सीरिया में तख्तापलट के निहितार्थ
अन्तरराष्ट्रीय विक्रम प्रतापकैसे किसी देश को साम्राज्यवादी आकांक्षा और पूँजीवादी विस्तारवाद की चपेट में बर्बाद कर दिया जाता है, इसका जीत–जागता उदाहरण सीरिया है। खबर है कि दिसम्बर 2024 के पहले हफ्ते में विद्रोहियों ने बशर अल–असद की सरकार को उखाड़ फेंका। देश कई विद्रोही गुटों और खूँखार विदेशी भेड़ियों के पंजों में असहाय पड़ा हुआ है। उसका कोई रहनुमा नहीं रहा। कुछ लोग ताली बजा कर इसका स्वागत कर रहे हैं। कहीं वे हत्यारों के समर्थन में ताली तो नहीं बजा रहे हैं ? लेकिन हमें एक बार ठहरकर सोचना चाहिए कि हकीकत क्या है ? सीरिया की जैसी हालत आज है, उससे सीरिया की जनता का भला नहीं हो सकता। उसके लिए एक ही उपमा नजर आ रही है–– खण्डित राष्ट्र।
सीरिया की तबाही के लिए कौन जिम्मेदार है ? दस साल में इस देश की आबादी आधी से कम रह गयी। 5 लाख से अधिक लोग मारे गयें और दसियों लाख लोग पलायन कर गयें। सीरिया में सरकार के खिलाफ लड़ने वाले विद्रोहियों की मदद कौन कर रहा था ? इन सवालों के जवाब ढूँढना बहुत जरूरी है।
सत्ता से हटाये जाने के बाद सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल–असद को रूस में शरण लेनी पड़ी है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री एस पेसकोव ने बताया कि रूस में अल–असद कहाँ पर हैं, इसका खुलासा नहीं किया जाएगा। पुतिन ने अल–असद और उनके परिवार को सहारा दिया है। अल–असद की सरकार ने ईरान और रूस की मदद से एक दशक से अधिक समय तक विद्रोही ताकतों को रोके रखा था। लेकिन दिसम्बर की शुरुआत में असद की सरकार आश्चर्यजनक गति से ढह गयी, जिसका समापन राजधानी दमिश्क पर विद्रोहियों के नियंत्रण के साथ हुआ। इससे ईरान और रूस को बहुत बड़ा झटका लगा है।
असद सरकार, इस्लामिक स्टेट, विपक्षी समूह, ईरान, रूस, तुर्की और अमरीका के नेतृत्व वाले गठबंधन पर गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन और नरसंहार के आरोप लग चुके हैं। कोई दूध का धुला नजर नहीं आ रहा है। साम्राज्यवादी भेड़िये सीरिया की जनता पर टूट पड़े हैं और नोच खाने के लिए आतुर हैं। उन्होंने मिलकर एक अच्छे–खासे फलते–फूलते राष्ट्र को खण्डहर में तब्दील कर दिया और जनता को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया। इस चैतरफा संघर्ष ने एक बड़े शरणार्थी संकट को जन्म दिया जिसमें लाखों लोग जर्मनी, तुर्की, लेबनान और जॉर्डन में सिर छिपाने को मजबूर हैं। इसने यह दिखा दिया कि अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बनायी गयी संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ किस कदर साम्राज्यवादियों के आगे असहाय हो गयी है।
अमरीका का मीडिया असद सरकार पर तरह–तरह की तोहमते लगाता रहा है। जैसे, असद सरकार ने जनता का कत्लेआम किया है। गृहयुद्ध में रासायनिक हथियारों के द्वारा मासूम–निहत्थे लोगों को मारा। इसके चलते हजारों लोग विस्थापित हुए। 20 सालों से जनता के लोकतंत्र का मजाक उड़ाया। यह सब अमरीका का झूठा प्रोपगेण्डा है। यह हमें सीरिया की हकीकत को समझने से रोकता है।
कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि यह बात ठीक है कि अमरीका के खिलाफ होने के चलते असद को सत्ता से बाहर जाना पड़ा। कुर्द लोगों के कई दशकों के संघर्ष में असद सरकार ने कितना साथ दिया है। जब भी कुर्द अपने हक की माँग करते हैं उनके कुचलने की खबरें तो हमने भी सुनी है। वे आज भी इस लड़ाई को अकेले लड़ रहे हैं।
सीरिया में गृहयुद्ध
दुनिया इस बात की गवाह रही है कि 2008 की विश्वव्यापी मन्दी के चलते विश्व साम्राजवादी व्यवस्था संकट में फँसती चली गयी थी। इसने दुनिया भर में बहुत बड़े राजनीतिक संकट को जन्म दिया। जनता का असन्तोष चरम पर पहुँच गया। हर देश में व्यवस्था विरोधी आन्दोलन की झड़ी लग गयी। लेकिन 2008 से 2013 तक हुए आन्दोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए नाकाफी साबित हुए। उनका मुँह गलत दिशा में मोड़ दिया गया। इससे हर जगह प्रतिक्रियावादी ताकतों को पनपने का मौका मिला। जैसे–– मिस्र, भारत और सीरिया में। 2011 में असद के खिलाफ देश में विशाल प्रदर्शन हुए। इसका फायदा उठाते हुए देश में असद सरकार के खिलाफ कई विद्रोही धड़ों ने सिर उठा लिया। इससे सीरिया में दीर्घकालिक और विनाशकारी गृहयुद्ध की शुरुआत हो गयी।
मार्च 2011 में अल–असद सरकार के प्रति जनता में भारी असन्तोष था। लोगों ने पूरे सीरिया में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और लोकतंत्र समर्थक रैलियाँ शुरू कर दी थीं। इसी तरह के प्रदर्शन अरब देशों में भी हो रहे थे। मिस्र में लोकतंत्र समर्थक आन्दोलन ने सैन्य नेता होस्नी मुबारक की 30 साल पुरानी तानाशाही को उखाड़ फेंका था, लेकिन मिस्र को दुर्दिन देखना ही लिखा था। वहाँ आन्दोलन, सत्ता संघर्ष और तख्ता पलट का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने जनता की कमर ही तोड़ दी। इधर सीरिया में असद सरकार ने लोकतंत्र समर्थक आन्दोलन को उभरने नहीं दिया, जिसके चलते देश भर में फ्री सीरियन आर्मी जैसे विभिन्न सशस्त्र विद्रोही समूह बनने लगे, जिसने सीरियाई विद्रोह को नया मुकाम दिया। 2012 के मध्य तक, विद्रोह एक पूर्ण विकसित गृहयुद्ध में बदल गया था।
सीरिया का गृहयुद्ध बहुत जटिल तस्वीर पेश करता है। यह युद्ध केवल दो ताकतों के बीच नहीं लड़ा जा रहा था, बल्कि इसमें कई पक्ष थे, जिनके स्वार्थ एक दूसरे से टकरा रहे थे। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर दो बड़ी ताकतें–– अमरीका और रूस एक दूसरे के खिलाफ खड़ी थीं। हालाँकि शीत युद्ध का जमाना बीते हुए दशकों हो गये थे और 1990 के दशक में विघटित होने के बाद रूस में इतनी ताकत नहीं बची कि वह खुलेआम अमरीका की दादागिरी का जवाब दे सके, लेकिन पुतिन के शासन ने जब रूस को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया, तब रूस की साम्राजवादी महात्वाकांक्षा को पर लग गये। हालाँकि इससे पहले उसने इराक और लीबिया में अमरीका की दखलन्दाजी के आगे घुटने टेके थे, क्योंकि वह कमजोर था, लेकिन सीरिया में नहीं। अब पानी सिर के ऊपर चला गया था। अमरीका को जवाब देना जरूरी था। सीरिया में अमरीका और रूस की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हुई थी। जहाँ रूस असद सरकार के साथ मजबूती से खड़ा था, वहीं अमरीका विद्रोहियों की मदद के जरिये असद सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए काम कर रहा था। रूस की तरह ईरान और हिजबुल्लाह ने सीरिया की असद सरकार को सैन्य समर्थन दिया था। रूस ने सीरिया में सितम्बर 2015 से विद्रोहियों के खिलाफ कई हवाई हमले और जमीनी अभियान चलाये।
अमरीका ने सीरियाई विद्रोहियों के हित और सहानुभूति का बहाना बनाकर सीरिया में दखलन्दाजी की और उसके कई इलाकों पर बमबारी भी की। उन विद्रोहियों में से कुछ ने अमरीका के हमलों का विरोध भी किया। अमरीका के कई शहरों में अमनपसन्द जनता ने युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन बेशर्म ओबामा ने उनकी एक न सुनी। उसने अमरीकी हथियार और तेल कम्पनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए नोबेल शान्ति का मुखौटा उतार फेंका और नग्न साम्राज्यवादी चरित्र के अनुरूप नरसंहार की तैयारी में जुट गया, जिससे वे लूटे गये माल को हड़प सकें और मन्दी से बच सकें।
दुनिया के जाने–माने विद्वान नोम चोमस्की ने लिखा था कि “जब सीरिया पर हमला करने के लिए ओबामा द्वारा लिये गये फैसले के पक्ष में अन्तरराष्ट्रीय साख ध्वस्त हो गयी और उसी के साथ ओबामा सरकार की साख भी गिर गयी, तब आखिरकार उसे अपने युद्ध अपराध के लिए उस बहुप्रचलित बहाने का सहारा लेना पड़ा जो सारे ढकोसले फेल हो जाने के बाद अपनाया जाता है–– दुनिया के स्वघोषित दारोगा की धमकियों की साख का।”
विद्रोही कौन हैं ?
पश्चिम की मीडिया के अनुसार, असद को सत्ता से बेदखल करने के पीछे मुख्य विद्रोही समूह ‘हयात तहरीर अल–शाम’ है। सीरिया के गृहयुद्ध की शुरुआत में कई विद्रोही समूह एक साथ आने शुरू हुए थे, जब जिहादियों ने असद सरकार से लड़ने के लिए नुसरा फ्रंट का गठन किया था। इस समूह के शुरुआती सम्बन्ध इस्लामिक स्टेट और फिर अल कायदा से थे। अमरीका और अन्य पश्चिमी देश अभी तक इसे एक आतंकवादी समूह मानते हैं, लेकिन असद सरकार के खिलाफ इनकी मदद भी करते रहे हैं। अमरीका का यह दूरंगापन उसके साम्राज्यवादी चरित्र के अनुरूप ही है। ऐसा कहा जाता है कि 2016 में ‘हयात तहरीर अल–शाम’ ने इस्लामिक स्टेट से अपना सम्बन्ध खत्म कर दिया था।
जैसा हमने देखा कि ‘हयात तहरीर अल–शाम’ ने असद सरकार का तख्ता पलट कर राजधानी दमिश्क पर कब्जा कर लिया है। अब अटकलें लगायी जा रही हैं कि किस देश–– तुर्की, अरब और खाड़ी देश, यूक्रेन, अमरीका का सीआयीए या इजराइल ने ‘हयात तहरीर अल–शाम’ को नकदी, हथियार या प्रशिक्षण के साथ मदद की है। लेकिन कई वर्षों से इस विद्रोही समूह पर नजर रखने वाले विद्वानों का मानना है कि यह समूह काफी हद तक स्व–वित्तपोषित है। यह समूह अपने कब्जे के इलाके में टैक्स लगाकर धन जुटाता है। इसे विदेशों में रहने वाले उन अमीर सीरियाई लोगों से भी धन प्राप्त होता है, जो बशर अल–असद का विरोध करते हैं।
सीरिया नृजातीय, साम्प्रदायिक और धार्मिक रूप से विभाजित देश है, इस पर कोई धर्म–निरपेक्ष सरकार ही शासन चला सकती है। विद्रोहियों को इसे अपने नियंत्रण में लेने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ रही है। लेकिन धर्म–निरपेक्ष और जनवादी सरकार के अभाव में देश की एकता को बरकरार रखना सम्भव दिखायी नहीं देता। हालाँकि विद्रोही सेनाओं ने राजधानी पर नियंत्रण कर लिया है और वे एक नयी सरकार बनाने के बारे में विचार कर रही हैं, लेकिन उनके लिए आगे का रास्ता ‘आग का दरिया’ है।
सीरिया के दूसरे सबसे बड़े विद्रोही समूह कुर्द हैं। कुर्द इराक, सीरिया, तुर्की और ईरान में फैले हुए हैं और इन देशों की रजनीति को गहरे से प्रभावित करते हैं। उनकी कुल आबादी 3 करोड़ से अधिक है जिनके पास अपना स्वतंत्र राष्ट्र नहीं है। अपने राष्ट्र की आकांक्षा आज भी उनमें बलवती है। वे लगातार विस्थापन, अमानवीयकरण, अलगाव और नरसंहार के शिकार रहे हैं। ऐसी दर्दनाक असुरक्षाओं के बीच कुर्द राष्ट्रवाद की प्रेरक शक्ति ने उन्हें विद्रोही बना दिया है। हालाँकि सभी कुर्द समरूप समूह नहीं हैं और न ही वे एकजुट हैं, बल्कि उनके बीच राजनीतिक–सांगठनिक प्रतिद्वन्द्विता भी है।
मध्य पूर्व में कुर्द राजनीति
प्रथम विश्व युद्ध के बाद, 1920 में सेव्रेस सन्धि के जरिये ओटोमन साम्राज्य को भंग कर दिया गया था और एक स्वायत्त कुर्द राष्ट्र के निर्माण का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन तुर्की के नये नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने सेव्रेस सन्धि को अस्वीकार कर दिया। इससे कुर्द राष्ट्र का सपना अधूरा रह गया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद कुर्दों ने ईरान के कुर्द–आबाद क्षेत्रों में महाबाद गणराज्य की स्थापना की थी, जो थोड़े समय के लिए ही चला। 1946 में कुर्द राष्ट्रवाद के जनक मुस्तफा बरजानी ने महाबाद गणराज्य में निर्वासन के दौरान इराक की कुर्द डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई। बाद में इसका नाम बदलकर कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी (केडीपी) कर दिया गया, यह 1970 के दशक तक इराक में एकमात्र कुर्द पार्टी थी। बरजानी ने इराकी शासन के विरुद्ध कुर्द विद्रोह का नेतृत्व किया था।
सीरिया के अल–हसाकाह गवर्नरेट की जनगणना में, जो कुर्द 1945 से पहले सीरिया में अपने निवास को साबित नहीं कर पाये, उनकी नागरिकता छीन ली गयी। कुर्द और उनके वंशज वोट देने, सम्पत्ति, व्यवसाय के मालिक होने या कानूनी रूप से विवाह करने से वंचित कर दिये गये। 1970 में सीरियाई नेता हाफिज अल–असद ने तुर्की की सीमा पर तथाकथित अरब बेल्ट की स्थापना की थी, जिससे सीरियाई कुर्दों को विस्थापित किया जा सके। यह कदम संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों से कुर्दों के प्रभुत्व को कमजोर करने के लिए उठाया गया था।
1978 में अब्दुल्ला ओकलान ने तुर्की में कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) की स्थापना की। पीकेके को कोंगरा–गेल के नाम से भी जाना जाता है। यह मार्क्सवादी विचारों पर आधारित समूह है। इस समूह का उद्देश्य ईरान, इराक, सीरिया और तुर्की के कुर्द क्षेत्रों पर नियंत्रण हासिल करके एक स्वतंत्र कुर्दिस्तान राष्ट्र की स्थापना है। 1997 में अमरीका ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। 1998 में, तुर्की के सैन्य दबाव के चलते सीरिया ने अदाना समझौते पर हस्ताक्षर करके पीकेके से समर्थन खत्म कर दिया। 1999 में अमरीका के इशारे पर अब्दुल्ला ओकलान को केन्या के नैरोबी में तुर्की बलों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें देशद्रोह के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। ओकलान की गिरफ्तारी के खिलाफ तुर्की और यूरोप में कुर्द विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे।
2003 में पीकेके से सम्बद्ध कुर्द डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी (पीवाईडी) की स्थापना सीरिया में की गयी। पीकेके के प्रति पीवाईडी की वफादारी इसे अन्य सीरियाई कुर्द पार्टियों और बरजानी के नेतृत्व वाली केआरजी के साथ टकराव में डालती हैं। मार्च 2004 में सीरियाई सेना द्वारा नौ कुर्द युवकों के शोक में निकाले गये जुलूस पर गोलीबारी के बाद सीरियाई कुर्द कामिशली में सड़कों पर उतर आये थे। 2011 में विद्रोह के बीच कुर्दों का समर्थन पाने के लिए, संकटग्रस्त राष्ट्रपति बशर अल–असद ने डिक्री 49 जारी की, जिसके तहत 1962 की जनगणना में विदेशी के रूप में पंजीकृत कुर्दों को नागरिकता प्रदान की गयी। जो कुर्द कभी पंजीकृत नहीं हुए, वे आज तक राज्यविहीन बने हुए हैं। सीरिया की असद सरकार के खिलाफ कुर्दों का विद्रोह लगातार जारी रहा। कुर्द अमरीका के साथ भी नहीं हैं।
सीरिया के गृहयुद्ध में कई पक्ष हैं
हमने अभी तक देखा कि सीरिया के गृहयुद्ध में कई पक्ष शामिल हैं जो कुल मिलाकर एक जटिल परिदृश्य उपस्थित करते हैं। बाद में बशर अल–असद सरकार बनाम कुर्द और केआरजी विद्रोहियों के बीच इस्लामिक स्टेट (आयीएसआयीएस) ने अपनी नाक घुसेड़ ली। अमरीका ने इस्लामिक स्टेट को खत्म करने के नाम पर सीरिया में हमले किये। किस पर ? यह सवाल उठा। उसने असद सरकार की सैन्य ताकतों पर हमले किये। इसके साथ ही उसने अल नुसरा और फ्री सीरियन आर्मी को हथियार भी दिया जो असद सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे। अल नुसरा, अल–कायदा से सम्बन्ध रखता है। हम जानते हैं कि अमरीका अल–कायदा को आतंकवादी संगठन मानता है, लेकिन सीरिया में अल नुसरा की मदद करता है। बराक ओबामा ने आधिकारिक बयान देकर इसकी पुष्टि की थी। अमरीका सहित सभी पश्चिमी देश सीरिया में असद की सरकार को उखाड़ने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं, यहाँ तक कि वे इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों को भी सत्ता सौंप सकते हैं। उनका यह तरीका शीत युद्ध के दौर से ही जारी है।
विद्रोही ताकतों ने शुरू में सरकारी सैनिकों के खिलाफ कई लड़ाइयों में जीत हासिल की। विद्रोहियों ने 2013 में रक्का और 2015 में इदलिब पर कब्जा कर लिया। इसके बाद ईरान ने 2014 में सीरियाई सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया और 2015 में रूस ने भी ऐसा ही किया, जिससे संघर्ष का सन्तुलन बदल गया। 2018 के अन्त तक, इदलिब क्षेत्र के कुछ हिस्सों को छोड़कर सभी विद्रोही गढ़ सरकारी सैनिकों के हाथों में वापस चले गये थे।
सितम्बर 2014 में, गृहयुद्ध में एक नाटकीय मोड़ आया। उस समय इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीरिया के कुर्द शहर कोबानी पर हमला किया। यह शहर कुर्द विद्रोही पीवाईडी द्वारा नियंत्रित था और तुर्की की सीमा पर है। इसके चलते तुर्की का हित भी सीरिया के गृहयुद्ध से जुड़ गया। तुर्की कुर्द विद्रोही पीवाईडी के भी खिलाफ है क्योंकि पीवाईडी के सम्बन्ध तुर्की के कुर्द विद्रोही संगठन पीकेके से हैं। यहाँ दृश्य बड़ा पेचीदा हो गया। यह संघर्ष बहुपक्षीय बन गया। पीवाईडी कोबानी शहर का बचाव कर रहा था, इस्लामिक स्टेट उसे तबाह कर रहा था, दोनों असद सरकार के खिलाफ थे। इस लड़ाई से पीवाईडी कमजोर होती और असद सरकार का फायदा होना तय था, इसलिए अमरीका ने ताकतवर पीवाईडी के समर्थन में इस्लामिक स्टेट पर भारी हवाई हमले किये। पीकेके के सहयोगी पीवाईडी के लिए अमरीकी समर्थन ने तुर्की को नाराज कर दिया। इससे तुर्की–अमरीकी सम्बन्धों में खटास पैदा हो गयी जो पहले काफी अच्छे दोस्त थे, अब विरोधी हो गये। इसके बाद 15 जुलाई 2016 को अमरीका समर्थित हत्यारों द्वारा तुर्की के अर्दाेगन सरकार के नाकाम तख्तापलट ने तुर्की को अमरीका के खिलाफ ही कर दिया।
इराक में एक साथ मिली सफलता से इस्लामिक स्टेट पूरे उत्साह में था। 2014 में उसने सीरियाई सरकार और दूसरे विद्रोही गुटों दोनों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ जीतीं, लेकिन अमरीका और तुर्की ने उसको आगे बढ़ने से रोक दिया। 24 जुलाई, 2015 को तुर्की ने इस्लामिक स्टेट के कई सीरियाई ठिकानों पर बमबारी की, तुर्की ने इसके लिए अमरीका को अपने इनसिरलिक एयर बेस तक पहुँच प्रदान की। इस्लामिक स्टेट को 2017 के अन्त तक क्षेत्रीय रूप से पराजित कर दिया गया था।
हमने देखा कि ईरान, रूस, तुर्की और अमरीका जैसी कई विदेशी ताकतें सीधे तौर पर गृहयुद्ध में शामिल रही हैं, संघर्ष में विरोधी गुटों को समर्थन प्रदान करती रही हैं। इन विदेशी ताकतों ने सीरिया की सम्प्रभुता को अपने पैरों के नीचे कुचल दिया है। अमरीका इस्लामिक स्टेट के खिलाफ निशाना साधने के बहाने असद समर्थक बलों के खिलाफ हवाई और जमीनी अभियान चलाता रहा है। सीरियाई फ्री आर्मी और एसडीएफ जैसे गुटों को सैन्य सामग्री और रसद देता रहा है। 2011 और 2017 के बीच, सीरियाई गृहयुद्ध की लड़ाई लेबनान में भी फैल गयी क्योंकि सीरियाई सरकार के विरोधी और समर्थक एक–दूसरे से लड़ने और हमला करने के लिए लेबनान की धरती का इस्तेमाल भी करने लग गये। इजराइल भी कहाँ पीछे रहने वाला था, उसने अपनी सीमा से सटे सीरिया के इलाके में भारी गोलीबारी करके हिजबुल्लाह और ईरानी सेना को निशाना बनाया क्योंकि इजराइल इन दोनों को अपना दुश्मन मानता है, जबकि ये दोनों सीरिया की सरकार का समर्थन कर रहे थे।
9 मई, 2017 को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक विद्रोही समूह ‘सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेस’ (एसडीएफ) को हथियार देने की योजना को मंजूरी दी थी। उस समय इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमरीकी नेतृत्व वाला गठबंधन–– एसडीएफ रक्का पर कब्जा करने की तैयारी कर रहा था। इस कदम ने भी तुर्की को नाराज किया था, क्योंकि तुर्की रक्का में अपने लोगों को बैठाना चाह रहा था। एसडीएफ ने इराक–सीरिया सीमा के पास सीरियाई शहर बागौज के आसपास के इलाकों पर नियंत्रण कर लिया था, जो इस्लामिक स्टेट के कब्जे वाला आखिरी आबादी वाला इलाका है। एसडीएफ के समर्थन में अमरीकी अधिकारियों ने कहा कि यह इस्लामिक स्टेट के क्षेत्रीय शासन के अन्त का प्रतीक है।
तुर्की ने इराकी कुर्दिस्तान में पीकेके के ठिकानों पर भी हमला किया था। उसने यूफ्रेट्स नदी के पश्चिम में कुर्दों की बढ़त को रोक दिया था और एक जटिल फ्रंट लाइन बनायी थी जिसमें दो विरोधी खेमे–– अमरीकी सहयोगी और रूस–ईरान समर्थित समूह शामिल हुए। तुर्की ने तब तक ही सीरिया की सरकार को समर्थन दिया, जब तक सीरिया की सरकार ने कुर्दों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। तुर्की किसी भी तरह कुर्दों को आगे बढ़ने देना नहीं चाहता क्योंकि उसके इलाके में बसे कुर्द उसकी क्षेत्रीय अखण्डता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। नवम्बर 2022 में, तुर्की ने इराक और सीरिया में कुर्द लड़ाकों को निशाना बनाकर कई हवाई हमले किये थे। कुल मिलाकर पूरे इलाके में कुर्द अकेले पड़ गये हैं।
सीरिया की ताजा स्थिति
आज की तारीख में सीरिया एक खण्डित राष्ट्र है। वह टूट कर कई स्वायत्त क्षेत्रों में बँट गया है जो विरोधी गुटों के कब्जे में है और वे गुट एक दूसरे से लड़ रहे हैं। असद सरकार का तख्ता पलटा जा चुका है, लेकिन उसके वफादार सैनिक आज भी अलग–अलग इलाकों में लड़ रहे हैं। सीरिया के अलग–अलग इलाकों में कब्जे की स्थिति इस तरह है––
1– देश के उत्तर–पूर्व में कुर्द लड़ाकों ने एक चैथाई से अधिक हिस्से पर कब्जा कर रखा है। कुर्द स्वायत्तशासी हैं। इन्हें किसी विदेशी ताकत का समर्थन नहीं है।
2– विद्रोही समूह ‘हयात तहरीर अल–शाम’ ने दक्षिण–पश्चिम के अलेप्पो, हामा, होम्स और दमिश्क शहरों पर कब्जा कर रखा है। इसके नियन्त्रण में लगभग 15 प्रतिशत इलाका है। इसी विद्रोही समूह ने दिसम्बर के शुरूआती दिनों में तेजी से आगे बढ़ते हुए सीरिया की राजधानी दमिश्क पर कब्जा कर लिया था जिसके चलते असद की सरकार खत्म हो गयी थी।
3– तुर्की–सीरिया सीमा के पास 7–8 प्रतिशत इलाकों पर तुर्की समर्थित विद्रोहियों का कब्जा है।
4– लगभग 10 प्रतिशत इलाका अन्य विद्रोहियों के कब्जे में है। इनमें इस्लामिक स्टेट मुख्य है।
5– दक्षिण के कुछ हिस्से पर अमरीका ने सैन्य अड्डा बना रखा है।
6– बाकी कुछ इलाके पर असद समर्थक सैनिकों का भी नियंत्रण है। ध्यान रहे कि सीरिया के दक्षिणी इलाके में बहुत बड़ा रेगिस्तान है जो सीरिया के कुल क्षेत्रफल का 55 प्रतिशत हिस्सा घेरता है।
अमरीका ने सीरिया के गृहयुद्ध को भड़काया और इस युद्ध में सीरिया सरकार का साथ रूस और ईरान ने दिया। उनकी मदद से ही असद की सरकार बची रह सकी थी। इस युद्ध में अमरीका ने सीरिया के खिलाफ न केवल हथियारों और विद्रोहियों, बल्कि झूठे प्रचार तंत्र का इस्तेमाल किया जिससे दुनिया भर में असद की छवि को खराब किया जा सके, जिस तरह अमरीका ने सद्दाम हुसैन की छवि खराब की थी और झूठा प्रोपगेण्डा फैलाया था कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के खतरनाक हथियार थे। अमरीका ने सद्दाम को खत्म कर दिया और इराक को भयावह तबाही और गृहयुद्ध में झोंक दिया जिससे इराक आज तक उबार नहीं पाया। लोग ताली बजाते रह गये। अगर आज हमें पता चल भी गया है कि सद्दाम के पास कोई “जनसंहार का खतरनाक हथियार” नहीं था तो हमने क्या कर लिया ? सद्दाम हुसैन को बर्बाद करने की अमरीका की मंशा तो पूरी हो चुकी है। यही कहानी लीबिया में जनरल गद्दाफी के साथ दुहरायी गयी और हम जानते हैं कि गद्दाफी के खात्मे के बाद लीबिया खुशहाल नहीं हुआ। वह पूरी तरह बर्बाद हो गया। अब बशर अल–असद के साथ वही सब हो रहा है।
अमरीकी सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि सीरिया में अमरीकी अड्डे हैं और वहाँ अमरीकी सैनिक बड़ी संख्या में तैनात हैं। अमरीका के मेजर जनरल पैट राइडर कहते हैं, “हालाँकि, सीरिया की स्थिति और महत्वपूर्ण हितों के मद्देनजर, हमें हाल ही में पता चला है कि ये संख्याएँ अधिक हैं और सीरिया में लगभग 2,000 अमरीकी सैनिक हैं।”
बहुत समय पहले से मध्य–पूर्व के पूरे इलाके पर जिसमें सीरिया भी शामिल है, अमरीका अपनी दादागिरी के ख्वाब देखता रहा है, उसके विशेषज्ञ समूहों और युद्ध मशीनरी ने सीरिया में गृहयुद्ध को बढ़ावा दिया है। पैसे देकर विद्रोहियों को उकसाना, उन्हें हथियार देना और झूठा प्रचार (प्रोपगेण्डा) चलाना उसके हथकण्डे हैं। कोई रिकॉर्ड नहीं है कि “रासायनिक हथियारों के द्वारा मासूम–निहत्थे लोगों को मारने” का काम बशर अल–असद की सरकार ने किया था, यह काम विद्रोहियों का अधिक लगता है जिससे असद सरकार को बदनाम किया जा सके। युद्ध में ऐसा ही होता है। सीरिया में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर 1300 से अधिक लोगों की हत्या वहाँ की सरकार ने नहीं किया है, बल्कि अमरीका समर्थित विद्रोहियों ने किया है। बाद में ये बातें खुलकर सामने आ भी गयीं।
संयुक्त राष्ट्र जाँचकर्ता कार्ला डेल पोंटे ने बताया था कि राष्ट्रपति बशर अल–असद के शासन ने सरीन गैस का इस्तेमाल नहीं किया था, बल्कि अमरीका समर्थित विद्रोहियों द्वारा उसका इस्तेमाल किया गया था। डेल पोंटे का खुलासा उन झूठों को बेनकाब करता है, जिस पर अमरीका ने सीरिया पर अपने हमले को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया था। डेल पोंटे के बयान सीरिया पर खुलेआम अवैध इजरायली हवाई हमलों से मेल खाते हैं, जिसका राष्ट्रपति ओबामा ने समर्थन किया था।
आज साम्राज्यवादियों ने सीरिया को लगभग बर्बाद कर दिया है। अब अमरीका लोकतंत्र की आड़ में सीरिया में तेल, गैस और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों को जमकर लूटेगा। इसके लिए वह ‘हयात तहरीर अल–शाम’ के नेता जोलानी से हाथ मिलाने से भी नहीं चूकेगा, जबकि अमरीका ने उसके संगठन को आतंकवादी का तमगा दे रखा है। मुनाफे के इन भूखे भेड़ियों का कोई ईमान नहीं है, वे जहाँ–जहाँ जाते हैं, तबाही और कत्लोगारत लाते हैं। इनकी साजिशों और प्रोपगेण्डा को नहीं समझा गया तो हम फिर से सीरिया के बारे में भी गलत धारणा बनायेंगे। ये बातें अगर आज भी हम नहीं समझेंगे तो सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमरीकी प्रोपगेण्डा के प्रभाव में आने की गलती को फिर एक बार दुहराएँगे। साम्राज्यवाद के खात्मे के बिना दुनिया में खुशहाली नहीं आ सकती।
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