28 फरवरी को साम्राज्यवादी अमरीका और उसके लठैत इजराइल ने ईरान पर हमला बोल दिया। पहले ही हमले में ईरान के सर्वाेच्च नेता आयातुल्ला अली खामेनई समेत कई अगुआ नेताओं की हत्या कर दी गयी। इसके साथ ही अब तक ईरान के सैकड़ों स्कूली बच्चों समेत हजारों आम नागरिकों की हत्या की जा चुकी है, दर्जनों स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को तबाह किया गया है।

जबाबी कार्रवाई में ईरान ने अमरीका और इजराइल को बहुत गहरे घाव दिये हैं। ‘आयरन डोम’ नीचे छिपकर खुद को सुरक्षित रखने का इजराइल का दावा ईरान की मिसाइलों ने तोड़ दिया। खुद नेतन्याहू बंकरों में छिपता फिरा। कई अरब देशों में अमरीकी सैन्य अड्डे, लड़ाकू विमान और साजो–समान तबाह कर दिये गये।

ट्रम्प की लाख कोशिशों के बाद भी दुनिया का कोई महत्वपूर्ण देश अमरीका के साथ खड़ा नहीं हुआ। पूरे मध्य–पूर्व में ईरान का प्रभाव और होर्मूज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत हुआ।

कुलमिलाकर अमरीका युद्ध हार रहा है, विश्व–नियंत्रणकारी महाशक्ति की उसकी साख और धाक को गहरी चोट पहुँची है, दुनिया उसकी मजम्मत कर रही है। ईरान दुनिया के रंगमंच पर हीरो बनकर उभरा है, अमरीका–इजराइल पर उसके पलटवार ने वैश्विक–राजनीति को एक एतिहासिक मोड़ दे दिया है।

यह युद्ध क्यों?

युद्ध तबाही के सिवा कुछ नहीं देते। इसके बावजूद दुनिया पर युद्ध थोपे जाते हैं, देशों को युद्ध में उलझने के लिए मजबूर किया जाता है। 1979 की इस्लामिक क्रान्ति के बाद से आज तक एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा, जब अमरीका ने ईरान को धमकाने, बदनाम करने, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने, महत्वपूर्ण लोगों की हत्या करने, तख्तापलट करने की कोशिशों पर विराम लगाया हो।

इस युद्ध से दुनिया पर पड़नेवाले आर्थिक, भूराजनीतिक और कई तरह के प्रभावों के विश्लेषण किये जा रहे हैं। यह सब जरूरी है। होर्मूज जलडमरूमध्य की नाकाबन्दी से तेल की कीमतें बढ़ गयीं, गैस और उर्वरक का संकट खड़ा हो गया, महँगाई बढ़ गयी जिससे भारत समेत कई देशों के मजदूरों और किसानों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।

लेकिन अगर इस युद्ध को केवल इसके नतीजों के जरिये देखा जाये तो वह ऐतिहासिक कारण आँखों से ओझल हो जाने का खतरा है जिसने इस युद्ध को जन्म दिया है। और जो पिछले सवा सौ साल से इस धरती के अलग–अलग हिस्सों पर लड़े गये लगभग सभी युद्धों के लिए जिम्मेदार है। वह कारण साम्राज्यवाद है।

19वीं सदी के अन्त तक विश्व पूँजीवाद विकसित होकर अपनी चरम अवस्था, एकाधिकारी वित्तीय पूँजी के प्रभुत्व के दौर पहुँच गया था जिसे साम्राज्यवाद नाम दिया गया। उस समय के प्रमुख साम्राज्यवादी देश थे–– ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमरीका। इन साम्राज्यवादी देशों के बीच दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों, श्रम–शक्ति तथा बाजारों पर कब्जे की होड़ शुरू हुई। इसके लिए वे कमजोर देशों पर हमला करके उन्हें अपना उपनिवेश बना लेते थे।

साम्राज्यवादी देशों के द्वारा दूसरे देश पर सैन्य हमले किसी नेता की सनक नहीं होती और न ही उस नेता के द्वारा मनमाने तरीके से अपनायी गयी विदेश नीति। साम्राज्यवादी देश द्वारा दूसरे देशों के संसाधन और बाजार पर कब्जे के लिये किये जाने वाले  हमले का ठोस वस्तुगत आधार होता है। यह अति विकसित पूँजीवाद की ढाँचागत समस्या है। दुनिया के संसाधनों, बाजारों और श्रम को नियंत्रित करने के लिए साम्राज्यवादी देश सैन्य और वित्तीय शक्ति का इस्तेमाल करते हैं और इस नियंत्रण के खिलाफ उठनेवाली हर चुनौती को दबाते हैं। वे लूट के लिए दूसरे साम्राज्यवादी देश से भी लड़ते हैं क्योंकि उपनिवेशों की छीना–झपटी के लिए उनके बीच तीखी प्रतिस्पर्धा होती है।

युद्ध और उपनिवेश के जरिये वह अपने देश के अन्दर अत्यधिक पूँजी संचय के संकट, आर्थिक मन्दी और तीव्र होते वर्ग–अन्तर्विरोधों से छुटकारा पाने की कोशिश करता है और कुछ समय के लिए संकट को टाल भी देता है। यही कारण है कि साम्राज्यवाद ने युद्धों का एक अन्तहीन सिलसिला शुरू किया है जो मरते हुए साम्राज्यवाद के लिए राहत की चन्द घड़िया देता है। वह इनसान की लाश पर जिन्दगी का जाम पीता है। साम्राज्यवाद का यह पाप उसके नाश तक जारी रहेगा।

सन 1911 में ब्रिटेन ने दुनिया की दूसरी साम्राज्यवादी शक्तियों पर बढ़त हासिल करने की एक नायाब तरकीब निकाली। उसके नौसेना कमांडर विंस्टन चर्चिल ने अपने युद्धपोतों के र्इंधन में तेल का इस्तेमाल करने का फैसला किया था। चर्चिल ने ही कहा था “इस तेल को हासिल करने के लिए ब्रिटेन के पास ‘मुसीबतों के समुन्द्र’ में उतरकर लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जिसकी उसे जरूरत तो है लेकिन वह उसके पास मौजूद नहीं है।”

पहले विश्व युद्ध की शुरुआत से ही ऊर्जा के प्रमुख साधन–– तेल पर कब्जा करना न केवल ब्रिटेन का बल्कि हर साम्राज्यवादी देश का प्रमुख उद्देश्य बन गया। ईरान पर हमला करने के पीछे आज अमरीका का भी यही उद्देश्य है।

1917 में ब्रिटेन ने पश्चिमी एशिया में खोजे गये तेल को पाइप लाइन के जरिये भूमध्य सागर तक लाने की योजना तैयार की। तेल की निकासी के लिए तटीय शहर हाइफा को, जो अब इजराइल का प्रमुख बन्दरगाह है, सबसे बेहतर जगह के तौर पर चुना गया। लेकिन तेल के निरन्तर प्रवाह की गारण्टी के लिए ब्रिटेन अरब मुस्लिमों पर भरोसा नहीं कर सकता था। इस क्षेत्र में एक ‘अपने देश’ की जरूरत थी। कई ऐतिहासिक कारणों से, यूरोपीय यहूदी इस उद्देश्य को पूरा कर सकते थे। इतिहास से पता चलता है कि यूरोप के शासकों ने यहूदियों को पनाह दी, उनका इस्तेमाल किया और जरूरत पड़ने पर उन्हें दुतकार दिया।

1917 में ब्रिटेन के वित्त मंत्री लार्ड वालफोर ने यूरोप के भावी वित्त और तेल सम्राट वाल्टर डी रोथ्सचाइल्ड को एक पत्र में लिखा कि फिलिस्तीन में ‘यहूदियों के अपने राष्ट्रीय घर’ का निर्माण होना चाहिए। यही बाद में इजराइल को बसाने वाला ‘वालफोर डिक्लियरेशन’ बना। बदले में इजराइल पिछले आठ दशकों से पश्चिमी साम्राज्यवादियों के फायदे के लिए अरबों का कत्लेआम कर रहा है।

नेतन्याहू गुरू नहीं चेला है

बेशक मध्य–पूर्व में इजराइल का प्रभाव बढ़ाने की नेतन्याहू की महत्वाकांक्षा है लेकिन यह कहना कि अपनी ‘वृहत्तर इजराइल’ की परियोजना के लिए उसने अमरीका को ईरान के साथ युद्ध में फँसा दिया है, अमरीकी साम्राज्यवादियों को ‘भोला बच्चा’ बताना है।

1927 में ब्रिटेन ने इराक के किरकुक में मिले तेल को भूमध्य सागर तक लाने के लिए पाइपलाइन बिछाने की योजना बनायी जो इराक, सीरिया, जॉर्डन और लेबनान के कुछ क्षेत्रों से होकर गुजरती थी। इन्हीं सब हिस्सों को मिलाकर ‘वृहत्तर इजराइल’ बनता है।

1948 के अरब–इजराइल युद्ध के बाद इराक ने इस पाइपलाइन को बन्द कर दिया था। सन 2001 में 9/11 की घटना के बाद जार्ज बुश ने इस पाइपलाइन को दुबारा चालू करवाने की योजना बनायी। इसका जिम्मा इजराइल के तत्कालीन वित्त मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को सौंपा। इसी समय नाटो के कामण्डर वेस्ली क्लार्क ने कहा था कि “अगले पाँच सालों में सात देशों की सरकारों को हमला करके तबाह कर दिया जाना है।” इस सूची में इराक, सीरिया, लेबनान, लीबिया, सोमालिया, सूडान और अन्त में ईरान था।            

पिछले दो सालों से फिलिस्तीन में इजराइल एक जघन्य नरसंहार कर रहा है। अमरीका समेत सारे साम्राज्यवादी उसके कुकृत्य पर मुँह में दही जमाये बैठे हैं, बल्कि उसे सहयोग दे रहे हैं। सभी जानते हैं कि सन 2000 के बाद से ही भूमध्य सागर के पूर्वी तटों के पास प्राकृतिक गैस और तेल के एक के बाद एक, बड़े भण्डार खोजे जा रहे हैं। 2010 में गजा मरीन में भी गैस का विशाल लेविथान क्षेत्र खोज लिया गया।

इन भण्डारों से अमरीकी कम्पनी शेवरोन के नियंत्रण में गैस निकाली जा रही है। भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर तेल और गैस की पाइपलाइनों का जाल बिछा है जिसमें अमरीकी कम्पनियों की हिस्सेदारी या नियंत्रण है। इस क्षेत्र पर अमरीका के दीर्घकालिक नियंत्रण की गारण्टी एक लगातार खूँखार और ताकतवर होता लठैत, इजराइल ही कर सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह मालिक हो गया।

ट्रम्प अहमक या अमरीकी साम्राज्यवाद पर संकट

ईरान पर अमरीकी हमले को ट्रम्प के पागलपन का नतीजा बताया जा रहा है। चाहे–अनचाहे यह भी अमरीकी साम्राज्यवाद पर परदा डालने की कोशिश है। इस युद्ध के बारे में अमरीका में हुए सभी सर्वेक्षणों से पता चलता है कि वहाँ की तीन–चैथाई जनता इसके खिलाफ है। इस युद्ध के खिलाफ अमरीका में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए हैं। अमरीकी संविधान के मुताबिक युद्ध की घोषणा करने और सेना उतारने की शक्ति मूलत: कांग्रेस के पास है। ट्रम्प ने कांग्रेस की शक्ति छीन ली और कांग्रेस मौन रही। यहाँ तक कि ट्रम्प ने पेंटागन के खाते से धन निकालकर युद्ध में खर्च कर दिया लेकिन कांग्रेस मौन रही।

पिछले दरवाजे से इस तरह के संविधान विरोधी कामों को जायज ठहराने के लिए कांग्रेस ने ईरान को आतंकवाद प्रायोजित करनेवाला देश घोषित किया, जिसके पक्ष में 372 और विरोध में केवल 53 मत आये। स्पष्ट है कि कांग्रेस का बहुमत, यानी अमरीकी शासक वर्ग का बहुमत, जिसका ट्रम्प प्रतिनिधि है, युद्ध के पक्ष में है।

अमरीकी शासक वर्ग में दो बड़े खेमे हैं, हथियार लॉबी और तेल लॉबी। इन्हीं के चन्दे से डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों पार्टियाँ चलती हैं। युद्ध और हथियार कम्पनियों के मुनाफे का सीधा सम्बन्ध जग जाहिर है।

27 मार्च को मेसाच्युसेट्स के सीनेटर एड मार्की ने बयान दिया कि होर्मूज बन्द होने से एक्सानमोबिल, शेवरोन, शेल और बीपी तेल कम्पनियों ने अरबों डॉलर मुनाफा कमाया है। उनके शेयर आसमान छू रहे हैं। उन्होंने यह मुनाफा अपने अधिकारियों के साथ साझा न करने की सलाह भी कम्पनियों को दी। दूसरी ओर अमरीकी जनता तेल के दामों में 30 फीसदी की मार झेल रही है।                  

अमरीका द्वारा ईरान पर थोपा गया साम्राज्यवादी युद्ध ट्रम्प या रिपब्लिकन पार्टी की सत्ता के कारण नहीं, अमरीका के साम्राज्यवादी चरित्र और उसके बढ़ते संकट के कारण है।

अमरीकी साम्राज्यवाद का संकट

1990 के बाद बनी एकधु्रवीय दुनिया में नियंत्रण कायम रखने के लिए सैन्य ताकत के अलावा अमरीका का ऊर्जा संसाधनों, रेयर अर्थ मिनरल्स, माइक्रो चिप, वित्त और दुनिया में उसके प्रवाह की प्रणाली, डॉलर तथा  रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण था। नाटो के रूप में उसके पास एक बेहद मजबूत सामरिक गठबन्धन था। इस सब के दम पर वह दुनिया के तमाम देशों पर प्रतिबन्ध लगाने में सक्षम था।

आज चीन और रूस से उसे निर्णायक चुनौती मिल रही है। ये दोनों अमरीका की सामरिक ताकत को चुनौती देने की स्थिति में हैं। रेयर अर्थ मिनरल्स और रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अब चीन का निर्णायक नियंत्रण है। चीन और रूस वित्तीय प्रवाह की अलग प्रणाली तैयार कर चुके हैं और डी–डॉलराइजेशन की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं। माइक्रोचिप, सर्विलांस और एआई जैसी महत्वपूर्ण अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में भी चीन ने काफी हद तक अमरीकी वर्चस्व को तोड़ दिया है। और नाटो में भी अब दरारें स्पष्ट दिख रही हैं। कुलमिलाकर अमरीकी साम्राज्यवाद और उसकी एकधु्रवीय विश्व–व्यवस्था की नाव डगमगा रही है।

तेल और गैस जैसे ऊर्जा संसाधनों पर कठोर नियंत्रण ही अन्तरराष्ट्रीय लेनदेन में डॉलर के वर्चस्व और अमरीका के लिए पेट्रो–डॉलर के लाभ को बनाये रख सकता है, जो दुनिया में डी–डॉलराइजेशन की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है।

ईरान और वेनेजुएला दोनों अपने ऊर्जा संसाधनों को अमरीकी नियंत्रण से मुक्त चहते हैं। इसलिए दोनों को अमरीका के साम्राज्यवादी हमले का सामना करना पड़ा लेकिन दोनों ही जगह अमरीका ने मुँह की खायी। हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं कि दुनिया पर अमरीका का एकधु्रवीय नियंत्रण खत्म हो गया, वह अभी केवल कमजोर हुआ है।

चीन–रूस के रूप में नये धु्रव के बनने या दुनिया के बहुधु्रवीय हो जाने से भी दुनिया साम्राज्यवादी शोषण और युद्धों से मुक्त नहीं होगी। एक शोषण–मुक्त, युद्ध–मुक्त, साम्राज्यवाद–मुक्त दुनिया के निर्माण के लिए उस पूँजीवादी व्यवस्था का विनाश जरूरी है जो बहुत पहले ही मर जानी चाहिए थी, लेकिन अपनी चरम अवस्था में पहुँचने के बाद भी यह प्रेत जिन्दा है और लोगों को सता रहा है।