नेस्ले और यूनिलीवर पिछड़े देशों में बेच रहे कम गुणवत्ता वाले खाद्य सामान
समाचार-विचार जैनबआज हमारे देश में हर जगह राशन की दुकानें देखने को मिल जाती है, जिनको हम उनमें टंगी रंग–बिरंगी पन्नियाँ देखकर पहचान जाते हैं जो खासतौर से बच्चों को अपनी और आकर्षित करती हैं। इन दुकानों पर मिलने वाले दूसरे सामान हमारी दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी बनते जा रहे हैं। चाहे वे नेस्ले कम्पनी का बनाया हुआ सेरेलेक हो जो बच्चे के पैदा होने के लगभग दो महीने बाद से 3 साल की उम्र तक खिलाते हैं या फिर बच्चों की लम्बाई बढ़ाने के लिए दिया जाने वाला हॉरलिक्स हो जिसे यूनिलीवर कम्पनी बनती है। ये ऐसे सामान हैं जिनको लगभग हर मध्यम वर्गीय परिवार खरीदता है।
हमारे रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान की निर्माता ज्यादातर यही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं। इनकी पहुँच एक गरीब परिवार से लेकर अमीर परिवार तक है। नेस्ले, यूनिलीवर और पेप्सिको ऐसी कम्पनियों ने दुनिया भर में अपना दबदबा कायम कर रखा है। नेस्ले 189 देशों में अपने बनाये खाद्य सामान बेचती है, यूनिलीवर की पहुँच लगभग 190 देशों में है और पेप्सिको के मामले में तो यह संख्या 200 से भी ज्यादा है।
इतना बड़ा बाजार होने के बाद भी ये कम्पनियाँ लोगों की सेहत के साथ खुलेआम खिलवाड़ कर रही हैं। मुनाफा कमाने की होड़ ने इन्हे अन्धा बना दिया है। सामान की क्वालिटी कहाँ कैसी होगी यह बात उस देश के लोगों का मुखड़ा देखकर तय होती है जिन्हें सामान बेचा जा रहा हैं। जिनके पास दौलत है, उन्हें सामान भी अच्छी क्वालिटी का मिलता है लेकिन अगर किसी देश के पास इन पर लुटाने के लिए दौलत नहीं है तो सामान की क्वालिटी भी बेकार मिलती है।
हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स में आयी एक रिपोर्ट में बताया गया कि नेस्ले, पेप्सिको समेत 30 ऐसी कम्पनियाँ है जो भारत और दूसरे पिछड़े देशों में खुलेआम कम गुणवत्ता वाले खाने के सामान बेच रही हैं। इसका सीधा असर वहाँ रहने वाले लोगों के सेहत पर पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ अमरीका जैसे दूसरे बड़े और अमीर देशों में ये तुलनात्मक रूप से अच्छी क्वालिटी के सामान बेचती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि पूरी दुनिया में लगभग एक अरब लोग ऐसे हैं जो मोटापे का शिकार हैं और इनमें हर दस में से सात लोग गरीब और पिछड़े देशों के है। एटीएनआई (एक्सेस टू न्यूट्रिशन इनिशिएटिव ) संस्था का कहना भी है कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थ मोटापे की समस्या बढ़ाने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और ये एमएनसी कम्पनियाँ भारी मात्रा में पैकेज्ड खाद्य पदार्थ बनाती हैं और खूब प्रचार करके बेचती हैं।
हेल्थ स्टार रेटिंग प्रणाली का इस्तेमाल करके जब 30 से ज्यादा कम्पनियों के पचास हजार से ज्यादा खाद्य सामानों के नमूने की टेस्टिंग की गयी तो पता चला कि जो सामान दो अलग–अलग देशों में बिक रहे हैं उनकी रेटिंग में बहुत अन्तर है। इस रेटिंग प्रणाली के तहत 3–5 से अधिक स्कोर वाले खाद्य सामानों को लोगों के लिए स्वस्थ माना जाता है। लेकिन हालत यह है कि पिछड़े देशों के लिए औसत स्कोर 5 में से 1–8 है, जबकि उच्च आय वाले देशों के लिए 2–3। क्वालिटी सुधारने के बजाय कम्पनियों के मालिक सतरंगी बयान लिये हर रोज हमारे सामने आ रहे हैं।
एक तरफ नेस्ले के प्रवक्ता ने कहा, “हमने अधिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों की बिक्री बढ़ाने के साथ–साथ लोगों को अधिक सन्तुलित आहार की ओर मार्गदर्शन देने के लिए प्रतिबद्धता जतायी है।” लगता है कि हमारे शरीर में जो पोषण की कमी है वे इनके चिप्स नमकीन खाकर दूर हो जायेगी।
वहीं दूसरी तरफ पेप्सिको के प्रवक्ता ने कुछ कहने से ही इनकार कर दिया। कम्पनी ने पिछले साल अपने आलू के चिप्स में सोडियम की मात्रा कम करने और अपने प्रोडक्ट में साबुत अनाज शामिल करने के नये लक्ष्य निर्धारित किये थे जो कहीं से भी पूरा होता नहीं दिख रहा है। यह जो कोल्ड ड्रिंक बेचती है उनमें भरपूर चीनी होती है, जिसे यह बड़ी बेशर्मी से ‘जीरो शुगर’ का लेबल लगा कर बाजार में बेचती है।
इन आँख खोल देने वाले तथ्यों को देखते के बाद भी इन कम्पनियों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही है। ऐसा करने की जगह उल्टा हमारी सरकारें इन कम्पनियों को बढ़ावा दे रही हैं। वे अपने ही देश को लूटने के लिए जमीन तैयार कर के इनको देती हैं जहाँ ये कम्पनियाँ अपनी फैक्ट्री लगाती हैं और खराब गुणवत्ता के माल बनाकर हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ करती हैं।
–– जैनब
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