(साम्राज्यवादी व्यवस्था का ढाँचागत संकट दुनिया भर की मेहनतकश जनता को दर–ब–दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर रहा है।)

अफ्रीका, मध्य–पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के देशों की बहुत बड़ी आबादी दर–ब–दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। यानी औपनिववेशिक और नव–औपनिवेशिक देशों की मेहनतकश आवाम आज भी साम्राज्यवादी हिंसा, गृह युद्ध, नस्लीय, जातीय हिंसा और विस्थापन का दर्द झेल रही है। आज दुनिया भर में लगभग 11 करोड़ 70 लाख लोग अपने–अपने देशों से उजड़कर रोजी–रोटी की तलाश में भटक रहे हैं। इनमें लगभग 12 फीसदी लोग उत्तरी अफ्रीका और मध्य–पूर्व के हैं। इन आँकडों में फिलिस्तीन के वे लाखों लोग शामिल नहीं है जो 1948 से इजराइली यहूदीवाद के शिकार होकर उजड़ गये।

हर जगह विस्थापित लोगों का एक जैसा नजारा दिखायी देता है। ट्रकों, खच्चरों, बुग्ग्यिों आदि में अपना जरूरी सामान लेकर कहीं और बसने की उम्मीद चले जाते हैं। ठिकाना मिलने पर शरणार्थी शिविरों में दिन काट लेते हैं जहाँ जरूरत की सभी चीजों का बहुत अभाव होता है। अपनी जड़ और जमीन से उजड़ने की पीड़ा बड़ी भयानक होती है। उसकी रोजी–रोटी के साधन तो छिन जाते ही हैं, उसकी पहचान भी खो जाती है। शरणार्थी शिविरों में रहना भी कोई आसान बात नहीं है। गर्भवती महिलाओं से लेकर नवजात शिशु, बच्चे, बीमार, बूढ़े–बुजुर्ग, नौजवान लड़के–लडकियाँ सबकी अपनी–अपनी समस्याएँ होती हैं, जिनका कोई समाधान वहाँ उपलब्ध नहीं होता है। महिलाओं और बच्चों का भविष्य अन्धकार में होता है।

विस्थापित लोगों का कोई देश नहीं होता क्योंकि इन्हें  अपने देश वापसी की उम्मीद नहीं होती। उनकी नागरिकता खत्म हो जाती है। सरकारें इनको घुसपैठिया कहकर इन पर हमला करती हैं। जैसे–– भारत में म्याम्यार के विस्थापित रोहिग्या मुसलमानों को घुसपैठिया कहा जाता है। वे डर के साये में जिन्दगी जीते हैं। वे जिस देश की सीमा के करीब होते हैं स्थानीय निवासियों की भीड़ इन पर हमला करती है। इससे उनकी जानें जाती हैं और लोग गम्भीर रूप से घायल होते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार 55 फीसदी विस्थापित लोग भयावह मनोरोग के शिकार हैं। सामान्य रोगों से पीड़ितों की संख्या तो अनगिनत है। इसके अलावा इनमें शामिल बच्चों के लिए दूध, भोजन, सब्जी आदि पोषक पदार्थों के मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। अकेले गाजा में 80 फीसदी से अधिक विस्थापित लोग भयावह गरीबी की मार झेल रहे हैं। वे लोग भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा, अज्ञानता, धार्मिक भेदभाव, साम्प्रदायिक और नस्लीय हिंसा, गरीबी, लाइलाज बीमारियाँ अपनी जिन्दगी के हिस्सों की तरह झेल रहे हैं।

साम्राज्यवादी संघर्षों और हिंसक युद्धों से विस्थापित लोगों की संख्या हर साल लगातार बढ रही है। 2023 की तुलना में इस साल विस्थापित लोगों की संख्या लगभग 8 फीसदी तक बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेन्सी की रिपोर्ट है कि संघर्ष से सम्बन्धित मौतों की संख्या हर साल विस्थापित लोगों की संख्या के लगभग बराबर है। जबरन विस्थापन की सबसे बड़ी संख्या वाले तीन देश सूडान, फिलिस्तीन और म्यांमार वर्तमान में सशस्त्र संघर्ष की मार झेल रहे हैं।

कई देश अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों का विरोध करते हैं। उनको अमरीका द्वारा गरीब, भूखा और कमजोर करने की कोशिश की जाती है। इसके लिए बलपूर्वक और एकतरफा उपायों या प्रतिबन्धों का सहारा लिया जाता है। अब तक अमरीका ने लगभग 39 देशों और क्षेत्रों पर इन उपायों को एकतरफा लागू किया है। आर्थिक प्रतिबन्ध साम्राज्यवादी युद्ध का ही एक पहलू है, क्योंकि इनसे युद्ध के बराबर जान–माल का नुकसान होता है।

साम्राज्यवादी अमरीका औपनिवेशिक और नवऔपनिवेशिक देशों की जनता को युद्ध, गरीबी, भुखमरी, डर, अपराध, और विस्थापन में धकेल रहे हैं। इससे जनता की जीवन प्रत्याशा गिर रही है। भयावह असमानता पर आधारित मौजूदा साम्राज्यवादी व्यवस्था टिकाऊ नहीं है। इसका अन्त करीब है। दुनिया की प्रगतिशील ताकतों को एकजुट होकर जनता की चेतना को उन्नत करना होगा। जनता साम्राज्यवादी व्यवस्था को जरूर उखाड फेंकेगी और इसकी जगह एक मानव केन्द्रित व्यवस्था जरूर स्थापित करेगी।

–सोनू पवांर