चीन का रेयर अर्थ मिनरल्स पर नियंत्रण
समाचार-विचार विक्रम प्रतापचीन द्वारा रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर बनाये गये नये नियमों ने वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर भारत जैसे विकासशील देशों की नींव हिला दी है। रेयर अर्थ तत्व –– जिनकी संख्या 17 है–– आधुनिक तकनीक के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितना औद्योगिक क्रान्ति के लिए कोयला था। स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, सोलर पैनल्स, रॉकेट्स, फाइटर जेट्स, सैटेलाइट्स और मिसाइल सिस्टम–– सबकी तकनीक इन्हीं खनिजों पर टिकी है।
आज की सच्चाई यह है कि इन 17 में से 12 रेयर अर्थ मिनरल्स की प्रोसेसिंग पर चीन का एकाधिकार है। अमरीका, यूरोप, जापान या भारत के पास कच्चा माल तो कहीं–कहीं मिलता है, लेकिन उसे शुद्ध कर उपयोगी रूप में बदलने की तकनीक और इन्फ्रास्ट्रक्चर सिर्फ चीन के पास है। यही कारण है कि दुनिया का कोई भी देश, भले ही उसके पास खनिज हो, तब तक उसका कुछ नहीं कर सकता जब तक चीन उसे प्रोसेस न करे। भारत में झारखण्ड, ओडिशा, राजस्थान, केरल और अरुणाचल जैसे इलाकों में दुर्लभ खनिज मिलते हैं, लेकिन प्रोसेसिंग के लिए उन्हें चीन भेजना पड़ता है। जैसा कि अमरीकी विश्लेषक डेविड एस अब्राहम ने अपनी किताब “द एलीमेंट्स पावर” (2015) में लिखा है–– “चीन ने रेयर अर्थ की प्रोसेसिंग पर ऐसा ताला जड़ दिया है कि पूरी दुनिया की तकनीक उसी की चाबी से खुलती है।” उन्होंने तर्क दिया है कि चीन ने रेयर अर्थ के निष्कर्षण और प्रसंस्करण में एक ऐसा एकाधिकार स्थापित कर लिया है, जो वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा प्रभाव डालता है। उनके अनुसार, चीन ने केवल खनन नहीं, बल्कि परिष्कृत प्रसंस्करण की जटिल तकनीकों पर भी अपना दबदबा बना लिया है, जहाँ अयस्क को तेजाबों के माध्यम से सैकड़ों बार प्रक्रमित करना पड़ता है। यह प्रक्रिया महँगी, खतरनाक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है, जिसके कारण पश्चिमी देशों ने इस क्षेत्र में निवेश कम किया। इसी कारण चीन ने लगभग 90 प्रतिशत वैश्विक प्रसंस्करण क्षमता पर कब्जा कर लिया, जिससे यह न केवल सस्ती लागत पर उत्पादन कर सकता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति पर भी नियंत्रण रखता है।
चीन ने हाल ही में जो नये निर्यात नियन्त्रण नियम लागू किये हैं, वे सिर्फ व्यापारिक नीति नहीं, बल्कि “तकनीकी प्रभुत्व” हैं। इन नियमों के तहत अगर कोई देश चीन से रेयर अर्थ मिनरल खरीदकर उनसे इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ–– जैसे स्मार्टफोन, सोलर पैनल या ईवी बनाता है, तो उसे उन्हें बेचने से पहले चीन से एक्सपोर्ट लाइसेंस लेना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि चीन अब न सिर्फ कच्चे माल का मालिक है, बल्कि उससे बने हर उत्पाद की मंजूरी का भी दरबान बन गया है।
भारत पर इसका सीधा असर इसलिए पड़ेगा क्योंकि भारत की ऑटोमोबाइल इण्डस्ट्री, स्मार्टफोन उत्पादन और डिफेंस सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश माइक्रो–मैग्नेट, बैटरी कम्पोनेंट्स और सेमीकण्डक्टर चिप्स का आधार इन्हीं रेयर अर्थ तत्वों पर है। नीति आयोग की 2023 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की इलेक्ट्रिानिक–वाहन इण्डस्ट्री का लगभग 90 प्रतिशत “सप्लाई चेन इनपुट” चीन पर निर्भर है। अब अगर इन पर लाइसेंसिंग की बन्दिश लगती है, तो यह पूरे सेक्टर को ठप कर सकती है।
स्पेस और डिफेंस सेक्टर में भी खतरा कम नहीं है। भारत के पीएसएलवी रॉकेट या “तेजस” फाइटर जेट जैसे प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल होने वाले नियोडायनियम, डायस्प्रोसियम और यिट्रियम जैसे तत्व चीन के ही प्रोसेस किये हुए हैं। अगर चीन निर्यात या उपयोग की मंजूरी पर रोक लगाता है, तो रक्षा उत्पादन सीधे प्रभावित होगा। इसका असर वित्तीय बाजारों में भी तुरन्त दिखा। चीन के नियम लागू होने के 24 घण्टे के भीतर क्रिप्टो मार्केट से लगभग 1,80,000 करोड़ रुपये उड़ गये। ऐसा इसलिए क्योंकि निवेशक जानते हैं कि रेयर अर्थ की कीमतें बढ़ते ही माइनिंग, बैटरी और चिप सेक्टर में अस्थिरता आएगी जिससे ब्लॉकचेन और डिजिटल टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स पर सीधा झटका पड़ेगा।
इधर अमेजन और अलीबाबा जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर चीनी उत्पादों का दबदबा पहले से है। हावर्ड बिजनेस रिव्यू की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि “अमेजन पर बिकने वाले 60 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद किसी न किसी रूप में चीन से आते हैं।” यानी उपभोक्ता बाजार में भी चीन पहले ही मजबूत और एकाधिकारी हालत में है। अमरीका ने प्रतिक्रिया में पुराने “ट्रम्प स्टाइल” टैरिफ को फिर से जगा दिया है। नतीजा –– नये व्यापार युद्ध की शुरुआत।
यह युद्ध सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन का युद्ध है। चिप, बैटरी, ऑटो, मोबाइल, सोलर–– हर सेक्टर प्रभावित होगा। सबसे ज्यादा मार उन देशों पर पड़ेगी जिनके पास संसाधन तो हैं, लेकिन प्रोसेसिंग या तकनीकी आत्मनिर्भरता नहीं। यही कारण है कि विकासशील और “पिछड़े” देश–– जिनकी औद्योगिक क्षमता आयात पर निर्भर है–– सबसे पहले संकट में आएँगे।
चीन की यह चाल दरअसल एक सन्देश है कि “औद्योगिक साम्राज्यवाद का युग” बदल चुका है। अब बन्दूक से नहीं, खनिज से गुलामी होगी। और जैसा कि मार्क्स ने अपनी रचना ‘पूँजी’ में लिखा है–– “उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण, समाज पर नियंत्रण का आधार है।” चीन ने वही साधन अपने कब्जे में रखकर आज दुनिया की दिशा तय करने की शक्ति हासिल कर ली है।
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