अंक 49, दिसंबर 2025
संपादकीय
उन्मादी–फासीवादी ट्रम्प का टैरिफ युद्ध और भारत सरकार का आत्मसमर्पण
अमरीका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा उठाये गये एकतरफा और प्रतिशोधात्मक कदम आज के वैश्विक सत्ता–सम्बन्धों में साम्राज्यवादी वर्चस्व की एक खुली मिसाल हैं। टैरिफ युद्ध को भले ही व्यापारिक असन्तुलन को सुधारने के रूप में पेश किया गया हो, लेकिन इसके भीतर छिपी असली मंशा आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व को बनाये रखना है। टैरिफ...
देश विदेश के इस अंक में
सामाजिक-सांस्कृतिक
उपभोक्तावाद की संस्कृति
सामाजिक-सांस्कृतिक–– श्यामाचरण दुबे धीरे–धीरे सब कुछ बदल रहा है। एक नयी जीवन–शैली अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। उसके साथ आ रहा है एक नया जीवन–दर्शन–– उपभोक्तावाद का दर्शन। उत्पादन बढ़ाने पर जोर है चारों ओर। यह उत्पादन आपके लिए है, आपके भोग के लिए है,… आगे पढ़ें
जीवन और कर्म
जाँ निसार अख़्तर : मन मोरा बावरा
जीवन और कर्म | विजय गुप्तउर्दू अदब में जाँ निसार अख़्तर का एक अलग मुक़ाम है। वह ताज़िन्दगी मार्क्सवादी उसूलों के क़ायल रहे हैं। उन्होंने अपनी ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों से मजलूमों और बेबस लोगों की ख़्िादमत की। आम जनता को नींद से जगाया और हर तरह के अन्याय और शोषण के ख़्िालाफ़ लामबन्द किया। चार दशकों… आगे पढ़ें
व्लादिमीर मायाकोव्स्की की कविताएँ (संघर्ष और क्रान्ति का उद्घोष)
जीवन और कर्म | अभिषेक तिवारीमैं जनता का नेता हूँ, और साथ ही जनता का सेवक भी। मेहनतकश हमारी ही आवाज में बोलता है, हम सर्वहारा कलम के सिपाही हैं। (कविता और टैक्स–इंस्पेक्टर) कविता का यह अंश जिस कवि की कलमनवाजी का नजीर है और जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया, वह था व्लादिमीर मायाकोव्स्की। उनकी कविताओं… आगे पढ़ें
राजनीति
एआई तकनीकी का गाजा नरसंहार में खतरनाक इस्तेमाल
राजनीति | आशुतोष स्वप्निलदुनिया भर में बुद्धिजीवियों के बीच की खूबियाँ बताने की होड़ सी चल रही है, लेकिन उसके इस्तेमाल के विनाशकारी परिणाम भी सामने आ रहे हैं। इजराइली सेना द्वारा एआई का इस्तेमाल इस बात का पक्का सबूत है। 2024 में माइक्रोसॉफ्ट ने होस्सम नज्र और अब्दो मोहम्मद को ‘नो अज्युर फॉर अपर्थेड’… आगे पढ़ें
‘बिग ब्रदर इज वाचिंग यू’– पिछले 50 सालों के आन्दोलनों का गृह मन्त्री ने माँगा ब्यौरा
राजनीति | मोहित पुण्डीर“कहीं गैस का धुआँ है, कहीं गोलियों की बारिश शब–ए–अहद–ए–कमनिगाही तुझे किस तरह सुनाएँ” … आगे पढ़ें
साहित्य
कविता का मूलस्रोत
साहित्य–– देवेन्द्र सत्यार्थी आदिम युग के लोकगीतों की विवेचना करते हुए कॉडवेल ने इस बात पर विशेष जोर दिया था कि उस समय सामाजिक चेतना अपने प्रारम्भिक काल में थी और जिस प्रकार विकासमान समाज ने वातावरण के साथ संघर्ष करने में पृथ्वी पर अपने अस्तित्व के साथ अनुकूलता स्थापित… आगे पढ़ें
प्रसिद्ध रूसी उपन्यास ‘सीमेंट’ का परिचय
साहित्य | सोनू पवाँर“श्रम ही मानव समाज की आधारशिला है।” मनुष्य का सबसे जरूरी गुण है श्रम करने की उसकी क्षमता, जिसके अभाव में उसका नैतिक और शारीरिक पतन हो जाता है। “मैं सीमेंट के बारे में कुछ शब्द कहना चाहूँगा। मेरा मानना है कि यह एक बहुत ही बेहतरीन और उत्कृष्ट पुस्तक है। क्रान्ति… आगे पढ़ें
सच लिखने में पाँच कठिनाइयाँ
साहित्य–बर्तोल्त ब्रेख्त (1935) जो कोई भी इन दिनों, झूठ और अज्ञानता से लड़ना चाहता है और सच को लिखना चाहता है उसे कम से कम पाँच कठिनाइयों पर जीत हासिल करनी पड़ेगी। जब सच्चाई का हर जगह विरोध हो रहा हो तो उसके अन्दर सच्चाई को लिखने का साहस होना चाहिएय हालाँकि यह हर जगह छुपी हुई है… आगे पढ़ें
कहानी
एक देवदासी
कहानीभगवान की आड़ में मनुवादियों का काला धंधा सदियों से चल रहा है। हजारों देवदासियों की चीखें आज भी न्याय की गुहार लगा रही हैं। कोई है उनकी पुकार सुनने वाला ? “मुझे निर्वस्त्र करके 100 किलो का पुजारी, इस 11 साल की देवदासी बच्ची के ऊपर चढ़ गया था, मैं साँस तक नहीं ले पा रही थी–… आगे पढ़ें
अन्तरराष्ट्रीय
नेपाल में जेन जी आन्दोलन और उसके बाद
अन्तरराष्ट्रीय | आनन्द स्वरूप वर्मा10 सितम्बर 2025 को मैंने जेन जी आन्दोलन के बाद एक टिप्पणी लिखी थी जिसे संक्षेप में मैं पाठकों को बताना चाहता हूँ। इस टिप्पणी में मैंने लिखा था कि “नेपाल में 2008 में गणराज्य की स्थापना और इसे एक परिणति तक पहुँचाने में माओवादियों की सफलता से समूचे देश में वामपंथ की लहर… आगे पढ़ें
समाचार-विचार
130वाँ संविधान संशोधन विधेयक–– भाजपा का ‘एक पार्टी एक देश’ की तरफ बढ़ता एक और कदम
समाचार-विचारबीते 20 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में 130 वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। इस संशोधन के बाद पाँच साल से अधिक सजा के प्रावधान वाले आपराधिक मामलों में अगर किसी राज्य के मंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री 30 दिनों तक जेल में रहते हैं तो 31वें… आगे पढ़ें
अमीरी–गरीबी की बढ़ती खाई और भगत सिंह के विचार
समाचार-विचार‘हुरुन इण्डिया रिच लिस्ट 2025’ की रिपोर्ट के अनुसार, महज 1687 अरबपतियों के पास देश की आधी जीडीपी के बराबर सम्पत्ति है। भारत की आज की आर्थिक स्थिति पर अगर हम गहराई से नजर डालें, तो स्पष्ट दिखता है कि पूँजी और सम्पत्ति का संकेन्द्रण कुछ ही हाथों में सिमट गया है। ऑक्सफैम… आगे पढ़ें
अहमदाबाद में क्लीनिकल ट्रायल के जरिये गरीबों का शिकार
समाचार-विचार6 अप्रैल 2025 की टाइम्स ऑफ इण्डिया अखबार में खबर छपी कि अहमदाबाद के गरीब लोगों को 20 से 40 हजार रुपये के लिए क्लीनिकल ट्रायल माफिया बना रहे हैं। समाज की यह घिनौनी तस्वीर क्राइम ब्रांच के छापों में सामने आयी है। हमें आज भी कोरोना का वह दौर याद है जब हर तरफ हाहाकार मचा था। हर… आगे पढ़ें
उत्तराखण्ड के पेपर लीक पर मुख्यमंत्री धामी के नफरती बयान
समाचार-विचारउत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह बयान कि–– “नकल माफियाओं और नकल जिहादियों को मिट्टी में मिला देंगे”, उस वक्त सामने आया जब परीक्षा घोटाले का भंडाफोड़ और गिरफ्तारियों के बाद भी बेरोजगार नौजवान सड़कों पर उतरे। सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए… आगे पढ़ें
एआई तकनीकी विकास और उसके सामाजिक सरोकार
समाचार-विचारएआई तकनीक के विकास ने पूरी से उन सवालों को सतह पर ला दिया है जो काफी अर्से पहले तकनीकी विकास के साथ बहस का मुद्दा बना करते थे। मसलन, क्या तकनीकी विकास पर सवाल उठाया जा सकता है? आजकल कुछ लोग ऐसे भी हैं जो तकनीक को इस तरह पूजते हैं जैसे वह खुद जन–कल्याण का कोई परम अवतार… आगे पढ़ें
गाँव में बढ़ती बीमारी, बेहाल जनता और बदहाल व्यवस्था
समाचार-विचार“कमायेंगे नहीं तो खायेंगे क्या, इसलिए बुखार में भी काम पर जाना मजबूरी बन गया है, मालिक हमारी परेशानी जानकर भी अनजान बन रहा है” यह उस मजदूर के शब्द हैं जो लगभग 30 दिनों से बुखार की मार झेल रहा है। लेकिन उसके बाद भी वह लड़खड़ाते कदमों के साथ फैक्ट्री जाने को मजबूर है,… आगे पढ़ें
चीन का रेयर अर्थ मिनरल्स पर नियंत्रण
समाचार-विचार | विक्रम प्रतापचीन द्वारा रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर बनाये गये नये नियमों ने वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर भारत जैसे विकासशील देशों की नींव हिला दी है। रेयर अर्थ तत्व –– जिनकी संख्या 17 है–– आधुनिक तकनीक के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितना औद्योगिक क्रान्ति के… आगे पढ़ें
देश भर में कुदरत का कहर
समाचार-विचार | अपूर्वा तिवारी“अब के बारिश में तो ये कार–ए–ज़ियाँ होना ही था, अपनी कच्ची बस्तियों को बे–निशाँ होना ही था।” –मोहसिन नक़बी इस साल मानसून से पहले ही शुरू हुई बारिश ने मानसून के बाद तक भारत और पड़ोसी मुल्कों में भारी तबाही मचायी। सरकारी आँकडों के अनुसार… आगे पढ़ें
पाकिस्तान का अफगानिस्तान पर हवाई हमला
समाचार-विचार | विक्रम प्रतापपाकिस्तान का अफगानिस्तान पर हवाई हमला सिर्फ सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक भू–राजनीतिक संकेत है–– एक ऐसा संकेत जो बताता है कि वैश्विक ताकतें फिर से युद्ध की ओर झुकती जा रही हैं। नानहारगर और पक्तिया जैसे सीमान्त इलाके, जो ऐतिहासिक रूप से पश्तून इलाके… आगे पढ़ें
महालनोबिस ने बनाया और मोदी ने तोड़ा
समाचार-विचारसकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 8–2 प्रतिशत रहने पर भाजपा सरकार और उसके समर्थकों का जश्न जारी था, तभी अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का फैसला धीरे–धीरे आया, लेकिन उसका असर एकदम धमाके जैसा था। भारत के आर्थिक आँकड़ों को ‘श्रेणी–सी’ में धकेल दिया गया। यह उन… आगे पढ़ें
माइक्रोफाइनेंस उद्योग– मुनाफे की भेंट चढ़ती जिन्दगियाँ
समाचार-विचारअक्टूबर में मुम्बई पुलिस ने एक महिला की फर्जी वीडियो वायरल करने के आरोप में माइक्रो–फाइनेंस कम्पनी के एक लोन रिकवरी एजेंट को गिरफ्तार किया था। दरअसल, रिकवरी एजेंट ने कर्ज लेने वाले व्यक्ति के फोन से उसकी पत्नी की फोटो निकाल ली थी। बदनाम करने के लिए फोटो को एडिट कर सोशल… आगे पढ़ें
लद्दाख आन्दोलन और सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी
समाचार-विचार | विक्रम प्रतापकुछ महीने पहले, लद्दाख आन्दोलन के दौरान भड़की हिंसा के बाद सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया गया। यह एक चांैकाने वाली घटना थी क्योंकि एक ऐसा व्यक्ति जो शान्तिपूर्ण आन्दोलन और उपवास के जरिये अपनी माँग रख रहा था उसे अचानक उठाकर हिरासत में ले लिया गया, इससे यह संदेश तो गया… आगे पढ़ें
लोकतंत्र के स्वनामधन्य देश अमरीका में गूँज रहे लोकतंत्र बचाने के नारे
समाचार-विचार | उत्कर्षनवम्बर में अमरीका का ‘नो किंग प्रोटेस्ट’ नयी ऊँचाई पर पहुँच गया। इसमें 70 लाख से ज्यादा लोग शामिल हो चुके हैं। यह विरोध प्रदर्शन राष्ट्रपति ट्रम्प के तानाशाह रवैये के खिलाफ इसी साल जून में शुरू हुआ था और लगातार जारी है। 19 अक्टूबर को भी अमरीका में राष्ट्रपति… आगे पढ़ें
सत्ता और सिस्टम की गोद में पले “शेल” बच्चे की चमकदार बायोग्राफी
समाचार-विचार | राजेश कुमाररेलमंत्री? वो तो अब ठेके नहीं देते, अपने आप ही ले लेते हैं–– वह भी सरकारी खजाने से! जी हाँ, बात हो रही है अश्विनी वैष्णव की, जिन्होंने बड़ी ही विनम्रता और आत्मनिर्भरता के साथ 26,000 करोड़ के ठेके अपनी ही पुरानी कम्पनी को पकड़ा दिये। आत्मनिर्भर भारत का इससे बेहतर उदाहरण… आगे पढ़ें