मजरूह सुल्तानपुरी की शख्सियत गजल और गीत के अद्भुत मेल से बनी है। वह एक साथ गजलगो और गीतकार हैं। दोनोे विधाओं को साधना दोधारी तलवार के वार को निहत्थे रोकने जैसा है। उन्होंने जीवन भर हर हमले और प्रहार का डट के सामना किया। उनका मानना है कि खतरा अभी टला नहीं है, बल्कि वह बार–बार रूप बदलकर आ रहा है। कातिल सिरफिरा ही नहीं, बहुरूपिया भी है।

चारो ओर गौर से देखिए सारा तमाशा सामने आ जायेगा। अंग्रेजों का खंजर अब हमारे रहबरों और दुनिया को लूटने वाले हाईटेक व्यापारियों के हाथ में है।

किसने कहा कि टूट गया खंजरे–फरंग,1

सीने पे जख्मे–नौ2 भी हैं दागे कुहन3 के साथ।

(1– अंग्रेज का खंजर 2– नया घाव 3– पुराने दाग)

सत्ता पक्ष जनता के साथ नहीं बल्कि इन्हीं लुटेरे व्यापारियों के साथ खड़ा है। दोहरी लूट से जनता जूझ रही है। पुराने जख्मों के दाग के साथ रोज नये जख्म भी हरे हो रहे हैं। मजरूह लिखते हैं,

‘मजरूह’ काफिले की मेरे दास्ताँ है ये,

रहबर1 ने मिल के लूट लिया राहजन2 के साथ

(1– पथ–प्रदर्शक 2– डाकू)

जब रहबर ही डाकू बन जाये तो जनता क्या करे ? कहाँ जाये ? जिसके हाथों पूरे यकीन के साथ सत्ता की कमान सौंपी थी, कि वह हमारे जान–ओ–माल की हिफाजत करेगा। वही हमें लूटने लगा। सरे आम बेइज्जत करने लगा तो पलटकर वार करने के सिवा कोई चारा न बचा। हिन्दुस्तान की गुलामी का दौर याद कीजिए। आजादी के परवानों ने अंग्रेजों के सारे जुल्मो–जबर का मुकाबला करते हुए कैदखानों के स्याह अंधेरों को अपनी हिम्मत से रौशन किया। सितमगारों के मुँह पर कस के थप्पड़ लगाये और हँसते–हँसते फाँसी पर चढ़ गये। उनकी देह खाक हो गयी, दफ्न हो गयी। आवाज आज भी गूँज रही है। हमें जगा रही है।

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1921 को सुल्तानपुर  (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनकी मृत्यु 24 मई 2000 (उम्र 80 वर्ष) में मुम्बई में हुई थी। मजरूह सुल्तानपुरी की रचनाओं ने भारत के प्रगतिशील आन्दोलन को एक नयी दिशा प्रदान की है। उर्दू और हिन्दी का लाजवाब और कलात्मक संयोजन देखते ही बनता है। भाषा और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले धूर्त और पाखण्डी राजनेताओं से उन्हें सख्त नफरत है। मजरूह लिखते हैं कि,

रोक सकता हमें जिन्दाने बला1 क्या मजरूह,

हम तो आवाज हैं दीवार से छन जाते हैं।

(1– कैदखाने की जिल्लत)

उनकी साम्प्रदायिक सोच पर उन्होंने लगातार चोट की है और जनता को सचेत किया है। आम आदमी को डरा–धमकाकर वे दंगे–फसाद कराते हैं। निर्दोष लोगों की जान लेते हैं। भजन और अजान की पवित्र ध्वनियों को वे इन्सान के खून में डूबो देते हैं। उनका एक शे’र है,

डरा के मौज–ओ–तलातुम1 से हमनशीनों2 को,

यही तो हैं जो डूबोया किये सफीनों3 को।

(1– ज्वार, तूफान 2– संगी–साथी 3– नावों को)

चाहे दार्शनिक नगमा हो या मजाहिया गजल उनकी यही तमन्ना होती है कि इन्सान और इन्सानियत हर हाल में जिन्दा रहे। आदमी भला बने बुरा कतई नहीं। भलाई को नजरअन्दाज करने वाले और बुराई को बढ़ावा देने वालों को नरक में भी पनाह न मिले। उनका शे’र देखिए,

सितम! कि तेगे कलम दें उसे जो ऐ ‘मजरूह’,

गजल को कत्ल करे, नगमे को शिकार करे।

उनके मजाहिया अन्दाज का भी आनन्द लीजिए। 1958 में एसडी नारंग के निर्देशन में ‘दिल्ली का ठग’ फिल्म बनी थी। प्रमुख भूमिका में नूतन और किशोर कुमार थे। संगीत दिया था प्रसिद्ध संगीतकार रवि ने। उसका ये गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था।

सी ए टी कैट, कैट माने बिल्ली

आर ए टी रैट, रैट माने चूहा

दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ

इस गीत के लिए मजरूह साहब की कटु आलोचना हुई थी। उनका जवाब था कि फिल्म का नायक ठग है और बेहद चुलबुला भी। इसलिए ऐसा गीत लिखा गया ताकि उसका चरित्र न्यायसंगत लगे। मजरूह साहब हरफनमौला कलाकार हैं। उन्होंने जन–विरोधी सत्ता की मुखालिफत की और जन–संघर्षों में सहभागिता की। उन्हें न धार्मिक फतवे डरा सके और ना ही गुण्डों की धमकियाँ। उनका एक शे’र काबिले गौर है,

हम हैं काबा, हम हैं बुतखाना, हमीं हैं कायनात,

हो सके तो खुद को भी एक बार सजदा करना।

मजरूह साहब ने ओछी और संकीर्ण मानसिकता का सदैव विरोध किया है। साझी सभ्यता और संस्कृति का गुणगान ही उनके जीवन–दर्शन का सार है। वह इन्सानियत के सजग पैरोकार हैं और हर परिस्थिति में अपनी जनता के साथ खड़े रहे हैं। उनके जेहन में शिव का ताण्डव नृत्य जरूर रहा है। उनका एक शे’र है,

देख जिन्दा1 से परे रंगे–चमन जोशे–बहार,

रक्स2 करना है तो फिर पांव की जंजीर न देख।

(1– कैदखाने से 2– नृत्य)

मजरूह जिन्दगी और जद्दोजहद के बड़े कलाकार हैं। उनकी कला में रोटी की महक और फूलों की सुगन्ध है। एक चीनी कहावत है, “अगर तुम्हारे पास दो पैसे हैं तो एक से रोटी खरीदो, दूसरे से फूल। रोटी तुम्हें जिन्दगी देगी और फूल तुम्हें जीने की कला सिखाएगा।” उनकी शायरी रोटी का इस्तकबाल करती है तो फूलों के हार भी पिरोती है। रोटी की सिफत पर लिखते हैं,

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ

खुद नाचती हैं सबको नचाती हैं रोटियाँ

बच्चा उठाये बोझ खिलौने को भूल के

बुढ्ढा चलाये ठेले को फाकों में झूल के

देखा न जाये जो, वो दिखाती हैं रोटियाँ

दीवाना आदमी को–––

अन्न के भण्डारों पर जिनका कब्जा है वो पूँजीपति खेतों का सरमाया लूटकर, किसानों का हक मारकर रोटी के हथियार से भूख का उत्सव मनाते हैं। मजरूह साहब अपने गीत में सत्ता पक्ष और पूँजीपतियों की मिलीभगत की बखिया उधेड़ते हुए कहते हैं,

कहता था एक फकीर की रखना जरा नजर

रोटी को आदमी ही नहीं, खाते बेखबर

अक्सर तो आदमी को भी खाती हैं रोटियाँ

दीवाना आदमी को–––—

तुझको पते की बात बताऊँ मैं जानेमन

क्यों चाँद पर पहुँचने की इनसाँ को है लगन

इनसा को चाँद में नजर आती हैं रोटियाँ

दीवाना आदमी को—

यह गीत उन्होंने फिल्म : काली टोपी लाल रूमाल के लिए लिखा था। संगीतकार चित्रगुप्त के लाजवाब संगीत निर्देशन और सुरों के बादशाह मोहम्मद रफी साहब की जादुई आवाज ने इस नगमे को हरदिल अजीज बना दिया था। रोटी के साथ उन्होंने फूल को भी जोड़ा। रोटी और फूल का सन्तुलित मिश्रण ही जीवन को सुन्दर, रागमय और गतिशील बनाता है। फूल अपनी मर्जी से खिलता है और कांटों के बीच रहकर सुगन्ध बिखेरता है। कवि–चिन्तक मुक्तिबोध ने क्या खूब लिखा है कि, “दुनिया में नाम कमाने के लिए कभी कोई फूल नहीं खिलता है।” फूल को लेकर मजरूह साहब ने भी कई मानीखेज शे’र कहे हैं, आप भी पढ़िए और गुनिये,

मैं हजार शक्ल बदल चुका हूँ चमन–ए–जहाँ1 में सुन ऐ सबा,

कि जो फूल है तेरे हाथ में ये मेरा ही लख्ते–जिगर2 न हो।

(1– संसार रूपी उपवन में 2– दिल का टुकड़ा)

और यह भी,

शाखों पे नोके–तेग1 से क्या–क्या लिखे हैं फूल,

अन्दाजे–लालाकारिए–कातिल2 कहा न जाये

(1– तलवार की नोक 2– कातिल की लाल कशीदाकारी का अन्दाज)

सन् 1946 में बनी फिल्म ‘शाहजहाँ’ के लिए उन्होंने एक गीत लिखा,

दर्द भी हमें कूबूल चैन भी हमें कूबूल

हमने हर तरह के फूल हार में पिरो लिये

जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिये—

हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि प्रकृति ने तो खुलकर हमें नेमतें बख्शी हैं। यह तो हम बद्नीयत इन्सान हैं जिन्होंने नेमतों का भरपूर इस्तेमाल किया और बदले में अमृत जैसी हवा, पानी, मिट्टी, धरती और आसमान में विष घोल दिया। हमने आन्धी–तूफान, धूप, पानी, बरसात झेलते खेतांे में फसल उगाते किसानों और उपवन में तरह–तरह के फूल खिलाते मालियों के साथ क्या किया ? हमने उन्हें जानवरों से बद्तर समझा, लगातार अपमानित और प्रताड़ित किया। पाकिस्तान के मशहूर लेखक अब्दुल्लाह हुसैन ने इस दर्द को महसूस किया और अपने कालजयी उपन्यास ‘उदास नस्लें’ में लिखा कि, “यह हिन्दोस्तान का बदनसीब किसान था, जिसने अनगिनत मुसीबतें बगैर एहसास के झेली थीं। उस चेहरे पर अनगिनत लकीरें और गहरी थकान थी और जिसका जिस्म मौसमों की शिद्दत में नंगा रह–रहकर लाल, नीला और सियाह पड़ चुका था। उसके हिस्से का अनाज जमीन्दारों के घरों में था, और उसकी औरतों के जेवर महाजनों के पास गिरवी रखे थे। उसके हाथ खाली थे और वह गरीब था। उसकी मिल्कियत में एक दराँति और एक कुदाल थी और उसके हाथों में अपनी मेहनत थी।”1

मजरूह सुल्तानपुरी ने किसानों और बागबानों की बेबसी और प्रताड़ना देखी थी। वह इनके दुख–दर्द के साथ इनके भीतर छुपी दुनिया को बदल देने वाली ताकत का एहसास भी कराते हैं और इनके हक में अपनी आवाज बुलन्द करते हैं,

आ निकल के मैदां में दोरुखी1 के खाने से,

काम नहीं चल सकता अब किसी बहाने से।

(1– दोरंगी नीयत और राजनीति के चंगुल से)

अब जमीन गाएगी हल के साज़ पर नग़्मे,

वादियोंे में नाचेंगे हर तरफ तराने से।

अहले–दिल उगायेंगे खाक से माहो–अंजुम1

अब गुहर2 सुबक3 होगा जौ के एक दाने से।

(1– चान्द–सितारे 2– मोती 3– हल्का)

मजरूह साहित्य और संस्कृति के हर विभाग में ‘परफेक्शन’ हासिल करने के हिमायती रहे हैं। एक ओर वह यूनानी इलाज की शिक्षा ले रहे थे वहीं दूसरी ओर संगीत महाविद्यालय में संगीत की बारीकियों को समझने की कोशिश भी कर रहे थे। इनसार अहमद साहब ने अपने निबन्ध ‘मजरूह सुल्तानपुरी : कुछ यादें – कुछ बातें’ में लिखा है कि, “ये बात शुदा–शुदा (धीरे–धीरे) उनके वालिद तक पहुँची और वो अपने बेटे की इस जसारत (धृश्टता) पर बहुत नाराज हुए और डांट–डपट कर उनका नाम कटवा दिया।”2 वह उदास हुए लेकिन मुशायरों में उनका जलवा बरकरार रहा। उनके विरोधियों ने नये–नये हमले शुरू दिये। “चुनांचे लोगों ने एक पुख्ताकार (अनुभवी) शायर मसीहुद्दीन साहब को चढ़ाकर उनका तखल्लुस मजरूह के जवाब में ‘जर्राह’ रखवा दिया और वो मजरूह के शे’रों–गीतों पर पैरोडी लिखने लगे और उन पर तंज करने का काम करने लगे। दो–एक मिसालें दर्ज की जाती हैं :

बज्मे अदब खतम हुई, अब चल दो ऐ मसीह,

मजरूह आ रहे हैं सरंगी उठाएंगे।

फिरऔन पे मूसा उतरे थे, मजरूह के लिए जर्राह आया,

हो गयी हिकमत गायब गुल्ला, गाए जा कौवे गाए जा।

जर्राह को हर सिन्फे जराहत की कसम

वह शे’र पढ़ूँ कि ऑपरेशन कर दूँ।3

मजरूह सख्तजान इन्सान थे। उन्होंने इन बातों को कोई तवज्जो नहीं दी। वह नयी राह बनाते रहे और सारी जिन्दगी कलम और कलाम की शान बढ़ाते रहे। अपने पर तंज करने वालों पर पलट वार किया। एक शे’र में वो कहते हैं कि फाँसी और रस्सी की बात हमसे तब करो, जब तुम्हें सरफरोशों के वतन पर निसार हो जाने की चाहत और उनकी वैचारिक ऊँचाई का अन्दाजा हो जाये और मौत के साये में जीने का सलीका आ जाये। शे’र देखिए,

करो ‘मजरूह’ तब दारो–दसन के तजकिरे1 हम से,

जब उस कामत2 के साए में तुम्हें जीने का ढंग आए।

(1– फांसी और उसकी रस्सी का जिक्र 2– ऊँचाई)

मौत के साये में दिलदार आदमी ही जी सकता है। तंगदिल होकर जीना मरने के समान है। दिल को हर हाल में बचाकर ही दुनिया को बचाया जा सकता है। दु:खों से गुजरकर ही दिल सुर्खरू होता है। उन्होंने लिखा,

सीने में छुप गया है तुलू–ए–सहर1 के साथ

अब शाखे–दिल पे गुले–रुखसार2 देखिए।

(1– सुबह होने के साथ 2– गुलाब के फूल जैसा)

दिल से मूल्यवान और कुछ नहीं। बांग्लादेश के राष्ट्रीय कवि नजरूल इस्लाम कहते हैं,

आदमी के दिल से बड़ा कुछ नहीं।

दिल ही तमाम तीर्थों का स्थान है।

यही मंदिर, मसजिद, गिरजा, काबा, काशी और जेरूसलम है।

ईसा और मूसा ने यहीं बैठकर सत्य का साक्षात्कार किया था।

मजरूह की रचनाओं में दिल के कई रूप नजर आते हैं। आप भी इन रूपों का साक्षात्कार कीजिए। सन् 1946 में जनाब अब्दुल रशीद कारदार ने ‘शाहजहाँ’ फिल्म बनायी थी। लेखक थे कमाल अमरोही। महान गायक के एल सहगल नेे संगीतकार नौशाद साहब के निर्देशन में जो नगमा गाया था, उसकी स्वर–लहरियाँ आज भी हमें दर्द से भर देती हैं। सचमुच दिल टूट जाता है,

जब दिल ही टूट गया, जब दिल ही टूट गया

हम जी के क्या करेंगे, हम जी के क्या करेंगे

उल्फत का दीया हमने, इस दिल में जलाया था

उम्मीद के फूलों से, इस घर को सजाया था

इक भेदी लूट गया, इक भेदी लूट गया

जब दिल ही टूट गया

प्रेम के दीये से ही तो दिल रौशन हैं। इस दीये को बुझाकर ही उल्फत की दुनिया को लूटा जा सकता है। यह लूट आज सर्वनाशी हो गयी है। दिल का टूटना व्यक्ति के साथ पूरे समाज का टूटना और बिखरना है। मजरूह जिस भेदी की बात कर रहे हैं, उस भेदिये को पकड़ना और उसका सर्वनाश करना जरूरी है। गौर से देखिए पूरी दुनिया में ये भेदी फैले हुए हैं। धर्म का मुखौटा ओढ़कर ये करमजले सदियों से चले आ रहे प्रेम–बन्धन को तोड़ रहे हैं। उम्मीद के फूलों से सजे–संवरे घर को आग के हवाले कर रहे हैं। बस धुआं है, तपिश है। वह एक गीत में लिखते हैं,

 

गम दिये मुस्तकिल1

कितना नाजु़क है दिल – ये न जाना

हाय हाय ये जालिम जमाना

कोई ये रूदाद2 देखे

ये मुहब्बत की बेदाद3 देखे

फुंक रहा है जिगर,

पड़ रहा है मगर मुस्कुराना

हाय हाय ये जालिम जमाना

(1– स्थायी 2– हालत 3– अत्याचार)

दिल तो दु:ख का स्थायी बसेरा हो चला है। जिगर फुँक रहा है मगर मुस्कुराना पड़ रहा है। बेरहम जमाने के जा़लिमों ने हर तरफ जाल बिछाये हैं। एक ही रास्ता है, या तो जान दे दो या जाल को छिन्न–भिन्न कर दो। मजरूह सुल्तानपुरी ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने हर चुनौती का सामना किया और शायरी को अप्रतिम ऊँचाई दी। फारूक अर्गली साहब लिखते हैं कि, “मजरूह साहब एक तरफ उर्दू गजल के कालजयी शाइर के रूप में जाने जाते हैं तो दूसरी तरफ एक महान् फिल्मी गीतकार के रूप में उन्होंने जो असाधारण लोकप्रियता अर्जित की वह भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में साहिर और शकील बदायूनी के अतिरिक्त अन्य किसी गीतकार को प्राप्त नहीं हुई।”4 इसकी वजह थी अवध की संस्कृति को बचाये रखा। कुर्रतुल ऐन हैदर अपना अनुभव दर्ज करती हैं, “मजरूह साहब ने अवध के कल्चर को अपने घर में जिन्दा रखा था। वे एक निहायत मुहज्जब (सभ्य) और वजअदार (शानदार) इनसान थे। मजरूह साहब से मुम्बई की महफिलों में अक्सर मुलाकात हुई थी और वो बहुत ही शफकत (प्रेम) से मिलते थे।

उनकी बेगम फिरदौस भी एक बड़ी खलीक (सुशील) और मिलनसार खातून हैं। मैं शाइरों और अदीबोें की नावनोश (खाने–पीने की) महफिलों में जाने से एतराज करती हूँ लेकिन मजरूह साहब के यहाँ कई बार गयी। उनके यहाँ का रख–रखाव काबिले तअरीफ था।”5

                मजरूह सुल्तानपुरी अत्यन्त लोकप्रिय शायर रहे हैं। लोकप्रियता की अपनी शर्तें होती हैं। फिसलने, बहकने, और बिकने की पूरी गुंजाइश होती है। खरीददार हर जगह मौजूद हैं। बिक गये उस्तादों के कई किस्से इतिहास में दर्ज हैं। मजरूह कभी बिके नहीं। उनकी खूबियों को शायर निदा फाजली ने इस तरह दर्ज किया है, “मजरूह सुल्तानपुरी जो एक बुलन्द पाया शायर हैं, उन्होंने फिल्मों में भी निहायत खूबसूरत शे’र लिखे हैं, जिसका मुकाबला कोई दूसरा शायर नहीं कर सकता। इसकी वजह ये है कि उन्होंने सुल्तानपुर से अपना तखलीकी (सृजनात्मक) सफर शुरू किया है, जो न सिर्फ़ खित्तए अवध (इलाका) है बल्कि मलिक मोहम्मद जायसी की आमाजगाह (बसेरा) रहा है और यहाँ की बोली और मुहावरों का इस्तेमाल उन्होंने अपने अशआर में किया है। गजल के दायरे से उन्होंने बाहर निकलने की कोशिश नहीं की। मजरूह एक नस्ल के नुमाइन्दा शायर हैं, जिनका मुकाबला मौजूदा नस्ल के किसी शायर से करना मुनासिब नहीं है। जिस तरह टैगोर ने कहा था कि गुजरे हुए जमाने की नुमाइन्दगी उन्होंने किया है और मौजूदा नस्ल काजी नजरूल इस्लाम की ही है।”6

बीसवीं सदी का एक बड़ा हिस्सा प्रगतिशील और मार्क्सवादी विचारों के समर्थकों का रहा है। उन्होंने जन आन्दोलनों के जरिये जनता को जागृत और अन्याय के विरुद्ध लड़ने को प्रेरित किया। ऐसे रचनाकारों में मजरूह सुल्तानपुरी का नाम उल्लेखनीय है। ग़्ाुस्सा और असन्तोष उनके सीने को छलनी किये दे रहा था लेकिन उन्होंने उसे जाया नहीं होने दिया। क्रोध के भाप को नियंत्रित कर उसे जनता के दुश्मनों की ओर मोड़ दिया। उनकी एक गजल के चन्द शे’र कल और आज के हिन्दुस्तान की हालत बयाँ करते हैं,

जिस दम ये सुना, सुब्हे–वतन महबूस फजाये–जिन्दा मेंें1,

जैसे कि सबा2, ऐ हमकफसो3 बेताब4 हम आए जिन्दा में।

हों तेगे–असर जंजीरे–कदम5, फिर भी हैं नकीवे–मंजिल6 हम,

जख्मों से चिरागे–राहगुजर बैठे हैं जलाये जिं़दा में,

सद चाक कबा–ए–अम्नो–सुकूँ, उरिया है अहिंसाई का जुनूँ7,

कुछ खूँ से शहीदों ने अपने, वो गुल हैं खिलाये जिन्दां में।

ये जब्रे–सियासत, ये इनसां, मज्लूम आहें, मजबूर फूगां8,

जख्मों की महक दागों का धुआं, मत पूछ फजाये–जिन्दां में।

और आखिरी शे’र,

रफ्तारे–जमाना ले जिनकी, गेती है गुले–नग्मा जिनका9,

हम गाते हैं उन आवाजों से आवाज मिलाकर जिन्दां में।

(1– कैदखाने में कै़द 2– सुबह की हवा 3– कैदी साथियों 4– बेचैन, परेशान 5– पैरों की बेड़ियाँ जो तलवार जैसी धारदार हों 6– मंजिल के जानकार 7– सुख–शांति का लबादा सौ जगहों से फटा हुआ है और अहिंसा का जुनून नंगा हो गया है 8– यह अन्यायी राजनीति, ये गरीब लोग, मजबूर आहें 9– समय की गति जिन्हें अपनाए, जिनके लिए दुनिया गीतों का गुलदस्ता हो।)

मजरूह साहब का रचनात्मक संसार भारत की साझा संस्कृति के प्रकाश से भरा हुआ है। वह प्रकाश को हर गली–कूचे, गाँव–शहर और दिलों में भरना चाहते हैं। वह अन्धकार से लड़ते हुए प्रकाश के कवि हैं, इस बात से बाखबर कि अन्धेरा बार–बार वार करेगा और हर बार उसे मिलकर पटखनी देनी होगी। एकल प्रयास के साथ मिल–जुलकर आगे बढ़ना होगा। आवाज से आवाज मिलानी होगी तब ही हम कामयाब होंगे। वह लिखते भी हैं कि,

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर,

लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया।

कारवाँ तब बनता है जब पहला कदम उठता है। पहले कदम की आहट बुलाती है और धीरे–धीरे कई कदम बढ़ते हैं और कारवाँ मंजिल की ओर पयाम करता है। मजरूह सुल्तानपुरी गाते हुए, पुकारते हुए रचनाकार हैं। संगीतकार नौशाद की धुन पर दिलीप कुमार और नरगिस पर फिल्माया हुआ महबूब खान की फिल्म ‘अन्दाज’ का ये गीत याद कीजिए जिसे मुकेश ने कमाल का गाया था,

तू कहे अगर जीवन भर मैं गीत सुनाता जाऊँ

मन बीन बजाता जाऊँ

और आग मैं अपने दिल की

हर दिल में लगाता जाऊँ

दु:ख–दर्द मिटाता जाऊँ

तू कहे अगर

मन–बीन बजाते हुए वह तल्लीन होते हैं। मन की खुशी के साथ मन की पीड़ा को भी सुर देते हैं। उनकी चाहत है कि संसार से दु:ख–दर्द मिट जाये और रचनात्मक जीवन उत्कर्ष तक पहुँचे। इस चाहत का नया अन्दाज सन् 1958 में नरेन्द्र सूरी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘लाजवन्ती’ के लाजवाब गीत में सुनिये जिसे नरगिस की शानदार अदाकारी, आशा भोसले की पुरसोज आवाज और एस डी बर्मन के चमत्कारी संगीत ने रचा था,

गा मेरे मन गा, गा मेरे मन गा

तू गा मेरे मन गा, गा मेरे मन गा

यूँ ही बिताये जा दिन जिन्दगी के

तू गा मेरे मन गा, गा मेरे मन गा

तेरी टूटी हुई बीना, कहे तुझको है जीना

जीवन को निभा

चाहे भर–भर आएँ, चाहे दु:ख बरसाएँ

तेरे नैनों की घटा

तू नैन मत छलका

गा मेरे मन गा

मजरूह साहब के बिम्ब बतियाते हैं। उन अनुभवों की याद दिलाते हैं जिन्हें विस्मृति की धूल ने ढँक लिया है। जीवन रूपी बीना के टूटे हुए तार कहते हैं कि हर हाल में जीना है। जीवन को निभाना है भले ही नैनों की घटा आँसू से भर–भर जाएँ, उन्हें छलकने नहीं देना है। जीवन–राग साधना है और गाना है। मजरूह सुल्तानपुरी ने भाषा को नया तेवर दिया। गजल को मौज–मेले की सामन्ती परम्परा से बाहर निकाला और उसे नया समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सन्दर्भ दिया। गजल और नज्म को आम आदमी से जोड़ा और उसके फलक को विस्तृत किया। अनपढ़ मजदूरों और किसानों से जुड़ने के लिए उन्होंने सरल भाषा में गीत रचे और जनता को समाज की असलियत बतायी। मजरूह साहब ने एक गीत लिखा,

अमन का झण्डा इस धरती पर

किसने कहा लहराने न पाये,

ये भी कोई हिटलर का है चेला

मार ले साथी जाने न पाये।

इस गीत को उन्होंने मजदूरों की एक सभा में सुनाया और हंगामा हो गया। देवमणि पाण्डेय जी ने एक आत्मीय बातचीत मजरूह सुल्तानपुरी से की थी। कुछ जरूरी सवाल किये थे। देवमणि जी के सवाल और मजरूह साहब के जवाब सुनिये,

देवमणि : सुना है उस दौरान आपको जेल भी हो गयी थी ?

मजरूह : हाँ, सही बात है। परेल में मजदूरों की एक सभा थी। मुझे वहाँ गीत पढ़ने के लिए बुलाया गया। मुझसे कहा गया कि मैं इतना सरल गीत पढ़ूँ कि अनपढ़ मजदूरों की समझ में वह आ जाये। मैंने बहुत सरल भाषा में गीत लिखा, लेकिन बात वही थी, जो मैं कहना चाहता था। गीत के बोल थे –

अमन का झण्डा इस धरती पर

किसने कहा लहराने न पाये,

ये भी कोई हिटलर का है चेला

मार ले साथी जाने न पाये।

उस वक्त कॉमनवेल्थ का काफी जोर था। मैंने उसकी भी खबर गीत में ली थी। कुछ लोगों ने गलत ढंग से उसमें नेहरू को जोड़कर प्रचारित कर दिया कि मैंने नेहरू को मारने की बात की। अदालत में मेरी पेशी हुई। डिटेंशन एक्ट लगाया गया। मुझसे कहा गया कि आपने नेहरू को मारने के लिए भीड़ को उकसाया। माफी माँगिये। मैं ठहरा स्वाभिमानी आदमी। माफी माँगने का मतलब था अपनी जहनी सोच को नकारना। मैंने इन्कार किया तो डेढ़ साल की कैद सुनायी गयी। आर्थर रोड जेल में बन्द कर दिया गया।”7

जेल की दीवारें और कठोर बन्दिशें भी मजरूह साहब को विचलित नहीं कर पायी। उन्होंने निजी और सार्वजनिक जीवन मंे कभी डबल स्टैन्डर्ड नहीं रखा। दोहरे जीवन–मूल्यों से उन्हें नफरत थी। वह जीवन और भाषा में शुद्धता और सुन्दरता के हिमायती रहे और उनकी रक्षा के लिए लड़ते रहे। उन्हें इस बात का बहुत दु:ख था कि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भाषा की शुद्धता पर गहरी चोट की गयी है। सस्ती और बाजारू लोकप्रियता के लिए अर्थहीन और अश्लील शब्दों का बेशर्मी से प्रयोग किया जा रहा है। पुराने जमाने की सादगी और गहराई अब बची नहीं है। सादगी और गहराई दिखावे और आडम्बर के गर्त में डूब गयी है। अब तो खरीदने और बेचने का जमाना उरूज पर है। आदमी की अहमियत गलियों और बाजार में बिकने वाले सामान से ज्यादा कुछ नहीं है। राजेन्द्र सिंह बेदी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दस्तक’ में मजरूह सुल्तानपुरी अपनी गजल में पूँजीवादी–साम्राज्यवादी ताकतों की मिलीभगत और लूट–खसोट के वहशी खेल से परदा उठाते हैं। स्वरकोकिला लता मंगेश्कर की आवाज और मदन मोहन साहब की शास्त्रीय धुन आदमी के सामान में तब्दील होने करुण कथा बयाँ करती है,

हम हैं मताए कूचा–ओ–बाजार1 की तरह

उठती है हर निगाह खरीदार की तरह

(1– गली–कूचे और बाजार में बिकने वाले सामान)

हमारा अस्तित्व आज एक अदद सामान से ज्यादा कुछ नहीं है। सारे रिश्ते–नातों पर बाजार हावी हो चला है। आप जाने–अनजाने तोल–मोल की वस्तु बन चुके हैं। या तो खरीद लीजिए या बिक जाइए। मजरूह इन सबका लेखा–जोखा करते हुए अपने को भी नहीं बख्शते। आखिरी बन्द में लिखते हैं कि,

‘मजरूह’ लिख रहे हैं वो अहले वफा का नाम

हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

हमें खुद को सामान बनने से रोकना होगा। दुनिया को बाजार में बदलने वालों की हर चाल और साजिश को बेनकाब करना होगा। उन्हें जनता की अदालत में दण्डित करना होगा। तब ही हम एक सुन्दर संसार का निर्माण कर सकेंगे। उन्होंने सुख के साथ बहुत दु:ख भी झेला था। बेटे एरम की मृत्यु ने उन्हें विचलित कर दिया था। बाप के कन्धे पर बेटे का जनाजा़, इससे ज्यादा मर्मान्तक आघात और क्या हो सकता है। शायर जफर गोरखपुरी ने एक वाकया बयान किया है, “मेरा बड़ा बेटा बीमार हुआ और उसका इन्तकाल हो गया। उसके कुछ समय बाद मजरूह साहब के जवान बेटे का भी इन्तकाल हो गया। उसी दौरान एक कार्यक्रम में जब वह मिले तो मुझे गले लगा लिया और रोने लगे। रोते–रोते बोले जफर, अब मुझे मालूम हुआ कि नौजवान बेटे को खोने का गम क्या होता है।”8 स्वर–कोकिला लता मंगेश्कर को समर्पित गजल के कुछ शे’र देखिए और उनकी खुशी और गम को महसूस कीजिए,

वो खयालों के सनम और वो अल्फाज के चान्द

बे वतन हो गये अपने ही वतन में जैसे

फिर भी क्या कम है जहाँ रंग न खुशबू कोई

तेरे होंठों से महक जाते हैं अफकार1 मिरे

मेरे लफ्जों को जो छू लेती है आवाज तिरी

सरहदें तोड़ के उड़ जाते हैं अशआर मिरे

(1– विचार)

मजरूह सुल्तानपुरी के व्यक्तित्व और कृतित्व को एक छोटे से निबन्ध में नहीं समेटा जा सकता है। पाठक यदि अपनी तरफ से विभिन्न स्रोतों से उन्हें जानने–समझने का प्रयत्न करेंगे तब ही मेरा श्रम सार्थक होगा। उन्होंने भारतीय साहित्य और संस्कृति को समृद्ध किया है। उन्हें मेरा सलाम।

सन्दर्भ :

1– उदास नस्लें, अब्दुल्लाह हुसैन, लिप्यान्तरण : सुरजीत, सम्पादन : अब्दुल मुगनी, राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण :

2013, राजकमल प्रकाशन, 1–बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नयी दिल्ली, पृष्ठ : 198।

2– युगतेवर : मजरूह सुल्तानपुरी पर केन्द्रित विशेषांक, हिन्दी त्रैमासिक, जनवरी–मार्च, 2020, वर्ष : 15, अंक : 1, 1857/1, उदय प्रताप कॉलोनी, बढ़ैयावीर, सिविल लाइन्स –2, सुल्तानपुर उ–प्र–, पृष्ठ : 187।

3– उपर्युक्त, पृष्ठ : 188।

4– कुल्लियाते मजरूह सुल्तानपुरी, हिन्दी लिप्यान्तर एवं सम्पादन – फारूक अर्गली, प्रकाशक : फरीद बुक डिपो, प्राइवेट लिमिटेड, नयी दिल्ली, पृष्ठ : 5।

5– उपर्युक्त, पृष्ठ : 17, 18।

6– युगतेवर : मजरूह सुल्तानपुरी पर केन्द्रित विशेषांक, निबन्ध : ‘मजरूह सुल्तानपुरी : कुछ यादें – कुछ बातें’ हिन्दी त्रैमासिक, जनवरी–मार्च, 2020, वर्ष : 15, अंक : 1, 1857/1, उदय प्रताप कॉलोनी, बढ़ैयावीर, सिविल लाइन्स –2, सुल्तानपुर उ–प्र–, पृष्ठ : 192।

7– उपर्युक्त, पृष्ठ : 214, 215।