बहराइच हिंसा में सरकारी साजिश की भनक
समाचार-विचार आशुतोष कुमार दुबे13 अक्टूबर 2024 को उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में हिंसा की लोमहर्षक घटना घटी। जिले के महाराजगंज कस्बे में दुर्गा पूजा की मूर्ति विसर्जन को ले जा रहे समूह और इस इलाके में रहने वाले लोगों के बीच टकराव हुआ। इस घटना ने पूरे इलाके को अपनी आग में बुरी तरह से झुलसा दिया। हिंसा का कारण बताया जा रहा है कि डीजे पर जानबूझ कर तेज आवाज में इस्लाम विरोधी गाने बजाये गये, साम्प्रदायिक और नफरती नारे लगाये गये और घरों पर लगे इस्लामिक झण्डे को उखाड़कर भगवा झण्डे फहराये गये। ऐसी उकसावेबाजी वाली हरकतों ने आग में घी का काम किया। बहरहाल ऐसी ही घटना बाराबंकी, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे अन्य जगहों पर भी घटी। इस घटना को देखकर हाशिमपुरा, भागलपुर, गोधरा, बाबरी विध्वंश जैसे किसी पूर्वनियोजित अनहोनी की आहट सुनायी देती है।
बहराइच उत्तर प्रदेश का सबसे गरीब जिला है। जनता पर सरकार के कहर के अलावा, यहाँ पर नरभक्षी जानवरों का भी आतंक बना रहता है। महाराजगंज कस्बा एक मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। यहाँ की ज्यादातर दुकानें और व्यावसायिक गतिविधियों में इनका बड़ा हिस्सा है। पिछले कई वर्षों से हिन्दू या मुस्लिम त्यौहार पर रैली के रास्ते को लेकर दोनों समुदाय में विवाद होता रहा है। पिछले साल भी ऐसी स्थिति बनी थी, लेकिन जागरूक नागरिकों की वजह से हिंसा की घटना नहीं हुई थी।
13 अक्टूबर को मूर्ति विसर्जन के लिए जाते हुए साम्प्रदायिक गाने और नारे ने माहौल को खराब दिया। भीड़ के उकसावे में राम गोपाल मिश्रा ने अब्दुल हमीद के घर पर चढ़कर इस्लामिक झण्डे को उतार फेंका और भगवा झण्डे को फहराया। उसने साम्प्रदायिक नारे भी लगाये। ऐसा करने पर उस पर गोली चलायी गयी और वह घायल होकर वहीं गिर पड़ा। उसकी पत्नी ने बताया कि पुलिस ने उसकी मदद नहीं की। एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं हो पायी। उसके परिवारजनों ने बैटरी रिक्शे से उसे जिला अस्पताल पहुँचाया। इलाज देर से मिलने के चलते उसकी मौत हो गयी।
14 अक्टूबर को उसके शव को लेकर बहुत सारे लोगों को इकट्ठा किया गया और उसका अन्तिम संस्कार किया गया। वापस लौटते समय भीड़ ने मुसलमानों के सैकड़ों घर जलाये, पैसे चुराये, दुकानों को लूटा फिर उसमें आग लगा दी, वाहनों को आग के हवाले किया गया, लोगों को मारा–पीटा गया। यह सब करीब डेढ़ से दो घण्टे तक चलता रहा। इसका प्रभाव करीब दस किलोमीटर के घेरे में रहा। उसके बाद पुलिस आयी, लेकिन मौके को सम्हाल नहीं पायी। उसने बदनामी के डर से इन्टरनेट बन्द करवा दिया। करीब 100 लोगों के खिलाफ एफआयीआर दर्ज किया गया जिसमें से ज्यादातर मुसलमान थे। दो मुसलमान (जो अभी सिर्फ कथित तौर पर जिम्मेवार हैं, कानून ने कोई सजा नहीं सुनायी है) का एनकाउंटर किया। यही हिन्दू राष्ट्र का न्याय है। मुजरिम भी वही और मुंसिफ भी वही। 15 अक्टूबर को मुख्यमन्त्री योगी ने मृतक की पत्नी को दस लाख रुपये और सरकारी नौकरी का आश्वासन दिया।
इलाके की संवेदनशीलता के बावजूद त्योहारों की सरगर्मियों को ध्यान में रखते हुए पुलिस–प्रशासन ने कोई पुख्ता इन्तेजाम नहीं किया था। जैसे–– जरूरी संख्या में पुलिस और रिजर्व पुलिस बल का न होना, डीजे की आवाज को लेकर गाइडलाइन जारी न करना, मौके पर देर से पहुँचना, आदि। मुस्लिम पक्ष के लोगों पर तुरन्त एकतरफा कार्रवाई करना भी प्रशासन के साम्प्रदायिक रवैये को सामने लाता है, जबकि मुस्लिम पक्ष ही सबसे ज्यादा पीड़ित था, प्रशासन ने उसकी कोई मदद नहीं की।
उदाहरण के लिए इतनी बड़ी संख्या में साम्प्रदायिक तत्व मुसलमानों के घरों पर चढ़ कर भगवा झण्डा फहराते हैं, ऐसे साम्प्रदायिक तत्वों के खिलाफ कोई खास कार्रवाई नहीं की गयी। यहाँ तक कि परिवारजनों को पुलिस सुरक्षा भी नहीं दी गयी। 60 वर्ष के बुजुर्ग जो ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते और जिनके हृदय का ऑपरेशन होने वाला था–– बन्दूक के बट से मारना और हिंसा के लिए जिम्मेदार मानते हुए गिरफ्तार करना, यही रवैया 18 साल के एक लड़के के साथ किया गया, जिसका पथरी का ऑपरेशन होने वाला था और जो दर्द से कराह रहा था। महिलाओं को भी मारा–पीटा गया। लोगों को पीटते–पीटते घर से बाहर ले जाया गया और थाने में भी जमकर पीटा गया। दो लोगों का एनकाउंटर किया गया। कई लोग बुरी तरह घायल हुए। एक जगह एक परेशान महिला ने ‘हाय अल्लाह!’ कहा तो पुलिस वाले ने बन्दूक के बट से मारते हुए ‘हे राम!’ कहने को कहा।
एसपी वृन्दा शुक्ला ने मामले में पुलिस को गैर–जिम्मेदार ठहराते हुए कई पुलिस वालों का तबादला किया। पुलिस–प्रशासन कानून–व्यवस्था बनाये रखने और संवैधानिक रूप से उचित कार्रवाई करने में पूरी तरह नाकाम रही। इससे प्रदेश की पुलिस की साम्प्रदायिक सोच और जनविरोधी असंवैधानिक रवैया फिर उजागर हो गया और इसने तथाकथित ‘सुशासन’ की पोल खोल दी।
इक्का–दुक्का मीडिया चैनलों को छोड़कर ज्यादातर मीडिया और ऑनलाइन वेबसाइट पर नकली वीडियो प्रचारित कर गलत खबर दिखायी गयी कि मृतक को टॉर्चर किया गया और उसके पैरों के नाखून उखाड़ दिये गये। इसने पूरे मामले को तेजी से फैलाने, हिंसा भड़काने और आग में घी डालने का काम किया। मामला हाथ से निकलता देख, पुलिस ने सूचना दी कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है। मृतक की मौत गोली लगने से हुई है।
एक बार फिर मीडिया ने सरकार के पक्ष में साम्प्रदायिक माहौल बनाने, वोटों का ध्रुवीकरण करने जैसे तमाम जनविरोधी कामों को अंजाम दिया। ऐसे में कुछ न्यायप्रिय और संवेदनशील लोग आगे आये और सोशल मीडिया पर सही जानकारी साझा की।
स्थानीय लोग बीच–बचाव करते हुए सामाजिक सौहार्द बनाने की कोशिश करते रहे। कस्बे के बुजुर्गों ने सामाजिक सौहार्द के बारे में बताते हुए कहा कि बहराइच ने कभी किसी को बाहरी नहीं समझा और सबको अपने यहाँ रहने, फलने–फूलने के अवसर उपलब्ध कराये। उन्होंने कहा कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी यहाँ अमन कायम रखने के प्रयास किये गये। लोगों ने कहा कि हमारा जिला भले ही उत्तर प्रदेश का सबसे गरीब इलाका है, लेकिन हम किसी पर जोर–जबर्जस्ती और अन्याय के लिए नहीं जाने जाते।
घटना के बाद हुए उत्तर प्रदेश के उप चुनाव में नौ में से छ: भाजपा सरकार ने जीते। एक सीट पर पिछले 30 साल बाद फिर से जीत हासिल की। एक सीट मुस्लिम बाहुल्य इलाके में भी जीती। चुनावी पार्टियों ने एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराया और बेरोजगारी, भुखमरी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे असली मुद्दे को देश की बहुसंख्यक मेहनतकश जनता से दूर रखा।
–– आशुतोष दुबे
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