अमरीका के आगे घुटने टेकने की कीमत कौन चुका रहा है?
राजनीतिक अर्थशास्त्र अमित इकबालभाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव और मौजूदा सरकार का प्रमुख वैचारिक चेहरा राम माधव ने भारत पर अमरीकी दबाव को खुलेआम स्वीकार किया। मौका था, 24 अप्रैल 2026 अमरीका के हडसन इंस्टिट्यूट में आयोजित बहस का। उन्होंने कहा कि अमरीकी दबाव के चलते “भारत ने ईरान से तेल खरीदना बन्द कर दिया है। विपक्षी पार्टियों की कड़ी आलोचना के बावजूद रूस से भी तेल खरीदना बन्द कर दिया है। ज्यादा विरोध के बिना ही भारत ने अमरीका द्वारा थोपा 50 प्रतिशत सीमाशुल्क भी कबूल किया था।”
भाजपा सरकार लगातार इस बात से इनकार करती रही है कि वह अमरीका के दबाव में काम कर रही है, जबकि विपक्ष और इन्साफपसन्द जनता हमेशा उस पर ऐसा आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में भाजपा के महत्वपूर्ण चेहरे द्वारा इसकी स्वीकारोक्ति के बाद राजनीतिक गलियारे में हलचल तो मचनी ही थी। हालाँकि, हर महत्वपूर्ण मामलों की तरह किरकिरी होते देख वे पलटी खा गये। 2 मई को इंडियन एक्सप्रेस अखबार में उन्होंने सफाई भी पेश की कि मेरे पिछले बयान में कुछ तथ्यगत कमियाँ थीं। लेकिन इस सफाई के बावजूद सच सभी जानते हैं और भारत सरकार की जो दयनीय तस्वीर उन्होंने पेश की थी, वह नहीं बदलने वाली।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से लेकर तमाम अमरीका परस्त मीडिया ने तथ्यों के साथ यह बात बेहतर ढंग से उजागर की है कि भारत वाकई अमरीकी चैधराहट के आगे घुटने टेक चुका है।
भारत और अमरीका के बीच फरवरी 2025 में जिस व्यापार समझौते और “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” को आगे बढ़ाया गया, उसने भारतीय विदेश नीति और आर्थिक स्वायत्तता पर गम्भीर बहस खड़ी कर दी। सरकार इसे “राष्ट्रीय हित”, “वैश्विक निवेश” और “नयी तकनीकी साझेदारी” का नाम देती है, लेकिन यह सम्बन्ध बराबरी का नहीं बल्कि दबाव और समर्पण का नतीजा है। सवाल केवल व्यापार का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या भारत अपनी विदेश नीति, ऊर्जा नीति और औद्योगिक नीति को स्वतंत्र रूप से तय कर पा रहा है या नहीं।
इस समझौते का मतलब सिर्फ इतना ही नहीं था कि भारतीय माल को अमरीकी बाजार में घुसने के लिए 18 प्रतिशत सीमाशुल्क देना पड़ेगा। इस समझौते में भारत ने 500 अरब डॉलर का अमरीकी सामान जिसमें तेल से लेकर हवाई जहाज, बेशकीमती धातु और कृषि उत्पाद तक शामिल हैं, खरीदने का भी वादा किया है। यह फैसला ‘मेक इन इण्डिया’ के बजाय ‘सेल इन इण्डिया’ को बढ़ावा देगा। इससे भारत के छोटे उत्पादकों को कैसे मदद मिलेगी? वे तो उजड़ जायेंगे।
संयुक्त किसान मोर्चा के अनुसार, अमरीका में कृषि भारी सरकारी सब्सिडी पर चलती है, जबकि भारत में करोड़ों छोटे और मझोले किसान पहले से कर्ज, महँगी लागत और एमएसपी की गारण्टी न होने की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में अगर अमरीकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में कम शुल्क पर आते हैं, तो भारतीय किसान उनकी कीमतों से मुकाबला नहीं कर पाएँगे। इस तरह व्यापार समझौते के जरिये भारतीय कृषि को अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले किया जा रहा है। अमरीकी गेहूँ, सोयाबीन तेल, कपास, डेयरी उत्पाद, फल और पशु चारा भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर आयेंगे। इससे भारतीय फसलों के दाम गिरेंगे और किसानों की आमदनी और घटेगी। छोटे किसान, जिनकी संख्या भारत में 86 प्रतिशत से अधिक है, कॉरपोरेट खेती और आयातित माल के सामने टिक नहीं पाएँगे।
इस व्यापार समझौते का एक उद्देश्य यह भी है–– भारत को अमरीका अपने आर्थिक और सामरिक ढाँचे में अधिक गहराई से जोड़ना चाहता है, ताकि चीन और रूस के खिलाफ एक स्थायी धुरी बनायी जा सके। समझौते के बाद रूस से तेल खरीद में आयी 39 प्रतिशत कमी इसी ओर इशारा करती है। एक साल पहले, रूस बाजार दर से 13 डॉलर प्रति बैरल सस्ता तेल भारत को बेचता था और अब बाजार दर से 4–5 डॉलर महँगा बेचता है। भारत वास्तव में स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता, तो वह अपने ऊर्जा स्रोतों का फैसला केवल अपनी आर्थिक जरूरतों के आधार पर करता, न कि अमरीका के दबाव में।
रूस से तेल खरीदने में भारत सरकार ने रिलायंस ग्रुप को ही आगे किया, सरकारी कम्पनी इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम या हिन्दुस्तान पेट्रोलियम को नहीं। ध्यान रहे कि अमरीका परस्त नीतियों के चलते भारत ईरान से भी दूरी बना चुका है। इसके चलते अमरीका–ईरान युद्ध के समय भारत को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी गैस की किल्लत हुई और उनकी कीमतें बढ़ा दी गयीं। कई राज्यों में चुनाव खत्म होने बाद दाम और बढ़ाये जायेंगे।
इसके बावजूद सरकार बोल रही है कि गैस और तेल की आपूर्ति में कोई किल्लत नहीं है। लेकिन गैस सिलिण्डर की बुकिंग लगातार टलते रहना, बुकिंग सेंटर के सामने लम्बी कतार और प्रवासी मजदूरों की गैर–बुकिंग गैस का महँगा होना सरकार के झूठ को बेनकाब कर रहे हैं। तमाम चीजों की महँगाई में बढ़ातरी से जनता बदहाल है।
खाड़ी के देशों में मेहनत–मजदूरी कर रहे लगभग 5 करोड़ भारतीय देश के विदेशी मुद्रा भण्डार में बड़ा योगदान करते हैं। लेकिन ईरान पर हमले के चलते उस पर संकट छाया हुआ है। ऐसे में अमरीका के पास मौका था अपने कर्ज के संकट से उबरने के लिए भारत जैसे जी–हुजूरी करने वाले देश को आसान शिकार बनाना और उसने बनाया भी।
भारत में मजदूर विरो/ाी और पर्यावरण का नाश करने वाली नीतियाँ भी अमरीकी आकाओं का हुक्म बजाने और मन लुभाने के चक्कर में बनायी जा रही हैं। विदेश मंत्री यूट्यूब में कितना ही हाजिर जवाबी कर लें लेकिन भारत की सार्वभौमिकता को बरकरार रखने में वो और उनकी सरकार नाकाम हैं। अन्तरराष्ट्रीय राजनीति यूट्यूब का रील नहीं है जिसमें वह आक्रामक आँखे दिखाकर और कुतर्क करके किसी को चुप करा सके।
रक्षा क्षेत्र में भी अमरीकी प्रभाव तेजी से बढ़ा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक देशों में रहा है। पहले रूस उसका प्रमुख रक्षा साझेदार था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अमरीका से हथियार और रक्षा तकनीक खरीद में भारी वृद्धि हुई है। सरकार इसे “आधुनिकीकरण” और “रणनीतिक सहयोग” बताती है, लेकिन इससे भारत की सैन्य निर्भरता का चरित्र बदल रहा है–– रूसी निर्भरता की जगह अमरीकी निर्भरता बढ़ रही है। अमरीकी हथियारों के साथ शर्तें, तकनीकी नियंत्रण और राजनीतिक दबाव भी आते हैं। रक्षा सौदों के जरिये अमरीका केवल बाजार नहीं बनाता, बल्कि देशों की विदेश नीति पर भी प्रभाव जमाता है।
ट्रम्प और मोदी के बीच व्यक्तिगत मित्रता को बार–बार प्रचारित किया गया। बड़े–बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में दोनों नेताओं ने एक–दूसरे की खुलकर तारीफ की। लेकिन यह भारत की कूटनीति कम और राजनीतिक आत्म–समर्पण ज्यादा है। अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में मित्रता स्थायी नहीं होती, केवल हित स्थायी होते हैं। यहाँ तो मित्रता है भी नहीं क्योंकि बार–बार ट्रम्प ने अपने भारत विरोधी बयानों से प्रधानमन्त्री मोदी को शर्मशार किया है, लेकिन मोदी जी ने कोई जवाब नहीं दिया। ऐसे में अमरीका के आगे घुटने टेकना भारत के राष्ट्रीय हितों को कमजोर करता है।
इसके अलावा, भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहन नीति में बदलाव कर विदेशी कम्पनियों, खासकर टेस्ला, के लिए रास्ता आसान किया। इसमें आयात शुल्क में रियायत और स्थानीय उत्पादन की शर्तों में लचीलापन शामिल है। इससे भारतीय ऑटो उद्योग पर दबाव बढ़ेगा और घरेलू कम्पनियों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा पैदा होगी। भारत में उद्योग नीति का उद्देश्य घरेलू उत्पादन क्षमता और रोजगार को बढ़ाना होना चाहिए, न कि विदेशी कॉरपोरेट कम्पनियों के लिए बाजार खोलना।
इस बेशर्म आत्म–समर्पण का ही नतीजा है कि दिल्ली राजधानी क्षेत्र में तमाम असंगठित मजदूर अपनी वेतन बढोतरी, काम की बेहतर परिस्थिति के लिए लड़ने को मजबूर हो गये हैं। अन्तरराष्ट्रीय पूँजी के सरगना अमरीका को खुश करने के चक्कर में मौजूदा सरकार पिछले कई साल से लगातार जन–विरोधी कृषि कानून और श्रम कानून बनाने पर आमादा है। उधर अमरीका ने सितम्बर 2025 में एच1बी वीजा के आवेदन की फीस 4500 डॉलर से बढ़ाकर 1,00,000 डॉलर कर दी। इसके चलते इनफोसिस, टीसीएस, विप्रो जैसे आईटी क्षेत्र की कम्पनियों की हालत खराब है क्योंकि इनकी वार्षिक आय का एक बड़ा हिस्सा अमरीकी कारोबार से ही आता है। हाल में ओरेकल ने भारत में ही 12 हजार आईटी कर्मचारियों की छँटनी की है। भारत का श्रम कानून पहले से ही इन कम्पनियों के हित में होने के चलते ऐसे कर्मचारियों के बोलने या कुछ कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार भी हमारे पास नहीं है।
भारत ने फिलिस्तीन के मामले में भी अमरीकी दबाव का सामना किया। वह राष्ट्रसंघ में मतदान में अनुपस्थित रहा और पिछले एक–डेढ़ साल से खुलकर इजराइल के पक्ष में बोल रहा किया है। यहाँ तक कि ईरान पर इजराइली हमले से महज दो दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी इजराइल की संसद में गये। उस नेतान्याहू से दोस्ती का इजहार किया जो अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय द्वारा घोषित युद्ध–अपराधी है और जिसके खिलाफ 2024 में गिरफ्तारी का वारण्ट जारी हो चुका है। इतना ही नहीं, श्रीमान मोदी ने इजराइल को “फादरलैण्ड” की उपाधि भी दे दी। एक घोषित युद्ध–अपराधी से इतना प्रेम? इस बात से देश और दुनिया में उनकी बहुत किरकिरी हुई।
भारत–अमरीका व्यापार समझौते का असली लाभ अमरीकी कृषि–कॉरपोरेट, हथियार कम्पनियों और बड़े भारतीय कॉरपोरेट घरानों को मिलेगा, जबकि नुकसान ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मेहनतकश जनता को उठाना पड़ेगा। अमरीका के आगे घुटने टेकने की कीमत सबसे ज्यादा देश के किसान, मजदूर, छोटे उत्पादक, बेरोजगार युवा और आम उपभोक्ता चुका रहे हैं–– यही बात संयुक्त किसान मोर्चा, मासा, ट्रेड यूनियनों और कई जन–संगठनों ने लगातार उठायी है। इन संगठन ने इसे “ऐतिहासिक धोखा”, “पूरा आत्म–समर्पण” और “आर्थिक औपनिवेशीकरण” तक कहा है।
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