तेल: ईरान युद्ध और मध्य पूर्व के सभी युद्धों के पीछे का असली कारण
अन्तरराष्ट्रीय चार्लोट डेनेटईरान में युद्ध शुरू हुए एक महीना बीत चुका है, और अब पत्रकारों और राजनेताओं, डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन, वामपंथियों, दक्षिणपंथियों और निर्दलीयों को यह पूछना बंद कर देना चाहिए कि आखिर यह युद्ध किस बारे में है।
सासन फयाजमानेश ने 'काउंटरपंच' में अपने 13 मार्च के लेख में यह ठोस (और साहसी) तर्क दिया है कि "यह इज़राइल एकदम बेवकूफ है"। बस वे अपनी बात को पूरी गहराई तक नहीं ले जा पाये।
उन्होंने बिल्कुल सही ढंग से उन सवालों को उठाकर शुरुआत की है, जिनका अभी तक कोई सुसंगत जवाब मिलता नहीं दिख रहा था:
क्या इसलिए कि ईरान के साथ उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत आगे नहीं बढ़ रही थी? क्या इसलिए कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के बेहद करीब था? क्या इसलिए कि ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें जल्द ही अमेरिका तक पहुँचने वाली थीं? क्या इसलिए कि इज़राइल ईरान पर हमला करने वाला था और अमरीका ने अमरीकियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहले ही एहतियाती कदम उठा लिए थे? क्या इसलिए कि ईरान की सरकार मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही थी? या फिर वजह कुछ और ही है?
वे यह तर्क देते हैं:
"अमरीका ने ईरान पर केवल और केवल एक ही कारण से हमला किया है और वो है- इज़राइल। अमरीका और यूरोपीय देशों द्वारा गढ़े गए इज़राइल ने दशकों से अमरीका को ईरान के खिलाफ एक विनाशकारी युद्ध छेड़ने के लिए उकसाया है।"
क्यों? ताकि 'ग्रेटर इज़राइल' (वृहद इज़राइल) बनाने के ज़ायोनवादी उदेश्य को हासिल किया जा सके। लेकिन वह तेल हासिल करने और उस पर कब्जा रखने वाली इज़राइल की प्यास का ज़िक्र नहीं करती; यह बात जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के राष्ट्रपति-काल और 9/11 के ठीक बाद नाटो के पूर्व कमांडर वेस्ली क्लार्क के सामने हुए एक खुलासे की याद दिलाती है। जैसा कि मैंने अपनी किताब, *फॉलो द पाइपलाइन्स: अनकवरिंग द मिस्ट्री ऑफ अ लॉस्ट स्पाई एंड द डेडली पॉलिटिक्स ऑफ द ग्रेट गेम फॉर ऑयल* में दस्तावेज़ों के साथ बताया है। क्लार्क ने 2007 में कहा था कि 2001 में पेंटागन के एक अधिकारी ने उन्हें एक योजना के बारे में बताया था—जिसके तहत "पाँच सालों के भीतर सात देशों की सरकारों पर हमला करके उन्हें तबाह कर दिया जाना था।" इस योजना की शुरुआत इराक से होनी थी, और उसके बाद सीरिया, लेबनान, लीबिया, सोमालिया, सूडान [ये सभी तेल से जुड़े संघर्ष थे] और फिर ईरान का नंबर आना था। अपनी किताब के प्रचार दौरे के दौरान, क्लार्क ने आगे कहा कि बुश की रणनीति मुख्य रूप से मध्य-पूर्व के तेल संसाधनों पर कब्जा हासिल करने के इर्द-गिर्द ही बुनी गई थी। यह रणनीति उनके नव-रूढ़िवादी (न्यूकंजरवेटिव) समर्थकों [जिनमें से कुछ के पास अमरीका और इज़राइल, दोनों देशों की नागरिकता थी] की एक योजना पर आधारित थी—जिसका मकसद "विदेशों में मौजूद इन ऊर्जा भंडारों तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए अमरीकी सैनिकों का इस्तेमाल करना" था।
सऊदी अरब और वेनेज़ुएला के बाद ईरान, आज दुनिया में तेल के भंडारों का तीसरा सबसे बड़ा मालिक है। मीडिया ने इस सीधी-सादी बात को ठीक से नहीं दिखाया; इसके बजाय, उसका ज्यादातर ध्यान होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी करने और खर्ग द्वीप पर कब्ज़ा करने के खतरों पर रहा है—जिसके परिणामस्वरूप तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं—और उसने इस बात को शिद्दत के साथ समझाया है कि कैसे दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के तेल ठिकानों पर बमबारी की है। लेकिन, मीडिया ने इसके पीछे के छिपे हुए संदर्भ को नहीं समझाया है—कि कैसे तेल पर कब्ज़ा और नियंत्रण पाने के लिए प्रतिस्पर्धी 'पेट्रो-शक्तियाँ' आपस में होड़ कर रही हैं, ताकि वे अपनी सेनाओं को तेल की पर्याप्त आपूर्ति कर सकें—और हाल ही में, प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करके एआई डेटा केंद्रों को बिजली दे सकें।
अब, आखिरकार, ट्रंप ने राज़ खोल ही दिया। पिछले सप्ताह, ट्रम्प की अपने कैबिनेट के साथ बैठक के बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इकठ्ठा हुई पत्रकारों की भीड़ के बीच, एक रिपोर्टर ने अपना हाथ ऊँचा उठाया और वह वर्जित सवाल पूछ लिया कि "क्या आप ईरान के तेल पर कब्जा करना चाहते हैं?" "यह एक विकल्प है," ट्रम्प ने उत्तर दिया। "लेकिन मैं इसके बारे में बात नहीं करूँगा।" अगले कुछ दिनों तक, उसने अमरिकी युद्ध योजनाओं का तेल से किसी भी तरह का संबंध छिपाने की पारंपरिक रणनीति का पालन किया, लेकिन सप्ताह के आखिर में उसने सब कुछ उगल दिया। उसने 'फाइनेंशियल टाइम्स' को बताया कि वह "ईरान के तेल पर कब्ज़ा कर सकता है" और ऊर्जा निर्यात के मुख्य केंद्र खर्ग द्वीप को भी अपने कब्जे में ले सकता है।
"जगह, और सिर्फ जगह"
यहाँ तक कि 1917 के प्रसिद्ध बालफोर घोषणापत्र का भी तेल से एक संबंध है, जिसमें अंग्रेजों ने फिलिस्तीन में एक यहूदी राज्य के निर्माण का समर्थन किया था। वास्तव में यह ब्रिटेन के विदेश मंत्री लॉर्ड बालफोर द्वारा यूरोप के विशाल तेल और बैंकिंग साम्राज्य के उत्तराधिकारी वाल्टर डी रॉथ्सचाइल्ड को लिखा गया एक साधारण पत्र था। इज़राइल की स्थापना से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों में अक्सर यह छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बात नदारद रहती है—कि पूर्वी भूमध्य सागर से सटा हुआ इसका स्थान, इराक से तेल लाने वाली पाइपलाइन के लिए एक आदर्श अंतिम बिंदु (टर्मिनल पॉइंट) था। बशर्ते, यूरोप के यहूदियों पर उस पाइपलाइन की सुरक्षा के लिए भरोसा किया जा सके। लोगों को यह बात क्यों नहीं पता? क्योंकि युद्ध और तेल के बीच के संबंध को उन सभी देशों ने सख्ती से दबा रखा है, जो या तो महाशक्ति हैं, या बनने की आकांक्षा रखते हैं। उन्होंने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार से एक बड़ा सबक यह सीखा है कि, “उसकी सेना का ईंधन खत्म हो गया था।”
तेल सेना का ईंधन था, और आज भी है; यही बात इसे धरती का सबसे प्रतिष्ठित संसाधन बनाती है। भले ही देश 'ए' के पास इसकी काफ़ी मात्रा हो (जैसा कि ट्रम्प अब अमरिकी भंडार के बारे में तर्क दे रहा है), फिर भी उसे दुश्मन देश 'बी' (रूस, चीन, ईरान, वेनेज़ुएला, ब्रिक्स गठबंधन) के बारे में चिंता करनी पड़ती है कि कहीं वे तेल के दूसरे समृद्ध, अभी तक इस्तेमाल न हुए भंडार हासिल न कर लें। मैं इसे 'तेल के लिए महान खेल' कहता हूँ, और अब यह पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक होता जा रहा है, क्योंकि अब एआई डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस की तलाश की जा रही है।
राष्ट्रपति ट्रंप, जिसे इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं हैं, शायद इस बात को जानता है क्योंकि वह अपने तेल-उद्योग के दानदाताओं से अक्सर बात-चीत करता है; वह उन्हें भरोसा दिलाता है कि उनके चुनाव अभियानों में दिये गये लाखों डॉलर का हिसाब, वह युद्ध छेड़कर पाई-पाई चुकता कर देगा। हो सकता है कि वह अपनी असली महत्वाकांक्षाओं को छिपाने की कोशिश करे: अपने मशहूर नारे 'ड्रिल बेबी ड्रिल' से भी आगे बढ़कर, वह 'कमांडर-इन-चीफ़' के पद पर रहते हुए अरबों कमाने की जुगत में है, और दुनिया के तेल-समृद्ध इलाकों पर कब्ज़ा करने के लिए पागलपन की हद तक जा चुका है।
कम से कम मैसाचुसेट्स के सीनेटर एड मार्की ने 27 मार्च को यह खुलासा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने तेल कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई की है, जिससे उनके शेयरों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। 27 मार्च को, उन्होंने पाँच सबसे बड़ी तेल और गैस कंपनियों—एक्सॉनमोबिल, शेवरॉन, कोनोकोफिलिप्स, शेल और बीपी—के सीईओ को एक पत्र भेजा, जिसमें यह मांग की गई है कि "बड़ी तेल और गैस कंपनियाँ ईरान में ट्रंप के अवैध युद्ध के दौरान तेल की बढ़ती कीमतों से होने वाले मुनाफ़े को अपने अधिकारियों को देने से परहेज़ करें।"
लेकिन उसने भी एक मुख्य तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया है। कौन-सी पत्नी या माँ अपने प्रियजनों को ख़तरे में डालना स्वीकार करेगी, यदि इसका मुख्य उद्देश्य तेल कंपनियों और उनके सरकारी सहयोगियों को मालामाल करना हो? यही वह बिंदु है जहाँ सैन्य शक्ति के लिए ईंधन की आवश्यकता और अलग-अलग 'बहाने' अपनी भूमिका निभाते हैं।
और देखिए कैसे 1952 में, कट्टर-रूढ़िवादी हेनरी ल्यूस के स्वामित्व वाली 'टाइम पत्रिका' ने ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद मोसादेघ को बदनाम किया था, जिसके बाद 1953 में सीआईए के तख्तापलट द्वारा उन्हें सत्ता से हटा दिया गया। उनका "अपराध" ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण करना था।
ईरानी लोगों के मन में इस विडंबना की यादें आज भी ताज़ा हैं, जिसके कारण शाह को मयूर सिंहासन (तख़्त-ए-ताऊस) पर बैठाया गया था। तख्तापलट से किसे फ़ायदा हुआ? नेल्सन और डेविड रॉकफेलर (ईरान पर मेरा पिछला सबस्टैक देखें)।

प्रथम विश्व युद्ध: जब तेल का वर्चस्व पहली बार स्थापित हुआ
विंस्टन चर्चिल ने, ब्रिटिश नौसेना के प्रथम लॉर्ड के रूप में, 1911 में अपनी नौसेना के ईंधन को कोयले (जिसकी ब्रिटेन में प्रचुरता थी) से बदलकर अधिक तेज़, अधिक कुशल और सस्ते तेल (जो उसके पास बिल्कुल नहीं था) में बदलने का फैसला लिया। चर्चिल ने अफ़सोस जताते हुए कहा था कि ब्रिटेन के पास उस तेल को प्राप्त करने के लिए "मुसीबतों के समंदर" में उतरकर लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, जिसकी उसे ज़रूरत तो थी, पर वह उसके पास मौजूद नहीं था।
यही वजह थी कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इराक के तेल पर कब्ज़ा करना ब्रिटेन का "सर्वोच्च युद्ध-लक्ष्य" बन गया था। एक बार यह लक्ष्य हासिल हो जाने के बाद, अगली चुनौती इस तेल को उन जगहों तक पहुँचाना था जहाँ इसकी ज़रूरत थी। प्रथम विश्व युद्ध के विजेताओं को यह भली-भांति पता था कि यह काम कैसे किया जाए: पाइपलाइन के ज़रिए। सबसे अच्छा रास्ता? इसे पूर्वी भूमध्य सागर के तटों पर स्थित एक टर्मिनल बिंदु तक पाइपलाइन के जरिए पहुँचाना, जहाँ से युद्धपोत ईंधन भर सकें और टैंकर इसे यूरोपीय बंदरगाहों तक पहुँचा सकें। एकदम सही जगह: हाइफ़ा, फ़िलिस्तीन। 'द ट्रेजेडी ऑफ ज़ायोनिज्म' के लेखक और इजरायली विद्वान बर्नार्ड आइशाई ने उल्लेख किया है कि "हाइफ़ा एक आदर्श बंदरगाह था—और पूरब से तेल लाने वाली पाइपलाइन के टर्मिनल के लिए एक स्वाभाविक जगह था।" हाइफ़ा में अरब और यहूदी, दोनों ही रहते थे; लेकिन अन्तिमतौर पर यह मुख्य रूप से यहूदियों के कब्जे में आ गया। पाइपलाइन की सुरक्षा सुनिश्चित करने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है कि फ़िलिस्तीन में यूरोपीय यहूदियों को बसा दिया जाए, जिन पर मुस्लिम काफ़िरों से इसकी रक्षा करने के लिए भरोसा किया जा सके?
इस बात पर मेरा यकीन कीजिए: मेरे पिता, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मध्य पूर्व में ओ.एस.एस. और बाद में सी.आई.जी. (सेंट्रल इंटेलिजेंस ग्रुप, जो दोनों ही सी.आई.ए. की पूर्ववर्ती संस्थाएँ थीं) के लिए अमेरिकी काउंटर-इंटेलिजेंस के प्रमुख थे, उन्होंने 1943 में लिखा था कि उनका सबसे महत्वपूर्ण मिशन “किसी भी कीमत पर तेल पर कब्जा करना” था।

इराक पेट्रोलियम कंपनी पाइपलाइन। इसका निर्माण 1934 में हुआ था, लेकिन इसकी परिकल्पना प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही कर ली गई थी। 1948 में इजरायल राज्य की स्थापना के बाद इसे बंद कर दिया गया था। बेंजामिन नेतन्याहू ने 2003 में इराक पर आक्रमण के बाद इसे फिर से खोलने की उम्मीद जताई थी, और गर्व से कहा था, 'जल्द ही तेल हाइफा तक प्रवाहित होगा।' लेकिन क्षेत्र में जारी शत्रुता के कारण ऐसा नहीं हो सका है।
वह सऊदी अरब का तेल था, जो अमेरिका की सबसे कीमती धरोहर थी, जिसे ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन के माध्यम से पूर्वी भूमध्य सागर तक—या तो इज़रायल या लेबनान तक—पहुँचाया जाना था। जैसा कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2 मई, 1947 को लिखा था—मेरे पिता की एक रहस्यमय विमान दुर्घटना में मृत्यु होने से दो सप्ताह पहले—“उस निवेश की सुरक्षा और उसके द्वारा प्रतिनिधित्व की जाने वाली सैन्य एवं आर्थिक सुरक्षा अनिवार्य रूप से इस क्षेत्र में अमेरिकी विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्यों में से एक बन जाएगी, जो पहले से ही वैश्विक राजनीति का एक धुरी बिंदु और पूरब एवं पश्चिम—पूरब का अर्थ रूस है—के बीच प्रतिद्वंद्विता के मुख्य केंद्रों में से एक बन चुका है”।

यह मानचित्र, 1947 के न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख और मानचित्र पर आधारित है, जो ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन के प्रस्तावित मार्ग को बिंदुदार रेखा द्वारा दर्शाता है। अंततः इसका समापन यहाँ चित्रित उत्तरी लेबनान के बजाय दक्षिणी लेबनान में हुआ। ठोस रेखा वाली पाइपलाइनों की परिकल्पना प्रथम विश्व युद्ध के बाद की गई थी, जिसमें उत्तरी शाखा पर फ्रांसीसियों का कब्जा था जो उत्तरी लेबनान में समाप्त होती थी, और दक्षिणी शाखा पर अंग्रेजों का कब्जाथा, जो फिलिस्तीन के हाइफा में समाप्त होती थी।
यह खेल आज तक जारी है: किसी भी कीमत पर तेल की सुरक्षा। इंसानी जानों और मालों की और कितनी कीमत पर?
दुनिया के लिए तेल के सुरक्षित प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए—इराक और सऊदी अरब से—पिछले लगभग आठ दशकों में इज़रायल में अरबों डॉलर बहाए गए हैं। और यद्यपि नेतन्याहू को अब ट्रंप के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के कारण अपनी विस्तारवादी योजनाओं के लिए मनचाहा रास्ता मिल रहा है, लेकिन अंतिम निर्णय ट्रंप ही लेगा, क्योंकि 'बिग ऑयल' (तेल उद्योग) हर चीज़ पर भारी पड़ता है।
इतिहास से कुछ और अनमोल बातें
प्रथम विश्व युद्ध के ठीक बाद के कालखंड के पारंपरिक इतिहास यह बताते हैं कि कैसे फ्रांस और इंग्लैंड—जो तुर्की के पराजित ओटोमन साम्राज्य के तेल पर कब्जा करने के लिए लड़े गए युद्ध के मुख्य विजेता थे—ने सीरिया और फिलिस्तीन से लेकर मेसोपोटामिया (इराक) तक फैले पूर्व ओटोमन साम्राज्य के आयताकार भू-भाग को आपस में विभाजित कर लिया था। उनका 1920 का समझौता 'सैन रेमो समझौता' के नाम से जाना जाने लगा। हालाँकि, उन दिनों विदेश विभाग के दस्तावेज़ों में इसे अधिक सटीक रूप से 'तेल पर सैन रेमो समझौता' कहा गया था। बाद में यह ज़िक्र आम चर्चा से गायब हो गया, ठीक वैसे ही जैसे 1920 के दशक में अमेरिकी विदेश नीति को 'तैलीय कूटनीति' कहे जाने का ज़िक्र भी गायब हो गया था।
अब 1944 में चलते हैं, जब होलोकॉस्ट से बचे यहूदी किसी तरह बचकर फ़िलिस्तीन पहुँचने में कामयाब रहे। वे पहले लोग थे जिन्होंने "तेल के लिए खून नहीं" लिखे हुए बैनर लहराए; वे रूज़वेल्ट प्रशासन द्वारा यहूदियों को बचाने में की जा रही देरी का विरोध कर रहे थे—यह देरी इसलिए की जा रही थी ताकि सऊदी अरब के राजा इब्न सऊद को नाराज़ न किया जाए, जो फिलिस्तीन में एक यहूदी राज्य के निर्माण के विरोधी थे और उन्होंने अमेरिका के विशेष एवं अत्यंत लाभकारी तेल रियायत को खत्म करने की धमकी दी थी।
पाँच साल बाद, 1949 में, सीआईए ने सीरिया के राष्ट्रवादी नेता शुक्री कुवतली का तख्तापलट कर दिया, जिन्होंने सीरियाई क्षेत्र से गुजरने वाली और इज़रायल में समाप्त होने वाली ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन का विरोध किया था। (आखिरकार यह पाइपलाइन इज़रायल से लगभग 100 मील उत्तर में, दक्षिणी लेबनान में समाप्त हुई।)
एक सीआईए जासूस की बेटी, ऐन टैज़वेल, अपनी पुस्तक ए गुड स्पै लीव नो ट्रैसःबिग आयलःसीआईए सीक्रेटस एंड ए स्पै डाटरस रिकोकोनिंग, में हमें 1950 के दशक के मध्य के मिस्र में ले जाती हैं। वे एक ऐसे दस्तावेज़ का खुलासा करती हैं, जो संभवतः उनके पिता द्वारा लिखा गया था, जिसमें कहा गया है कि: “मध्य पूर्व में हमारी नीति इस क्षेत्र को स्वतंत्र दुनिया के भीतर बनाए रखने और तेल संसाधनों को विकसित करने की दिशा में निर्देशित रही है।”
सच कहूँ तो, 2003 में सीआईए ने राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश को आगाह किया था कि सद्दाम हुसैन का इराक कोई ऐसा तत्काल खतरा पैदा नहीं कर रहा है जिसके लिए उस पर हमला करना ज़रूरी हो; लेकिन बुश (जो खुद एक जूनियर ऑयलमैन थे) ने इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया। ट्रंप के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ: अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि ईरान से कोई तत्काल खतरा नहीं है। जनरलों ने भी ट्रंप को होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण के बारे में आगाह किया था।
लेकिन अब ट्रंप इस कदर जिद पर आ गया है कि उसने मध्य-पूर्व में 10,000 से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक भेजने का आदेश दे दिया है।
यमन और होर्मुज़ जलडमरूमध्य का विकल्प
मीडिया वृत्तांतों में जिस बात का जिक्र नहीं किया गया है, वह है अमेरिका के समर्थन से हूतियों के खिलाफ यमन में सऊदी अरब का युद्ध। सऊदी योजना यह है: एक 'ट्रांस-यमन' पाइपलाइन का निर्माण करना, जो हॉर्मुज जलडमरूमध्य के जोखिम से बच सके और सऊदी तेल को दक्षिणी यमन से होते हुए अरब सागर के पास अदन की खाड़ी तक पहुँचा सके।

ट्रंप ने, 2019 में, 'यमन वॉर पावर्स एक्ट' पर वीटो लगा दिया था, इस अधिनियम(एक्ट) का मकसद उस विनाशकारी युद्ध में हूतियों का दमन करने के उद्देश्य से अमेरिकी सैन्य भागीदारी को खत्म करना था; इस युद्ध ने यमन में भीषण भुखमरी सहित एक गंभीर मानवीय संकट पैदा कर दिया था। मार्च 2025 तक, सऊदी अरब इस बात पर अड़ा रहा है कि जिस जमीन से पाइपलाइन गुजरती है, उसे सऊदी क्षेत्र माना जाए—यह एक ऐसी माँग है जिसे स्थानीय जनजातियों ने सिरे से खारिज कर दिया है।
बिंदु वाली रेखा प्रस्तावित 'ट्रांस-यमन' पाइपलाइन को दर्शाती है—जो अभी भी प्रस्तावित ही है—जो पूरब में हॉर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम में बाब-अल-मंडेब के अवरोधों से बचकर निकलेगी। क्षमा करें: किसी कारणवश इस मानचित्र या सऊदी ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन मानचित्र में देशों की पहचान नहीं दी गई है, लेकिन वे चेल्सी ग्रीन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक 'फॉलो द पाइपलाइन्स' में दी गई हैं।
जिस वक्त यह लेख लिखा जा रहा है, उसी वक्त ट्रंप अब धमकी दे रहा है कि अगर ईरान 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' को नहीं खोलता है, तो वह ईरान के बिजली संयंत्रों और 'खर्ग द्वीप' को "पूरी तरह तबाह" कर देगा। और इज़रायल दक्षिणी लेबनान में अपनी बमबारी का विस्तार कर रहा है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षकों और तीन पत्रकारों की मौत हो गई है। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय और यूनिसेफ के अनुसार, 120 बच्चों सहित 1,200 से अधिक लोग मारे गए हैं, जबकि देश भर में 12 लाख से अधिक लोगों को अपने घरों से बेघर होना पड़ा है।
और हाँ, इन घुसपैठों का तेल और गैस से भी सीधा संबंध है, क्योंकि नेतन्याहू पूरे पूर्वी भूमध्य सागर में एक ऊर्जा गलियारा स्थापित करने का प्रयास कर रहा है, ताकि गाजा, इज़रायल, लेबनान और सीरिया के तटों पर मौजूद 05 अरब डॉलर के तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार का दोहन किया जा सके।
चार्लोट डेनेट एक खोजी पत्रकार हैं। जो फॉलो द पाइपलाइन्स: अनकवरिंग द मिस्ट्री ऑफ अ लॉस्ट स्पाई एंड द डेडली पॉलिटिक्स ऑफ द ग्रेट गेम फॉर ऑयल के लेखक है। यह उनकी नवीनतम पुस्तक है, और अब पेपरबैक में उपलब्ध है।
(काउंटरपंच से साभार)
अनुवाद--सोनू पवांर
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