संसदीय नेता और पूँजीपति के बीच का फर्क लगभग  मिटता जा रहा है। कई पूँजीपति तो खुद ही राजसत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं। कैबिनेट मंत्री अश्वनी वैष्णव इसकी जीती जागती मिसाल हैं। वह राज्यसभा के जरिये संसद में पहुँचे हैं। पता नहीं वे इनसान हैं या कई सिरों वाले देव जो एक साथ कई कम्पनियाँ और तीन–तीन मलाईदार मंत्रालय सम्भाल रहे हैं। यह भी किसी चमत्कार से कम नहीं कि उनकी एक कम्पनी ने केवल एक लाख रुपये का निवेश करके 113 करोड़ रुपये कमा लिये।

वह पहले उड़ीसा में आईएएस अधिकारी थे और सन 2003 में जमीन खरीद–फरोख्त की एक बड़ी धाँधली में नाम आने पर सुर्खियों में आये। ऐसे ‘होनहार’ अधिकारी की तो पार्टियों को खास जरूरत रहती है, इसलिए 2003 में ही वैष्णव को दिल्ली बुलाकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में डिप्टी सेक्रेटरी बना दिया। वैष्णव ने भी वफादारी निभायी और 2004 में भाजपा के हारने के बाद उन्होंने कांग्रेसी प्रधानमंत्री के अधीन काम नहीं किया। इसलिए 2006 तक वे पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के निजी सचिव के तौर पर काम करते रहे। इस स्वामिभक्ति का इनाम मिला, वे गोवा पोर्ट ट्रस्ट के निदेशक बने।

राजनेताओं के लिए मुफीद इस अधिकारी को 2008 में एमबीए करने के नाम पर दो साल के लिए अमरीका भेजा गया। वापस आते ही अश्वनी वैष्णव ने आईएएस की नौकरी छोड़ दी। वे खास ट्रेनिंग लेकर आये थे। उड़ीसा के अरबपति खदान माफिया बी प्रभाकरण से पहले ही दोस्ती हो चुकी थी। वह हल्का आदमी नहीं था, 2013 में उड़ीसा की खदानों में गैरकानूनी खनन की जाँच के लिए गठित एमबी शाह आयोग ने बी प्रभारकण को 900 करोड़ रुपये के अवैध खनन का दोषी पाया था, जिसके लिए उसे जेल भी जाना पड़ा था।

अश्वनी और प्रभाकरण की यारी आज के जमाने में दुर्लभ है। गौरतलब है कि प्रभाकरण की कम्पनी “त्रिवेणी अर्थमूवर्स” ने 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी के लिए 11 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉण्ड खरीदे थे। इससे पहले भी यह बीजेपी को लगातार चन्दा देती आयी है। भाजपा ने भी प्रभाकरण को निराश नहीं किया, मंत्रालयों से उसके दोस्त ने वैष्णव की झोली भर दी।

राजसत्ता, माफिया, पूँजीपति के इस गजब के गठजोड़ से बीजेपी को मिला करोड़ों का चन्दा, प्रभाकरण को मिला अरबों रुपये का मुनाफा और अश्विनी वैष्णव को मुनाफे के साथ तीन–तीन मंत्रालय। मोदी ने गुजरात को व्यापारियों का ‘स्वर्ग’ बना दिया था। इसलिए नौकरी छोड़ने के बाद 2012 में अश्वनी वैष्णव ने भी गुजरात में दो कम्पनियाँ लगाकर अपने व्यापारिक जीवन की विधिवत शुरुआत की। धन की बरसात होने लगी, लेकिन वह अपने माफिया दोस्त प्रभाकरण को नहीं भूले। तीन साल बाद 2015 में सपत्नीक अपने दोस्त के पास, उड़ीसा की खदनों में पहुँच गये और ‘एडलर’ नाम से एक कम्पनी शुरू कर दी। चमत्कार देखिये, उन्होंने खनन कम्पनी में केवल एक लाख रुपये का शुरुआती निवेश किया। कोई दूसरा होता तो इतने पैसों में तसला–फावड़ा भी न खरीद पाता। लेकिन, यार निगहेबान, एडलर ने अपनी सेवाएँ केवल प्रभाकरण की ‘त्रिवेणी अर्थमूवर्स’ को देने का फैसला किया था और केवल दो साल में ‘एडलर’ को ‘त्रिवेणी अर्थमूवर्स’ से शेयर के रूप में 113 करोड़ रुपये की विराट धनराशि मिली।

यार चुनने में अश्वनी वैष्णव बहुत माहिर थे। उनके यार बी प्रभाकरण के बारे में उड़ीसा के वित्त मंत्री ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बी प्रभाकरण उन चार लोगों में से है जो उड़ीसा की सरकार चलाते हैं। इस गुस्ताखी के लिए मंत्री जी का पद छीन लिया गया था।

धन के बादल फटे और जमकर बारिश हुई, कुछ ही सालों में एडलर का मुनाफा लगभग तीन सौ गुना तक बढ़ गया। एडलर के दो साल बाद, 2017 में प्रभाकरण और वैष्णव ने मिलकर एक और कम्पनी बना ली, जिसने पैलेट्स यानी लोहे के छर्रे बनाकर ही करोड़ों का मुनाफा कमाया क्योंकि सरकारी बन्दूकों में इनका इस्तेमाल बढ़ता ही जा रहा है। यह गजब का व्यापार है, सरकार जनता पर जितना ज्यादा गोलियाँ चलाएगी अश्वनी जी का मुनाफा बढ़ता जाएगा। इस कम्पनी के दस्तावेज बताते हैं कि जितना भी माल बनाया, सारा बिक गया, कभी स्टॉक बाकी ही नहीं रहा। कम्पनियों के इतिहास में ऐसा कभी–कभार ही होता है।

शायद मोदी जी के “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” का सबसे ज्यादा लाभ माननीय रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव ने ही उठाया। वह प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के भी उतने ही लाडले हैं जितने उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के। 2019 में, राजनीति में एक दूसरे के धुर विरोधी बीजू जनता दल और भाजपा दोनों ने मिलकर अश्वनी वैष्णव को उड़ीसा से राज्यसभा सांसद बनाकर भेजा था। विपक्षी पार्टियाँ चिल्लाती रह गयीं कि खनन माफिया के आदमी को राज्यसभा मत भेजो, वह राज्य के हितों की रक्षा कैसे कर सकता है, आदि, आदि। उनकी चिल्ल–पों का कोई असर नहीं हुआ।

जैसे ही अश्वनी वैष्णव राज्यसभा पहुँचे ‘एडलर’ कम्पनी भी भेड़िया से चीता बन गयी। वह भी पैलेट्स यानी छर्रे बेचने लगी। जनता और खासकर कश्मीर की जनता तथा आन्दोलनकारी किसानों पर पैलेट्स गोलियों का खूब इस्तेमाल हुआ, दर्जनों की आँखें फूटीं, सैंकड़ों घायल हुए। अश्वनी जी की मौज हो गयी, ‘एडलर’ 2021 तक 323 करोड़ का राजस्व कमाने वाली कम्पनी बन गयी।

रेलवे सबसे बड़े और मलाईदार विभागों में से है। इसमें लोहे की बहुत जरूरत होती है और अश्विनी वैष्णव लोहे के धंधे तथा खनन माफियाओं के अच्छे जानकार, लिहाजा जुलाई 2021 में उन्हें रेल मंत्री बना दिया गया। वैष्णव के रेल मंत्री बनने के बाद से देश में 131 रेल हादसे हो चुके हैं। इनके कार्यकाल में ही पिछले तीन दशक का सबसे बड़ा रेल हादसा उड़ीसा में हुआ था जिसमें लगभग 300 लोगों की जान चली गयी थी। लोगों ने अश्वनी वैष्णव से इस्तीफा देने के लिए कहा, तर्क भी दिया कि मंत्री के पास ज्यादा काम है। वह तीन–तीन मंत्रालय चलाएँ, कम्पनियाँ चलाएँ, माफियाओं से रिश्ता चलाएँ या रेल चलाएँ। लेकिन उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती बनकर रह गयी।

अश्वनी वैष्णव पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने “सुरक्षित रेल परिचालन” के बजाय अमृत स्टेशन, बुलेट ट्रेन, वन्दे भारत जैसी मंत्रियों को अमृतपान कराने वाली योजनाओं को रेलवे के बजट के केन्द्र में रखा। अश्विनी वैष्णव रेलमंत्री बनने से तीन दिन पहले तक अपनी साझेदारी वाली चार कम्पनियों में सबसे ऊँचे पदों पर आसीन थे। मंत्री बनने पर उन्होंने दिखा दिया कि वह शुद्ध व्यवसायिक मानसिकता रखते हैं। जब वह एडलर कम्पनी की जिम्मेदारी सम्हाल रहे थे तब उनका वेतन कम्पनी के सैंकड़ों मजदूरों के कुल वेतन से कई गुना ज्यादा था। उनकी कम्पनी कम वेतन में कम लोगों से ज्यादा काम लेने के लिए बदनाम थी। यही तरीका उन्होंने रेलवे में अपनाया जिसके लिए रेल सुरक्षा से समझौता किया गया। शायद इसीलिए वह प्रधानमंत्री मोदी के इतने चहेते हैं। एक चालबाज और माफियाओं से रिश्ते रखने वाले व्यवसायी और राजनीति में बिल्कुल अनुभवहीन व्यक्ति को बेहद महत्वपूर्ण रेल मंत्रालय सहित तीन–तीन मंत्रालयों की जिम्मेदारी क्यों दी गयी है, इसका अन्दाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है।

मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता सम्हालने से पहले ही “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” का नारा दिया था। जब किसी देश की सरकार ऐसे घटिया सिद्धान्तों पर चलने लगे तो वैष्णव जैसे मुनाफाखोर राजनेता बनकर देश की जनता पर सवारी करेंगे ही और अपने पद और पावर का इस्तेमाल अपनी पूँजी बढ़ाने में करते रहेंगे। आप उनका क्या बिगाड़ सकते हैं, चाहे वे देश को लूट कर खा जायें?

–– विशाल विवेक