“श्रम ही मानव समाज की आधारशिला है।”

मनुष्य का सबसे जरूरी गुण है श्रम करने की उसकी क्षमता, जिसके अभाव में उसका नैतिक और शारीरिक पतन हो जाता है।

“मैं सीमेंट के बारे में कुछ शब्द कहना चाहूँगा। मेरा मानना है कि यह एक बहुत ही बेहतरीन और उत्कृष्ट पुस्तक है। क्रान्ति के बाद पहली बार, हमें अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण विषय “श्रम” के बारे में स्पष्ट और दृढ़ समझ मिलती है। आपसे पहले किसी ने भी इस विषय को इतनी ऊर्जा और कौशल के साथ नहीं सम्भाला था।”

   –––प्रसिद्ध रूसी उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की

समाजवादी यथार्थवाद का पहला क्लासिकीय उपन्यास ‘सीमेंट’, जिसको फ्योदोर वासिलीविच ग्लादकोव (एफ वी ग्लादकोव) बहुत ही शानदार ढंग से समाजवादी यथार्थवादी सौन्दर्य शैली में पाठकों के सामने प्रस्तुत करते है। ग्लादकोव इकुत्सक इलाके में समाजवादी क्रान्तिकारी पार्टी की गतिविधियों में शामिल रहे, जहाँ से उन्हें निर्वासन की पीड़ा भोगनी पड़ी। उसके बाद 1906 में वे रूस की सामाजिक जनवादी पार्टी मंे शामिल हो गये और समर्पित होकर मजदूर वर्ग के ध्येय के लिए काम करने लगे। 1917 की रूसी समाजवादी क्रान्ति के बाद उन्होंने लाल सेना में काम किया। 1930 के दशक में उनका पहला प्रमुख उपन्यास ‘सीमेंट’ समाजवादी यथार्थवादी लेखन के लिए एक साहित्यिक मानक बन गया। उन्होंने 1932 में स्थापित ‘समाजवादी यथार्थवादी सौन्दर्यशास्त्र’ को और विकसित करने के लिए अपने जीवनकाल में सीमेंट के कुछ अंशों को फिर से लिखा।

उपन्यास की कहानी समाजवादी क्रान्ति के बाद रूस में चल रहे वर्ग–संघर्ष को मुख्य पहलू के रूप में जाहिर करती है। उपन्यास का नायक ग्लीब चुमालोव जब गृहयुद्ध के मोर्चे से वापस अपने नगर नेवोरोसिस्क वापस आता है तो, वह अपनी पत्नी दाशा के व्यक्तित्वान्तरण, आत्म–त्याग और संघर्ष से आश्चर्यचकित रह जाता है। उपन्यास में ग्लीब का महान बोल्शेविक पार्टी, लेनिन, लाल सेना, जनता और मजदूर वर्ग की विचारधारा के प्रति अटूट लगाव बहुत ही स्पष्ट ढंग से दिखायी देता है। ग्लीब का आत्मत्याग और उसकी पक्षधरता बहुत ही ऊँचे स्तर की है। यह पुस्तक 17 अध्यायों में लिखी गयी है। इसका हर अध्याय और उप–अध्याय पूरे उपन्यास का हिस्सा होने के साथ–साथ अपने आप में एक मुक्कमल कहानी भी है।

ग्लीब बहुत ज्यादा शिक्षित तो नहीं था, लेकिन वर्ग–संघर्ष को अपनी जिन्दगी में बहुत ही शानदार ढंग से समझता है। संक्रमणकालीन मजदूर वर्ग का व्यवहारिक उदाहरण है––– ग्लीब चुमालोव। ग्लीब पेटी बुर्जुआ इंजीनियर क्लेस्त के प्रति ईर्ष्या–द्वेश रखने के बजाय अपनी व्यवहारिक कार्रवाई से उसका निरन्तर रूपान्तरण करता है। इंजी– क्लेस्त अलगाव ग्रस्त, निराश और ठहराव का शिकार है। ग्लीब उसको रूपान्तरित करके उत्पादन कार्रवाई में लगा देता है। उपन्यास के अन्त तक क्लेस्त इस हद तक रूपान्तिरत हो जाता है कि वह अपने पेटी बुर्जआ चरित्र की पूरी ईमानदारी के साथ मजदूर वर्गीय विचारधारा की रोशनी में आत्मालोचना करता है। टीम भावना और सामूहिक श्रम के प्रति मजदूर वर्गीय नजरिये से प्रेरित ग्लीब वीरान और बन्द फैक्ट्री को खुशहाली में तब्दील कर देता है।

युद्ध के मोर्चे से तीन साल बाद ग्लीब जब वापस आता हैं, तो देखता हैं कि फैक्ट्री बन्द पड़ी है और वीरान हो गयी है। मजदूरों के थके और उदास चेहरे देखकर, वह अपने मन में फैक्ट्री के जीर्णोद्धार का  फैसला लेता है। अपने भाईयों की बस्ती में पहुँचकर वह कहता है कि,

 “भाइयों, यह सच है–– पेट भरा हुआ ही होना चाहिए। मैं वहाँ भी लड़ रहा था और मैं यहाँ भी लड़ने जा रहा हूँ। हम कारखाने को शुरू करने के लिए लड़ने जा रहे हैं। मैं या तो मर जाऊँगा,  फट जाऊँगा, या पागल हो जाऊँगा पर यह कारखाना शुरू होकर रहेगा। मैं जिन्दा जल सकता हूँ, पर धुआँ उठता रहेगा और मशीनंे चलती रहेंगी। मैं इस पर अपने सिर की बाजी लगाता हूँ।”

ग्लीब घर आता है और देखता है कि उसकी पत्नी दाशा जो पहले एक कुशल गृहणी थी, अब पुरानी दाशा नहीं रह गयी है। बिल्कुल बदल चुकी है, उसे यकीन ही नहीं कि यह दाशा है। उनकी बेटी नूरका जो अब सामूहिक बालगृह में भर्ती करायी जा चुकी है और दाशा कम्युनिस्ट पार्टी की महिला शाखा का नेतृत्व करती है, पार्टी हित ही अब उसकी सबसे पहली चिन्ता है। वह बहादुर, आत्मनिर्भर, दृढ़ नेतृत्व क्षमता और सामूहिकता की भावना से लैस है। उसका जीवन बहुत की अनुशासित है। वह निरन्तर अध्ययनरत है। घर में मेज पर किताबें फैली हुई हैं। ग्लीब यह सब देखकर हैरान है और उसके मन में बहुत ही ऊथल–पुथल चल रही है।

दाशा सचमुच एक बहुत ही आकर्षक और पाठक को गहराई तक प्रभावित करने वाला चरित्र है। उसका संघर्ष बहुत ही उम्दा है। दाशा के नये व्यक्तित्व का टकराव ग्लीब से होता है। ग्लीब नयी दाशा को स्वीकार नहीं कर पाता। वह इससे तनाव और  अलगाव महसूस करता है और बहुत ही गुस्से में होता है। उसके पुराने विचार निरन्तर टूटते रहते हैं। इससे वह बेचैन है। उपन्यास के अन्त तक पति–पत्नी का संघर्ष जारी रहता है। दाशा एकदम मुखर है और संघर्षों के दौरान ग्लीब के पुराने पितृसत्तात्मक व्यवहार की निर्मम आलोचना करते हुए वह धीमी और थोड़ी कर्कश आवाज में कहती है कि,

“तुम अभी मेरी बात नहीं सुन सकते, जैसे कि तुम्हें सुननी चाहिए। मैनें अभी तुमसे जो कहा, वह बस मुझे और अधिक स्पष्ट रूप से देखने में मदद करने के लिए था। तुम मोशिया के यहाँ मेरी जासूसी करने गये थे–– मुझे पता है। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि तुम क्या हो। तुम कम्युनिस्ट हो, यह सच है। लेकिन तुम एक क्रूर आदमी भी हो, तुम्हें एक औरत की जरूरत है जो तुम्हारे साथ बिस्तर पर सो सके। तुम एक अच्छे सैनिक हो, लेकिन आम जिन्दगी में तुम एक बुरे कम्युनिस्ट हो।”

ग्लीब का सामना क्रान्ति विरोधी पूँजीपतियों, जमींदारों, पेटी बुर्जुआ लोगों और उनकी विचारधाराओं से होता रहता है। उनके विरुद्ध वह निरन्तर संघर्ष करता भी है, लेकिन वह मिथकों का कोई परम्परागत अजेय नायक नहीं है, बल्कि साधारण मानवीय चरित्र है जो अकेलेपन और निराशा का भी अनुभव करता है। आत्म–संघर्ष उसे आत्म–विश्वास और दृढ़–इच्छाशक्ति से भर देता है। ग्लीब का क्रान्तिकारी चरित्र अपने तमाम साथियों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली दिखायी देता है क्योंकि वह आत्मालोचना करने में सहज, मजदूर भाइयों के साथ बराबरी और सामूहिकता की भावना से लैस, तात्कालिक समस्याओं के साथ–साथ पार्टी के दूरगामी हितों के प्रति सचेत, अपने विरोधियों के खिलाफ निर्मम संघर्ष और क्रान्तिकारी मानवतावादी व्यवहार करने वाला है।

वह फैक्ट्री को शुरू करने के सिलसिले में जिला कमेटी सचिव शिदकी से मिलने जाता है, तो वह अपनी दूर–दृष्टि से शिदकी के संकीर्ण नजरिये का विरोध करता है। यहाँ हमें कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर दो विरोधी विचारांे की टकराहट स्पष्ट तौर पर दिखायी देती है। ग्लीब सचिव शिदकी से दृढ़ता से कहता है, “एक ही रास्ता है। हम रोपवे को पहाड़ों पर ले जाएँगे और ट्रालियों को घाट पर ले जाएँगे। उन्हें लोड करके शहर और स्टेशन तक ले जाएँगे। हम सभी यूनियनों में स्वैच्छिक रविवारीय श्रम के लिए अभियान चलाएँगे। मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं है।”

एग्जीक्यूटिव चैयरमेन बडिन उपन्यास का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पात्र है। वह पूर्व क्रान्तिकारी, बुद्धिमान, ऊर्जावान और सम्मानित कम्युनिस्ट है। लेकिन भ्रष्ट जीवनशैली, सुविधापरस्ती, नौकरशाही और मध्यमवर्गीय अवगुणों ने उसे महत्वकांक्षी, स्वार्थी और जनता से अलगाव जैसे दुर्गुणों से भर दिया। इसके चलते वह क्रान्ति के प्रति वफादार नहीं रहा। ग्लीब अपने लोगों की जरूरतों और कारखाना शुरू करने के सिलसिले में बडिन से मिलने जाता है तो उन दोनों की सोच के बीच का अन्तर साफ जाहिर होता है। लेखक कहता है, “दो ताकतें–– एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और मजदूर चुमालोव। दोनों शक्तियों में टकराव हुआ और एक चिंगारी चमकी! इस आदमी की आँखों के पीछे क्या जल रहा था? एक जानवर? एक नायक? एक जलन भरा पुरुष ?

चैयरमेन बडिन लकड़ी आपूर्ति, डाकुओं, कज्जाकों आदि तात्कालिक मुद्दों पर अपना बुद्धिमत्तापूर्ण पक्ष रखता है, लेकिन वह ग्लीब की कारखाना शुरू करने की योजना को बेतुकी और तात्कालिक जरूरत के हिसाब से गलत बताता है।

ग्लीब चुमालोव कहता है कि “तुम छोटे सवालों में इतने व्यस्त हो, कॉमरेड चैयरमेन कि बड़े मुद्दों को नजरअन्दाज कर रहे हो। तुम पिस्सुओं के पीछे हथौड़े लेकर दौड़ रहे हो! चलिए, मुद्दे की जड़ तक पहुँचते हैं। लाल सेना ने हजारों मील की यात्रा की और आंटांट को ध्वस्त किया, जबकि तुम्हारी छोटी सी भीड़ आलसी लोगों को बढ़ावा दे रही है। तुमने उत्पादन को फिर से बहाल करने के लिए वास्तव में क्या किया है? कुछ नहीं! सवाल को स्पष्ट रूप से, लेकिन व्यापक रूप से, तुरन्त बिना किसी देरी के उठाया जाना चाहिए।”

अपने नगर वापस आकर ग्लीब अपने लोगों को फिर से और अधिक सघनता के साथ संगठित करना शुरू करता है। जनता की एकता और सामूहिक श्रम की बदौलत रोपवे फिर से चालू हो जाता है। उसको देखकर मजदूरों के दिल उत्साह, उमंग और उम्मीद से भर जाते हैं। लेकिन सोवियत रूस अभी गृहयुद्ध की आग में जल रहा था। कज्जाकों और डाकुओं का खतरा मजदूरों पर लगातार बना रहता था और अचानक कज्जाकों ने मजदूरों पर हमला कर दिया। ग्लीब के सच्चे नेतृत्व में मजदूरों ने कज्जाकों को शिकस्त दी। इससे जनता में फिर से उत्साह भर गया, एक बार फिर जनता की एकता स्थापित हो गयी। कारखाने की चिमनियों से फिर धुआँ उठा। और अब सबसे महत्वपूर्ण बात–जनता, मेहनत की गड़गड़ाहट, पहियों की पंखदार उड़ान, उस रात कारखाने की आँखें बिजली के चाँद की तरह खुल गयी और कामगारों के घरों में फ्यूज बल्बों के उलझे हुए धागे फिर से जल उठे। ग्लीब यह सबकुछ देखकर पूरे उत्साह से झूम उठा। वह अपने साथियों से निरन्तर गतिशील रहने, कठोर श्रम करने और संघर्ष करने का आह्वान कर रहा था। उसने कहा,

“कामरेड, सुनो! श्रम के लिए बलिदान, हमारी एकजुट ताकत के साथ, कोई आँसू या सिसकियाँ नहीं! हमारे हाथों की जीत–– कारखाना। हम जीत गये––––हम आग और मशीनों से अपनी आवाज बुलन्द करेगें। मजदूरों के गणतंत्र के निर्माण का महान कार्य–– हम खुद, हमारा मस्तिष्क और शरीर––—संघर्ष का खून और पीड़ा–– ये पूरी दुनिया को जीतने के लिए हमारे हथियार हैं। अब इसे जाने दो, कॉमरेड!” और ग्लीब ने स्थापित कर दिया कि जनता ही सबसे महत्वूर्ण और ताकतवर होती है।

सोवियत संघ में चल रहे इस ऐतिहासिक बदलाव को पूँजीपति वर्ग बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। वह तोड़–फोड़ की कार्रवाई लगातार कर रहा था। मजदूर वर्ग के नेता–कार्यकर्ता अभी अनुभवहीन थे जो धीरे–धीरे अनुभव हासिल करते हुए आगे बढ़ रहे थे। ग्लीब और उसके साथियों में समाजवादी सपने के प्रति गहरा लगाव था। वे बहादुरी और साहस के साथ दुश्मनों का खात्मा कर रहे थे। वे खुद भी रूपान्तरित हो रहे थे और विरोधी सोच के लोगों को भी रूपान्तरित करते जा रहे थे। एक बातचीत के दौरान ग्लीब की महिला साथी पोलिया कहती है–– “अहा, यह बात तुम्हें छू गयी, है न? हाँ और यही तुम्हारी प्यारी नयी आर्थिक नीति है–– तुम इसे शुरू करने की कोशिश करो! रियायतें, रेस्तरां, बाजार–– कुलक, षडयंत्रकारी, सट्टेबाज,—मुझे लगता है कि तुम मुझे कामगारों की कोऑपरेटिव कमेटियों के बारे में कुछ सांत्वना देने वाली बात बताओगे? फूड टैक्स कोऑपरेटिव्स––—शायद यह जरूरी है। लेकिन पीछे हटना नहीं, ग्लीब, ऐसा नहीं! कुछ भी हो लेकिन यह सब नहीं! अमर क्रान्ति के लिए वीरतापूर्ण कारनामें! यही हम चाहते हैं! पूरी गम्भीरता से एक सार्वभौमिक आग जलानाय जीते हुए पदों को छोड़ना नहीं, बल्कि नये स्थानों पर कब्जा करना। बस इतना ही!” उसने जो कहा था अब ग्लीब उस पर विचार करता रहा।

अलग–अलग उतार–चढ़ाव से होता हुआ, कारखाना शुरू हो जाता है। सामूहिक श्रम की भूमिका अपना रंग दिखाने लगती है। अलगाव में पड़ा क्रान्ति विरोधी इंजी– कलेस्त अपनी पूरी ताकत से कारखाने के काम में जुट जाता है। उसका रूपान्तरण हो जाता है। उसे अपने पुराने मध्यमवर्गीय व्यक्तित्व के घिनौनेपन का अहसास होता है। उसने ग्लीब का हाथ दबाया और अपनी आत्मालोचना करते हुए कहा, “चुमालोव मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुम उस भयानक अपराध को भूल जाओ जो मैंने तुम्हारे और अन्य कामगारों के प्रति किया था। वह याद, जिसने लोगों को मौत और यातना के हवाले कर दिया था, मुझे परेशान करती रहती है।”

ग्लीब ध्यान से उसकी ओर देखते हुए कहता है कि “कॉमरेड टेक्नोलॉजिस्ट, वह बहुत पहले की बात है–– अब वह अतीत है। उन दिनों हम दोनों एक–दूसरे से लड़ते–झगड़ते थे। लेकिन बस एक बात याद रखना–– अगर तुमने उस समय मेरी पत्नी को नहीं बचाया होता, तो अब उसकी हड्डियाँ भी नहीं बचती। अब तुम हमारे सबसे अच्छे कामगारों में से एक हो–– एक शानदार बुद्धि और सोने के हाथ। तुम्हारे बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। देखो, हमने तुम्हारे मार्गदर्शन में कितना बढ़िया काम किया है।”

ग्लीब की बात सुनकर कलेस्त के दिल में उत्साह भर जाता है। वह भरी आवाज में कहता है, “डियर चुमालोव, मैं अपना सारा ज्ञान और अनुभव–– अपना पूरा जीवन–– अपने देश को समर्पित करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। मेरा जीवन आप सभी के साथ जुड़ा हुआ है और मेरा एकमात्र कार्य एक नयी संस्कृति का निर्माण करने के लिए हमारा सामूहिक संघर्ष है।” ग्लीब इंजी– कलेस्त को कहता है कि चलो कॉमरेड हम दोस्त बनते हैं।

पार्टी शुद्धीकरण के बाद से ही दाशा अब घर पर नहीं सोती थी। उसने ग्लीब को स्पष्ट तौर पर बता दिया था कि “ग्लीब तुम्हें खुद के और समाजवादी भविष्य के लिए और अधिक आत्म–संघर्ष, रूपान्तरण और मेहनत करने की जरूरत है।” इसके बाद वह दोनों अब अलग–अलग रहने लगे थे। दाशा पोलिया के साथ रहने लगी थी। नन्ही नूरका अब इस दुनिया में नहीं रही थी। भूख की तड़प ने उसे निगल लिया था। यह सबकुछ इतना भयावह था कि ग्लीब के दिलो–दिमाग में इसकी बहुत ही दुखद और वीभत्स तस्वीर छप गयी थी। दाशा ने कहा था कि ग्लीब यदि तुम स्वयं के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष करते रहे, मजदूर वर्ग के साथ उसके सपने के प्रति यूँ ही जुझारू संघर्ष करते रहे, तो हम एक दिन जरूर मिलेंगे और दुनिया की सबसे मजबूत एकता कायम करंेगे।

ग्लीब अब मजदूर वर्ग का और अधिक ताकत के साथ नेतृत्व कर रहा था। वह रात–दिन की परवाह किये बगैर मजदूरों के बीच जाता और उन्हें और अधिक उत्साह और ताकत के साथ काम करने को प्रेरित करता। लेनिन की शिक्षा को आत्मसात करने के लिए संघर्ष करता और समाजवादी समाज के निर्माण के विचार को मजदूरों के बीच स्थापित करता। ग्लीब कहता है कि “हमने गृहयुद्ध के मोर्चे पर विजय प्राप्त की है, हम आर्थिक मोर्चे पर भी विजय प्राप्त करंेगे।”

उपन्यास के अन्त में ग्लीब कारखाना शुरू करने के उत्साह को बढ़ाते हुए, बहुत ही जोशीला और शानदार वक्तव्य देता है। वक्तव्य के अन्त में वह मन ही मन खो जाता है और एक जीवन्त तस्वीर उभर कर पाठक के सामने आ जाती है। उसकी आँखों के सामने समाजवादी भविष्य तैरने लग जाता है––

“ग्लीब को याद आया, जैसे कि एक सपने में, उसने कैसे एक लाल झण्डा पकड़ा था और भीड़ के ऊपर तीन बार लहराया था। पहाड़ धातु की गड़गड़ाहट से गूँज उठे और हवा ध्वनि के एक पागल भँवर से हिल गयी। सायरन चिल्लाये–– एक, दो, तीन! सभी एक साथ, असंगत रूप से, कान के पर्दे फाड़ते हुए। उनकी चीखें हूटर से नहीं, बल्कि पहाड़ों, चट्टानों, भीड़, कारखानों की इमारतों और धुएँ की चिमनियों में से आ रही थीं। असंख्य भीड़ सायरन के साथ चिल्लायी और गरजी। वे ऊँचे मंच के नीचे, चट्टानों और पहाड़ी ढलानों पर नाच रहे थे और उछल रहे थे। बैनर आग के पंखों की तरह चमक रहे थे और बैण्ड हजारों बड़ी घण्टियों की तरह बज रहे थे।” उपन्यास का अन्त शानदार, रोचक और उत्साह से भरा हुआ है। पाठक को समाजवाद के प्रति प्रेम और उस सपने को पूरा करने के लिए अथक संघर्ष की प्रेरणा से भर देता है।

लेखक ग्लादकोव ने बहुत की शानदार, जीवन्त, सौन्दर्य से लैस समाजवादी यथार्थवाद की शैली मंे इस उपन्यास को लिखा है। कई जगह वाक्य अधिक लम्बा होने के कारण पाठक को फिर से पढ़ने की जरूरत पड़ जाती है, किन्तु ऐसा करना पाठक को कोई मुश्किल काम के बजाय उस भाव को पूरा समझने की जिज्ञासा से भर देता है। उपन्यास का जितना अधिक विस्तार है, उसकी सरलता भी उतनी ही अधिक है। अनुवादक रामपाल ने इतने सहज और सरल अन्दाज में उपन्यास का अनुवाद किया है कि एक–एक चरित्र का भाव बिल्कुल स्पष्ट होकर पाठक के सामने उभर जाता है। वे सचमुच अपने शानदार अनुवाद के लिए बधाई के पात्र हैं। सम्पादक दिगम्बर के प्रति मैं तहे दिल से आभार प्रकट करना चाहता हूँ जो इस रोचक और शानदार उपन्यास को हम सबके बीच लेकर आये। उनसे बातचीत के बाद ही मुझे इसकी भूमिका लिखने का इतना महत्वपूर्ण और प्यारा काम करने की प्रेरणी मिली। गार्गी प्रकाशन को मैं धन्यवाद देता हूँ, जो इस अँधेरे दौर में हमें अपने प्रगतिशील साहित्य से सच और हक की राह दिखा रहा है।