सत्ता और सिस्टम की गोद में पले “शेल” बच्चे की चमकदार बायोग्राफी
समाचार-विचार राजेश कुमाररेलमंत्री? वो तो अब ठेके नहीं देते, अपने आप ही ले लेते हैं–– वह भी सरकारी खजाने से!
जी हाँ, बात हो रही है अश्विनी वैष्णव की, जिन्होंने बड़ी ही विनम्रता और आत्मनिर्भरता के साथ 26,000 करोड़ के ठेके अपनी ही पुरानी कम्पनी को पकड़ा दिये। आत्मनिर्भर भारत का इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा, जहाँ मंत्री खुद ही व्यापारी, खुद ही ग्राहक और खुद ही ठेकेदार बन जाये! एक तरफ जनता स्टेशन पर ट्रेन के लेट होने से पसीने–पसीने हो रही होती है, दूसरी तरफ मंत्री जी अपने पुराने धन्धे की ट्रेन सही समय पर, सीधा खजाने के स्टेशन पर पहुँचा रहे होते हैं। जब एक शख्स ब्रिजेन्द्र सिंह ने इसका खुलासा कर दिया, तो सियासी गलियारों में हलचल मची, मगर भक्तों के दिमाग में वही पुरानी शान्ति–– क्योंकि वहाँ विचार नहीं, वाईफाई से सीधे ‘राष्ट्रभक्ति’ डाउनलोड होती है।
एक लाख की पूँजी से करोड़ों तक का यह सफर किसी स्टार्टअप की प्रेरणादायक कहानी नहीं, बल्कि सत्ता और सिस्टम की गोद में पले “शेल” बच्चे की चमकदार बायोग्राफी है जिसमें न कोई फैक्ट्री है, न कोई उत्पादन, बस जादू है––– कागजी जादू और नोटों की बारिश।
ओडिशा कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी अश्विनी वैष्णव, जो कभी पीएमओ और वर्ल्ड बैंक की फाइलों में कलम घिसते थे, अचानक नौकरी छोड़ते हैं और बीवी संग मिलकर 2015 में एक कम्पनी बना डालते हैं–– नाम रखा एडलर इण्डस्ट्रियल सर्विसेज। सुनने में ही इतना भारी कि लगे कोई स्टील प्लांट खोलने जा रहे हों। पूँजी डाली बस एक लाख की। फिर जो हुआ वो इन्वेस्टमेंट की किताबों में ‘चमत्कार’ के नाम से पढ़ाया जाना चाहिए।
पहले ही साल बिना कुछ बनाये, बिना मजदूर लगाये, बिना धुआँ उड़ाये कम्पनी की वैल्यू 45 लाख पहुँच गयी। 44 लाख त्रिवेणी अर्थमूवर्स से आये–– वही कम्पनी जिस पर अवैध खनन के लिए शाह कमीशन 900 करोड़ का जुर्माना ठोक चुका था। यानी पैसा भी आया और भरोसा भी–– एकदम खनन वाली गहराई से, चकाचक।
एडलर नाम की यह कम्पनी न खदान में पसीना बहाती थी, न ही फैक्ट्री की चिमनी से धुआँ उगलती थी–– मगर नोट बरसते रहे। 2016–17 तक कम्पनी की पूँजी हो गयी 3–79 करोड़। सैलरी का खेल भी मजेदार था–– अश्विनी ने खुद को 2–26 करोड़, पत्नी सुनीता को 18 लाख और बाकी स्टाफ को 2 लाख दे डाले। मतलब बाकी स्टाफ भी शायद कोई एक्सेल शीट में ‘हाँ जी’ टाइप करने वाले भूत रहे होंगे।
2017 में वही अश्विनी जी त्रिवेणी अर्थ मूवर्स की एक सहायक कम्पनी में डायरेक्टर बन जाते हैं। और फिर शुरू होता है बहीखाते का असली थ्रिलर–– त्रिवेणी कम्पनी एडलर के अकाउण्ट में 111–5 करोड़ भेजती है और फिर एडलर उनसे 77 करोड़ का लोन लेता है। यानी बाएँ हाथ से दाएँ को देना, फिर दाएँ से बाएँ का वापस लेना और पूरा सिस्टम ताली बजा रहा है।
इतना ही नहीं, त्रिवेणी के मालिक प्रभाकरण जेएसड्ब्ल्यू के सज्जन जिन्दल से मिलकर एक और कम्पनी ब्राह्मणी रिवर पैलेट्स को औने–पौने दाम में खरीद लेते हैं। क्या गजब की टुकरबन्दी थी–– खनन माफिया और सत्ता की!
इधर मीडिया के भक्तगण या तो मुँह में दही जमाकर बैठे रहे या कैमरा घुमा कर बाड़े में गाय खोजते रहे। कोई सवाल नहीं, कोई हेडलाइन नहीं–– सब ‘स्टार्टअप इण्डिया’ की हवा में डोलते–बोलते रहे।
2018–19 में एडलर को और 4–51 करोड़, फिर 2019–20 में सीधे 48 करोड़ मिलते हैं। पुराने 77 करोड़ चुका भी दिये और नये 52 करोड़ का लोन ले लिया–– बिना किसी उत्पादन के, बिना किसी धन्धे के। शायद पैसा देखकर ही बैंक वालों ने ‘प्रोडक्ट’ मान लिया हो।
2020–21 तक एडलर के अकाउण्ट में 323 करोड़ जमा हो चुके थे। जी हाँ, वही एक लाख की पूँजी वाला कागजी बच्चा अब 11,000 प्रतिशत बढ़ चुका था। उसमें से 91 करोड़ थे अश्विनी के और 23 करोड़ सुनीता के–– बाकी भगवान जाने किन बहीखातों में गये।
और हाँ, 2019 में जब अश्विनी राज्यसभा पहुँचते हैं, उसी साल त्रिवेणी बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये 11 करोड़ का चढ़ावा भी चढ़ा देती है। भक्ति का स्तर देखिए–– राजनीति में एंट्री के साथ ही दक्षिणा भी तैयार।
तो कुल मिलाकर, एक लाख से 113 करोड़ बनाने की ये स्कीम किसी बिजनेस स्कूल में नहीं, बस दिल्ली दरबार की गलियों में सीखी जा सकती है। और ऐसा लगता है, जब मौजूदा सत्ता का पर्दा हटेगा, तो अलमारियों से न सिर्फ कंकाल निकलेंगे–– बल्कि उनके बैंक स्टेटमेंट भी साथ आयेंगे।
इस अन्धेरगर्दी पर कोई बोले तो कैसे बोले? अन्धभक्तों का काम है आँख मूँद कर जयकारा लगाना और सोशल मीडिया पर “सब चंगा सी” लिखना। आखिर सत्ता की मलाई जो मिल रही है–– कोई एक आध पोस्ट, कोई बोर्ड का सदस्य, किसी के हिस्से जमीन तो कोई शराब और शबाब से ही खुश, कोई बस नेता जी के साथ सेल्फी से ही फूला नहीं समा रहा है। कुछ झूठ की चाशनी से ही मस्त हैं। सबको उसकी औकात के अनुसार प्रसाद मिल रहा है। अन्धभक्तों की पाँचों उंगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में है–– असल में बस इनकी ही मौज आ रही है, बाकी अन्धेरगर्दी चलती रहे बला से।
और जब कोई कहता है कि यह घोटाला है, यह सत्ता और कारोबार का नापाक गठबन्धन है, तो जवाब आता है–– “देशद्रोही हो”। सवाल पूछना अब देशद्रोह हो चुका है और जवाब देना ‘अर्बन नक्सल’ का काम। इसलिए अगर अन्धभक्त चुप हैं, वे समझदार हैं, बस इस ठेकेबाजी की दावत में अपनी थाली में गिरने वाले जूठन का इन्तजार करते रहते हैं। यानी राम नाम जपना, पराया माल अपना। भले ही देश में बेरोजगारी रिकॉर्ड तोड़ रही हो, रेल बजट का पैसा आत्मीय पुराने व्यापार में जा रहा हो, मगर भक्तजन सब माफ कर देते हैं, क्योंकि “नेता जी अच्छे हैं जी, दिल के सच्चे हैं जी”।
बाकी ट्रेन पटरी से उतर जाये, लोग मारे जाएँ, मंत्री जी की पुरानी कम्पनी सीधा फायदे के स्टेशन पर पहुँचती है –– समय से, बजट से और मनमर्जी से। यात्रीगण कृपया ध्यान दें, हिन्दू राष्ट्र की ट्रेन रवाना हो चुकी है और जल्द ही नम्बर 2 प्लेटफार्म पर आयेगी।
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