उर्दू अदब में जाँ निसार अख़्तर का एक अलग मुक़ाम है। वह ताज़िन्दगी मार्क्सवादी उसूलों के क़ायल रहे हैं। उन्होंने अपनी ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों से मजलूमों और बेबस लोगों की ख़्िादमत की। आम जनता को नींद से जगाया और हर तरह के अन्याय और शोषण के ख़्िालाफ़ लामबन्द किया। चार दशकों के अदबी दौर में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का शानदार नेतृत्व किया। उन्होंने ज़िन्दगी के  सभी रंग देखे हैं। हँसी–ख़्ाुशी, दु:ख–दर्द, सहमति–असहमति, आँसू, यातना, उपेक्षा, स्वीकृति–अस्वीकृति। इन दो शे’रों मंे हम उनके एहसास का अंदाज़ा लगा सकते हैं,

हरेक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे

ये ज़िन्दगी तो कोई बद्दुआ लगे है मुझे

बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद

हरेक फ़र्द1 कोई सानिहा2 लगे है मुझे

(1– व्यक्ति  2– दुर्घटना)

बद्दुआ में बदलती ज़िन्दगी और आदमी के अस्तित्व पर लगातार हमलावर पूँजीवादी संस्कृति आदमी को रौंद रही है। भय और हिंसा का खेल निर्ममता से खेला जा रहा है। रोटी और रोज़गार की चिन्ता में आम आदमी पिसा जा रहा है। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के इस जानलेवा हमले का सारा गणित जाँ निसार अख़्तर समझते हैं। उन्होंने भाँप लिया था कि बाज़ार के साथ–सा इनसानी दिमाग़ों पर भी नियंत्रण किया जा रहा है। उनका शे’र है,

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं

देखना है कि अब आग किधर लगती है

सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है

हर ज़मीं मुझको मेरे ख़्ाून से तर लगती है

कुछ और गहरे उतरकर वे लिखते हैं,

तूफ़ानों की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन

लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं

विडम्बना देखिए, डूबते हुए लोगों को और डुबोया जा रहा है। एक ओर शीर्ष पदों पर बैठे राजनेता और उच्चाधिकारी चिल्ला–चिल्ला कर झूठ को सच बना रहे हैं, मौज–मेले, सैर–सपाटे में मगन हैंय और दूसरी ओर पत्रकारों, शायरों, कवियों और शायरात को जेल का रास्ता दिखा रहे हैं।

उनकी पत्नी सफ़िया अख़्तर ने भोपाल से 28 नवम्बर, 1950 को एक ख़्ात लिखा। ख़्ात में अख़्तर साहब की सलामती की दुआ करते हुए मजरूह सुल्तानपुरी के जेल जाने की ख़्ाबर पर बेचैन होकर अपना दर्द बयाँ किया कि, ‘‘एशिया का ड्रामा हर वक़्त खेला जाता है। संगर के बच्चे अमरीकी शैतान बनते हैं। साइकिल पर लकड़ियाँ लगाकर तोप बनायी जाती है और रूस से अमरीका की जंग होती है। जाफ़री की नज़्म ‘एशिया जाग उठा’ के मिसरे दोहराए जाते हंै। ग़रज़ कि बच्चे क्या हैं, शामेत–आमाल (बुरे कर्मों का फल) हैं।

मजरूह के ज़िन्दांनी (जेल में कैदी) होने की ख़्ाबर सुनी। बेचारा! तुम मिलने जाओ तो मेरी दुआ और उसी का शे’र मेरी तरफ़ से पहुँचा देना।

देख जिन्दाँ से परे रंगे–चमन, रंगे बहार

रक़्स करना है तो फिर पाँव की जं़जीर न देख(1)

रक़्स जीवन को उमंगों से भर देता है। वह बेड़ियाँ नहीं देखता बल्कि अपनी तेज़ गति से सारी जं़जीरों को तोड़ देता है। एक आजा़द रूह की तरह सभी राजनीतिक, सामाजिक रूढ़ियों और कठमुल्लांे पर बिजली की मानिंद गिरता है, उन्हें ज़मींदोज़ कर आज़ादी का नया तराना रच देता है। लोगों के आँसू पोछ फ़िज़ाओं में हँसी घोल देता है। हँसी–ख़्ाुशी को लेकर वह फ़िल्म ‘आईना’ में एक गीत लिखते हैं,

हँस कर जी ले ओ नादान

हँसना जीने की पहचान

ऐसा लगता चारों ओर        

ख़्ाुद भी हँसता है भगवान

दिल की ख़्ाुशियाँ जितनी महँगी

उतनी सस्ती रे

मैं तो हँसती रे

हँसी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी नेमत है। वह ख़्ाुशी की हमजोली है। उनका एक शे’र है,

जज़्बों की गिरह खोल रही हो जैसे

अल्फ़ाज़ में रस घोल रही हो जैसे

हँसी–ख़्ाुशी को बचाने के लिए एक होना होगा और तब ही ज़िन्दगी की रंगत बदलेगी। झूठ का मुँह काला होगा और सच धूप की तरह खिला होगा। बर्तोल्त ब्रेख़्त की कविता का एक अंश है,

सब कुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं।

एक अकेले की क़िस्मत बेहतर नहीं हो सकती।

या तो बन्दूक या बेड़ी।

सब कुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं।

इसी जज़्बे को जाँ निसार अख़्तर कुछ यूँ अर्ज़ करते हैंय

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए

हमसे पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या

चन्द लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए

जीवन की यही प्राणदायिनी आग आज बुझायी जा रही है। अल्फ़ाज़ के मायने छोटे किये जा रहे हैं। भाषाविज्ञान में अर्थ–विस्तार और अर्थ–संकोच की विशद् व्याख्या की गयी है। जैसे, तत्सम शब्द ‘वयम्’ के फैलाव को ‘अहम्’ में संकुचित कर दिया गया है। वैसे ही तद्भव शब्द ‘हम’ को ‘मैं’ में बाँध दिया गया है। अर्थ–संकुचन का यह दायरा फैलता चला जा रहा है। आज ‘हम’ विस्थापित है और  ‘मैं’ सिर चढ़कर बोल रहा है। श्रेय लेने की होड़ मची है। उल्टी गंगा बहायी जा रही है। भारत की आज़ादी सामूहिक संघर्ष और बलिदान का सुपरिणाम है। हमें अपने इतिहास को सम्भालकर रखना चाहिए, उसकी ग़लत व्याख्या का विरोध करना चाहिए। आज पाठ्यक्रमों में इतिहास को अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए बदला जा रहा है। ज़िन्दगी की खुली हुई किताब को बन्द करना उजाले को अंधेरे में तब्दील करना है। इतिहास और इन्क़लाब को, उसके एक–एक वाकये को बचाना हमारी ज़िम्मेदारी है। जाँ निसार अख़्तर लिखते हैं,

ये ज़िन्दगी मुझे खुलती हुई किताब लगे

वरक़–वरक़ कोई तारीख़्ो इन्क़लाब लगे 

इतिहास के पन्नों पर छपे हर शब्द को, उसकी ध्वनि को समझना होगा, तब ही हम दोस्त के वेश में छुपे दुश्मन को बेनक़ाब कर सकते हैं। ‘गीता’ पर हाथ रखकर शपथ लेने वाले राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की पोल खोल सकते हैं।

वो जो बगुला–भगत की भंगिमा में देश को लूट रहे हैं, उनकी पहचान कर सकते हैं। अख़्तर साहब ने फ़िल्म ‘सुशीला’ में एक ग़ज़ल लिखी थी। उसका एक शे’र है,

बेमुरव्वत, बेवफ़ा, बेगाना–ए–दिल आप हैं

आप मानें या न मानें मेरे क़ातिल आप हैं

इन क़ातिलांे को अदालत में पेश किया जाना चाहिए और दण्डित करना चाहिए। न्यायाधीश का कर्तव्य है कि बिना देरी किये फ़ैसला करे। यही जनता और देश के हक़ में होगा। क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति और क्रान्तिकारी फ़िदेल एलेजेन्ड्रो कास्त्रो रूज़ ने पर्यावरण संकट पर 1992 के पृथ्वी सम्मेलन में एक भाषण दिया था, जो ‘कल बहुत देर हो जाएगी’ (टूमॉरो विल बी टू लेट) शीर्षक से गार्गी प्रकाशन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस किताब को  पर्यावरण और देश–दुनिया से प्यार करने वाले हर इनसान को पढ़ना और गुनना चाहिए।(2) देर तो बहुत हो चुकी है लेकिन अब भी सम्भला जा सकता है। बस पहला कदम बढ़ाने की पहल करनी है। अँधेरे को उजाले में बदलने की जुगत करनी है। अख़्तर साहब ने लिखा है कि,

अपने तारीक़1 मकानों से तो बाहर झांको

ज़िन्दगी शमा लिये दर पे खड़ी है यारो

(1– अंधेरे)

हम ही अंधेरे की ज़द में पस्तहिम्मत पड़े हैं। अपनी उदासियों और लाचारियों को झटककर हमें उजालों का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए, यह हमें उन्होंने सिखाया। वह कभी भी मार्क्सवादी उसूलों से हटे नहीं। जीवनपर्यन्त वो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने रहे और किसानों–मज़दूरों और आम आदमी को अपनी रचनाओं से जागृत करते रहे। वह सरल शब्दों में इनसान और इनसानियत की हिफ़ाज़त करते रहे।

हमने बहुत से ऐसे मार्क्सवादियों को देखा है जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए मार्क्सवाद को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और मतलब निकल जाने के बाद उस सीढ़ी को ही गिरा दिया। इन्क़लाब का नारा देकर हवेलियाँ खड़ी कर लीं और अपने को बेच कर दूसरों के हक़ लूट लिए। ऐसे ही कमज़र्फ़ों के लिए अख़्तर साहब ने लिखा है कि,

जब इन्क़िलाब के क़दमांें की गूँज जागी है

बड़े–बड़ों का कलेजा दहल गया है मियाँ

अख़्तर साहब ने मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपने को बिखरने नहीं दिया। वह आम जनता की सेवा नि:स्वार्थ भाव से करते रहे। वह अपना हर काम पूरे मनोयोग से करते रहे। उन्होंने फ़िल्म इण्डस्ट्री में पाँव जमाने के लिए एक फ़िल्म ‘बहू–बेगम’ बनायी। दुर्भाग्य से फ़िल्म चली नहीं। वह रिजेक्ट कर दिये गये पर उन्होंने हार नहीं मानी। वह लगातार लिखते रहे और संघर्ष करते रहे। इस बीच उनकी पत्नी सफ़िया अख़्तर नहीं रहीं। वह लगभग टूट गये। अपने ग़म से लड़ते हुए वह सम्भले और अपने दर्द को ‘ख़्ााके–दिल’ नज़्म में कुछ इस तरह जाहिर किया,

चूम कर आज तेरी ख़्ााके लह1 के ज़र्रे

अनगिनत फूल मुहब्बत के चढ़ाता जाऊँ

जाने इस सम्त2 कभी मेरा गुज़र हो कि न हो

आख़्िारी बार गले तुझ को लगाता जाऊँ

लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन ज़ार वतन

देख इस ख़्ााक को आँखों में बसाकर रखना

इस अमानत को कलेजे से लगा कर रखना

(1– मज़ार,  2– ओर)

अख़्तर साहब जिस अमानत, मोहब्बत और धरोहर की बात कर रहे हैं, उसी अमानत में ख़्ायानत पैदा की जा रही है। विश्वासघात किया जा रहा है। यदि हम सचेत नहीं हुए तो हमारा सब कुछ लुट जाएगा। हमें हर हाल में एकजुट और ताकतवर होना है। हर विश्वासघात पर ज़बर्दस्त हमला करना है। बिना भयभीत हुए हर अन्याय, अत्याचार का विरोध करना है। अपने भीतर की आग को बाहर लाना है। अपनी नज़्म ‘ख़ाके–दिल’ में जाँ निसार अर्ज़ करते हैं,

ज़िन्दगी देख मुझे हुक्मे सफ़र देती है

एक दिल शोला–बजाँ1 साथ लिये जाता हूँ

हम क़दम तूने कभी अज़्मे–जवाँ बख़्शा था

मैं वही अज़्मे–जवाँ2 साथ लिए जाता हूँ

(1– आग की लपटें  2– नयी शक्ति)

जब आदमी के भीतर की आग बर्फ़ हो जाती है तो उसे झकझोरना पड़ता है। उसके ठण्डेपन को आग के दरिया में डुबोना पड़ता है। तब जाके आदमी अग्निधर्मा होता है और आग की तासीर से भर उठता है। राजनीति में उच्च पदों पर बैठे लोग इस आग को बुझाने का काम कर रहे हैं। अख़्तर साहब ने क्या ख़्ाूब लिखा है,

ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का

सम्भल भी जा, कि अभी वक़्त है सम्भलने का

अभी नहीं सम्भले तो बहुत देर हो जाएगी। सम्भल कर हमें काम में जुटना होगा। शब्दों की गरिमा को हर हाल में बचाना होगा। ‘शब्द ही ब्रह्म है’ इस सूक्ति को दिलो–दिमाग़ में सँजोकर रखना होगा। शब्द की महिमा को भाषा के दुश्मनों से बचाना होगा। उनके हर कुटैव को समझकर पलट वार करना होगा अन्यथा हम अपनी भाषिक सम्पदा खो देंगे। आज दुनिया में हज़ारों बोलियाँ तबाह कर दी गयी हैं। कुछ अपने को बचाये रखने की मुश्किल लड़ाई लड़ रही हैं। जन विरोधी सरकारें अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए भाषा–भाषा का खेल खेलती हैं। हिन्दी को उर्दू, संस्कृत को फ़ारसी, मराठी को हिन्दी और तमिल को मलयालम के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। शुक्र है कि भारतीय संगीत में यह भेद–भाव नहीं है। वहाँ सिर्फ़ प्रेम की भाषा ही स्वीकार्य है। हर शब्द एक–दूसरे में समाहित हैं। प्रतिक्रियावादी सरकारें जो चाहें कर लें रचनाकार प्रेम का गीत गाता रहा है और गाता रहेगा। प्रेम अजेय है। शब्द अमर है।

जाँ निसार अख़्तर का जन्म 18 फ़रवरी, 1914 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में हुआ था। उनके पिता मुज़्तर ख़्ौराबादी थे। उनकी जीवन साथी सफ़िया सिराज–उल हक़ और उसकी मृत्यु के बाद ख़्ादीजा तलत उनकी दूसरी बीवी बनीं।

भगवान कृष्ण की सजी मूरत में

चुपचाप समा गयी थी मीरा जैसे

जाँ निसार अख़्तर पूरे दिल से मोहब्बत के शायर रहे हैं। उनकी चाहत बस इतनी रही है कि हर इनसान के दिल में प्रेम की ज्योति जलती रहे। नफ़रत के कोई निशाँ बाक़ी न रहे। वह समाज को जोड़ने वाले रहे हैं और जो भी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक शक्तियाँ साम्प्रदायिकता का विष घोलकर समाज को तोड़ती हैं, उनके कट्टर विरोधी रहे हैं। उनकी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि वह चाटुकारिता और व्यक्तिवादिता के विरुद्ध आजीवन खड़े रहे और उनका मुखर विरोध किया। वह कविता और आदमी से प्रेम करने वालों से कहते हैं कि सवालों को समझो, जवाब बहुतेरे हैं, भ्रम में मत पड़ो और एकदम सही जवाब चिन्हित कर उसे ज़िन्दगी में उतारो।

समझ सके तो समझ ज़िन्दगी की उलझन को

सवाल इतने नहीं हैं जवाब जितने हैं

वह सन् 1935–36 के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गोल्डमेडलिस्ट एमए थे। सन् 1947 के देश विभाजन से पहले ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उर्दू के प्रोफ़ेसर रहे। साम्प्रदायिक दंगों ने उनका बहुत कुछ तबाह कर दिया। उजड़कर भोपाल पहुँचे, वहाँ भी उन्हें हाथों–हाथ लिया गया और वे सैफ़िया कॉलेज में उर्दू के विभागाध्यक्ष हुए। सन् 1952 में उनकी प्रगतिशीलता और किसान–मज़दूर यूनियन में उनकी सक्रियता सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकी और एक बार फिर उन्हंे घर–बार छोड़कर मुम्बई जाना पड़ा। उन्होंने हर प्रकार के दमन और शोषण की मुख़्ाालिफ़त की और सरकार के कोपभाजन का शिकार हुए, पर वे डरे नहीं लिखते रहे, पढ़ते रहे और जनता–जनार्दन के बीच बने रहे।

उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं–– घर–आंगन (रुबाइयाँ), सलीस (कविता संग्रह), नज़र–ए–बुताँ (कविता संग्रह), जाँ निसार अख़्तर की मुक़म्मल शायरी ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ (दो खण्डों में), ख़्ााके–दिल (कविता  संग्रह)। उन्हें सोवियत लैण्ड नेहरू एकेडेमी सम्मान, महाराष्ट्र अकादमी पुरस्कार और सन् 1976 मंे ‘ख़्ााके–दिल’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू) से नवाजा गया।

अख़्तर साहब ने अपनी क़लम कभी गिरवी नहीं रखी। उन्होंने हर अल्फ़ाज़ की इज़्ज़त की और उसे गरिमा दी। उसके सौंदर्य को निखारा और जन–जन तक पहुँचाया। उनका एक शे’र देखिए,

न लफ़्ज़ है न किनाया1 न सौत2 है न सदा

सुकूतेशब3 की न पूछे कोई ज़बां हम से

(1– संकेत  2– ध्वनि  3– मौन रात्रि)

अख़्तर साहब ने अपने फ़िल्मी कैरियर में कभी भी अपने अल्फ़ाज़ को बेइज़्ज़त नहीं होने दिया। जीवन में भी उन्होंने शब्दों की पवित्रता बचाये रखी। कभी अश्लील नहीं हुए। आज के फिल्म संगीत में अश्लीलता का बोलबाला है। मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखा है कि, ‘‘जाँ निसार नर्म लबो–लहजे़ के पुख़्ता शायर थे। भाषा के संगीत, जज़्बा और एहसास की थरथराहटों के जानकार। वह नयी ताज़गी के साथ शेरगोई की तरफ़ माइल हुए और देहान्त तक (जो नौ–दस साल की छोटी सी मुद्दत है) इतना लिखा जो अदबी वज़न और गहराई में उनकी पहले की शायरी से ज़्यादा अलग है।”(3)

जाँ निसार अख़्तर बरसों–बरस साहिर लुधियानवी के हमसाया रहे। वह उनका बहुत सम्मान करते थे। उनका पूरा ध्यान रखते थे। उनकी तन्हाइयों को चटख रंग देकर उसे दिलकश और ख़्ाुशगवार बना देते थे। उनसे अलग होकर ख़्ाुद को पहचाना, तराशा और एक अलग जाँ निसार होकर दुनिया के सामने आये। उनका एक शे’र है,

ज़िन्दगी तेरे हवादिस1 हम को

कुछ न कुछ राह पे ले आये हैं

(1– घटनाएँ–दुर्घटनाएँ)

अख़्तर साहब ने दोस्ती और दुश्मनी के, मोहब्बत और नफ़रत के कई रंग–रूप देखे हैं और अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है। आप भी देखिए और उन एहसासांे से गुज़रते हुए।

हमने हर गाम पे सजदों के जलाए हैं चराग़

अब तेरी राहगुज़र राहगुज़र लगती है

लम्हे लम्हे में बसी है तेरी यादों की महक

आज की रात तो ख़्ाुश्बू का सफ़र लगती है

और क्या इससे ज़्यादा कोई नर्मी बरतूँ

दिल के जख़्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह

हमसे मायूस न हो गर्दिशे–दौरां कि अभी

दिल में कुछ दर्द चमकते हैं उजालों की तरह

दुनिया के रूढ़िवादी रीति–रिवाज़ों और पाबंदियों ने कब किसी अदीब को चैन से जीने दिया है। अख़्तर साहब ने भी बेहिसाब दु:ख और ज़िल्लत झेली है। बम्बई आज की मुम्बई में वह कई बार रिजेक्ट किये गये लेकिन बन्दे ने हार नहीं मानी। अस्वीकृति को उन्होंने स्वीकृति में बदल दिया। उनकी हिम्मत कभी टूटी नहीं। वह संघर्ष करते रहे और अन्तत: सफल भी हुए। वह जीवनपर्यन्त भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का भी निडर होकर नेतृत्व किया और उसे आम जनता के दु:ख–दर्द से जोड़े रखा। फ़िल्म ‘अनारकली’ के एक गीत में उन्होंने लिखा,

आ प्यार के तूफ़ान में लहरा के चला आ

हर कै़द को हर रस्म को ठुकरा के चला आ

आशिक़ है तो हर चीज़ मुहब्बत पे लुटा दे

दीवाना मुहब्बत का कहीं डर के रुका है

दरबार में शाहों के कहीं इश्क़ झुका है

ख़्ाुद इश्क़ के दरबार में शाहांे को झुका दे

आ जाने वफ़ा आ

कविता उनकी प्राण शक्ति है। रसूल हमज़ातोव ने विश्व प्रसिद्ध कृति ‘मेरा दाग़िस्तान’ में लिखा है कि “कविता, तुम्हारे बिना मैं यतीम हो जाता।” जाँ निसार अख़्तर भी इसी अहसास को एक शे’र में यूँ बयाँ करते हैं,

हर लफ़्ज़ को छूते हुए जो काँप न जाए

बर्बाद वो अल्फ़ाज़ की औक़ात करे है

आज भारतीय समाज अन्तर्विरोधों से भरा हुआ है। सच के मुखौटे के पीछे झूठ छिपा हुआ है। पूँजीवादी राजनेता, साम्प्रदायिक संगठनों के कार्यकर्ता, तमाम एनजीओ दिन–रात आम जनता को बरगलाये जा रहे हैं। उस समय भी अख़्तर साहब देश के हालात से अच्छी तरह वाकिफ़ थे। वह अपनी ग़ज़लों, नज़्मों, रुबाइयों और फ़िल्मी नग़मों में इन बहुरूपियों से जनता को आगाह करते हैं। कुछ उदाहरण पेश हैं, एक शे’र में लिखते हैं,

वतन से इश्क़ ग़रीबी से बैर अम्न से प्यार

सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं

उनकी एक नज़्म ‘इक ज़ख़्मे तमन्ना और सही’ का एक बन्द देखिए,

झेली है सज़ा खुद्दारी की पर हाथ नहीं फैलाये हैं

औरों के लिए हर दर्द सहा इस पर भी बुरे कहलाये हैं

तीरों का जिन्हें फ़न सिखलाया ख़्ाुद तीर उन्हीं से खाये हैं

जो ज़ख़्म मिले हैं अपनों से उन ज़ख़्मों को गिनवाएँ क्या

अपनी रूबाइयों में भी उन्होंने बहुत कुछ कहा है,

इक बार गले से उनके लग कर रो लें

जाने को खड़े हैं उनसे क्या बोले

जज़्बात से घुट के रह गयी है आवाज़

किस तरह से आँसुओं के फ़न्दे खोले

या फिर अंधेरे में किसी रौशनी की आस,

हर बार अंधेरे में लगा है ऐसा

जैसे कोई शम्अ चल रही है मेरे साथ

ज़िन्दगी उम्रदराज़ होती जा रही है। बुढ़ापे की छाया देह पर दिखने लगी है। देह ढलान पर है लेकिन मन की उठान आसमान पर है। जाँ निसार ने अपने ख़्ात में लिखा है, “आदमी जिस्म से नहीं दिलोदिमाग़ से बूढ़ा होता है।” वे वास्तव में आख़्िारी दिन तक जवान रहे। ऐसा लगता था कि उन पर नये सिरे से जवानी ने करम फ़रमाया है।(4)

वह जान चुके थे कि आख़्िारी वक़्त क़रीब है इसलिए वह डूबकर लिखने लगे, न दिन देखा न रात बस आख़्िारी साँस तक लिखते रहे और अपने जज़्बात जनता तक पहुँचाते रहे। कहते हैं कि अन्तिम दिनों में आदमी अपने अतीत को वर्तमान से जोड़कर भविष्य देखता है। उन्होंने ज़िन्दगी का सामना किया और मौत का भी। मौत के एहसास को अपनी इस ग़जल में उन्होंने कुछ यूँ व्यक्त किया है,

हरेक शख़्स मुझे परेशानो–दरबदर सा लगे

ये शहर मुझ को तो यारो कोई भंवर सा लगे

किसे पता है कि दुनिया का हश्र क्या होगा

कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे

 

निशाते–सोहबते–रिन्दां1 बहुत ग़नीमत है

कि लम्हा–लम्हा पुर आशोबो–पुर ख़्ातर2 सा लगे

वो तुन्द3 वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सके

हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर4 सा लगे

(1– रसिकों की संगत का आनन्द  2– भयपूर्ण  3– तेज़  4– पेड़)

उन्होंने काव्य की हर विधा में लिखा। पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के बुनियादी अधिकारों की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की  पैरवी की। आज भी स्त्रियाँ अपने हक़ की लड़ाई लड़ रही हैं। अदालत में आज भी हज़ारों–हज़ार केस बलात्कार के, औरतों को ज़िन्दा जलाने के, घर–बाहर उनकी प्रताड़ना के दर्ज हैं। न्याय की प्रतीक्षा में बेबसी और व्याकुलता चरम पर है। उनका एक शे’र है,

कुछ जिसकी शिकायत है न कुछ जिसकी ख़्ाुशी है

ये कौन सा बरताव मेरे साथ करे है

 

एक दूसरी ग़जल में लिखते हैं,

मुझसे नज़रें तो मिलाओ कि हज़ारों चेहरे

मेरी आँखों में सुलगते हैं सवालों की तरह

और तो मुझको मिला क्या मेरी मेहनत का सिला

चन्द सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों की तरह

क्या हाथ के छालों और मन में उठते सवालों का कोई हल नहीं है? क्या औरतों के शोषण का, मातृसत्ता पर पितृसत्ता के जबरिया आधिपत्य पर कोई विकल्प है? है, मगर पहल कौन करे? सब अपनी जान बचाने की फ़िक्र में मुब्तिला हैं, लेकिन उर्दू और हिन्दी के प्रगतिशील शायरों–कवियों ने अपनी आवाज़ बिना डरे समय–समय पर उठाई है। अख़्तर साहब की ग़ज़ल के दो शे’र देखिए,

इतने मायूस तो हालात नहीं

लोग किस वास्ते घबराए हैं

संगरेज़ों1 से ख़्ाज़फ़ पारों2 से

कितने हीरे कभी चुन लाये हैं

(1– पत्थर के टुकड़े  2– मिट्टी के टुकडे़)

तरक़्क़ीपसन्द शायरी से मोहब्बत करने वाले सदैव अपनी जनता के साथ खड़े होते हैं। केन्द्र और राज्य की सत्ता का विराधी पक्ष बनते हैं। जनता के दुखड़ों, उनकी तकलीफ़ों को अपने दर्द में घुला–मिलाकर, आँसुओं से चमकाकर जनता के दिलों को रौशन कर देते हैं। वह समय–समय पर चेताते भी रहते हैं कि सिर्फ़ जीना काफ़ी नहीं है, जीने का हुनर ज़रूरी है। वह लिखते है,

कितना मुश्किल कितना कठिन

जीने से जीने का हुनर

जीने का हुनर हमारी कलाएँ हमें सिखाती हैं। चित्रकला, मूर्तिकला, नृत्य, गायन–वादन, लेखन हमारे भीतर की ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देती है। ऊर्जा ही जीवन का स्रोत है। इसे हर हाल में बचाये रखना ज़रूरी है। अख़्तर साहब की ग़ज़ल के दो शे’र हैं,

रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में

दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा

——

लम्हा लम्हा रहे आँखों में अंधेरे लेकिन

कोई सूरज मेरे सीने में उभरता ही रहा

चाँद और सूरज हमारी शायरी का अटूट हिस्सा हैं। हर युग के कवियों ने इनका प्रतीकात्मक प्रयोग किया है। सन् 1958 की फ़िल्म ‘रागीनी’ राखान साहब के निर्देशन में बनी थी। इसके कुछ गीत जाँ निसार अख़्तर ने और कुछ नग़मे क़मर जलालाबादी ने रचे। अख़्तर साहब का लिखा हुआ एक गीत है,

मन मोरा बावरा

निसीदिन गाए गीत मिलन के

निसीदिन गाए गीत मिलन के

मन मोरा बावरा

आशाओं के दीप जलाकर

आशाओं के दीप जलाकर

बैठी कब से आस लगाकर

आया प्रीतम प्यारा

दिलचस्प बात यह है कि किशोर कुमार खुद सफल प्लेबैक सिंगर थे और फ़िल्म के नायक भी। वह खुद इस गीत को गाना चाहते थे। रफ़ी साहब ने तो इतिहास रच दिया। इस कदर डूब कर गाया कि सारे लोग हैरान हो गये। किशोर कुमार भी रफ़ी साहब के क़ायल हो गये। उन्होंने कहा भी कि ‘रफ़ी भाई आप ही इस कठिन गीत को गा सकते थे और दोनों एक–दूसरे के गले लग गये। वे छठे और सातवें दशक के अद्भुत कलाकार थे। ईर्ष्या, अभिमान और सारे छल–छद्म से परे, सिर्फ़ प्यार से भरे–भरे।

उर्दू अदब में प्यार के बड़े कवि जाँ निसार अख़्तर रहे हैं। उनकी इस ग़जल को पढ़िए और सारी दुनिया में प्यार बाँटिये।

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो

साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

जब शाख कोई हाथ लगाते ही चमन में

शर्माए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो

सन्दल सी महकती हुई पुरकै़फ़ हवा का

झोंका कोई टकाराए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर

नद्दी कोई बलखाए तो लगता है कि तुम हो

चार दशक के लम्बे सिनेमाई कैरियर में उन्होंने लगभग अस्सी फ़िल्मों के लिए गीत लिखे, जो बहुत मकबूल हुए और आज भी संगीत प्रेमियों के मन में गूँजते रहते हैं। फ़िल्म ‘प्रेम–पर्वत’ का यह गीत सुनिए और कुदरत की ख़्ाूबसूरती में डूब जाइए,

ये दिल और उनकी निगाहों के साये

मुझे घेर लेते हैं बाहों के साये

पहाड़ों को चंचल किरन चूमती है

हवा हर नदी का बदन चूमती है

यहाँ से वहाँ तक हैं बाहों के साये

लिपटते ये पेड़ों से बादल घनेरे

ये पल–पल उजाले, ये पल–पल अंधेरे

बहुत ठंडे–ठंडे हैं राहों के साये

धड़कते हैं दिल कितनी आज़ादियांे से

बहुत मिलते–जुलते हैं इन वादियों से

मोहब्बत के रंगी पनाहों के साये

इनके अलावा उन्होंने बहुत सी ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का भी सृजन किया है। उनकी ज़िन्दगी का एक ही मक़सद था कि लोग जागरूक बनें, सतर्क रहें और कला को फ़क़त बाज़ार और उन्हें बेचकर दौलत का अम्बार लगाने वालों पूँजीपतियों, उद्योगपतियों और लूटख़्ाोरों से सावधान रहें। अपने एक शे’र में वह कहते भी हैं कि,

वो भी क्या मौजे–लहू है कि जो थमथम के बहे

गर्म चश्मों की रवानी जो नहीं तो क्या है

अपने ख़्ाून में यह रवानी पैदा करनी होगी तब जाके हम आज़ादी और अभिव्यक्ति का अर्थ समझ सकेंगे और कुछ नया रच सकेंगे। 19 अगस्त 1976 को अपने गीतों और नग़मों से उर्दू शायरी को मालामाल करने वाले जॉनिसार अख़्तर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी देह नहीं रही लेकिन उनकी रचनाएँ हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी। उन्होंने हमेशा उम्र को धता बतायी और अपने को नौजवान समझा। निदा फ़ाज़ली साहब ने ठीक लिखा है कि, ‘‘जाँ निसार आख़्िारी दम तक जवान रहे। बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास का एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो–अदब की महफ़िलों में हमेशा जवान रखेगा।”(5)

सन्दर्भ

1– तुम्हारे नाम, जाँ निसार अख़्तर को सफ़िया अख़्तर के ख़्ात, संस्करण : 2020, लिप्यांत्रण–– असगर वज़ाहत, पृष्ठ  132–133।

2– ‘कल बहुत देर हो जाएगी’, फ़िदेल कास्त्रो, गार्गी प्रकाशन, दिल्ली, द्वितीय संस्करण अप्रैल 2017, पृष्ठ 2।

3– जाँ निसार अख़्तर : एक जवान मौत, भूमिका लेखक व सम्पादक, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, आवृत्ति 2012, पृष्ठ 10।

4– उपर्युक्त, पृष्ठ 11।   

5– उपर्युक्त, पृष्ठ 12।

(मेरे दो अभिन्न मित्रों ने इस लेख को पूरा करने में मदद की है, गोरखपुर के भाई एहतेशाम सिद्दीक़ी और बिलासपुर के भाई रफ़ीक ख़ान। दोनों के प्रति हार्दिक आभार।)