मैं बिहार से नोएडा इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने आया हूँ। आज कॉलेज में मेरा पहला दिन है। कॉलेज की दीवारों पर प्लेसमेंट के होर्डिग ऐसे लगे थे मानो पढ़ाई पूरी होने के बाद सीधे सीईओ बनाकर भेजेंगे। यहाँ इंजीनियरिंग कॉलेज ऐसे खड़े हैं जैसे कतार में हाथ जोड़े अतिथि–सत्कार में बेताब लोग हों। कॉलेज के शुरुआती दिन किसी हनीमून पीरियड से कम नहीं थे। फ्रेशर पार्टी में बड़े–बड़े अभिनेताओं और गायकों को बुलाया जाता, मानो हमारा एडमिशन किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में नहीं, बल्कि फिल्मफेयर की ट्रेनिंग के लिए हुआ हो। चारों तरफ मौज–मस्ती का ऐसा माहौल कि क्लासरूम की दीवारें भी नाचती हुई महसूस होती थीं। यहाँ कुछ दिन तो बड़े बढ़िया से गुजरे, लेकिन जल्द ही हकीकत ने धुएँ के बादलों को हटा दिया।

एक दिन मेरे फोन पर एक आर्थिक फरमान आ टपका–– “साप्ताहिक टेस्ट में अनुपस्थित रहने के जुर्म में आप पर 500 रुपये का अनुशासन शुल्क लगाया गया है।” यह जुर्माना मेरी नजर में किसी अवैध वसूली से कम नहीं था। पहला सवाल तो यह कि इन साप्ताहिक परीक्षाओं का फाइनल रिजल्ट से कुछ लेना–देना नहीं था। दूसरा वैज्ञानिक चमत्कार यह कि भला 500 रुपये का नोट देते ही मेरे ज्ञान में इजाफा कैसे हो जायेगा? यह बात मेरी समझ से उसी तरह बाहर थी, जैसे हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धान्त।

अगले दिन कॉलेज पहुँचा तो देखा कई छात्रों के चेहरों पर 500 रुपये वाली उदासी झूल रही थी। मैंने मौका देख तुरन्त विद्रोही स्वर में समझाना शुरू किया “भाइयों, मैनेजमेंट से बात करते हैं, यह सरासर अन्याय है!” लेकिन मेरे विद्रोही स्वर का असर केवल दो छात्रों पर ही हुआ। बाकी लोगों ने मुण्डी झुकाकर 500 रुपये देने में ही भलाई समझी। क्योंकि कॉलेज मैनेजमेंट से सवाल करने का मलतब है ‘अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारना’। खैर हम तीन स्वयम्भू विद्रोही मैनेजमेंट के दफ्तर पहुँचे।

“नेतागिरी करने आये हो? मालूम नहीं है यह क्या जगह है? ‘नो पॉलिटिक्स प्लीज!’ का बोर्ड नहीं देखा।” हमारी शिकायत सुनते ही क्लर्क अपनी कुर्सी से ऐसे उखड़ा जैसे किसी ने शॉर्ट–सर्किट कर दिया हो।

“क्या?” मैंने मासूमियत से पूछा।

“बेटा, इस कॉलेज में पॉलिटिक्स नहीं चलती, यहाँ सिर्फ फीस चलती है और रसीद कटती है।” उसने मेज थपथपाते हुए कहा।

जब मैंने इसे अवैध वसूली बताने की कोशिश की, तो वह तमतमा उठा, “तीन लोग एक साथ! इसे मैनेजमेंट की भाषा में यूनियनबाजी कहते हैं। आज तीन आये हो, कल तीस आओगे, फिर क्या गेट पर टेंट लगाओगे?” फिर उसने अपना ब्रह्मास्त्र निकाला। “तेरे बाप का नम्बर बता! अभी बताता हूँ कि उनका लाडला यहाँ इंजीनियर बनने नहीं, नोएडा का ‘अन्ना हजारे’ बनने आया है।”

बाप का नम्बर सुनते ही मेरे दो साथी ऐसे गायब हुए जैसे ‘गधे के सिर से सींग’। मैंने हकलाते हुए कहा, “सर, तीन लोग आना राजनीति कैसे हो गयी? ये तो बस एक इत्तेफाक है।”

उसने तिरस्कार से मुझे देखते हुए कहा, “बेटा, ये नोएडा है। यहाँ अगर तीन छात्र एक साथ पानी भी पी रहे हों, तो उसे हम मैनेजमेंट के खिलाफ जल–षड्यंत्र मानते हैं। तुम्हें पता है 500 रुपये का महत्व?” “जी सर, पन्द्रह दिन का नाश्ता–––” मैंने ईमानदारी दिखाई। “रोंग आन्सर!” वह दहाड़ा। “डीजे नाइट्स पर जमकर ठुमका लगाते हो। बर्गर, पिज्जा, मोमो जमकर खाते हो। और कहते हो पन्द्रह दिन का नाश्ता। यह 500 रुपये डीजे नाइट्स का चन्दा समझो।”

“लेकिन सर डीजे नाइट्स करने के लिए हमने तो नहीं कहा” मैंने थोड़ी हिम्मत जुटाकर कहा।

“अरे ये बाते तुम्हारी समझ से बाहर है। तुम क्या जानो ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों का महत्व। इन सांस्कृतिक आयोजनों से हमारी शाख बढ़ती है। छात्रों के दिमाग ऐसे ठण्डे रहते हैं मानो नवरत्न तेल से मालिश कर दिया हो। और भी काफी फायदे हैं। ये सब बातंे तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी”, उसने एक साँस में ज्ञान देने के बाद अपनी बोतल से ठण्डा पानी पिया। मेरा गला प्यास और अपमान से सूख रहा था।

उसने आगे समझाया, “राजनीति वो होती है जहाँ सवाल पूछे जाते हैं। कॉलेज तो मन्दिर है, यहाँ छात्र सिर्फ प्रसाद लेने आता है, पुजारी से यह नहीं पूछता कि लड्डू छोटे क्यों हैं?”

इसी बहस के बीच क्लर्क ने मेरे पिताजी को फोन लगाया। फोन पर पिताजी ने 500 रुपये जुर्माना भरने के लिए सहमति दे दी। मैं मायूस होकर लौट आया।

इस खौफ का आलम यह हुआ कि अगले महीने सगी मौसी की शादी में जाने का विचार त्याग दिया। माँ ने बहुत मनाया, “बेटा, इकलौती मौसी है, शादी रोज–रोज नहीं होती है?”

मैंने सोचा, “माँ, इस शादी के चक्कर में कॉलेज की एक भी क्लास छूटी, तो मैनेजमेंट का 500 रुपये वाला चाबुक फिर से बरसेगा।”

उस दिन मुझे समझ आया कि प्राइवेट कॉलेज में छात्र–राजनीति पर रोक क्यों है। यहाँ शिकायत के लिए अकेले आओ तो प्रार्थी हो और साथ आओ तो अपराधी हो। कुछ दिन मन परेशान रहा पर मैं अकेला क्या करता? सब कुछ भूलकर फिर से पढ़ाई में जुट गया।

ताज्जुब तो यह देखकर हुआ जब पिछले सोमवार चलती क्लास के बीच कुछ बाहरी लोग दफ्तर के अधिकारी के साथ आ धमके। प्रोफेसर साहब ऐसे खामोश हो गये जैसे किसी ने रिमोट से म्यूट बटन दबा दिया हो।

पार्टी का पटका पहने एक शख्स ने अधिकार से घोषणा की “सभी भावी इंजीनियरों को सूचित किया जाता है कि इस रविवार को विपक्ष के दफ्तर के बाहर एक विशाल विरोध प्रदर्शन है। जो छात्र वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा, उसे मैनेजमेंट की तरफ से विशेष लाभ (शायद अटेण्डेंस या मार्क्स की रिश्वत) दिया जाएगा।”

क्लास से बाहर आये तो छात्रों में इस बात की चर्चा हो रही थी। पास खड़े एक समूह से किसी छात्र ने कहा “चले जायंेगे अपना क्या जाता है। कम से कम अटेण्डेंस तो पूरी हो जाएगी।”

मैं सन्न रह गया! जो कॉलेज कल तक राजनीति से कैरियर बर्बाद होने का इंजेक्शन लगा रहा था, आज वह खुद छात्रों को राजनीति की मण्डी में खड़ा कर रहा था। यहाँ राजनीति केवल छात्रों के मुद्दों के लिए प्रतिबंधित है, मैनेजमेंट के लिए नहीं। हम छात्र नहीं, हेड–काउंट हैं, शुल्क लेना हो तो अनुशासित बच्चा और शक्ति प्रदर्शन करना हो तो भाड़े के सैनिक।

कब नेताओं से रिबन कटवाना है, कब मोटिवेशनल स्पीकर को बुलवाना है। लाखों खर्च करने के बाद प्लेसमेंट के नाम पर कम्पनियों को सस्ते मजदूर कैसे मुहैया कराने है। इन सबके लिए मैनेजमेंट नयी–नयी पालिसी बनाती है। वह सब राजनीति नहीं, देशहित है और अगर छात्र अपने हित में बात करें, मिलकर आवाज उठायें तो वह राजनीति है, वह उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

प्राइवेट कॉलेजों में देश के अलग–अलग हिस्सों से छात्र आते हैं। यहाँ छात्र एकदम अकेले होते हैं। यहाँ अपना सगा कोई नजर नहीं आता। यह अकेलापन एक डर पैदा करता है। और यह डर हमें चुप रहना सिखा देता है। सवाल करने की आदत कॉलेज परिसर में दम तोड़ देती है। नोएडा आने से पहले मैंने सोचा था कि कॉलेज एक चलती रेलगाड़ी की तरह होगा, जहाँ खिड़की से समाज और जीवन के नजारे देखेंगे। लेकिन यहाँ आकर पता चला कि यह तो एक अंधेरा कमरा है एक ऐसा ब्लैक होल जहाँ न खिड़की है, न रोशनी। जहाँ विवेक नहीं, आज्ञाकारिता तौली जाती है। हर साल हजारों नौजवान अपनी आँखों की चमक इस अंधेरी सुरंग में खो देते हैं। वे अपनी मौलिकता लेकर आते हैं और साँचे में ढले आज्ञाकारी रोबोट बनकर निकलते हैं। और जो इस मशीनी घुटन को बर्दाश्त नहीं कर पाते, वे इस दुनिया से ही एग्जिट कर लेते हैं।

मैनेजमेंट के लिए वे सिर्फ एक एनरोलमेंट नम्बर थे जो कम हो गया। और सरकार के लिए एक आँकड़ा जो बढ़ता जा रहा है। पर माँ–बाप के लिए वह वह सपना था जो पूरा होने से पहले ही दम तोड़ गया। हम इंजीनियर तो बन रहे हैं, पर इनसानियत के पुर्जे इसी कॉलेज के गेट पर कहीं गिरते जा रहे हैं। यहाँ मैनेजमेंट का बस एक ही मंत्र है भावनाओं को गेट पर छोड़ आओ, “कोल्हू के बैल” बनो और कैरियर की उस चक्की में पिसते रहो जो अन्त में एक चमचमाती डिग्री और एक थका हुआ शरीर देगी।

छात्र राजनीति पर प्रतिबन्ध से केवल कॉलेज मालिकों के साथ सरकार की भी “पाँचों ऊँगली घी में और सिर कड़ाही में है।” हर साल बढ़ती फीस, अनुशासन के नाम पर जुर्माना, घटिया इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्लेसमेंट के नाम पर धोखाधड़ी तभी चल सकती है जब छात्र राजनीति न करें। कॉलेजों के मालिक यह बात जानते हैं। इसलिए तमाम तरह के प्रपंच रचकर छात्रों की राजनीति पर बैन लगाया गया है। ताकि मालिकों को लूट की खुली छूट मिल सके।

राजनीति करने का मतलब सिर्फ एमपी, एमएलए या मंत्री बनना नहीं है। अपनी समस्याओं से निपटना, अपने हक के लिए आवाज उठाना, अन्याय के विरुद्ध बोलना और न्याय के पक्ष में खड़ा होना भी राजनीति है।

लेकिन जहाँ शिक्षा के मन्दिर ही छात्रों को इनसानी मशीन में ढाल रहे हों। वहाँ कॉलेज के बाद नौजवान बेरोजगारी, शोषण, भष्ट्राचार, श्रम कानूनों के बदलाव जैसी विकराल समस्याओं के विरोध में कैसे बोलेगा? मत बोलो, राजनीति होगी। राजनीति करने की मनाही है, हालात से तंग आकर मौत को गले लगाने की मनाही नहीं है। आखिर क्यों और किसके लिए राजनीति करना आत्महत्या से भी खतरनाक है? वे वही लोग हैं जो छात्रों की लाशों पर राजनीति की रोटियाँ सेंकते हैं। जो भ्रष्ट्र सरकार, साम्प्रदायिक नेताओं और अत्याचारी प्रशासन के तलवे चाटते हैं और छात्रों को ज्ञान देते हैं कि राजनीति मत करो। साथियो, अपने हक के लिए आज नहीं तो कल राजनीति तो करनी ही पड़ेगी।