर उसे कमजोर करना, पर्यावरण सम्बन्धी बाधाओं को हटाना, जंगलों की कटाई करना, पूँजीपतियों को टैक्स में भारी छूट देना, प्राकृतिक संसधानों को कोड़ियों के मोल बेचना। दूसरा, अब तक जिन सामाजिक सेवाओं को सरकार की जिम्मेदारी माना जाता था, जैसे–– स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, सिंचाई, बिजली, आदि से पिण्ड छुड़ाकर उनका निजीकरण करना और उन्हें पूँजीपतियों के मुनाफे का जरिया बनाना। यानी देश के करोड़ों मेहनतकश लोगों की कंगाली और बर्बादी की कीमत पर मुट्ठीभर लोगों का विकास।
इन्हीं का नतीजा है कि देश के 1,687 सबसे अमीर लोगों की सम्पत्ति निर्धनतम 50 करोड़ लोगों से भी ज्यादा हो गयी है। यही 1990 से देश में लागू नव–उदारवादी नीतियों का यही जमा–जोड़ है। इन्हीं नीतियों को कांग्रेस धीमी रफ्तार से लागू कर रही थी। लेकिन पूँजीवाद के वैश्विक मन्दी के दौर में अपने मुनाफे की दर को बरकरार रखने के लिए पूँजीपति मेहनतकश जनता के खून की आखिरी बूँद तक मुनाफे में बदलने को आतुर हैं। लोकतंत्र के लबादे के पीछे छिपकर उनके लिए मुनाफा कमाना अब सम्भव नहीं रह गया है। आज उन्हें इस लबादे को उतार कर जनता पर ‘आयरन हैण्ड’ लागू करने वाली सरकार की दरकार है, जो मेहनतकश जनता के अधिकारों को खत्म कर सके और उनके विरोध को निर्मम तरीके से दबा सके। यह काम भाजपा हिन्दुत्व और कोर्पाेरेट के नाजायज गठबन्धन के जरिये करने की कोशिश कर रही है।
छद्म राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता के खोल में पूँजी की चाकरी, यही है हिन्दुत्व और कोर्पाेरेट का नाजायज गठबन्धन। जनता के हर विरोध को देश विरोधी और हिन्दुत्व का दुश्मन बना देना, आर्थिक और सामाजिक पतन के शिकार लोगों में धर्मांधता को बढ़ाकर लोगों की तार्किक शक्ति को छीनकर उन्हें एक दूसरे के खून का प्यासा बनाया जा रहा है। ऐसे समय में मेहनतकश जनता को अपने वर्ग मित्र और शत्रु की पहचान करनी होगी, उसे अपने बीच के नकली धार्मिक, क्षेत्रीय और जातिगत भेदभाव को मिटाकर एक व्यापक एकता का निर्माण करना होगा। हिटलर, मुसोलिनी से लेकर बड़े–बड़े तानाशाहों को जनता की संगठित ताकत ने मिट्टी में मिलाया है। इसी संगठित ताकत के दम पर सरकार के हजार दमन के बाद भी नये–नये आन्दोलन फिनिक्स पंछी की तरह अपनी राख से दुबारा उठ खड़े होंगे और लूट पर टिके इस तंत्र को हवा में उड़ा देंगे।
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