ईरान ने खाड़ी देशों में अमरीकी हितों पर कैसे चोट पहुँचाई
अन्तरराष्ट्रीय अजहरइस साल अमरीका ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर बेहद क्रूर और अमानवीय हमला किया। डोनाल्ड ट्रम्प के स्वेच्छाचारी और उन्मादी रवैये को इस हमले का कारण माना जाये या कुछ और। इसे जानने के लिए हमें इस सवाल का जवाब ढूँढना पडे़गा कि खाड़ी देशों से अमरीका को कितना आर्थिक–राजनीतिक फायदा होता है? इन इलाकों में ईरानी दबदबे के विस्तार ने अमरीका के किन हितों को गम्भीर चोट पहुँचाई है?
खाड़ी क्षेत्र और अमरीका के बीच सम्बन्धों को केवल तेल व्यापार के सीमित दायरे में समझना पर्याप्त नहीं हैय यह सम्बन्ध वैश्विक पूँजी, वित्तीय संरचना, सैन्य गठजोड़ और भू–राजनीतिक नियंत्रण के जटिल ताने–बाने से निर्मित है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, कुवैत जैसे खाड़ी देश विश्व ऊर्जा आपूर्ति के केन्द्र में स्थित हैं और इसके चलते वे अन्तरराष्ट्रीय शक्ति–सन्तुलन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे अमरीका को बहुआयामी आर्थिक–राजनीतिक फायदा प्राप्त होता है, जो प्रत्यक्ष आय से कहीं अधिक व्यापक है।
अमरीकी साम्राज्यवाद एक विशाल ऑक्टोपस की तरह खाड़ी देशों की तेल–सम्पदा की लूट और मेहनतकश जनता से मुनाफा चूसकर अपनी जर्जर–मरणासन्न पूँजीवादी व्यवस्था को जिन्दा रखे हुए है। इस लूट में खाड़ी देशों के शेख, शाह, राजघराने, प्रतिक्रियावादी शासक और देशी पूँजीपति अमरीका की भरपूर मदद करते हैं और बदले में इन मुट्ठीभर शोषकों को अय्याशी भरी जिन्दगी बिताने का मौका मिलता है।
अमरीकी व्यापार की एक महत्वपूर्ण कड़ी “पेट्रोडॉलर व्यवस्था” है, जिसके अन्तर्गत वैश्विक तेल व्यापार मुख्यत: अमरीकी डॉलर में होता है। जब खाड़ी देश अपने तेल का निर्यात डॉलर में करते हैं, तो विश्वभर के देशों को तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत होती है। इससे डॉलर की वैश्विक माँग स्थायी रूप से बनी रहती है और अमरीका को अपनी मुद्रा के जरिये असाधारण वित्तीय ताकत मिलती है। इससे अमरीका बड़े पैमाने पर व्यापार घाटा होने के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाये रखता है। इस तरह, खाड़ी क्षेत्र से होने वाला फायदा केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि मौद्रिक प्रभुत्व के रूप में काम करता है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव ट्रिलियन डॉलर स्तर तक पहुँच जाता है। यह मौजूदा अमरीकी साम्राज्यवाद की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।
इसके अलावा, अमरीका के लिए हथियारों का व्यापार बहुत मायने रखता है। अमरीका खाड़ी देशों को उन्नत सैन्य उपकरण–– लड़ाकू विमान, मिसाइल प्रणाली, वायु रक्षा प्रणाली, आदि बड़े पैमाने पर निर्यात करता है। इन सौदों का मूल्य अक्सर दर्जनों अरब डॉलर में होता है और यह न केवल अमरीकी रक्षा उद्योग को फायदा पहुँचाता है, बल्कि इन देशों को अमरीका पर दीर्घकालिक रूप से निर्भर बना देता है, क्योंकि इन प्रणालियों के रखरखाव, प्रशिक्षण और उन्नतिकरण के लिए खाड़ी देशों को लगातार अमरीकी सहयोग की जरूरत बनी रहती है। इस तरह यह व्यापार केवल आर्थिक लेनदेन नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद के नख–दन्त हैं।
पूँजी निवेश का प्रवाह भी इस सम्बन्ध का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। सऊदी सार्वजनिक निवेश कोष, अबू धाबी निवेश प्राधिकरण, जैसे सम्प्रभु सम्पत्ति कोष (सोवरेन वेल्थ फण्ड) के जरिये खाड़ी देश अपने विशाल तेल राजस्व को अमरीकी अर्थव्यवस्था में निवेश करते हैं। ये निवेश अमरीकी शेयर बाजार, प्रौद्योगिकी कम्पनियों, रियल एस्टेट और वित्तीय संस्थानों में लगाये जाते हैं। नतीजतन, खाड़ी देशों की पूँजी अमरीकी वित्तीय प्रणाली को मजबूत करती है और वहाँ के पूँजी बाजारों की तरलता (लिक्विडिटी) को बनाये रखने में योगदान देती है।
ऊर्जा क्षेत्र में अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भूमिका भी उल्लेखनीय है। एक्सॉनमोबिल और शेवरान जैसी अमरीकी कम्पनियाँ खाड़ी देशों में तेल और गैस से सम्बन्धित परियोजनाओं, तकनीकी सेवाओं और बुनियादी ढाँचे के निर्माण में भागीदारी करती हैं। इन गतिविधियों से उन्हें प्रत्यक्ष मुनाफा मिलता है, साथ ही वे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाये रखती हैं।
खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी सैन्य अड्डे जो सुरक्षा सहयोग के नाम पर कायम किये गये हैं जो अमरीकी दादागिरी की मिसाल हैं। वे स्थानीय स्तर पर निर्माण, सामानों की आपूर्ति और सेवा क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को जन्म देते हैं, जिनमें अमरीकी कम्पनियों को अपना कारोबार बढ़ाने का मौका मिलता है। इससे एक ऐसा आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र बनता है, जिसमें सैन्य और आर्थिक हित एक–दूसरे के पूरक बन जाते हैं। ये सैन्य अड्डे केवल आर्थिक रूप से ही फायदेमन्द नहीं हैं, बल्कि भू–राजनीतिक दबदबा कायम रखने में भी अमरीका की मदद करते हैं और प्रतिद्वन्द्वी देशों को इस इलाके से दूर रखते हैं।
इनके अलावा, खाड़ी क्षेत्र पर रणनीतिक प्रभाव के चलते अमरीका वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर परोक्ष नियंत्रण रखता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों के जरिये दुनिया के 20 प्रतिशत हिस्से का तेल परिवहन होता है। इस क्षेत्र पर प्रभुत्व बनाये रखने से अमरीका वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर असर डालता है, जो उसे अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में अतिरिक्त ताकत प्रदान करता है।
ईरान कैसे अमरीका का खेल बिगाड़ रहा है?
इसे जानने के लिए यह देखना चाहिए कि खाड़ी क्षेत्र में अमरीका की आर्थिक–सामरिक व्यवस्था किन स्तम्भों पर टिकी हुई है–– ऊर्जा व्यापार, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, डॉलर–आधारित तेल व्यापार और क्षेत्रीय सहयोगी देशों के साथ सुरक्षा गठजोड़ पर। मौजूदा युद्ध में ईरान की रणनीति इन सभी स्तम्भों को सीधे या परोक्ष रूप से निशाना बनाने की है, जिसके चलते वह अमरीका को शिकस्त देने की हालत में है।
सबसे पहला आयाम ईरान की भौगोलिक स्थिति का है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान के नजदीक एक जलसन्धि है, जहाँ से विश्व के कुल समुद्री तेल व्यापार का 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का तनाव, सैन्य गतिविधि या अवरोध वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को तुरन्त प्रभावित करता है। ईरान समय–समय पर इस मार्ग पर नियंत्रण या व्यवधान की क्षमता का संकेत देता रहा है, जिससे न केवल तेल की कीमतों में अस्थिरता आती है, बल्कि अमरीका और उसके सहयोगियों की ऊर्जा सुरक्षा कमजोर पड़ती है। मौजूदा अमरीकी हमले के बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अपने दुश्मनों के लिए बन्द कर दिया। इसने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया, जो अमरीकी आर्थिक हितों के लिए बड़ी चुनौती है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू असममित युद्ध की रणनीति है। पारम्परिक सैन्य शक्ति में अपेक्षाकृत कमजोर होने के बावजूद, ईरान ने मिसाइलों, ड्रोन और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिये ऐसी उन्नत क्षमता विकसित की है, जो कम लागत में खतरनाक मारक क्षमता रखती है। इसका इस्तेमाल करके ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों को लगभग तबाह कर दिया है। अब अमरीकी सैनिकों को होटलों में छिपकर रहना पड़ रहा है। ईरान इन होटलों को भी निशाना बना रहा है। ईरान ने जान–माल का भारी नुकसान उठाने के बावजूद अमरीका–इजराइल को नाको–चने चबवा दिये हैं।
पिछले कई दशकों में “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” कहलाने वाले क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिये ईरान ने मध्य–पूर्व के विभिन्न देशों–– ईराक, सीरिया, लेबनान, यमन, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, बहरीन में अपने राजनीतिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार किया है। इसके चलते वह युद्ध में परोक्ष तरीकों से भी प्रभाव डाल सकता है। यह नेटवर्क अमरीका की उस नीति को चुनौती देता है, जिसके जरिये वह इस इलाके में अपना वर्चस्व कायम रखता है और अपने सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इस तरह, मौजूदा सैन्य संघर्ष केवल तीन देशों के बीच सीमित नहीं है, बल्कि इसने एक व्यापक क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का रूप ले लिया है।
40 सालों के प्रतिबन्धों के बावजूद, ईरान ने वैकल्पिक व्यापार मार्ग, स्थानीय मुद्रा में लेनदेन और गैर–पश्चिमी साझेदारियों के जरिये अपने ऊर्जा निर्यात को जारी रखने की कोशिश की है। इससे उस पर अमरीकी प्रतिबन्धों का असर बहुत कमजोर साबित हुआ है। ईरान ने प्रतिबन्धों के बावजूद लम्बे समय तक न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को कुशलता से संचालित किया है, बल्कि सामरिक ताकत भी विकसित कर ली है और वह नाभिकीय बम बनाने के बहुत करीब पहुँच गया है। इसने अमरीका और इजराइल की नींद उड़ा दी है। उनके लिए खतरा यह है कि इससे दूसरे देश भी अमरीकी वर्चस्व से मुक्ति का रास्ता तलाश सकते हैं, जो अमरीकी पराभव को और तेज कर देगा।
ईरान ने युद्ध में अमरीकी सैन्य ठिकानों, इजराइल की रक्षा प्रणाली को भेदकर और सहयोगी खाड़ी देशों में मौजूद अमरीकी सैन्य ठिकानो को निशाना बनाकर दिखा दिया कि अमरीका की सुरक्षा गारण्टी पूरी तरह अभेद्य नहीं है। अमरीका को हराया जा सकता है। इससे खाड़ी देश भी असमंजस की हालत में है–– वे एक ओर अमरीकी सुरक्षा पर निर्भर हैं, वहीं दूसरी ओर ईरानी हमले से बचना चाहते हैं। इसी बात का फायदा उठाकर ईरान ने इन देशों को निशाना बनाया है। यहाँ के अय्याश शेखों और शाहों के हरम भी सुरक्षित नहीं हैं। ईरान ने “सीधे टकराव” से अधिक “रणनीतिक विघटन” की नीति के जरिये अमरीकी खेल को जटिल और महँगा बनाया है। इस झटके से युद्धोन्मादी ट्रम्प भी सदमे में है।
ईरान की क्षेत्रीय महात्वाकांक्षा है कि वह मध्य पूर्व से अमरीकी सैन्य अड्डों को खत्म कर दे, इजराइल को घुटनों पर ला दे, अपनी शर्तों पर मध्य एशियाई देशों पर हुक्म चलाये और रूस–चीन धुरी से खुलकर मजबूत सम्बन्ध विकसित करे। यह सब अमरीका के लिए बहुत बड़ा आघात है। इसलिए वह ईरान से समझौता करने के लिए बेचैन है और उसकी कोशिश है कि वह ईरान को साधकर इलाके में उसे अपना सहयोगी बना ले। यह बात ईरान जानता है। इसलिए वह अभी तक अमरीकी काबू से बाहर है।
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