भाजपा सदस्यता अभियान की असलियत
राजनीति मोहित पुण्डीर2 सितम्बर को भाजपा ने पार्टी सदस्यता देने के लिए सदस्यता अभियान शुरू किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी पहली सदस्यता लेते हुए कहा कि भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है, 10 करोड़ नये सदस्य बनाकर हम अब नया कीर्तिमान खड़ा करेंगे। भाजपा का यह दूसरा सदस्यता अभियान है। 2014 में भाजपा ने 8 करोड़ सदस्य बनाने का दावा किया था। उस दौरान हुए लोकसभा चुनाव में इसका जमकर प्रचार किया गया था। लोगों के बीच नरेन्द्र मोदी की युगपुरुष की छवि गढ़ी गयी थी। भाजपा ने चुनावों में इसका जमकर फायदा उठाया था। लेकिन इस साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। ऐसे में इस नये सदस्यता अभियान के मनोविज्ञान, राजनीति और आर्थिकी को समझना बेहद जरूरी है।
भाजपा का यह सदस्यता अभियान शुरू से ही सन्देह के घेरे में रहा है। एक तरफ भाजपा रिकॉर्ड तोड़ सदस्य बनाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे देश का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा बता रहा है। 19 सितम्बर को ‘द हिन्दू’ अखबार के वरिष्ठ पत्रकार महेश लांगा ने गुजरात में चल रहे सदस्यता अभियान पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। उन्होंने इस रिपोर्ट में अस्पताल, स्कूल–कॉलेज, सरकारी विभागों, राशन की दुकानों आदि में चल रही फर्जी सदस्यता अभियान की कलई खोल दी। इस रिपोर्ट में उन्होंने जबरन सदस्य बनाने के खिलाफ आम जनता द्वारा की गयी अनेक एफआईआर का जिक्र किया है। ऐसी ही एक एफआईआर राजकोट के एक सरकारी अस्पताल के खिलाफ भी की गयी थी। दरअसल शिकायतकर्ता मोतियाबिन्द का ऑपरेशन कराने के लिए इस अस्पताल में भर्ती हुए थे। उनके अनुसार रात को करीब 11 बजे अस्पताल के कर्मचारियों ने वहाँ भर्ती लगभग 200 मरीजों को उठाकर उनसे उनका फोन ले लिया। इससे पहले वह कुछ समझ पाते तब तक वे सभी भाजपा के सक्रिय सदस्य बन चुके थे। गुजरात के अनेक अस्पतालों में ऐसा ही सदस्यता अभियान जोरों से चला। एण्टी–रेबीज की वैक्सीन लगवाने अस्पताल गयी एक महिला से फोन लेकर जबरन उसे भाजपा का सदस्य बना दिया गया, इस पूरी घटना को उस महिला ने अपने फोन में रिकॉर्ड कर लिया। लेकिन पुलिस को सभी सबूत देने के बाद भी अस्पताल प्रबन्धन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी।
गुजारत के ही सुरेन्द्रनगर जिले के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ने तो हद ही कर दी थी। उसने मोबाइल नम्बर को राशन कार्ड से लिंक कराने का बहाना बनाकर सभी अभिभावकों को भाजपा का सदस्य बना दिया। जब लोगों को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठायी। लेकिन प्रशासन ने इस मामले को दबा दिया। इसी रिपोर्ट में मनरेगा मजदूरों और सरकारी कर्मचारियों पर दबाव बनाकर उन्हें जबरन सदस्य बनाने का भी भण्डाफोड़ किया गया है। भाजपा के किसी भी नेता ने इन घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि रिपोर्ट प्रकाशित होने के कुछ दिन बाद ही महेश लांगा पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। बिना सुनवाई उन्हें 10 दिन जेल में गुजारने पड़े।
गुजरात ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, समेत सभी जगह से फर्जी सदस्य बनाने की खबरों की बाढ़ आयी हुई है। कई जगहों पर सदस्य बनने से मना करने पर मारपीट तक की गयी है। मध्य–प्रदेश के छतरपुर में दो बाइक सवार लोगों द्वारा सदस्य बनने से मना करने पर पहले तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया, उसके बाद उनके फोन छीन लिये गये। उन्होंने इसके खिलाफ एफआइआर करायी, तब जाकर यह मामला सामने आया। प्रधानमंत्री मोदी ने नये कीर्तिमान खड़े करने की बात कही थी, यह अभियान जोर–जबरदस्ती, धोखाधड़ी, फरेब और फर्जीवाड़े के बड़े–बड़े कीर्तिमान खड़ा करता नजर आ रहा है।
सदस्यता अभियान के अधिकतर आँकड़ें इसी तरह तैयार किये हुए नजर आ रहे हैं। दरअसल 10 करोड़ नये सदस्य जोड़ने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सभी सांसदों से लेकर जिला अध्यक्ष तक को नये सदस्य बनाने का एक निश्चित लक्ष्य दिया था। इसमें महापौर और सांसद को 20 हजार, जिला पंचायत अध्यक्ष को 15 हजार, विधायक और एमएलसी को 10–10 हजार, अन्य क्षेत्रीय नेताओं का 5 हजार नये सदस्य जोड़ना अनिवार्य था। एक तरफ जहाँ भाजपा इस सदस्यता अभियान को लेकर बड़ी–बड़ी बातें कर रही थी वहीं जमीन पर कुछ और ही चल रहा था। सदस्यता अभियान का पहला चरण पूरा होने पर भाजपा के अनेक दिग्गज नेता अपने निर्धारित लक्ष्य से बहुत पीछे नजर आये। जिस उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सदस्य बनाने का दावा किया जा रहा है, वहाँ के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य केवल डेढ़ हजार सदस्य ही बना पाये। पार्टी अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह का आँकड़ा तो 200 पार भी नहीं गया। इसके अलावा अनेक नेताओं को अपने खाते में 50 सदस्य जोड़ना भी मयस्सर नहीं हुआ।
इस सदस्यता अभियान के पहले चरण ने ही यह दिखला दिया था कि बेरोजगारी–महँगाई से बदहाल बहुसंख्यक जनता को भाजपा का सदस्य बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। इस असफलता के चलते भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सभी सांसदों, विधायकों आदि को किसी भी तरह तय सीमा तक लक्ष्य पूरा करने के सख्त निर्देश दिये। इसके बाद से साम–दाम–दण्ड–भेद की नीति से सदस्य बनाने का सिलसिला शुरू हो गया था। कुछ नेताओं ने लोगों को सरकारी योजनाओं का झाँसा देकर सदस्य बनाने की कोशिश की, कुछ ने सदस्य बनने के बदले में टीशर्ट और मिठाई रिश्वत दी, तो वहीं कुछ नेताओं ने खुलेआम सदस्य बनने के बदले 50 से 100 रुपये देने की बात कही। तय समय सीमा में सदस्य बनाने की होड़ में कई नेताओं ने तो निजी एजेंसी को उनके नाम पर सदस्य बनाने का ठेका भी दिया। देखते ही देखते इस क्षेत्र में कई कम्पनियाँ कूद पड़ीं। ये कम्पनियाँ नेताओं को पैसे के बदले में फर्जी सदस्य बना देने लगीं। इसका खुलासा मध्य प्रदेश से भाजपा के 5 बार के विधायक और मंत्री अजय बिश्नोई ने खुद किया। उन्होंने एक पोस्ट शेयर की जिसमें एक ऐसी ही कम्पनी उनसे सदस्य बनाने के बदले पैसों की माँग कर रही थी। इस सदस्यता अभियान ने फर्जीवाड़े की सभी सीमाओं को पार कर दिया है। हद तो यह है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता लखन घघोरिया को भी भाजपा का सक्रिय सदस्य बना दिया गया।
मोदी ने इस अभियान की शुरुआत करते हुए कहा था कि यह अभियान जनता के साथ भावनात्मक रिश्ता कायम करने के लिए चलाया जा रहा है। लेकिन व्यवहार में कहीं ऐसा कोसों दूर तक नजर नहीं आ रहा है। जिस समय भाजपा का सदस्यता अभियान अपने चरम पर था उसी समय गुजरात के वडोदरा के अनेक हिस्से बाढ़ की चपेट में आये हुए थे। यहाँ कई इलाके 15 दिन से ज्यादा समय तक पानी में डूबे रहे थे। यहाँ लोगों के सामने रहने और खाने का संकट था। लेकिन इस दौरान भाजपा का एक भी बड़ा नेता पीड़ितों के पास झाँकने नहीं गया क्योंकि वे सदस्यता अभियान में व्यस्त थे। जनता द्वारा भाजपा के खिलाफ विरोध–प्रदर्शन करने के बाद कुछ नेता केवल हवाई दौरा करके लौट आये। भाजपा का देश की पीड़ित जनता के साथ यही भावनात्मक रिश्ता है ?
आखिर भाजपा इस अभियान के लक्ष्यों को किसी भी कीमत पर पूरा करने को इतनी बेचैन क्यों है ? कांग्रेस के शासन में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महँगाई से परेशान आम मेहनतकश जनता के बीच प्रचार के जरिये मोदी की करिश्माई छवि बनायी गयी थी। लोक–लुभावने नारे दिये गये और मुख्यधारा की मीडिया पर नियन्त्रण के जरिये भाजपा ने एक विशाल प्रचारतंत्र कायम किया गया। देश के बड़े औद्योगिक घरानों ने इस काम के लिए मोदी को अकूत दौलत मुहैया करायी। इसके बलबूते ही भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह पछाडकर सत्ता में आयी। मोदी ने सत्ता में आते ही सबसे पहला हमला मजदूरों के अधिकारों पर किया। इसके बाद जीएसटी, नोटबन्दी जैसी नीतियों से छोटे व्यापारी की कमर तोड़ दी। पिछले 10 साल में आम मेहनतकश जनता की जिन्दगी बद से बदतर हो गयी है। महँगाई और बेरोजगारी ने मध्यम वर्ग के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है। इस पूरे दौर में बड़े उद्योगपतियों की सम्पत्ति में दिन–दूनी, रात–चैगुनी बढ़ोतरी हुई है। असमानता की गहरी खाई ने लोगों के अन्दर असन्तोष पैदा किया है। पिछले कुछ सालों में तेजी से विकसित हुए किसान, मजदूर और अन्य शोषित–उत्पीड़ित तबकों के आन्दोलन इसी का नतीजा हैं। भाजपा हिन्दुत्व का सहारा लेकर इस असन्तोष की दिशा बदलना चाह रही है। मौजूदा चुनाव में भाजपा द्वारा हर सम्भव हथकण्डा अपनाने के बाद भी उसका 400 पार का नारा टाँय–टाँस फिस्स हो गया। ऐसे में सदस्यता अभियान के जरिये भाजपा की अपराजित छवि को कायम रखने की कोशिश की जा रही है। लेकिन भाजपा का छल–प्रपंच काम नहीं आ रहा है।
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