गली–मुहल्ले की किराना दुकानें आस–पास के लोगों के लिए बहुत मायने रखती हैं। आटा, दाल, चीनी, साबुन, तेल, मसाले जैसे रोजमर्रा की जरूरत के सामान और बच्चों को लुभाने वाली लॉलीपॉप, टॉफी, चूरण जैसी चीजें यहाँ हरदम मौजूद रहती हैं। ये दुकानें मुहल्ले के लोगों के मिलने का एक सामाजिक केन्द्र भी होती हैं। रोज–रोज का नाता पड़ने से ग्राहकों और दुकानदारों के बीच करीबी रिश्ते बन जाते हैं। संकट की घड़ी में दुकानदार सामान उधार भी दे देते हैं। लेकिन अफशोस, आज ऐसी लाखों दुकानें उजड़ रही हैं।

अखिल भारतीय उपभोक्ता उत्पाद वितरक संघ (एआयीसीपीडीएफ) की नवम्बर में आयी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में करीब 2 लाख किराना दुकानें उजड़ गयी हैं। इसका मुख्य कारण तुरन्त खरीद की सुविधा (क्विक कॉमर्स या त्वरित वाणिज्य) देने वाली कम्पनियों और दूसरी ऑनलाईन बिक्री कम्पनियों के बढ़ते व्यापार को बताया गया है। ब्लिंक इट, जेप्टो, डूँजो, स्वीगी कुछ ऐसे क्विक कॉमर्स प्लेटफार्म हैं जिस पर ग्राहक मोबाइल एप के जरिये दूध, आटा से लेकर आयी–फोन तक मँगवा सकते हैं।

ये कम्पनियाँ 10 मिनट के अन्दर सामान पहुँचाने की गारण्टी देती हैं। भारी छूट, धुआँधार प्रचार और तरह–तरह के ऑफर देकर इन्हांेने ग्राहकों के बीच तेजी से पैठ बनायी है। इस साल त्यौहारों पर इन कम्पनियों द्वारा बेचे जाने वाले कुछ उत्पादों की बिक्री पिछले साल की तुलना में 250 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है। ऑनलाइन बिक्री कम्पनियों के अलावा वॉलमार्ट, कारीफोर, मेट्रो, कैश एण्ड कैरी जैसी खुदरा सामान बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और रिलायन्स जैसी देशी कम्पनियाँ भी खुदरा बाजार को कब्जाने में लगी हैं।

बाजार पर अपना एकाधिकार कायम करने के लिए इनके पास विशाल तामझाम और बहुत बड़ी मात्रा में पूँजी है। सरकारें इनकी राह की हर बाधा हटाने के लिए सभी उपाय कर रही हैं। इनकी चमक–दमक मनमोहक है, ये लोगों की पसन्द को बदल देती हैं और अपने माल का उन्हें दीवाना बना देती हैं। ये उत्पादकों से सीधे बहुत बड़ी मात्रा में सामान खरीदती हैं और उसे इतनी कम बचत पर बेचती हैं, जिस पर खुदरा दुकानदारों के लिए बेचना सम्भव ही नहीं है। कुल मिलाकर गली–मुहल्ले की दुकानों को तबाह करने के लिए इनके पास सैंकड़ों तरीके हैं।

छोटे दुकानदार सरकारी संरक्षण के बिना इन दैत्याकार कम्पनियों का मुकाबला नहीं कर सकते। अपनी जिन्दगी भर की जमा–पूँजी लगाकर, बैंक से कर्ज लेकर छोटे दुकानदार माल खरीदतें और जगह किराये पर लेते हैं। हमारे इर्द–गिर्द की ये छोटी–छोटी दुकानें भारत में खुदरा व्यापार की रीढ़ हैं। इन्हीं के जरिये दूर–दराज के लोगों तक जरूरत का सामान पहुँचता है। खुदरा व्यापार में लगी दैत्याकार देशी–विदेशी कम्पनियाँ केवल शहरों के बाजार की मलाई खाती हैं। खुदरा दुकानें करोड़ों लोगों की जीविका का जरिया हैं। छोटी सी दुकान से पूरा परिवार पलता है। पिछले एक साल में दो लाख किराना दुकानें उजड़ने का अर्थ है लगभग 10 लाख लोगों की जीविका का उजड़ जाना। 

दुकानदार जरूरत के हिसाब से अपने यहाँ आदमियों को नौकरी पर भी रखते हैं। साइकिल–बाइक पर सामान लादकर गली–गली की दुकानों तक पहुँचाने वाले छोटे सप्लायर भी इन्हीं के जरिये रोजगार पाते हैं। इन दुकानों के जरिये उन छोटे स्थानीय निर्माताओं को भी काम मिलता है जिनके बनाये हुए उत्पाद जैसे अचार, पापड़, ब्रेड, पेटीज आदि को छोटे दुकानदार अपने यहाँ बेचते हैं। छोटी खुदरा दुकानें उजड़ जायेंगी तो इन तमाम लोगों की जीविका भी उजड़ जायेगी। मुट्ठीभर देशी–विदेशी कम्पनियों के मुनाफे के लिए लाखों लोगों की जिन्दगी तबाह कर देना, क्या यही है देश का लोकतन्त्र ?      

केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल तबाह होती खुदरा दुकानों को लेकर मौका–ब–मौका घड़ियाली आँसू बहाने से नहीं चूकते हैं। इस तबाही को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय उनकी ही पार्टी की सरकार अपनी नीतियों से छोटे खुदरा दुकानदारों को उजाड़ने में जी जान से लगी हुई है। सब जानते हैं कि भाजपा सरकार के नोटबन्दी और जीएसटी जैसे फैसले छोटे दुकानदारों को उजाड़ने वाले साबित हुए थे।

भाजपा सरकार जिन नव–उदारवादी नीतियों को लागू कर रही है वे पहले ही किसानों–मजदूरों को तबाह कर चुकी हैं और अब छोटे दुकानदारों को उजाड़ रही हैं। बड़े–बड़े पूँजीपतियों से यारी मोदी की अब किसी से छिपी नहीं है। उनकी सरकार इन्हीं पूँजीपतियों की सेवा में लगी है। जो इनका विरोध करता है उस पर लाठी–गोली चलायी जाती है। इसके बावजूद बहुत से किसान–मजदूर इनका विरोध कर रहे हैं और सरकार को पीछे हटने पर मजबूर भी कर रहे हैं। छोटे दुकानदारों का हित भी इसी में है कि वे भी इनके साथ आकार मिल जायें। ऐसी जन–विरोधी सरकार को जनता की एकता ही सबक सिखा सकती है।

–– समर्थ