भारत को विश्वगुरु बनायेगा गोबर!
समाचार-विचार समर्थहमारे देश को विश्वगुरु बनाने के अथक प्रयास हो रहे है लेकिन ध्यान रहे कि इस लक्ष्य की प्राप्ति गोबर की महिमा स्थापित किये बगैर नहीं हो सकती। इसके लिए धार्मिक बाबाओं से लेकर नेतागण, वैज्ञानिक और उच्च पदों पर आसीन सरकारपरस्त महानुभाव एड़ी–चोटी का जोर लगा रहे है। प्राचीन ग्रंथों को खंगालकर गोबर जनित दिव्य युक्तियों को सामने लाया जा रहा है। परन्तु दुर्भाग्य! प्राचीनकाल की तरह आज भी इस गोबर–यज्ञ में विघ्न डालने वालों की कोई कमी नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज की प्रधानाचार्य द्वारा रचित गोबरकांड में विघ्न से यह सत्य सिद्ध हो चुका है।
प्रिंसिपल मैडम ने गाय के शुद्ध गोबर से एक कक्षा की दीवारों को लीपकर महा गोबर–यज्ञ में पहली आहुति ही दी थी कि नारद नेट ने उनका वीडियो वायरल कर दिया। मंगल कार्य की भनक विघ्नकर्ताओं को लग गयी। उन्होंने हमला बोल दिया। मैडम ने गोबर के ‘कूलिंग इफेक्ट’ पर रिसर्च की बात कहकर उनका ध्यान भटकाने की कोशिश की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। ‘वैदिक ज्ञान’ का ब्रह्मास्त्र भी नाकाम रहा। शीर्ष पर विराजमान गोबर गणेश और सालों तक की गयी उनकी स्तुति भी काम नहीं आयी।
कालचक्र की गति विपरीत हो गयी, अपने ही पराये हो गये। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय ने अनिष्ट से बचने के लिए प्रिंसिपल मैडम को कालेज–कक्ष के बजाय स्वयं का घर गोबर से पोतने की सलाह दी। शुक्र है, मैडम ने इस आत्मघाती सलाह पर अमल नहीं किया, वरना उनके अपने बच्चे–कच्चे, रिश्तेदार मिलकर उन्हें पगलखाने भेज सकते थे।
वैदिक ज्ञान के प्रति मैडम का प्रेम ‘सच्चा’ है, वे अपना नहीं जगत का कल्याण चाहती हैं। उनकी इच्छा है कि उनके अपने घर–परिवार को छोड़कर, देश का हर कोना, हर दिमाग गोबर की सड़ाँध से सरोबार हो जाये। अफसोस कि विघ्नकारियों ने उनके ऑफिस की दीवारों पर ही गोबर पोत डाला।
हालाँकि ‘रामराज्य’ की सत्ता प्रिंसिपल मैडम के साथ है। सरकार द्वारा गठित कामधेनु आयोग और आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर तक गोबर को महिमण्डित करने में जी–जान से जुटे हैं। उनके अनुसार गौमूत्र और गोबर में कैंसर, त्वचा की बीमारियों के इलाज, फोन के रेडियेशन से बचाव की दिव्य शक्ति है। कोरोना काल में जब दुनिया के वैज्ञानिक कोविड का टीका ढूँढने में सर खपा रहे थे तब हमारे देश के कई महापुरुषों ने सरेआम गाय के मूत्र और गोबर का सेवन करके खुद को कोरोना–रोधी बना लिया था। लेकिन अफसोस कि भरपूर प्रचार के बावजूद देश–दुनिया के लोगों ने उनका अनुसरण करने के बजाय उनके दिमाग में गोबर भरा होने का आरोप लगाया। लेकिन अज्ञानी नहीं जानते कि इस विशेषता के बिना आज महापुरुष बनना सम्भव ही नहीं है।
प्रिंसिपल मैडम को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। उन्होंने गोबर के वैदिक ज्ञान लागू करके भारत को विश्वगुरु बनाने की ओर कदम बढ़ाया है और उस धन को भी बचाया है जो कक्ष को ठण्डा रखने के लिए खर्च करना पड़ता। अब यह निजी जरूरतों पर खर्च किया जा सकता है।
हिन्दुस्तान को गोबरिस्तान बनाने की विराट परियोजना में बहुत से राजनेता, सन्यासी, इतिहासकार, वैज्ञानिक आदि ने दिन रात एक कर रखा है। वेदों–उपनिषदों समेत तमाम प्राचीन ग्रंथों में गोबर की दिव्य शक्तियाँ खोजी जा रही हैं। हालाँकि इनमें गोबर जैसे गूढ विषय पर बहुत कम लिखा गया है। हो सकता है प्राचीन ऋषि–मुनियों ने यह विषय आज के गोबर–भक्तों के लिए छोड़ दिया हो। एक दिक्कत और है, इस दिव्य गोबर–ज्ञान के प्रचार–प्रसार के लिए निकृष्ट आधुनिक विज्ञान के व्हाट्स एप, ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्मों की मदद लेनी पड़ रही है जिनमें विघ्नकारी लोग भी घुसे हैं। एक ऐसा गोबर–तंत्र निर्माणाधीन है जिससे समस्त गोबर–ज्ञान एक गुबरैले दिमाग से दूसरे में गोबर–रे से पहुँच जाया करेगा। इस तंत्र में कोई गोबर–मुक्त दिमाग घुस ही नहीं पायेगा।
गोबरिस्तान बनाने के प्रयास पिछले सौ साल से चल रहे हैं। जब पाकिस्तान बना तभी गोबरिस्तान बन सकता था, वक्त माकूल था, दोनों तरफ गोबर भरे दिमाग वाले काफी लोग थे, अंग्रेज भी साथ थे, लेकिन नेहरू जैसे लोगों ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया। बाद में जब–जब भी प्रिंसिपल मैडम जैसे लोगों ने प्रयास किये, तर्कशील, धर्मविरोधी लोगों ने अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता फैलाने का आरोप लगाकर बाधा उत्पन्न की। 1990 के बाद जब अमरीका और कारपोरेट जगत की नजरे–इनायत हुई गोबरिस्तान के निर्माण अभियान ने गति पकड़ी। पूरी आजादी 2014 में जाकर ही मिल पायी। तब से छल–बल के नये सृजनात्मक प्रयासों को अंजाम दिया जा रहा है।
हालाँकि आज भी देश–दुनिया के तर्कशील और वैज्ञानिक सोच के लोग वेद जनित दिव्य गोबर–ज्ञान का मजाक उड़ाने का मौका नहीं चूकते। वे गोबर संस्कृति से देश को पीछे ले जाने के आरोप लगाते हैं। यह गोबर और देश दोनों को बदनाम करने की साजिश है। इसलिए सरकार देश में हर गोबर–विरोधी को राष्ट्र–विरोधी, देशद्रोही घोषित कर रही है।
आखिर हमारे देश के ऋषि–मुनियों ने कठिन तपस्या से पुराणों, वेदों का सृजन किया था। यह दिव्य ज्ञान का खजाना है। अष्टादश पुराण में विष्णुपुराण, गरुड़पुराण, मतस्यपुराण, नारदपुराण आदि अठ्ठारह पुराण शामिल हैं। अब जरूरत है गोबरपुराण की। लेकिन प्राचीनग्रंथों में इसका उल्लेख नहीं मिल पा रहा है। हालाँकि मौजूदा राजनैतिक–धार्मिक माहौल में गोबर पर चर्चाओं ने व्यापक रूप लिया और नये–नये पहलुओं को छुआ है। अगर इन्हीं चर्चाओं के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को एक साथ संस्कृत में लिपिबद्ध कर लिया जाये तो गोबरपुराण बन जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि सरकार पुरातन संस्कृति के संरक्षण और विकास के कार्यों को शीघ्र–अतिशीघ्र अपने जिम्मे ले ले।
विश्वगुरु बनना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए गोबरिस्तान की अनिवार्य मंजिल से होकर गुजरना पड़ेगा। प्रत्येक जन को साथ देना होगा। मोदी जी और उनके मंत्रीयों को खुद बढ़–चढ़कर गोबर हित में कार्य करने होंगे। इसकी शुरुआत विशालकाय सेंट्रल विस्टा की बिल्डिंग से लेकर देश के तमाम संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, नेताओं और अधिकारियों के घरों पर गोबर पुतवाकर की जा सकती है। बीएचयू में भी छात्रों को गोबर से उपले बनाने कि स्पेशल ट्रेनिंग दी गयी थी, ताकि वे गाँव के लोगों के साथ मिलकर स्टार्ट–अप शुरू कर पायें और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे पायें।
प्राचीन काल के ज्ञान और सरकार के मिले–जुले प्रयासों से जनता की समस्याएँ खुद–ब–खुद दूर होने लगेंगी। गोबर सबको रोजगार देगा। गाँव से शहर जाकर बसे लोग गोबर में काम करने वापिस गाँव आ जाएँगे। बीमारियाँ गोबर से ठीक कर दी जाएँगी। स्कूल–कॉलेज बन्द करके गोबर शिक्षा और अनुसंधान केन्द्र खोल दिये जाएँगे। यानी जनता को गोबर गणेश बनाकर पहले हिन्दुस्तान को गोबरिस्तान फिर विश्वगुरु बनाया जाएगा।
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