जब "शिक्षक वही चाहते हैं जो बच्चों की जरूरतें हैं": शिक्षकों के श्रम और शिक्षक संघवाद में अंतर्विरोधों का समाधान
सामाजिक-सांस्कृतिक लॉइस वीनरखंड 65, संख्या 02 (जून 2013)
“शिक्षक वही चाहते हैं जो बच्चों की जरूरतें हैं-- क्या वे सचमुच यही चाहते हैं?” 'सोशलिस्ट रिवॉल्यूशन' के एक लेखक डेविड के. कोहेन ने 1960 के दशक में सामूहिक-सौदेबाजी (कलेक्टिव बारगेनिंग) के लिए संघर्ष में 'अमेरिकन फेडरेशन ऑफ टीचर्स' (एएफटी) द्वारा इस्तेमाल किए गए इस नारे पर सवाल उठाया और इसे ठुकराते हुए 1969 में शिक्षक यूनियनों की प्रगतिशील संभावना को खारिज कर दिया था।(1) यह लेख एएफटी के नारे और कोहेन के सवाल पर पुनर्विचार करता है, तथा "शिक्षक क्या चाहते हैं" और "बच्चों की क्या जरूरतें हैं" के बीच के अंतर्विरोधों की जांच करता है। अमरीकी शिक्षक संघवाद (यूनियनिज्म) का इतिहास इस तर्क की पुष्टि करता है कि जब शिक्षक यूनियनें "सामाजिक आंदोलन" (सोशल मूवमेंट) के नजरिये को अपनाती हैं और सामूहिक-सौदेबाजी के समझौतों में निहित मानकों के दायरे से आगे बढ़कर दबाव बनाती हैं, तो ये यूनियनें एक ओर अपने भौतिक हितों की रक्षा के लिए श्रमिकों के रूप में संगठित होने के शिक्षकों के अधिकार और दूसरी ओर उनके काम की विशिष्ट राजनीतिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच के अंतर्विरोधों को बहुत कम कर देती हैं।
हालाँकि पूंजीवादी जनमाध्यमों (मास मीडिया) से या जिसे अब "कॉर्पोरेट स्कूल सुधार" कहा जाता है उसकी कई आलोचनाओं से यह बात स्पष्ट नहीं होती, फिर भी दुनिया के बच्चों का भविष्य काफी हद तक शिक्षकों और उनके यूनियनों की प्रतिरोध क्षमता पर निर्भर करता है। अमेरिका में हम उस वैश्विक परियोजना के एक रूप का अनुभव कर रहे हैं जिसे वित्तीय और राजनीतिक अभिजात वर्ग ने चालीस साल पहले लातिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में स्कूल सुधार थोपकर शुरू किया था-- पहले अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा समर्थित क्रूर सैन्य तानाशाही के तहत और बाद में आर्थिक सहायता के एवज में (quid pro quo)। हालाँकि ग्लोबल साउथ (या तीसरी दुनिया-- अनुवादक) के विद्वानों और कार्यकर्ताओं ने इसका गहन दस्तावेजीकरण किया है, फिर भी यह परियोजना (और इसके खिलाफ प्रतिरोध) इस देश में अभी तक बहुत अधिक चर्चित नहीं है।(2) हालाँकि विशिष्ट स्थितियाँ एक देश से दूसरे देश में भिन्न होती हैं, लेकिन इसके कार्यक्रम का ढांचा और उद्देश्य वही है-- विद्यालयों को इस बात के नवउदारवादी नजरिये के अनुरूप ढालना कि दुनिया की क्या ज़रूरतें हैं: स्कूली शिक्षा का व्यवसायीकरण (वोकेशनललाइजेशन), शैक्षणिक क्षेत्र का निजीकरण और शिक्षण कार्य का वि-व्यावसायीकरण (डिप्रेफेशनलाइजेशन)। यह सब छात्रों, शिक्षकों और स्कूलों को मापने के एकमात्र तरीके के तौर पर स्टैंडर्डाइज़्ड टेस्ट पर निर्भरता से जुड़ा है।(3)
अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार सूचना और नीतियों को साझा करने वाले शक्तिशाली अभिजात वर्ग इस बात को समझते हैं (दुर्भाग्य से अधिकांश शिक्षकों की तुलना में बेहतर ढंग से) कि अपनी तमाम जगजाहिर समस्याओं के बावजूद, शिक्षक यूनियनें नवउदारवादी परियोजना के पूर्ण क्रियान्वयन में मुख्य बाधा हैं। जैसा कि सामान्य रूप से श्रम यूनियनों के बारे में सच है, शिक्षक संघवाद के सामूहिक कार्रवाई और एकजुटता के सिद्धांत नवउदारवादी परियोजना के मुख्य आधार-- व्यक्तिगत पहल और प्रतिस्पर्धा-- का खंडन करते हैं और उसे चुनौती देते हैं। नवउदारवादी विचारधारा "योग्यतम की उत्तरजीविता" (सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट) की मानसिकता को बढ़ावा देती है, जबकि श्रम यूनियनें यह मानती हैं कि लोगों को अपने साझा हितों की रक्षा के लिए मिलकर काम करना चाहिए। यूनियनों के खतरानाक होने का दूसरा कारण यह है कि वे संस्थागत ताकत का इस्तेमाल कर सकती हैं: संगठनों के रूप में उनके पास कानूनी अधिकार होते हैं; अपनी संस्थागत जड़ों के कारण वे एक स्थिर शक्ति होती हैं; और वे सदस्यता शुल्क (मेंबरशिप ड्यूस) का लाभ उठाने में सक्षम होती हैं, जिससे उन्हें आय का एक नियमित स्रोत प्राप्त होता है। इन खूबियों की वजह से टीचर्स यूनियनों को ऐसी सांगठनिक क्षमता मिलती है जो आमतौर पर वकालत करने वाले समूहों या माता-पिता को नहीं मिल पाती; माता-पिता तो अक्सर अपने बच्चों के साथ ही स्कूलों की गतिविधियों से हट जाते हैं। फिर भी, जिन कारकों से यूनियनें स्थिर और संभावित रूप से शक्तिशाली बनती हैं, वे ही कारक उनमें पदानुक्रम और रूढ़िवादिता को भी जन्म देते हैं। न तो संगठन के रूप में यूनियनें और न ही व्यक्तियों के रूप में यूनियन सदस्य उन पूर्वाग्रहों से अछूते हैं जो समाज को संक्रमित करते हैं, भले ही ये पूर्वाग्रह कार्यस्थल पर समानता के यूनियन के सिद्धांतों के विपरीत हों।
हालाँकि पापुलर मीडिया शिक्षक यूनियनों को बहुत शक्तिशाली के रूप में चित्रित करता है, लेकिन अधिकांश मामलों में यूनियनें वहाँ कमजोर होती हैं जहाँ यह सबसे अधिक मायने रखता है-- यानी स्कूल के स्तर पर। यूनियन के पदाधिकारी और कर्मचारी अक्सर भटके हुए और भ्रमित नजर आते हैं। शिक्षकों और शिक्षक यूनियनों के खिलाफ सुनियोजित और भारी धन से वित्तपोषित दुष्प्रचार अभियान ने यूनियनों की विश्वसनीयता को और यहाँ तक कि खुद शिक्षकों के बीच भी शिक्षक संघवाद के विचार को भारी आघात पहुँचाया है। दुर्भाग्य से, शिक्षक यूनियनों ने अपनी वैधता को खत्म किए जाने (डिलीजिटिमेशन) के खिलाफ मुकाबले में खुद को इसलिए बिना हथियारों के कर लिया है क्योंकि उन्होंने यूनियन संगठन के "व्यावसायिक" (बिज़नेस) या "सेवा" मॉडल को अपना लिया है। दशकों से अमेरिकी यूनियनों में हावी रहा यह मॉडल उन्हें एक ऐसे व्यवसाय के रूप में ढालता है जो सदस्यों को सेवाएं प्रदान करने के लिए अस्तित्व में है-- जिसमें कार बीमा पर कम दरें, कल्याण कोष (वेलफेयर फंड) से लाभ, पेंशन सलाह, अनुबंध पर बातचीत और शायद कोई शिकायत दर्ज करना शामिल है। पदाधिकारी और कर्मचारी सदस्यों की ओर से निर्णय लेते हैं। किसी अनुबंध पर मतदान करने और हर कुछ वर्षों में अधिकारियों का चुनाव करने के अलावा, सदस्य पूरी तरह निष्क्रिय होते हैं। उनका कर्तव्य केवल बकाया शुल्क (ड्यूस) का भुगतान करना और नेतृत्व की विशेषज्ञता को स्वीकार करना होता है। चूंकि सेवा मॉडल इस मान्यता पर आधारित है कि सदस्य अधिकारियों पर निर्भर रहें, इसलिए इसमें भागीदारी न्यूनतम होती है और इस तरह नेता आसानी से एक गुट में तब्दील हो जाते हैं-- जो अक्सर रक्षात्मक और संकीर्ण (इंसुलर) होता है।
1992 में नवउदारवादी शिक्षा परियोजना के -- जो कि पीछे मुड़कर देखने पर उसका पहला दौर था -- जवाब में, उदारवादी शिक्षाविदों, प्रगतिशीलों, शिक्षा कार्यकर्ताओं और कुछ यूनियन अधिकारियों ने यह तर्क दिया था कि शिक्षक यूनियनों को शिक्षा में "उत्कृष्टता" और "जवाबदेही" की माँगों पर ऐसी मुद्रा अपनाने से बचना चाहिए जिससे वे "औद्योगिक यूनियनों" जैसी दिखें। उनका तर्क था कि छात्रों को लाभ पहुँचाने वाले स्कूल सुधारों के प्रति शिक्षक यूनियनों को अधिक समझौतापरस्त रवैया अपनाना चाहिए। एक खेमे, यानी "व्यावसायिक संघवाद" (प्रोफेशनल यूनियनिज़्म) के समर्थकों ने श्रम-प्रबंधन संघर्ष के टकराव से निजात पाने के लिए सामूहिक-सौदेबाजी के समझौतों को खत्म करने और उनकी जगह "विश्वास समझौतों" (ट्रस्ट एग्रीमेंट्स) को लागू करने की वकालत की। उनका मानना था कि शिक्षकों को ऐसे पेशेवर बनना चाहिए जो शैक्षणिक नतीजों की जिम्मेदारी खुद लें।(4) शिक्षक कार्यकर्ताओं के एक अन्य धड़े ने शिक्षा क्षेत्र में हावी रहे औद्योगिक संघवाद के मॉडल को हटाने के लिए "सामाजिक न्याय शिक्षक संघवाद" (सोशल जस्टिस टीचर यूनियनिज़्म) का समर्थन किया।(5)
दुर्भाग्य से, जिन प्रगतिशीलों ने "नए शिक्षक संघवाद" का समर्थन किया था, उन्होंने आम शिक्षकों (रैंक-एंड-फाइल टीचर्स) के बीच अपनी विश्वसनीयता खो दी, जो अपनी यूनियन से यह उम्मीद करते थे कि वह नौकरी पर-- यानी स्कूलों में-- उनके हितों की रक्षा करे। इसके अलावा, सामाजिक न्याय शिक्षक संघवाद के समर्थक अक्सर इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं थे कि उनका नज़रिया नए शिक्षक संघवाद से किस प्रकार भिन्न है और उनका यह भी सोचना था कि शैक्षणिक नतीजों में सुधार के लिए यूनियनों को अपने उन अनुबंधों की सुरक्षा को छोड़ देना चाहिए जिसे उन्होंने कड़े संघर्षों से हासिल किया था। हालाँकि अमेरिका के कई शिक्षा कार्यकर्ता, जो सामाजिक न्याय शिक्षक संघवाद की वकालत करते थे, माता-पिता और समुदाय के बीच अपनी यूनियनों के लिए समर्थन जुटाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने निजी उद्योग में जिस प्रकार के प्रबंधन-श्रम सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा था, वैसी साझेदारी को शिक्षा में आमंत्रित करने के खतरे को कम करके आँका।(6) अनुबंधों और विश्वास समझौतों (ट्रस्ट एग्रीमेंट्स) के तहत यूनियनों ने वेतन वृद्धि के बदले वरिष्ठता (सीनियरटी) जैसी अपनी महत्वपूर्ण नौकरी-सुरक्षाओं को त्याग दिया। सहकर्मी-मूल्यांकन योजनाओं (पीयर-इवैल्यूएशन स्कीम्स) और वेतन की नई तालिकाओं (सैलरी शेड्यूल्स) ने "मास्टर टीचर्स" का सृजन करके शिक्षकों के बीच पद-आधारित असमानताएं पैदा कर दीं, जिससे शिक्षकों पर स्कूली नतीजों की जिम्मेदारी तो आ गई, लेकिन स्कूल जीवन के सबसे बुनियादी पहलुओं पर निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं रहा। विडंबना यह है कि जिन सुधारों को लागू करने के लिए प्रगतिशील कार्यकर्ताओं ने स्कूली नतीजों में सुधार के नाम पर यूनियन पर दबाव डाला था, उन्होंने ऐसी कार्य-संस्कृति के लिए द्वार खोल दिए जिसमें यह मान लिया जाता है कि शिक्षक सप्ताह के सातों दिन और चौदह घंटे ऑनलाइन-कॉल पर बने रहेंगे। नवउदारवाद अब इसी स्कूली संस्कृति पर जोर देता है, जिसकी सराहना छात्रों की शैक्षणिक उपलब्धि को बढ़ावा देने के लिए एक आवश्यक शर्त के रूप में की जाती है।
अमेरिका में सामाजिक न्याय शिक्षक संघवाद की एक और सीमा यह थी कि वह यह संबोधित करने को तैयार नहीं था कि शिक्षक यूनियन की शक्ति का क्षरण, यूनियन के आंतरिक जीवन के ह्रास-- विशेषकर जीवंत लोकतंत्र के अभाव-- से किस प्रकार जुड़ा हुआ था। इस सीमा को TURN (टीचर यूनियन रिफॉर्म नेटवर्क) द्वारा दर्शाया गया, जो नेशनल एजुकेशन एसोसिएशन (NEA) और अमेरिकन फेडरेशन ऑफ टीचर्स (AFT) दोनों के शिक्षक यूनियन अधिकारियों का एक ऐसा गठबंधन था जो खुद को प्रगतिशील शिक्षा सुधार के पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करता था।(7) कनाडाई शोधकर्ता स्टेफनी रॉस (Stephanie Ross) का यह प्रेक्षण है कि हालाँकि कोई यूनियन सामाजिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त कर सकती है, "फिर भी वे सदस्यों को जुटा सकती हैं, लेकिन वे इन परिस्थितियों में ऐसा करती हैं जो बड़े पैमाने पर नेताओं द्वारा परिभाषित होती हैं... [जो] शीर्ष-से-नीचे (टॉप-डाउन) की प्रथाओं को आसानी से आत्मसात कर सकती हैं और यहाँ तक कि उन्हें सुदृढ़ भी कर सकती हैं।" वह यह नोट करती हैं कि सैम गिंडिन, किम मूडी, माइकल ईसेंशर और क्रिस्टोफर शेंक जैसे लेखक "यूनियन के पुनरुद्धार के लिए लामबंदी (मोबिलाइज्ड) और लोकतांत्रीकरण (डेमोक्रेटाइजिंग) के नजरियों के बीच और विशेष रूप से इस बात के बीच भेद करते हैं कि रणनीतियों को कैसे गढ़ा और उपयोग किया जाता है। वे सभी सामाजिक संघवाद के एक रूप-- जिसे अक्सर सामाजिक आंदोलन संघवाद (सोशल मूवमेंट यूनियनिज़्म) कहा जाता है-- का सुझाव देते हैं, जो एक अर्थवाद-विरोधी (एंटी-इकोनॉमिस्ट), संकीर्णता-विरोधी (एंटी-सेक्शनलिस्ट) और रूपांतरकारी (ट्रांसफॉर्मेटिव) नजरिये को नई लामबंदी की शैलियों और सांगठनिक रूपों के साथ जोड़ता है। यहाँ कामगार केवल 'भाग' नहीं लेते-- वे 'सक्रिय रूप से नेतृत्व करते हैं' और अपनी यूनियन, अपने समुदायों तथा अपने देश में 'श्रमजीवी लोगों को प्रभावित करने वाली हर एक चीज़ के लिए संघर्ष' पर लोकतांत्रिक नियंत्रण रखते हैं।"(8)
रॉस यह इंगित करती हैं कि यूनियनों का वर्गीकरण करते समय, यूनियन के घोषित उद्देश्यों और उन लक्ष्यों को क्रियान्वित करने के उसके तरीकों-- यानी लेबलों से परे जाकर उसके कार्यों-- दोनों पर गौर करना जरूरी है। उदाहरण के लिए, हम यह देख सकते हैं कि ब्रिटिश कोलंबिया टीचर्स फेडरेशन खुद को एक सामाजिक न्याय यूनियन कहता है, लेकिन यह रॉस द्वारा वर्णित सामाजिक आंदोलन शिक्षक यूनियन से बहुत अधिक मेल खाता है।
सामाजिक आंदोलन शिक्षक संघवाद (Social Movement Teacher Unionism)
रॉस द्वारा किए गए इस भेद का उपयोग करते हुए, मेरा सुझाव है कि 'सामाजिक आंदोलन संघवाद' शब्द यह स्पष्ट करता है कि यूनियन का सांगठनिक रूप (एक सामाजिक आंदोलन के रूप में) उसके द्वारा अपनाई जाने वाली राजनीतिक स्थितियों (सामाजिक न्याय की रक्षा) से कैसे संबंधित है। सामाजिक आंदोलन संघवाद यूनियन की ताकत को इस क्षमता के एक किस्म के रूप में देखता है कि वह अपने सदस्यों को अपने खुद के हितों के लिए संघर्ष करने के लिए लामबंद कर सके और हमारे समाज को अधिक न्यायसंगत तथा समतावादी बनाने के उद्देश्य से अन्य सामाजिक आंदोलनों के साथ एक सहयोगी के रूप में जुड़ सके। यूनियन की शक्ति नीचे से ऊपर (बॉटम-अप) की ओर आती है, जैसा कि सामाजिक आंदोलनों में होता है। सदस्यों के स्व-हित को व्यापक रूप से परिभाषित किया जाता है, जो तात्कालिक आर्थिक और संविदात्मक चिंताओं से कहीं बढ़कर होता है। यूनियन अधिक लोकतांत्रिक, समतावादी समाज के निर्माण में अपने सदस्यों की हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करती है और यूनियन खुद को उन अन्य आंदोलनों के साथ लामबंद करती है जो सामाजिक न्याय, शांति और समानता के लिए काम कर रहे हैं।
हालाँकि मेरे द्वारा प्रस्तावित सामाजिक आंदोलन संघवाद के कुछ तत्व नए हैं, फिर भी इसके कई तत्व उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में शिकागो में शिक्षक संघवाद के जन्म के समय से ही मौजूद थे। इस आंदोलन की सबसे प्रमुख प्रवक्ता मार्गरेट हेले (Margaret Haley) थीं, जो एक प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका और समाजवादी थीं और जिनके संबंध AFL के समाजवादियों, मताधिकार आंदोलन के कार्यकर्ताओं और प्रगतिशील शैक्षणिक सुधारकों, विशेष रूप से जॉन डीवी (John Dewey) तथा स्कूल अधीक्षक एला फ्लैग यंग (Ella Flagg Young) के साथ बहुत गहरे थे।(9) जिस आंदोलन को संगठित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसने शिक्षकों के आर्थिक हितों के लिए संघर्ष किया और उच्च वेतन, पेंशन तथा व्यावसायिक अधिकार की इन मांगों को एक ऐसे राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम में पिरोया जिसका उद्देश्य स्कूलों का लोकतंत्रीकरण करना और मेहनतकश लोगों के लिए आर्थिक तथा राजनीतिक मुक्ति हासिल करना था। जॉन डीवी के साथ, हेले ने लोकतंत्र के लिए नागरिकों को शिक्षित करने में सार्वजनिक शिक्षा और एक पेशेवर शैक्षणिक ताकत की केंद्रीयता की वकालत की।(10) शिकागो यूनियन, जो AFT का लोकल-1 था, उसने निगमों पर कर लगाकर सार्वजनिक स्कूलों के लिए वित्त पोषण को बहाल करने के वास्ते उग्र अभियानों की शुरुआत की।
फिर भी, जैसा कि संगठित श्रम में यूनियन के सहयोगियों के मामले में सच था, यहाँ तक कि समाजवादियों के बीच भी, शिक्षक संघवाद नस्लीय अलगाव के अन्याय और शिक्षा तथा संपूर्ण समाज के भीतर मौजूद असमानता के प्रति अंधा बना रहा।(11) यूनियन द्वारा नस्लीय असमानता को स्वीकार किए जाने की हमारी समझ के साथ हेले के भाषण "शिक्षकों को संगठित क्यों होना चाहिए" (Why Teachers Should Organize) का पुनरावलोकन करना, शिक्षक और बच्चे की जरूरतों के बीच पूर्ण तदात्म्य (कौरस्पोंडेंस) के लिए उनके द्वारा किए गए दावों को जटिल बना देता है। हेले सबसे पहले यह स्पष्ट करती हैं-- "बच्चे के हित और शिक्षक के हित के बीच कोई संभावित संघर्ष नहीं है... बच्चे और शिक्षक दोनों के लिए स्वतंत्रता ही विकास की शर्त है। जिस माहौल में पढ़ाना सबसे आसान होता है, वही माहौल सीखने में भी सबसे आसान होता है। जो चीज़ें शिक्षक पर बोझ हैं, वे बच्चे पर भी बोझ हैं। जो चीज़ें उसकी शक्तियों को सीमित करती हैं, वे उसकी (बच्चे की) शक्तियों को भी सीमित करती हैं।" लेकिन इसके बाद वह एक चेतावनी भरे स्वर में लिखती हैं: "आत्म-सुरक्षा के लिए संगठन में खतरे का तत्व स्वार्थी मकसद की प्रधानता है। शिक्षकों के मामले में इस प्रेरणा पर व्यावसायिक संगठन की आवश्यकता द्वारा एक स्वाभाविक रोक (नेचुरल चेक) लगाई जाती है। इन दोनों प्रकार के संगठनों के बीच जितनी गहरी एकता होगी, प्रत्येक के लिए उतनी ही पूर्ण और प्रभावी गतिविधि संभव होगी।"(12)
अपने निजी स्वहित-- "स्वार्थी मकसद"-- के लिए संगठित होने वाले शिक्षकों के रूढ़िवादी प्रभाव को हेले स्वीकार करती हैं। वह यह मानती हैं कि एक पेशेवर संगठन-- उनके ज़माने में, NEA-- का अस्तित्व एक "स्वाभाविक रोक" के रूप में काम करता है। लेकिन 1960 के दशक में शिक्षक संघवाद के पुनरुत्थान के समय, पूंजीवाद के साथ एक उग्र टकराव को बढ़ावा देने वाला हेले के समय की तरह कोई व्यापक समाजवादी आंदोलन मौजूद नहीं था। इसके अलावा, NEA एक प्रतिद्वंद्वी शिक्षक यूनियन में बदल चुका था। इसलिए AFT या NEA दोनों के लिए ही "स्वार्थी मकसद" पर लगने वाली "स्वाभाविक रोक" अब अस्तित्व में नहीं थी।
1960 के दशक में अमेरिकी समाज को नागरिक अधिकार आंदोलन की चुनौती मिली, उसके बाद शिक्षक संघवाद एक राजनीतिक ताकत के रूप में पुनर्जीवित हुआ। शहरी स्कूलों में गोरे शिक्षकों और अश्वेत माता-पिता तथा सामुदायिक कार्यकर्ताओं के बीच राजनीतिक टकराव ने शिक्षक संघवाद को—जिसकी पहचान अल्बर्ट शांकर से जुड़ी थी—कई वामपंथी कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों की नज़र में मौजूदा (नस्लवादी) सत्ता-संबंधों को चुनौती देने का अनिवार्य विरोधी बना दिया। 1975 तक, शांकर ने इस दिखावे को भी त्याग दिया था कि शिक्षकों और बच्चों के हित एक समान हैं और इसके बजाय यह तर्क दिया कि सार्वजनिक और यूनियन हित "कभी-कभार" ही एक-दूसरे से मिलते (कन्वर्ज होते) हैं, जिससे ये अवसर "सबसे खुशी के समय" बन जाते हैं।(13)
कोहेन की आलोचना-- जो न्यू लेफ्ट (नया वाम) में कोई असामान्य बात नहीं थी-- कुल मिलाकर इस तर्क पर आधारित थी-- वामपंथ ऐसे स्कूल प्रणालियों में, जो अल्पसंख्यक बच्चों को असफल कर रही थीं, बेहतर वेतन और पेंशन के लिए लड़ने वाले शहरी स्कूलों के गोरे शिक्षकों को न्यायसंगत नहीं ठहरा सकता था। यह बात जिस तरह हेले द्वारा संगठित आंदोलन के लिए सच थी, उसी तरह अपने पुनरुत्थान के समय शिक्षक संघवाद भी व्यवस्थागत नस्लवाद के प्रति अंधा बना रहा था। शिक्षक यूनियनों ने संविदात्मक संघवाद (कॉन्ट्रैक्ट यूनियनिज्म) की परिसीमित सीमाओं को स्वीकार कर लिया था और अलोकतांत्रिक स्कूलों तथा एक अलोकतांत्रिक समाज के भीतर शिक्षकों के लिए अधिक आवाज़ उठाने के लिए संघर्ष किया था। ऐसा करके यूनियनों ने रंगभेद से पीड़ित समुदायों के साथ सम्मानजनक गठबंधन विकसित करने की अपनी क्षमता को कम कर लिया, जो स्कूल सुधार को नागरिक अधिकार संघर्ष के एक विस्तार के रूप में देखते थे। स्कूलों पर "स्वामित्व" रखने के इच्छुक सामुदायिक कार्यकर्ताओं का भी एक ऐसा ही अंधापन सामने आया, जो शिक्षकों की गरिमा के लिए शिक्षक संघवाद के दावों को कामगारों के रूप में देखने में विफल रहे।(14) जहाँ हेले ने जिस यूनियन और आंदोलन का नेतृत्व किया, उसे "शिक्षा में लोकतंत्र" के लिए संघर्ष करने की खातिर आगे बढ़ाया-- जिसमें रंगीन (अश्वेत) लोगों को बाहर रखा गया था-- वहीं शांकर ने जिस तंत्र और आंदोलन का नेतृत्व किया, उसे "व्यावसायिक यूनियन" (बिज़नेस यूनियन) के नजरिये के अनुरूप ढांचा प्रदान किया, जिसमें सदस्यों के हितों को अमेरिकी पूंजीवाद की वैश्विक इच्छाओं द्वारा परिभाषित यथास्थिति के भीतर बेहतर वेतन और लाभ के रूप में परिभाषित किया गया।(15) यूनियन के ढांचे की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता को यूनियन की सेहत और खुद पब्लिक एजुकेशन की सेहत के बराबर माना गया। यह स्थिरता यूनियन लीडरशिप की उन कानूनों को लाने की कोशिशों से ज़ाहिर होती थी, जिनसे उन्हें 'एजेंसी फ़ीस' (कॉन्ट्रैक्ट पर बातचीत और उसे लागू करने के खर्च के लिए गैर-सदस्यों से पैसे लेने का अधिकार) और 'ड्यूज़ चेकऑफ़' (पेचेक से मेंबरशिप और एजेंसी फ़ीस का अपने-आप कट जाना) की सुविधा मिलती थी।
शिक्षकों की यूनियनों ने 'बिज़नेस यूनियनिज़म' के तहत शिक्षकों के अपने हितों (एक कर्मचारी और शिक्षक के तौर पर) की जो संकीर्ण परिभाषा अपनाई है, वह उनके लिए खुद को नुकसान पहुँचाने वाली साबित हुई है। इसने शिक्षकों और उनकी यूनियनों को एक "विशेष हित" (स्पेशल इंटरेस्ट) के रूप में गढ़ने में नवउदारवाद की वैचारिक विजय का मार्ग प्रशस्त किया है, जो शिक्षा के "बाजार" में प्रवेश करने वाले निगमों (कॉर्पोरेट) से अलग नहीं हैं। खासकर उन स्कूलों में जहाँ समाज के हाशिए पर रहने वाले छात्र पढ़ते हैं, स्कूल का संगठन और नियम अमानवीय हो सकते हैं। आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि अनुबंध सौदेबाजी के दायरे को बुरी तरह सीमित कर दिया गया है और आंशिक रूप से "व्यावसायिक यूनियन" की सोच को अपनाए जाने के कारण, शिक्षक यूनियनों ने स्कूल के ढाँचे और संगठन को मूल रूप से जैसा है वैसा ही काफी हद तक स्वीकार कर लिया है। पढ़ाना एक निजी और देखभाल करने वाली गतिविधि है, जबकि स्कूलों का ढांचा, संस्कृति और संगठन ऊंच-नीच पर आधारित होते हैं (चाहे वह पितृसत्तात्मक सोच, नौकरशाही या कॉर्पोरेट संस्कृति की वजह से हो)। इन दोनों के बीच के इस बेमेलपन का शिक्षकों के मनोबल और उसके बाद छात्रों की सीखने की प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ता है। स्कूलों के कामकाज के तरीके को बदलने के लिए माता-पिता, समुदाय और मज़दूर संगठनों के साथ मिलकर काम करने और नेतृत्व करने में शिक्षकों की यूनियनों की एक खास भूमिका होती है-- इसमें उन्हें सम्मानजनक बराबरी के साथ गठबंधन बनाकर काम करना होता है। इस मामले में हमें हेली से बहुत कुछ सीखना है।
हमें जिस बात को नहीं दोहराना चाहिए, वह है समाज के डिफ़ॉल्ट सेटिंग के रूप में नस्लीय उत्पीड़न को स्वीकार करने में शिक्षक संघवाद की मिलीभगत। माता-पिता के साथ तनाव अपरिहार्य है, खासकर तब जब माता-पिता को यह महसूस हो कि यूनियन द्वारा उनका सम्मान नहीं किया जा रहा है, जैसा कि अक्सर उन समूहों के साथ होता है जिन्हें श्रम यूनियनों से नस्लीय बहिष्कार का अनुभव हुआ है। अमेरिका के तमाम शहरों में, शिक्षक यूनियनें माता-पिता और सामुदायिक कार्यकर्ताओं के साथ प्रामाणिक गठबंधन बनाने में अपनी विफलता की विरासत का सामना कर रही हैं। उनकी "रोटी-कपड़े" (ब्रेड एंड बटर) से परे देखने में विफलता—विशेष रूप से, नस्ल और नस्लवाद को माता-पिता और छात्रों की वैध चिंताओं के रूप में सामने रखने की उनकी अनिच्छा—ने उन्हें नवउदारवाद के उस दुस्साहसी और प्रभावी अपहरण के प्रति संवेदनशील बना दिया है, जो ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील आंदोलनों से जुड़े समान शैक्षिक अवसर के बयानबाजी का दुरुपयोग कर रहा है।
बदलाव लाने वाले काम के तौर पर शिक्षण
शिक्षकों के काम की अनूठी प्रकृति के कारण एक अच्छे शिक्षक यूनियन के पास विशेष नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारियाँ होती हैं। पूंजीवादी अभिजात वर्ग के नजरिये से, शिक्षकों को सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण रूप से नियंत्रित किया जाना चाहिए क्योंकि वे "विचार-श्रमिक" (आइडिया वर्कर्स) हैं, यानी वे सामाजिक मूल्यों और मानदंडों को प्रसारित करने-- या उनमें व्यवधान डालने में एक वैचारिक भूमिका निभाते हैं। यह एक मुख्य कारण है कि नवउदारवादी परियोजना शिक्षकों की स्वायत्तता को नष्ट करके और स्कूलों में आलोचनात्मक सोच तथा स्वतंत्रता व सामाजिक न्याय के विचारों के लिए जो जगह बनती है उसे समाप्त करके शिक्षण को नए सिरे से गढ़ना चाहती है।(16) ऑस्ट्रेलियाई समाजशास्त्री रेविन कॉनेल (Raewyn Connell) शिक्षकों के काम की खास प्रकृति को इस तरह बताती हैं: “पढ़ाना हमेशा बदलाव लाने वाला काम होता है, जो नई सामाजिक सच्चाइयों को सामने लाता है; और यह मूल रूप से आपसी बातचीत पर आधारित होता है, न कि किसी व्यक्ति विशेष का काम। शिक्षकों का काम सामाजिक पुनरुत्पादन नहीं है, बल्कि यह रचनात्मक है और इसलिए यह सामाजिक संघर्ष का एक क्षेत्र है...। लंबे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो आज के दौर के शिक्षक अनोखे हैं और उनमें पूरे समाज की सीखने की क्षमता को आकार देने की संभावना है; यह बात अब खास तौर पर अहम हो सकती है।"(17)
अन्यत्र कॉनेल यह स्पष्ट करती हैं कि व्यक्तिगत शिक्षक की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना क्यों भ्रामक है। वह यह नोट करती हैं कि शिक्षण को स्कूल स्तर पर मौजूद लोगों के एक सामूहिक प्रयास के रूप में समझा जाना चाहिए: "एक स्कूल के दैनिक जीवन में जो कुछ भी घटित होता है, उसका अधिकांश हिस्सा कर्मचारियों के संयुक्त श्रम और छात्रों की सामूहिक उपस्थिति के प्रति कर्मचारियों के सामूहिक संबंध से जुड़ा होता है...। तदनुसार, शिक्षण में सुधार के कार्य को केवल व्यक्तियों को प्रेरित करने या उन्हें पुनः-कौशल-युक्त (री-स्किलिंग) करने के मामले के रूप में नहीं समझा जा सकता है।"(18) शिक्षकों के काम की सामूहिक प्रकृति को सामने रखते हुए, कॉनेल यह स्पष्ट करती हैं कि अच्छे स्कूलों के लिए अच्छे शिक्षक यूनियन क्यों जरूरी हैं। इस संबंध में, शिक्षक यूनियन वास्तव में वही चाहते हैं जो बच्चों की जरूरतें हैं-- शिक्षकों के लिए एक सामूहिक आवाज़ जो उन परिस्थितियों का बचाव कर सके जो सीखने और अच्छी तरह से पढ़ाने में सहायक होती हैं।
कई शिक्षक यह नहीं समझते कि उन्हें एक सामूहिक आवाज़ की जरूरत है और न ही वे यह समझते हैं कि वे "विचार-श्रमिक" हैं जो "बदलाव लाने वाला काम" करते हैं। वे इस पेशे में इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें बच्चों के साथ रहना या वह विषय पसंद है जिसे वे पढ़ाना चाहते हैं। नवउदारवाद के शैक्षिक सुधारों के वास्तुकार यह अच्छी तरह जानते हैं कि सचेत इरादे की परवाह किए बिना, शिक्षकों में सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करने, उन अभिजात वर्ग के प्राधिकरण को चुनौती देने की क्षमता होती है जो अपनी शक्ति और विशेषाधिकार को बनाए रखने में अपना हित देखते हैं। इस कारण से, शिक्षकों के यूनियन की एक विशेष जिम्मेदारी है कि वह छात्रों को आलोचनात्मक रूप से सोचने में मदद करने के शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा करे। शिक्षकों की अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा करना यूनियन के सबसे जरूरी कामों में से एक है। इसका मतलब कार्यकाल (टेन्योर) और जब शिक्षकों के व्यावसायिक आचरण के बारे में शिकायतें की जाती हैं तो हमें निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ सुनवाई की गारंटी के लिए संघर्ष करना चाहिए। यूनियन के लिए अकादमिक आज़ादी और अपने सदस्यों के काम के प्रदर्शन का बचाव करना इसलिए मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बच्चों की स्कूल में अनिवार्य उपस्थिति वाले कानून उन्हें क्लासरूम में बंधक बना देते हैं। इसलिए यूनियन के प्रति निष्ठा अपने सदस्यों के रूप में कामगारों के प्रति भी निष्ठा है और यह छात्रों की भलाई की रक्षा के लिए भी है। अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए, शिक्षक यूनियनों को उस सौदेबाजी (quid pro quo) को अस्वीकार करना होगा जो शिक्षकों को सामूहिक-सौदेबाजी का अधिकार तो देती है लेकिन सौदेबाजी के दायरे को सीमित करती है।
"प्रभावी शिक्षण" को छात्रों के परीक्षा प्राप्तांकों में सुधार के पर्याय के रूप में गढ़ने में नवउदारवाद की वैचारिक सफलता ने शिक्षण के नागरिक और सामाजिक कार्यों की रक्षा करना और भी अधिक जरूरी और कठिन बना दिया है। मानकीकृत परीक्षणों (स्टैंडर्डाइज्ड टेस्टिंग) का दमघोंटू माहौल और परीक्षा प्राप्तांकों का शिक्षकों के वेतन व मूल्यांकन से जुड़ा होना-- इन चीज़ों ने कामकाजी और गरीब परिवारों के बच्चों वाले कई स्कूलों को बेरोज़गारी, कम मज़दूरी वाले काम और जेल भेजने की तैयारी करने वाली जगहों में बदल दिया है। AFT और NEA दोनों ने ही स्कूली शिक्षा के उद्देश्यों को इसके आर्थिक मूल्य तक सीमित करने वाले नवउदारवाद के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है। फिर भी, शिक्षण के गैर-आर्थिक कार्यों, लोगों को आलोचनात्मक रूप से सोचने के लिए शिक्षित करने में इसकी भूमिका और इसकी समाजीकरण व पोषण संबंधी जिम्मेदारियों का बचाव किए बिना हम नवउदारवाद के खिलाफ शिक्षकों, शिक्षण और सार्वजनिक शिक्षा की प्रभावी ढंग से रक्षा नहीं कर सकते। पढ़ाना "महिलाओं का काम" माना जाता है और जैसा कि (Sara Freedman) ने दूरदर्शिता के साथ नोट किया था, पढ़ाने के काम का दर्जा तब तक नहीं सुधारा जा सकता "जब तक कि शिक्षक के सबसे ज़रूरी कामों में से एक-- बच्चों को समझना, उनके साथ काम करना और उन्हें भावनात्मक सहारा देना को स्कूलों के बाहर कोई खास अहमियत न मिले।"(19)
शिकागो के छात्रों को क्या मिलना चाहिए, इस पर अपनी रिपोर्ट में शिकागो टीचर्स यूनियन ने हेली के उस नज़रिए को अपनाया और उसे बेहतर बनाया है, जिसके तहत टीचर्स यूनियन को शिक्षकों के काम और बच्चों की भलाई पर चर्चा करने की ज़रूरत है।(20) जहाँ नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता को लेकर माता-पिता अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं, वहीं वे स्कूलों से अपने बच्चों की सुरक्षा की भी उम्मीद करते हैं। असल में माता-पिता ही वे लोग हैं जिनकी बात शिक्षकों और उनके यूनियनों को माननी चाहिए और उन्हें स्कूल सुधार के बारे में हमारी सोच को अपनाना चाहिए; न कि बैंकरों या उन राजनेताओं की बात, जिन्हें वे (बैंकर) पैसा देते हैं।
अपनी सुरक्षा के लिए संगठन बनाने के पीछे "स्वार्थी मकसद" के बारे में हेली की चेतावनी से पता चलता है कि टीचर्स यूनियनों को यूनियन से अलग ऐसे संगठन बनाने की कोशिश करनी चाहिए-- जैसे हायर एजुकेशन में फैकल्टी सीनेट होती हैं जो "विचार-श्रमिकों" (आइडिया वर्कर्स) के तौर पर शिक्षकों के अधिकारों और उनके वैचारिक काम (जैसे कोर्स बनाना, किताबें, मटीरियल और पढ़ाने के तरीके चुनना) की रक्षा कर सकें। हेले के यूनियन ने "शिक्षक परिषदों" (टीचर्स काउंसिल्स) के निर्माण का समर्थन किया था जो सांगठनिक रूप से यूनियन से स्वतंत्र थीं। शिक्षकों ने परिषदों के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव किया, जिनकी शैक्षिक निर्णयों पर एक सलाहकार भूमिका थी।(21) साथ ही, शिक्षक यूनियनों को कक्षाओं में क्या सबसे अच्छा काम करता है, इस बारे में विचारशील शिक्षकों और माता-पिता के बीच की अलग-अलग राय का सम्मान करना चाहिए। जो शिक्षक अल्पसंख्यक और प्रवासी समुदायों के करीब हैं, वे ऐसी जानकारी और नजरिये ला सकते हैं जो बच्चों को सीखने में मदद करने के लिए मूल्यवान हैं।(22) अक्सर औपचारिक शिक्षा से वंचित माता-पिता के विचारों को, विशेषकर तब जब वे उत्पीड़ित समूहों के सदस्य होते हैं, बिना जानकारी वाला मानकर खारिज कर दिया जाता है, जबकि वास्तव में ये माता-पिता अल्पसंख्यक छात्रों के साथ अनुचित और असमान व्यवहार की बेहद जरूरी आलोचना प्रस्तुत करते हैं।(23)
पारंपरिक (शिक्षक-यूनियन) समझ यह मानती है कि सामूहिक-सौदेबाजी ने शिक्षकों की कामकाजी परिस्थितियों में सुधार किया और अगर हम शिक्षकों के काम को मुख्य रूप से वेतन और घंटों के संदर्भ में परिभाषित करते हैं, तो यह बात सटीक है। लेकिन NEA के अपने ऐतिहासिक परीक्षण में, वेइन अर्बन (Wayne Urban) यह निष्कर्ष निकालते हैं कि NEA से जुड़े सहयोगियों (एफिलिएट्स) के शिक्षकों की व्यावसायिक मामलों में वास्तव में उस समय अधिक आवाज़ थी जब NEA ने सामूहिक-सौदेबाजी शुरू नहीं की थी।(24) सौदेबाजी के उस संकीर्ण दायरे के कारण जिसे यूनियनों ने तब स्वीकार किया था जब उन्होंने शिक्षकों को सामूहिक-सौदेबाजी का अधिकार देने वाले कानून के लिए दबाव डाला था, ऐसी स्थिति में शिक्षक यूनियनें आम तौर पर मानकीकृत परीक्षण और शिक्षण सामग्री व पद्धतियों के चयन जैसी शैक्षणिक चिंताओं को संबोधित करने से वंचित हो जाती हैं।
शिक्षक और छात्र उन यूनियन अनुबंधों के कारण नुकसान झेल रहे हैं जो शिक्षक मूल्यांकन और वेतन को मानकीकृत परीक्षा प्राप्तांकों से जोड़ते हैं-- ये ऐसी नीतियां हैं जिनका अब AFT और NEA द्वारा समर्थन किया जाता है। यूनियनों को शिक्षक मूल्यांकन की पद्धति को वापस लेने के लिए दबाव डालने (पुश बैक) की जरूरत है, लेकिन वे तब तक सफलतापूर्वक ऐसा नहीं कर सकतीं जब तक कि वे माता-पिता, समुदाय और छात्रों के साथ आपसी सम्मान पर आधारित गठबंधन बनाना नहीं सीख जातीं। जैसा कि सैम गिंडिन (Sam Gindin) यह आह्वान करते समय नोट करते हैं कि "सार्वजनिक क्षेत्र की यूनियनों के बारे में हर एक चीज़ में-- वे अपने संसाधनों को कैसे आवंटित करती हैं, वे अपने कर्मचारियों को कैसे प्रशिक्षित करती हैं और अपने सदस्यों, अन्य यूनियनों तथा समुदाय से कैसे संबंध रखती हैं, से लेकर (इन सबसे ऊपर) सेवाओं के स्तर, गुणवत्ता और प्रशासन को एक प्रमुख सौदेबाजी का मुद्दा बनाने तक-- एक संपूर्ण क्रांति की जरूरत है," यूनियनों को प्रत्यक्ष कार्रवाई में भी संलग्न होना चाहिए।(25) नवउदारवाद ने शिक्षकों की यूनियनों को स्वार्थी और अपने ही फ़ायदे की सोचने वाले के तौर पर पेश करने में कामयाबी हासिल की है और कॉन्ट्रैक्ट पर सामूहिक-सौदेबाजी करने के अधिकार पर भी हमले हुए हैं। ऐसे में, सामूहिक-सौदेबाजी और यहाँ तक कि सामूहिक-सौदेबाजी के दायरे पर फिर से सोचने का यह सही समय है। सामाजिक आंदोलन संघवाद का मॉडल यह सुझाव देता है कि हमें अपने इस लक्ष्य को समझने की जरूरत है कि हम शिक्षकों के एक ऐसे सामाजिक आंदोलन का निर्माण करें जो सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा के लिए एक व्यापक सामाजिक आंदोलन में अपने व्यावसायिक और आर्थिक हितों की रक्षा करे। तब हम जिस सांगठनिक रूप को अपनाते हैं, वह इसके विपरीत होने के बजाय आंदोलन के उद्देश्यों का समर्थन करता है।
क्या शिक्षक वही चाहते हैं जो बच्चों की जरूरतें हैं?
कोहेन का प्रश्न और AFT का नारा दोनों ही इस मुद्दे को 'या तो यह/या तो वह' (either/or) के रूप में गढ़ते हैं, लेकिन इसे एक सापेक्षित (कंटीजेंट) रूप में समझा जाना चाहिए-- शिक्षक और शिक्षक यूनियनें कब वह चाहती हैं जो बच्चों की जरूरतें हैं? हर जगह के सभी कामगारों की तरह, शिक्षकों को सामूहिक-सौदेबाजी के लिए यूनियन बनाने का अधिकार है। साथ ही, हमें यह स्वीकार करने की जरूरत है कि जब यूनियनें अपने सदस्यों के हितों को छात्रों, माता-पिता और समुदाय की जरूरतों से अलग मानती हैं, तो शिक्षकों के अधिकारों का बचाव करना कठिन हो जाता है। हालाँकि यूनियन अपने लक्ष्यों को व्यापक बना सकती है और उसे ऐसा करना भी चाहिए, लेकिन एक ऐसा अंतर्विरोध है जिसके साथ जीना हमें अवश्य सीखना चाहिए। शिक्षक यूनियनों में संघर्षों की रूपरेखा तय करने की ताकत लगभग कभी भी पर्याप्त नहीं होती है और खासकर अब जब यूनियनें और सार्वजनिक शिक्षा दोनों ही ऐसे निरंतर, क्रूर हमलों के दायरे में हैं, तो बहुत बार यूनियन कार्यकर्ताओं और समुदाय के समर्थकों को इस बारे में कठिन चुनाव करने होते हैं कि कब तक और कितनी मजबूती से लड़ना है-- और किस लिए। यूनियनों पर माता-पिता और समुदाय का विश्वास जीतने और उसे लगातार अर्जित करते रहने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए-- जबकि हम सभी यह पहचानते हैं कि यूनियनें उन सीमाओं (कानूनी और आंतरिक) के अधीन हैं जो एडवोकेसी समूहों पर लागू नहीं होती हैं।
हाँ, शिक्षक वास्तव में वही चाहते हैं जो बच्चों की जरूरतें हैं, अधिकांश समय। हालाँकि, हमारे आंदोलन के लिए हमें जिस नजरिये को प्रस्तुत करना चाहिए -- और जिस नारे को हमें अपनाना चाहिए -- उसे लोकतांत्रिक, गुणवत्तापूर्ण स्कूलों और एक न्यायसंगत समाज के नजरिये के भीतर शिक्षकों की जरूरतों को पिरोना चाहिए।
लॉइस वीनर 'न्यू पॉलिटिक्स' के संपादकीय बोर्ड की सदस्य हैं और न्यू जर्सी सिटी यूनिवर्सिटी में शिक्षा की प्रोफेसर हैं, जहाँ वह अनुभवी शिक्षकों के लिए एक स्नातकोत्तर (ग्रेजुएट) कार्यक्रम का समन्वय करती हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक, द फ्यूचर ऑफ आवर स्कूल्स: टीचर्स यूनियन एंड सोशल जस्टिस, यह बताती है कि सार्वजनिक शिक्षा को बचाने के लिए शिक्षकों को अपने यूनियनों को क्यों और कैसे रूपांतरित करने की जरूरत है।
Notes
- ↩ David K. Cohen, “ Teachers Want What Children Need-- Or Do They?,” The Urban Review 2 (1968): 25–29.
- ↩ Our Schools / Our Selves, Breaking the Iron Cage: Resistance to the Schooling of Global Capitalism (Ottawa: Canadian Centre for Policy Alternatives, 2008).
- ↩ Mary Compton and Lois Weiner, eds., The Global Assault on Teaching, Teachers and Their Unions: Stories for Resistance (New York: Palgrave Macmillan, 2008).
- ↩ Charles Kerchner and Julia Koppich, A Union of Professionals: Labor Relations and Educational Reform (New York: Teachers College Press, 1993).
- ↩ Bob Petersen, “We Need a New Vision of Teacher Unions,” Rethinking Schools 11, no. 4 (Summer 1997), http:// rethinkingschools.org.
- ↩ Lois Weiner, “Teacher Unions Not ‘Too Industrial,’” letter to the editor in “Readers Speak Out on Teacher Unions,” Rethinking Schools 13, no. 1 (1998), http://rethinkingschools.org.
- ↩ Adam Urbanski, “TURNing unions around,” http://turnexchange.net. Originally published 1998.
- ↩ Stephanie Ross, “Varieties of Social Unionism: Towards a Framework for Comparison,” Just Labour: A Canadian Journal of Work and Society 11 (Autumn 2007), 28, http://justlabour.yorku.ca. The quotes inside Ross’s excerpt are from Sam Gindin, The Canadian Auto Workers: The Birth and Transformation of a Union (Toronto: James Lorimer & Co., 1995), 268.
- ↩ Lois Weiner, The Future of Our Schools: Teachers Unions and Social Justice (Chicago: Haymarket, 2012).
- ↩ Lois Weiner, “Teacher Unions and Professional Organization: Re-examining Margaret Haley’s Counsel on Councils,” paper presented at the American Educational Research Association, 1992, http://eric.ed.gov.
- ↩ Kate Rousmaniere, “White Silence: A Racial Biography of Margaret Haley,” Equity and Excellence in Education 34, no. 2 (2001): 7–15.
- ↩ Margaret Haley, “Why Teachers Should Organize,” in the National Education Association of the United States, Journal of Proceedings and Addresses of the Forty-Third Annual Meeting Held at St. Louis, Missouri (Chicago: University of Chicago Press, 1904), 146, http://babel.hathitrust.org.
- ↩ Weiner, The Future of Our Schools, 104. Originally in “Cracks in Shanker’s Empire,” New Politics 11, no. 4 (1976).
- ↩ Steve Golin, The Newark Teacher Strikes: Hopes on the Line (New Brunswick, NJ: Rutgers University Press, 2002).
- ↩ Weiner, The Future of Our Schools, 104.
- ↩ Howard Stevenson, “Working In, and Against, the Neo-Liberal State: Global Perspectives on K–12 Teacher Unions,” Workplace 17 (2010): 1–10. This special issue of Workplace: A Journal of Academic Laborcontains other contributions by international group of researchers in the Special Interest Group of the American Educational Research Association, http://prophet.library.ubc.ca.
- ↩ Raewyn Connell, “The Work of Teaching,” History of Education Review 38 no. 2 (2009): 9.
- ↩ Raewyn Connell, “Good Teachers on Dangerous Ground: Towards a New View of Teacher Quality and Professionalism,” Critical Studies in Education 50, no. 3 (2009): 221, 222, http://revistas.usp.br.
- ↩ Sara Freedman, “Weeding Women Out of ‘Woman’s True Profession’: The Effects of the Reforms on Teaching and Teachers,” in Joyce Antler and Sari Knopp Biklen, eds., Changing Education: Women as Radicals and Conservators (Albany: SUNY Press, 1990), 256.
- ↩ Chicago Teachers Union, The Schools Chicago Students Deserve, 2012, http://ctunet.com.
- ↩ Geoffrey G. Tegnell, Democracy in Education: A Comparative Study of the Teachers’ Council Movement, 1895–1968 (PhD dissertation, Harvard University, Graduate School of Education,1997).
- ↩ Michele Foster,”The Role of Community and Culture in School Reform Efforts: Examining the Views of African-American Teachers,” Educational Foundations 8 , no. 2 (Spring 1994): 5–26.
- ↩ Community Asset Development Re-defining Education (CADRE) and Justice Matters Institute (JMI), We Interrupt This Crisis-- With Our Side of the Story: Relationships Between South Los Angeles Parents and Schools(Los Angeles, October 2004), http://educationjustice.org.
- ↩ Wayne J. Urban , Gender, Race, and the National Education Association (New York: RoutledgeFalmer, 2000).
- ↩ Sam Gindin, “Marx’s Proletariat: What Can Today’s Labor Movement Learn from Marx?,” New Labor Forum 21, no. 2 (June 2012): 20.
(अनुवाद : विक्रम प्रताप, 14 सितम्बर 2026)
(साभार: https://monthlyreview.org/articles/when-teachers-want-what-children-need/#fn3)
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