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“संस्कृत कूप जल, भाखा बहता नीर”: विचार हवा में नहीं बनते

एक बिलकुल अप्रसिद्ध लेखक ने संस्कृत और लोक भाषा के विरोधाभाष पर एक लेख लिखा। उसका लेख शैली की दृष्टि से बेहद सफल है। उसका यह तर्क है कि कबीर की उपमा "संस्कृत कूप जल, भाखा बहता नीर" बेहद समीचीन है। इसे लेखक ने ठीक वैसे ही इस्तेमाल किया है जैसे शरीर में कोलेजन काम करता है जो बनता और टूटता रहता है। कूप का जल स्थिर है, पर बहता नीर गतिशील और जीवंत है। उसने हनुमान के प्रसंग वाला सुंदरकांड का श्लोक-- "यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम्” का उपयोग बहुत प्रभावी ढंग से किया है जिसमें सिद्ध करने की कोशिश की है कि संस्कृत कभी आम बोलचाल की भाषा नहीं थी, यह विशिष्ट वर्ग तक सीमित थी। लेकिन यह प्रसंग खुद में प्रतिक्रियावादी है। हजारीप्रसाद द्विवेदी के परंपरा-प्रवाह के विचार को नदी के तट और जल से समझाना बहुत सुंदर है।

लेख संस्कृत को केवल "पंडितों तक सीमित" कहता है। जबकि संस्कृत भी अपने समय में कभी लोकभाषा के करीब थी जो आज जनता से बिलकुल कट गयी है। जैसे अंग्रेजी केवल विद्वानों की भाषा नहीं है। वह इंगलैंड की लोकभाषा है। लेख द्विभाषिक स्थिति को ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में दिखाता है। व्यवहार में हिंदी अक्सर दूसरी भाषाओं के शब्दों को लेकर सहिष्णु बनी है। लेख इस अंतर्विरोध “शुद्धतावाद बनाम बहता नीर” पर चुप है जिस पर हिंदी साहित्य में काफी बहस चली है।

इस लेख में रामायण के उदाहरण से जो बात कही गयी है, वह लेख को बेहद कमजोर और प्रतिक्रियावादी बना देती है क्योंकि रामायण मिथ है, इतिहास नहीं। उसे तथ्य के रूप में प्रयोग करना अवैज्ञानिक है। लेखक ने इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रखा कि भारत के इतिहास में कई गौरवशाली और प्रेरणादायी उदाहरण हैं, लेकिन आरएसएस और भाजपा द्वारा 'राम राज्य' को प्रमुखता देने के पीछे गहरे सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं। हम सभी जानते हैं कि आरएसएस और भाजपा की विचारधारा 'हिंदुत्व' और उग्र सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित है जिसे हिंदुत्ववाद कहते हैं। इस विचारधारा के तहत वे भारत के गौरव को उसकी प्राचीन जड़ों और प्रतीकों से जोड़ते हैं, जिनमें राम और राम-राज्य सबसे प्रमुख हैं। यहाँ लेखक आसानी से आरएसएस और भाजपा के प्रतिक्रियावादी प्रोपगेंडा का शिकार खुद को हो जाने देता है।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार और कई आधुनिक विचारकों ने रामायण और राम राज्य की इस आधार पर तीखी आलोचना की है कि जन्म-आधारित वर्ण व्यवस्था, पितृसत्ता और लैंगिक असमानता को हिन्दू परम्परा में गौरवशाली मान्यता दी गई है।

एक बात और, तुलसी और कबीर में मेल-मिलाप कराना एक असंभव और अवैज्ञानिक कोशिश है। यह वर्ग-संघर्ष को धुंधला करना है। मार्क्सवादी साहित्य आलोचक रामविलास शर्मा के अनुसार, कबीरदास जनवादी-विद्रोही चेतना के प्रतीक हैं। वे निर्गुण, जाति-तोड़क और सामंती व्यवस्था पर सीधा हमला करते हैं। जबकि तुलसीदास सामंती, वर्णाश्रम-धर्म के समर्थक और यथास्थितिवादी चेतना के प्रतीक हैं-- “पूजिय विप्र सकल गुन हीना” जैसी पंक्तियों को लिखा है। दोनों दो अलग-अलग वर्ग-चेतना और दो अलग-अलग भौतिक परिस्थितियों की उपज हैं। इनमें दो विरोधी विचारों का संघर्ष है, जो इतिहास को आगे ले जाता है। इसलिए उक्त लेखक ने इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं में भाषा पर बहस के जरिये जबरदस्ती समन्वय बैठाने की कोशिश किया है।

ऐसा व्यक्ति द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को न समझकर भाववाद के स्तर पर सोचता है। वह यह भूल जाता है कि विचार हवा में नहीं बनते, भौतिक वर्ग-हितों से बनते हैं। ऊपर से मेल-मिलाप कराकर वह असल में शोषक वर्ग के हित में काम करता है और जनता में मिथ्या चेतना पैदा करता है, ताकि कबीर के क्रांतिकारी चेतना की धार कुंद हो जाए। अनजाने में व्यक्ति अक्सर उसी वर्ग के विचार ढोने लगता है जो उसके अपने हित के खिलाफ होते हैं, क्योंकि विचार हवा में नहीं बनते, वह परिवार, धर्म, स्कूल, सिनेमा, अखबार और भाषा में पहले से मौजूद होते हैं।

उदाहरण के लिए सामंती विचारों को देखो। एक गरीब या मध्यम वर्ग का व्यक्ति खुद मेहनत से जीता है, लेकिन उसके मन में यह बैठा रहता है कि मालिक भगवान के समान होता है, बड़े घर में जन्म लेना पिछले जन्म के पुण्य का फल है, नौकर का धर्म है मालिक की सेवा करना। वह अपनी जाति पर गर्व करता है, दूसरी जाति को छोटा समझता है, औरत को घर की इज्जत और संपत्ति मानता है जिसे नियंत्रित करना जरूरी है, भाग्य और किस्मत पर ज्यादा भरोसा करता है कि मेहनत से ज्यादा नसीब काम करता है। ये सारे विचार सामंतवाद के हैं जहाँ जमीन और इज्जत कुछ लोगों के हाथ में थी, लेकिन आज एक साधारण व्यक्ति भी इन्हें अपनी जुबान में दोहराता है और इस तरह उसी व्यवस्था को मजबूत करता है जो उसे नीचे रखती है।

वैसे ही पूंजीवादी विचार आज सबसे ज्यादा अनजाने में ढोए जाते हैं। जैसे यह मान लेना कि दुनिया में प्रतियोगिता प्राकृतिक है, हर आदमी दूसरे का प्रतिद्वंद्वी है। सफलता सिर्फ व्यक्तिगत मेहनत का नतीजा है, इसलिए अगर कोई गरीब है तो वह आलसी या नाकाबिल है। ज्यादा सामान खरीदना, ब्रांड का कपड़ा पहनना, महंगी चीजों से अपनी कीमत दिखाना ही आधुनिक होना है। मजदूरी को शर्म की बात और बिना श्रम किये पैसों से पैसा बनाना होशियारी की बात समझना। सरकारी स्कूल, अस्पताल, पानी जैसी चीजों को भी मुनाफे की चीज बना देना सही लगता है। नौकरी में 12 घंटे खटना उसे गर्व की बात लगती है। ये सोचते हुए व्यक्ति को लगता है कि वह बहुत व्यावहारिक और आधुनिक सोच रहा है, पर असल में वह उस वर्ग की सोच दोहरा रहा है जिसके पास पूंजी है और जिसे सस्ती मेहनत और ज्यादा उपभोग से फायदा होता है।

अब अगर ऐसा व्यक्ति लेखक बन जाए तो बात और गंभीर हो जाती है। आम आदमी तो अपने विचारों को घर या मोहल्ले तक रखता है, लेकिन लेखक के पास भाषा है, कहानी है, शैली है। वह अपने जहरीले विचारों को सीधे नहीं कहता, वह उन्हें सुंदर-सजीले बना कर पेश है। सामंती सोच को वह संस्कृति, परंपरा, मर्यादा, पारिवारिक मूल्य जैसे शब्दों में लपेट देता है। पूंजीवादी सोच को वह प्रेरणा, सेल्फ-मेड, सफलता का मंत्र, पॉजिटिव थिंकिंग बना देता है। पाठक को लगता है वह साहित्य पढ़ रहा है, पर धीरे-धीरे उसकी भाषा में वही शब्द, वही उपमाएं, वही नायक-खलनायक की परिभाषा बस जाती है। जैसे वह बार-बार लिखे कि गरीब इसलिए गरीब है क्योंकि उसमें इच्छाशक्ति नहीं, या औरत की सबसे बड़ी जीत त्याग में है, या मालिक का कठोर होना जरूरी है नहीं तो मजदूर काम नहीं करते।

भाषा के जरिये यह जहर इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह तर्क पर नहीं, भावना पर हमला करता है। एक लेख अच्छी शैली लिखा गया हो तो लोग उसके विचार की जांच नहीं करते, उसकी सुंदरता में बह जाते हैं। फिर वही विचार स्कूल की किताब, फिल्म का संवाद, सोशल मीडिया की पोस्ट बनकर हजारों लोगों तक पहुंच जाता है और हमारे विरोधी शासक वर्ग को एक भी लाठी उठाए बिना वैचारिक जीत मिल जाती है।

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