तकनीक तटस्थ लग सकती है,

हालाँकि उसका सामाजिक उपयोग तटस्थ नहीं है

आज सभी उद्योगों और फैक्ट्रियों में मजदूरों की कहानी बड़े त्रासद रूप में सामने आ रही है जब मशीनों की बढ़ती क्षमता इनसान की मुक्ति का नहीं, उसके बेरोजगारी–विस्थापन का कारण बन जाती है। फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर अपने हाथों की कला, अनुभव और वर्षों की मेहनत से उत्पादन की दुनिया को जीवित रखते हैं। लेकिन कॉरपोरेट मालिकों की नजर में उनका जीवन, अनुभव और श्रम केवल “लागत और मानव संसाधन” है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के आने के साथ ही उनके सामने एक ऐसा भविष्य खड़ा हो गया है, जिसमें मशीनें अधिक तेज हैं, सस्ती हैं और वेतन या अधिकार की माँग नहीं करतीं।

अगर मशीनें इनसान का काम छीन लेंगी, तो उस इनसान का क्या होगा जिसके पास अपना श्रम बेचने के अलावा जीने का कोई दूसरा साधन नहीं है? यहाँ तकनीक खलनायक नहीं, बल्कि उसे चलाने वाली मौजूदा व्यवस्था सवालों के घेरे में है जो तकनीकी उन्नति को कुछ लोगों के मुनाफे में बदल देती है। मजदूर अपनी रोजी ही नहीं, अपनी पहचान और गरिमा बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। आज एआई की चमक के पीछे मजदूर वर्ग, खास तौर से मानसिक श्रम करनेवालों का भय, असुरक्षा और अस्तित्व का संकट छिपा हुआ है और यहाँ सबसे खतरनाक बात यह है कि तकनीकी  विकास के बावजूद मेहनतकश जनता से कहा जाता है–– तुम्हारे लिए अब कोई जगह नहीं है।

इनसानी समाज उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एआई को चैथी औद्योगिक क्रान्ति का केन्द्रीय हिस्सा बताया जा रहा है। पिछले दो–तीन वर्षों में एआई का विकास इतनी तेज गति से आम जीवन, उत्पादन, शिक्षा, संचार, प्रशासन, विज्ञान और युद्ध में प्रवेश कर गया है कि एक सामान्य धारणा बन गयी है–– मशीनें शीघ्र ही इनसान की जगह लेने वाली हैं। इसी धारणा के दो विपरीत नतीजे दिखाई देते हैं। एक ओर पूँजीवादी प्रचार तंत्र एआई को असीम मुनाफे, उत्पादकता और आर्थिक विकास का स्रोत बताता हैय दूसरी ओर मजदूरों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के बीच यह आशंका फैलती जा रही है कि एआई उनके रोजगार, कौशल और भविष्य को निगल जाएगी।

सवाल यह नहीं है कि एआई इनसान के लिए अच्छी तकनीक है या बुरी। सवाल यह है कि एआई किस उत्पादन–प्रणाली के भीतर विकसित हो रही है, इसके उत्पादन–साधनों पर किसका मालिकाना है, इसका नियंत्रण किन वर्गों के हाथों में है और इसकी बढ़ी हुई उत्पादक शक्ति से उत्पन्न सामाजिक अधिशेष पर किसका अधिकार होगा।

पूँजीवादी विचारधारा अक्सर तकनीक को एक स्वायत्त शक्ति के रूप में पेश करती है। ऐसा कहा जाता है कि “एआई नौकरियाँ खत्म कर देगी”, “एआई समाज बदल देगी” या “एआई इनसानी सभ्यता को नियंत्रित कर सकती है।” इस प्रकार के वाक्य उस सामाजिक सम्बन्ध को छिपा देते हैं जिसके भीतर तकनीक वास्तव में काम करती है। मशीन खुद किसी मजदूर को नौकरी से नहीं निकालती। किसी उत्पादन प्रक्रिया में एआई के उपयोग के बाद अगर दस कर्मचारियों में से छह को बेरोजगार किया जाता है, तो यह निर्णय एआई नहीं लेती। यह निर्णय उस पूँजीपति, कॉरपोरेट प्रबन्धन और राज्य–सत्ता का होता है जो उत्पादन के साधनों और उत्पादन प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। एआई केवल वह भौतिक सम्भावना पैदा करती है जिसके जरिये कम मानवीय श्रम में अधिक उत्पादन सम्भव हो सकता है। उस सम्भावना का नतीजा बेरोजगारी होगा या कार्यदिवस में कमी–– यह तकनीक नहीं, सामाजिक व्यवस्था निर्धारित करती है।

तकनीक समाज से बाहर खड़ी स्वतंत्र शक्ति नहीं है। उत्पादन शक्तियाँ और उत्पादन सम्बन्ध परस्पर अन्त:क्रिया करते हैं। नयी उत्पादन शक्तियाँ पुराने उत्पादन सम्बन्धों के भीतर जन्म लेती हैं, उनका विकास करती हैं, लेकिन एक निश्चित बिन्दु पर उन्हीं सम्बन्धों के साथ अन्तर्विरोध में आ जाती हैं। मशीन का विकास सामन्ती समाज के भीतर हुआ, लेकिन मशीन–आधारित उत्पादन ने सामन्तवाद की आर्थिक नींव को कमजोर करके पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों के विकास को गति दी। पूँजीवाद ने मशीन, कारखाने और आधुनिक उद्योग को अभूतपूर्व विस्तार दिया, लेकिन उसी प्रक्रिया ने श्रम की उत्पादकता को इतना बढ़ाया कि सामाजिक उत्पादन और निजी मालिकाने के बीच अन्तर्विरोध लगातार तीखा होता गया।

एआई इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का नवीनतम चरण है। यह इनसानी श्रम के स्थान पर केवल भौतिक मशीन नहीं रखतीय यह ज्ञान, सूचना–प्रसंस्करण, भाषा, निर्णय–सहायता और अनेक मानसिक कार्यों का स्वचालन सम्भव बनाती है। इसलिए पूँजीवाद के इतिहास में पहली बार “ह्वाइट कॉलर” और “ब्लू कॉलर” श्रम के बीच स्थापित विभाजन भी बड़े पैमाने पर तकनीकी पुनर्गठन के अधीन आ गया है। शुरुआती औद्योगिक स्वचालन ने कारखानों, खानों और परिवहन में शारीरिक श्रम की जरूरत कम की थी।  एआई अब लेखन, अनुवाद, प्रोग्रामिंग, डिजाइन, ग्राहक सेवा, लेखांकन, कानूनी शोध, डेटा–विश्लेषण और प्रशासनिक कार्यों जैसे क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है और वह एक ओर मानसिक श्रम करने वालों की सहायक बन रही है तो दूसरी ओर उन्हें चुनौती भी दे रही है। यह पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल अन्तर्विरोधों से भरी हुई है।

लेकिन इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि एआई के कारण बेरोजगारी अपरिहार्य है। इसके विपरीत तकनीकी प्रगति जितनी अधिक श्रम–उत्पादकता बढ़ाती है, उतनी ही अधिक वह इनसान को आवश्यक श्रम से मुक्त करने की वस्तुगत क्षमता पैदा करती है। मौजूदा त्रासदी तकनीक में नहीं, उस वर्गीय व्यवस्था में है जो उत्पादकता में वृद्धि को मानव–मुक्ति में परिवर्तित नहीं करती। अगर किसी समाज में एआई और स्वचालन के कारण एक ही वस्तु या सेवा को बनाने में पहले की तुलना में आधा समय लगता है, तो तर्कसंगत सामाजिक नतीजा यह होना चाहिए कि समाज के सदस्य कम समय काम करें और अधिक समय शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, परिवार, सामुदायिक जीवन तथा सृजनात्मक गतिविधियों में लगायें। लेकिन पूँजीवाद में वही उत्पादकता–वृद्धि एक अलग रूप लेती है। कुछ श्रमिकों की नौकरी से छुट्टी कर दी जाती है, शेष श्रमिकों से अधिक काम कराया जाता है और उत्पादन की बढ़ी हुई सामाजिक क्षमता पूँजीपति के मुनाफे में बदल जाती है। यहीं से एआई के पूँजीवादी और समाजवादी मॉडल का वास्तविक विभाजन शुरू होता है।

पूँजीवाद में एआई: उत्पादक शक्ति का विकास और एकाधिकारी नियंत्रण

आज एआई को लेकर दुनिया में जो सबसे बड़ी तकनीकी दौड़ चल रही है, उसका केन्द्र केवल वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं है। इसके पीछे विशाल पूँजी संचय, डिजिटल एकाधिकार, डेटा पर नियंत्रण, अति–उन्नत सेमीकण्डक्टर, ऊर्जा संसाधन और भू–राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। उदाहरण के रूप में यूक्रेन युद्ध, ताइवान संकट और ‘किमी के–3’ एआई के विकास में ये बातें खुलकर सामने आयी हैं। एक आधुनिक एआई प्रणाली को प्रशिक्षित करने के लिए विशाल कंप्यूटिंग अवरचना चाहिए। उसके लिए चिप्स, डेटा सेण्टर, बिजली, जल, प्रशिक्षित वैज्ञानिक और विशाल डेटा–संग्रह चाहिए। इन सभी साधनों पर नियंत्रण जितना अधिक केन्द्रीकृत होगा, एआई का विकास उतना ही अधिक कुछ कम्पनियों और देशों के अधीन होगा।

यही कारण है कि एआई के मौजूदा पूँजीवादी विकास का सबसे स्पष्ट लक्षण केन्द्रीकरण है। “खुली” और “लोकतांत्रिक” तकनीक की भाषा बोलते हुए भी बड़ी एकाधिकारी पूँजी ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहती है जिसमें मॉडल, क्लाउड, कंप्यूटिंग, डेटा और वितरण के मुख्य बिन्दु कुछ कॉरपोरेट समूहों के नियंत्रण में रहें। उपयोगकर्ता एआई का उपयोग कर सकता है, लेकिन उसके निर्माण और संचालन की मूल प्रक्रिया पर उसका नियंत्रण नहीं होता। वह उपभोक्ता है, उत्पादक नहींय उपयोगकर्ता है, मालिक नहीं।

यहाँ बौद्धिक सम्पदा का सवाल भी केन्द्रीय महत्व ग्रहण कर लेता है। ज्ञान इनसान के हजारों वर्षों के सामूहिक श्रम का नतीजा है। भाषा किसी कम्पनी ने नहीं बनायी। साहित्य, वैज्ञानिक ज्ञान, कोड, संगीत, चित्रकला, सार्वजनिक संचार और सामाजिक व्यवहार सामूहिक मानव श्रम और उसके इतिहास की उपज हैं। एआई प्रणालियाँ इसी विशाल सामाजिक ज्ञान–सम्पदा पर प्रशिक्षित होती हैं। लेकिन जब इस सामूहिक ज्ञान को कुछ निजी कम्पनियाँ विशाल पूँजी के सहारे अपने नियंत्रण में लेकर उससे निजी लाभ कमाती हैं, तब सामाजिक उत्पादन का निजी अधिग्रहण नये और अधिक उन्नत रूप में दिखाई देता है।

यहाँ पूँजीवाद का मूल नियम बदलता नहीं है। इससे पहले औद्योगिक जमाने में श्रमिकों के सामूहिक श्रम से पैदा वस्तुओं पर निजी मालिकाना कामय कर लिया जाता था। आज के डिजिटल दौर में सामाजिक ज्ञान, सार्वजनिक संचार और इनसानियत की सांस्कृतिक–संज्ञानात्मक उपलब्धियों को निजी एल्गोरिदम आधारित पूँजी में बदला जा रहा है। अधिक सटीक बात यह है कि डेटा, ज्ञान और कंप्यूटिंग आधुनिक पूँजी संचय के ऐसे साधन बनते जा रहे हैं जिनके आधार पर सामाजिक रूप से अर्जित ज्ञान को निजी सम्पत्ति में बदला जा रहा है।

यह प्रक्रिया अमरीकी एआई मॉडल की सामान्य प्रवृत्ति को समझने में सहायता देती है। यहाँ “नवाचार” का अर्थ अक्सर बाजार–नेतृत्व, निजी निवेश, पेटेन्ट, शेयर–मूल्य और वैश्विक तकनीकी वर्चस्व के साथ जुड़ा हुआ है। एआई कम्पनी का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जाता कि उसने समाज की किन जरूरतों को पूरा किया, बल्कि इस आधार पर किया जाता है कि उसका भविष्य का बाजार कितना विशाल है, उसके पास कितना डेटा है और वह प्रतिद्वन्द्वियों को कितना पीछे छोड़ सकती है। इससे सटोरिया पूँजी का विस्तार भी हो रहा है। एआई से सम्बन्धित कम्पनियों का बाजार मूल्य उनके वास्तविक सामाजिक उपयोग से कहीं अधिक तेजी से बढ़ता जा रहा है।

एआई के गॉडफादर जेफरी हिण्टन का मानना है कि अगर एआई को अपने मुख्य कोड को बदलने की छूट मिले तो वह खुद अपनी और दुनिया की मालिक बन सकती है। लेकिन वे यह बात छिपाते हैं कि एआई के लिए बिजली–पानी जैसी भौतिक चीजों की जरूरत भी है। इससे वह दुनिया की मालिक नहीं बन सकती। इस तरह हम देखते हैं कि पूँजीवादी प्रचार एआई को अमूर्त “डिजिटल बुद्धि” के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि इसके पीछे खनन, सेमीकण्डक्टर निर्माण, सर्वर–फार्म, विद्युत संयंत्र, केबल नेटवर्क और विशाल डेटा सेण्टर जैसी भौतिक चीजों की बेहद जरूरत है। इन पर दिग्गज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा है। इसलिए एआई को “भौतिक अर्थव्यवस्था” से अलग बताना एक भ्रम जाल के सिवा कुछ नहीं है। हम जानते हैं कि कंप्यूटिंग शक्ति जितनी बढ़ेगी, ऊर्जा की माँग और अवरचनागक जरूरतें उतनी ही महत्वपूर्ण हो जायेंगी जो मुट्ठीभर साम्राज्यवादी कम्पनियों के नियन्त्रण में हैं।

इसका अर्थ है कि जिसके पास अधिक पूँजी है, वह अधिक कंप्यूटिंग खरीदेगाय जिसके पास अधिक कंप्यूटिंग है, वह अधिक शक्तिशाली मॉडल विकसित करेगाय शक्तिशाली मॉडल से अधिक उपयोगकर्ता, निवेश और मुनाफा आएगा और अधिक मुनाफे से प्रतिस्पर्धी एकाधिकार को और मजबूत किया जाएगा। यह चक्र तकनीकी प्रगति को सामाजिक सम्पत्ति बनाने के बजाय निजी पूँजी के केन्द्रीकरण का साधन बनाता है।

इसी सन्दर्भ में एआई का श्रम–बाजार प्रभाव समझना चाहिए। पूँजीवाद में तकनीक का प्रयोग श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाने के लिए होता है, लेकिन श्रमिक को उस उत्पादकता का मालिक नहीं बनाया जाता जबकि यह वर्ग दुनिया की आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। उदाहरण के लिए, अगर एआई किसी कर्मचारी का काम चार घण्टे से घटाकर दो घण्टे कर देती है, तो तीन सम्भावनाएँ हैं–– कर्मचारी का कार्यदिवस घटेय वही कर्मचारी अधिक सामाजिक रूप से उपयोगी काम करे या कम्पनी उसी काम के लिए कर्मचारियों की संख्या घटा दे और शेष से अधिक काम कराये। पूँजीवादी प्रतियोगिता तीसरी दिशा को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एआई आज “इनसान की जरूरत” पूरा करने के बजाय “श्रमिक की क्रयशक्ति” का संकट पैदा करती है। यह एक महत्वपूर्ण अन्तर्विरोध है। ऐसी हालत में जब आय कुछ पूँजीपति समूहों में केंद्रित होती जाती है, तो उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं को खरीदेगा कौन? पूँजीवाद इसी समस्या को ऋण, वित्तीय विस्तार, नये बाजारों, सैन्य खर्च और अस्थायी युद्धों से टालने का प्रयास कर रहा है, लेकिन वह आज भी सामाजिक उत्पादन और निजी मालिकाने के अन्तर्विरोध को स्थायी रूप से हल का प्रयास नहीं करता है। इसलिए उत्पादक शक्तियों की प्रगति समाज की भौतिक समृद्धि बढ़ाती है, लेकिन पूँजीवादी मालिकाना सम्बन्ध उसी समृद्धि को सामाजिक असमानता, बेरोजगारी और असुरक्षा के रूप में प्रकट करते हैं। एआई इस अन्तर्विरोध को समाप्त नहीं करतीय वह उसे नये स्तर पर ले जाती है।

पर्यावरण संकट के हिसाब से एआई का असीमित विस्तार हमारी प्रगति का सूचक नहीं है, यह प्राकृतिक संसाधनों पर बहुत अधिक दबाव डाल रहा है। विशाल डेटा सेण्टर बिजली की अथाह खपत करते हैं, मशीनों को ठण्डा रखने के लिए जल चाहिए और उनकी तकनीकी संरचना खनिज संसाधनों की माँग बढ़ाती है। इसलिए एआई के लिए हमारी धरती माँ कितनी कीमत चुका सकती है, यह भी हमें सोचना है। एआई के लिए संसाधनों के अथाह दोहन के खिलाफ भी जनता आन्दोलन कर रही है जो न्यायपूर्ण है।

समाजवाद में एआई की सम्भावना: मालिकाना, नियोजन और सामाजिक जरूरत

समाजवादी समाज में एआई के इस्तेमाल का अर्थ केवल यह नहीं कि किसी एआई पर मेहनतकशों के राज्य का नियंत्रण होगा। अगर राज्य मालिकाने के बावजूद तकनीकी विकास नौकरशाही विशेषाधिकार, सामाजिक नियंत्रण के अभाव और जनता से अलग निर्णय–प्रक्रिया के अन्तर्गत संचालित होता है, तो उसे केवल नाम के आधार पर समाजवादी नहीं कहा जा सकता। जैसा कि चीन में तकनीक के मामले में ‘महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’ के दौरान देखा गया जो उस क्रान्ति के मुख्य सवालों में से एक था। समाजवादी एआई की कसौटी उत्पादन साधनों के औपचारिक मालिकाना से आगे जाती है। केन्द्रीय प्रश्न हैं कि एआई अवरचना का सामाजिक मालिकाना कितना है, तकनीकी निर्णयों में जनता और श्रमिकों की भूमिका कितनी है, उत्पादकता–वृद्धि का लाभ किसे मिलता है, ज्ञान और तकनीक कितनी व्यापक रूप से साझा की जाती है और नियोजन का उद्देश्य मुनाफा है या सामाजिक जरूरत।

ऐसे मॉडल में एआई का पहला लक्ष्य श्रमिक को हटाना नहीं, उसके कार्य को मानवीय बनाना होना चाहिए। जो कार्य अत्यधिक दोहरावपूर्ण, खतरनाक, थकाऊ और नीरस हैं, उनमें स्वचालन का विस्तार होना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही “पुनर्वास” को दया या कल्याणकारी नीति नहीं, बल्कि नियोजित उत्पादन की अनिवार्य शर्त माना जाना चाहिए। अगर किसी उद्योग में एआई के कारण दस हजार श्रमिकों में से केवल पाँच हजार की आवश्यकता रह जाती है, तो पाँच हजार लोगों को बेरोजगार घोषित कर देना सामाजिक रूप से बेतुका निर्णय है। तर्कसंगत समाजवादी नीति काम को पुनर्वितरित करेगी, कार्यदिवस घटाएगी, नये क्षेत्रों में प्रशिक्षण देगी और सामाजिक जरूरतों–– स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, सार्वजनिक अवरचना, विज्ञान और देखभाल में श्रमशक्ति को नियोजित करेगी। यहीं रोजगार की जगह “सामाजिक श्रम–समय” को केन्द्रीय श्रेणी के रूप में देखना जरूरी है। यानी बूढ़े, बीमार और बच्चों की सेवा को प्राथमिकता देना समाजवादी नीति का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। एक उन्नत समाजवादी व्यवस्था में उत्पादकता बढ़ने का पहला संकेत बेरोजगारी में कमी के साथ ही कार्यदिवस की क्रमिक कमी होना चाहिए।

समाजवाद में भी यह बात महत्वपूर्ण होगी कि एआई पर्यावरण को कितना नुकसान पहुँचाता है। उस हिसाब से उसके इस्तेमाल को सीमित ही रखना होगा जिससे मानवता का भविष्य उज्ज्वल बना रहे।

दूसरा केन्द्रीय प्रश्न ज्ञान का है। एआई की वैज्ञानिक उन्नति सामूहिक शोध और ज्ञान के आदान–प्रदान से तेज होती है। अमरीकी बौद्धिक सम्पदा अधिकार और पेटेण्ट कानून के तहत बन्द मॉडल निजी मालिकाने की रक्षा करते हैं, जबकि चीन का ओपन सोर्स मॉडल ज्ञान के व्यापक प्रसार की सम्भावना पैदा करते हैं। यहाँ यह समझना जरूरी है कि चीन का “ओपन सोर्स” खुद समाजवाद नहीं है। वहाँ की एकाधिकारी निजी कम्पनियाँ भी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ओपन मॉडल जारी करती हैं। यहाँ यह बता दें कि शायद कोई भ्रमित होकर ही आज के चीन को समाजवादी कहेगा जो कि स्पष्ट तौर पर पूँजीवादी हो चुका है। फिर भी उसका ओपन सोर्स मॉडल समाज के लिए मौजूदा समय में ज्यादा बेहतर है। क्योंकि अगर भारत जैसा तकनीक में पिछड़ा देश अमरीकी बन्द मॉडल पर पूरी तरह निर्भर है, तो वह केवल एआई सेवा का उपभोक्ता बन सकता है। अगर उसके पास खुले मॉडल, स्थानीय भाषाई डेटा, सार्वजनिक कम्प्यूटिंग अवरचना और अपने वैज्ञानिक संस्थान हों, तो वह अपनी देशी जरूरतों के अनुसार तकनीक विकसित कर सकता है। यही कारण है कि खुले मॉडल विशेष रूप से दक्षिणी गोलार्द्ध के पिछड़े पूँजीवादी देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

भारत जैसे बहुभाषी और असमान समाज में इसका अर्थ बहुत व्यापक है। हिन्दी, तमिल, बांग्ला, उर्दू, मराठी, तेलुगु, कन्नड़, मलयाली, पंजाबी और अन्य भाषाओं में शिक्षा, कानूनी सहायता, कृषि–ज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक सूचना के लिए एआई विकसित की जा सकती है। लेकिन अगर ऐसी प्रणालियाँ विदेशी कॉरपोरेट प्लेटफॉर्मों के पूर्ण नियंत्रण में होंगी, तो भारतीय समाज केवल ग्राहक बनेगा। इसके विपरीत सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, भाषाई समुदायों और सार्वजनिक संस्थाओं के सहयोग से निर्मित ओपन और सार्वजनिक एआई अवरचना राष्ट्रीय वैज्ञानिक क्षमता का आधार बन सकती है।

समाजवादी एआई का अर्थ इसलिए तकनीकी आत्मनिर्भरता भी है, लेकिन संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं। वास्तविक तकनीकी सम्प्रभुता अलगाव से नहीं, वैज्ञानिक सहयोग से पैदा होती है। कोई भी देश आधुनिक एआई के सभी घटक अकेले विकसित नहीं कर सकता। सेमीकण्डक्टर, कंप्यूटिंग, ऊर्जा, गणित, भाषाई संसाधन और वैज्ञानिक अनुसंधान वैश्विक सहयोग की माँग करते हैं। इसलिए पूँजीवादी तकनीकी राष्ट्रवाद, जो पेटेण्ट, प्रतिबन्ध और भू–राजनीतिक दबाव के माध्यम से ज्ञान को नियंत्रित करना चाहता है, उसके मुकाबले समाजवादी अन्तरराष्ट्रीयतावाद ज्ञान–साझेदारी का सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। यही इनसानियत का भविष्य है।