बीएसएनएल का जिओ पर करोड़ों बकाया
समाचार-विचार उत्कर्षनियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 1 अप्रैल 2025 को एक रिपोर्ट जारी की। उसने बताया कि जिओ ने 2014 से 2024 तक बीएसएनएल के बुनियादी ढाँचे के इस्तेमाल के लिए एक भी रुपये का भुगतान नहीं किया है। आज बीएसएनएल का नुकसान बढ़कर 1757–36 करोड़ रुपये हो गया है। बीएसएनएल ने ‘मास्टर सर्विस एग्रीमेण्ट’ की शर्तों का पालन नहीं किया और लाइसेंस शुल्क का हिस्सा ‘टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स’ से वसूल नहीं किया, जिससे उसे 38–36 करोड़ रुपये का अतितिक्त नुकसान हुआ है। सरकार ने बीएसएनएल को मौत के कगार पर खड़ा कर दिया है और अब वह इतना बड़ा नुकसान झेलने की स्थिति में नहीं है।
आज से 10 साल पहले बीएसएनल और जिओ के बीच ‘मास्टर सर्विस एग्रीमेंट’ हुआ था जिसमें जिओ को बीएसएनएल के बुनियादी ढाँचे, जैसे–– टावर, बिजली, जमीन आदि का इस्तेमाल करने के लिए परमिशन मिली थी और इसकी एवज मंे उसे निर्धारित शुल्क अदा करना था। लेकिन जिओ ने बीते 10 साल में एक पाई भी नहीं दिया। बीएसएनएल ने भी इस एग्रीमेंट पर आँख मूँद ली और जिओ से कोई तगादा नहीं किया। इस प्रकरण के बारे में अभी तक बीएसएनएल और जिओ ने कुछ भी साफ–साफ नहीं बताया है। बीएसएनएल को होनेवाला इतना बड़ा घाटा, सरकार और जिओ के बीच हुए लेनदेन में भ्रष्टाचार को साफ दिखाता है।
जिओ की दनदनाती नेटवर्क सर्विस आज एडवांस टेक्नोलॉजी और मजदूरों के शोषण के दम पर खूब मुनाफा कमा रही है और अपना कारोबार बढ़ाते हुए देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी बन गयी है। उसके देशभर में 46–51 करोड़ उपयोगकर्ता हैं और वहीं बीएसएनल की हालत का अन्दाजा इस तथ्य से हो जाता है कि उसके पूरे भारत में सिर्फ 9–19 करोड़ ही उपयोगकर्ता हैं। जहाँ एक तरफ सभी प्राइवेट कम्पनियाँ 5–जी नेटवर्क लगाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी तरफ बीएसएनएल आज भी 3–जी नेटवर्क से काम चला रहा है।
सवाल उठता है कि जिओ और बीएसएनएल के बीच का यह कैसा समझौता है जिसमें फायदा सिर्फ जिओ का है। जिओ अगर पहले ही उसका भुगतान कर देता तो आज बीएसएनएल की हालात इतनी बुरी नहीं होती। इतनी बड़ी रकम न देना साफ दिखाता है कि बीएसएनएल और जिओ का समझौता जिओ को फायदा पहुँचने के लिए था, जिसके मालिक मोदी जी के चहेते अम्बानी जी हैं। यही कारण है कि इस पर सरकार ने भी अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। सरकार का पक्ष साफ है। जो सरकारी कम्पनी जनता के पैसों से बनी है उसका इस्तेमाल एन–केन–प्रकारेण पूँजीपतियों को फायदा पहुँचने के लिए करना है।
यह 1990 की नवउदारवादी नीतियों का नतीजा है, जिसने निजीकरण का रास्ता खोल दिया था। सरकार ने सरकारी कम्पनियों को कौड़ियों के भाव बेचा और प्राइवेट कम्पनियों के लिए अनगिनत छूट दी, जिससे वे सरकारी संस्थानों को निगल सकें। इससे जनता जरूरत की चीजें सरकारी संस्थाओं से सस्ते दामों के बजाय आज प्राइवेट कम्पनियों से महँगे दामों में खरीदने को मजबूर है। इनसे उसकी जिन्दगी भर की खून–पसीने की कमाई खत्म होती जा रही है। मौजूदा सरकार अम्बानी–अडानी जैसे पूँजीपतियों की सेवा में कोई कोर–कसर नहीं छोड़ रही है। इसी का नतीजा है कि आज जिओ सबसे महँगे नेटवर्क में से एक है और बाजार पर उसी का कब्जा है, जबकि बीएसएनएल आज भी सबसे सस्ता होने के बावजूद बन्दी के कगार पर पहुँच गया है। सरकार पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए जनता के शोषण और लूट का दरवाजा खोलने से बाज नहीं आ रही है। जब तक हमारी अर्थव्यवस्था चन्द मुनाफाखोरों के हाथ में बनी रहेगी, तब तक जनता की मेहनत की कमाई इसी तरह इन परजीवियों के हवन कुण्ड में स्वाहा होती रहेगी।
लेखक की अन्य रचनाएं/लेख
समाचार-विचार
- धड़ल्ले से बढ़ता नकली दवाओं का कारोबार 17 Nov, 2023
- बीएसएनएल का जिओ पर करोड़ों बकाया 7 Jul, 2025
- भाजपा शासित राज्यों में बुल्डोजर का बढ़ता आतंक 20 Aug, 2022
- भाजपा सरकार में मुसलमानों और ईसाइयों पर बढ़ते हमले 6 May, 2024
- भुखमारी और कुपोषण से जूझती विशाल आबादी 17 Feb, 2023
- लोकतंत्र के स्वनामधन्य देश अमरीका में गूँज रहे लोकतंत्र बचाने के नारे 12 Dec, 2025
- विश्व असमानता रिपोर्ट के मायने 13 Apr, 2022
- ‘छँटनी’ से बेहाल नौकरीपेशा लोग 13 Sep, 2024