ट्रम्प की वापसी : लोकतंत्र, इतिहास, वैश्विक व्यापार और पर्यावरण के लिए चिन्ताजनक
अन्तरराष्ट्रीय राजेश कुमारनाल्ड ट्रम्प अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव जीत कर फिर से व्हाइट हाउस आ गये हैं। पिछले चुनावों में जिन क्षेत्रों में कोई ट्रम्प को पूछने वाला नहीं था इस बार वहाँ भी उनके चाहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और उन्होंने बहुमत हासिल किया है। इसे अमरीकी राजनीति में बढ़ते फासीवादी रुझान के तौर पर देखा जा रहा है। अमरीकियों ने ट्रम्प की आपराधिक प्रवत्ति को नजरअन्दाज कर उन्हें दोबारा व्हाइट हाउस भेज दिया। प्रचार के दौरान भी ट्रम्प ने बिना किसी हिचकिचाहट के लोकतान्त्रिक मूल्यों पर हमला किया और ऐतिहासिक तथ्यों को एक शातिर राजनीतिज्ञ की तरह तोड़–मरोड़ कर पेश किया। उनके पहली बार राष्ट्रपति चुनने पर अमरीका में डेमोक्रेट्स, सरकारी नौकर और खुद उनके चुने हुए लोगों की ओर से विरोध के स्वर उठे थे। हैरानी की बात यह है कि इस बार ट्रम्प पहले से ज्यादा दक्षिणपंथी हुए हैं और विरोध के स्वर पहले के मुकाबले दबे–सहमे हुए हैं।
लोकतंत्र की हत्या और छद्म ऐतिहासिक गौरव
राष्ट्रपति पद से हटने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प तीन–चार अपराधों में फँसते दिखे थे, जिसमें धमकी, गुण्डागर्दी, यौन उत्पीड़न और न्यायिक जाँच में झूठ बोलने, जैसे अपराध शामिल हैं। राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अपने खिलाफ अपराधों की जाँच का नेतृत्व कर रहे जैक स्मिथ को बर्खास्त करने की घोषणा कर दी है। मुमकिन है कि वे नये अटार्नी जनरल को नियुक्त करके अपने और सहयोगियों के ऊपर लगे सारे केस जल्द ही रफा–दफा करा लेंगे। वास्तव में ट्रम्प को न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता खास पसन्द नहीं है। उन्होंने चुनाव प्रचार के समय न्याय व्यवस्था पर नकेल कसने की ओर इशारा किया था। कल्पना कीजिए, न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता के बिना कैसा लोकतंत्र होगा ? यानी भारत की तरह अब अमरीका के भी अच्छे दिन आने वाले हैं।
ट्रम्प अपने फूहड़, नस्लवादी और महिला विरोधी वक्तव्यों के लिए भी लोकप्रिय हैं। चुनाव प्रचार के अन्तिम दिन उन्होंने अपनी प्रतिद्वन्द्वी कमला हैरिस पर घटिया नस्लवादी टिप्पणी की थी। ट्रम्प खुद को अमरीकी ऐतिहासिक गौरव वापिस लाने के लिए प्रतिबद्ध मानते हैं। लेकिन उनकी टिप्पणियों और व्यवहारों से साफ झलकता है कि अमरीकी ऐतिहासिक गौरव और मूल्य मान्यताओं की न तो उनमें समझ है, न एहसास। अमरीका को नस्लवादी, गैर लोकतांत्रिक बनाने की प्रक्रिया में बड़े–बड़े धन्नासेठ, अपराधी प्रवृत्ति और अवैज्ञानिक सोच के लोग ट्रम्प के सहयोगी बने हुए हैं, जैसे–– उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, अरबपति एलोन मस्क, षड़यंत्र सिद्धान्तकार रॉबर्ट एफ कैनेडी जूनियर। कैनेडी को ट्रम्प ने स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग में बतौर सचिव नियुक्त किया है। कैनेडी के पास कोई मेडिकल अनुभव नहीं है और वह पहले से स्थापित वैज्ञानिक तौर–तरीकों को ही गलत बताते हैं। कैनेडी ने कोरोना वैक्सीन के बारे में गलत सूचना फैलायी थी। वह पोलियो और खसरे जैसे जीवन–रक्षक टीकों के विरोधी रहे हैं। अच्छी बात यह है कि कैनेडी के विरोध में 77 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने अपना विरोध दर्ज कराया है और उन्हें पद से हटाने की माँग की है।
इसके अलावा, ट्रम्प पीट हेगसेथ को रक्षा विभाग देना चाह रहे थे। लेकिन हाय रे किस्मत! हेगसेथ के ऊपर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप और नशे में धुत रहने की आदत उन्हें ले डूबी और उनका नामांकन रद्द हो गया। अपने गिरोह को अदालती पचड़े से दूर रखने के लिए ट्रम्प अटॉर्नी जनरल के पद पर पूर्व अमरीकी कांग्रेसी मैट गेट्ज को चुनना चाह रहे थे, पर यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी क्योंकि मैट गेट्ज पर नाबालिग के साथ यौन सम्बन्ध बनाने का केस चल रहा है, जाँच के दबाव में उन्होंने अपना नाम ही वापस ले लिया। ये हैं ट्रम्प के नवरत्न–– बलात्कारी, षड़यंत्रकारी, शराबी और नस्लवादी। इसी गिरोह के दम पर ट्रम्प अमरीका का ऐतिहासिक गौरव वापस लाने का दावा कर रहे हैं। ज्यादा सम्भावना है कि ट्रम्प अमरीका को नस्लवादी, आर्थिक संकट और तानाशाही की खाई की ओर धकेलेंगे। इस मामले में वे भारत के मौजूदा शासकों को भी काफी पीछे छोड़ सकते हैं।
वैश्विक व्यापार
अमरीकी राजनीति में इतनी गिरावट और फासीवादी रुझान के ठोस कारण आर्थिक संकट में छिपे हुए हैं। अमरीका की घरेलू और विदेश नीतियाँ अपने तथाकथित स्वर्ग को बचाने के लिए बनायी जाती हैं। वह दुनिया भर के गरीब देशों को निचोड़कर अकूत मुनाफा कमाता रहा है जिसे फिर से निवेश करने का संकट ही उसका असली आर्थिक संकट है। इसके साथ ही उसे दुनिया भर के अलग–अलग कोने से चुनौती मिलती रहती है। फिलहाल, अमरीकी पूँजीपति के हाथ से वैश्विक उत्पादन धीरे–धीरे खिसक रहा है और इसके साथ ही दुनिया पर उसका दबदबा भी कमजोर पड़ रहा है, हालाँकि वह इस पर पूरी कमान चाहता है। बैटरी कार और चिप डिजाइन में चीन ने अमरीकी पूँजीपतियों की बाँह मरोड़ दी है। अमरीका में बेरोजगारी पिछले पचास साल में आज सबसे अधिक है। इसके अलावा, कल तक जिस अलास्का के क्षेत्र में केवल रूसी बम वर्षक अमरीकी गतिविधियों की निगरानी करते थे, आज वहाँ चीन के एच–6 नजर आ रहे हैं। रूस के टीयू–95 और चीनी एच–6 का तोड़ ढूँढना डोनाल्ड ट्रम्प के लिए एक बड़ी चुनौती है। अमरीकी सरकार पर कुल कर्ज 3024 लाख करोड़ रुपये है जो उसकी जीडीपी (लगभग 2450 लाख करोड़ रुपये) का 123 प्रतिशत है। कहने को अमरीका पूँजीवादी स्वर्ग का एक नमूना है लेकिन कुल आय की तुलना में बहुत अधिक कर्ज से यह भ्रम दूर हो जाता है। इस तथाकथित स्वर्ग के निर्माण में लगी एक–एक र्इंट उधारी और दुनिया भर की जनता के शोषण और खून–खराबे से हासिल डॉलर की है।
आज वैश्विक व्यापार में भले ही डॉलर का बोलबाला है। 58 फीसदी वैश्विक व्यापार डॉलर में होता है। पिछड़े देशों की जनता को डॉलर का रिजर्व रखने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। डॉलर की जगह अगर ब्रिक्स देश (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथोपिया, ईरान और संयुक्त अरब) आपसी भुगतान का कोई नया माध्यम लाते हैं तो अमरीकी लूट में गिरावट आना तय है। इसके अलावा, अगर अपने वादे के अनुसार ट्रम्प प्रशासन आयात पर कर का बोझ बढ़ाता है तो अमरीकी बाजार में अस्थिरता और अप्रत्याशित महँगाई बढ़ेगी।
पर्यावरण और युद्ध
पर्यावरण संकट के समाधान पर भी ट्रम्प का रवैया गैर जिम्मेदाराना और बदमिजाज है। जब से अमरीका पर्यावरण की रक्षा के लिए जरूरी योगदान देने से पीछे हटा है, वैश्विक नेता के रूप में उसकी छवि धूमिल ही हुई है। डोनाल्ड ट्रम्प पर्यावरण संकट को कुछ वैज्ञानिकों की साजिश मानते हैं, उनकी बातों से लगता है जैसे वह जानते ही नहीं कि हम सब एक ही धरती के वासी हैं और इस धरती के हालात वाकई बदतर हैं। शायद उन्हें लगता हो कि सबकी धरती अलग–अलग है, इसलिए वे दूसरों की धरती पर युद्ध चाहते हैं, वह समझते हैं कि अरब देशों, वियतनाम और फिलिस्तीन में बम फोड़ने पर असर केवल उसी धरती पर होगा। आग अमरीका में भी धधकेगी, यह वह नहीं समझते। खैर, कहाँ बम गिरेगा और आग कहाँ तक पहुँचेगी ? इस पर विशेषज्ञों की टीम सोचे। एक नेता बतौर ट्रम्प को इससे क्या लेना–देना ? वह तो चुनते ही अपने अन्धराष्ट्रवादी मंसूबों को पूरा करने में लग गये हैं। उन्हें अमरीका का ऐतिहासिक गौरव लौटाना है। डोनाल्ड ट्रम्प जैसा राष्ट्र निर्माता समझता है कि राष्ट्र के निर्माण और विकास में र्इंट पत्थर, रोड़ी, सीमेंट और सरिया के साथ इनसानी खून लगाना जरूरी होता है। उनके द्वारा चुने गये बलात्कारी, षड़यंत्रकारी ही र्इंट–पत्थर हैं। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, मानवता, संविधान और लोकतंत्र के बारे में लिखी अच्छी–अच्छी बातें राष्ट्र निर्माण में बाधक हैं। इन सारी किताबों को गलाकर सीमेंट के साथ मिलाना पड़े तो भी राष्ट्र निर्माता पीछे नहीं हटता! वह एक मजबूत दीवार बनाकर ही दम लेता है! राष्ट्र निर्माण में लोग आपस में जुड़ें, चाहे न जुड़ें, लेकिन र्इंट से र्इंट जुड़नी चाहिए! हर थाली में खाना पहुँचे, चाहे न पहुँचे, लेकिन हर आँगन तक मिसाइल की रेंज पहुँचनी चाहिए। हर बीमार को इलाज मिले, चाहे न मिले, लेकिन इतने कारतूस बनने चाहिए कि कल को जरूरत पड़ जाये तो एक भी छाती यह शिकायत न करे कि हाय! मेरे हिस्से का कारतूस कहाँ है ?
पर्यावरण समस्या से दूर हटने में अमरीका का आर्थिक हित है। दुनिया को युद्धों में उलझाये रखने में भी अमरीका का आर्थिक हित है। इसलिए अमरीका की विदेश नीति दुनिया को युद्धों में उलझाये रखने की रही है। ज्यादा सम्भावना है कि ट्रम्प पुरानी नीति को ही तेजी से आगे बढ़ाते रहेंगे। इजराइल के विदेश मंत्री गिडोन सार ने कहा है कि राष्ट्रपति ट्रम्प की पहली अध्यक्षता के दौरान पिछली बार फिलिस्तीन में स्थित वेस्ट बैंक के विलय पर चर्चा हुई थी। अगर वेस्ट बैंक के इजराइल में विलय की तरफदारी ट्रम्प ने की तो मध्य–पूर्व एशिया में अफरा–तफरी मचेगी। भारत और दूसरे देशों के दूतावास भी यहीं हैं। इस उथल–पुथल को ट्रम्प चाहकर भी सम्भाल न पाएँगे। उम्मीद है कि वह इस इलाके में यथास्थिति बनाये रखने का प्रयास करेंगे।
अफगानिस्तान और वियतनाम में नरसंहार से सबक लेकर अमरीकी जनता ट्रम्प को सीधे तौर पर न तो युद्ध में उलझने देना चाहती है, न वह अपने खर्चों में कटौती करना चाहती है। अब नस्लवादी ट्रम्प को लठैत की भूमिका बनाये रखनी है, डॉलर का प्रभुत्व भी बचाना है, नये रोजगार भी पैदा करने हैं, दुनिया को युद्धों में उलझाकर भी रखना है, अमरीका के ऐतिहासिक गौरव की रक्षा भी करनी है, नस्लवाद भी फैलाना है और अमरीकियों को ठूँस–ठूँस कर पिज्जा बर्गर भी खिलाना है। सो गाइज, इट इज टू डिफिकल्ट टू मैनेज ईच एण्ड एवरीथिंग।
इन बातों से साफ है कि ट्रम्प जैसे आदमी के दुनिया के सबसे ताकतवर देश की कमान हथियाने का मतलब है कि दुनिया को बहुत बड़ी तबाही के लिए तैयार रहना चाहिए। यह तबाही कितनी भयावह होगी, इसे समय ही बतायेगा।
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