परिसीमन के नाम पर सत्ता के अति केन्द्रीकरण की कोशिश
समाचार-विचार कुशल चौधरीकेन्द्र की मोदी सरकार देश की संघीय व्यवस्था को कमजोर करके सारी सत्ता अपनी मुट्ठी में करने की नित नयी कोशिशें करती रहती है। अकेले जीएसटी के चलते ही भारत के सारे राज्य धन के लिए केन्द्र के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हो गये हैं। अब मोदी सरकार नयी परिसीमन नीति लागू करके संसद में दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम करना चाहती है। ध्यान रहे कि दक्षिण में भाजपा उत्तर की तुलना में काफी कमजोर है।
जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों का फिर से परिसीमन करने का केन्द्र सरकार का प्रस्ताव खासतौर पर दक्षिणी राज्यों के हितों को नुकसान पहुँचाने की साजिश के रूप में देखा जा रहा है। अगर यह लागू होता है तो लोकसभा में तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश की आठ–आठ सीटें कम हो जायेंगी। जबकि उत्तर भारत के राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य–प्रदेश की 27 सीटें बढ़ जाएँगी। यानी दक्षिण भारत के राज्यों को अपनी जनसंख्या नियंत्रित रखने की कीमत अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व गँवाकर चुकानी पड़ेगी।
सन 1951 के बाद से हर 10 साल में जनगणना के साथ ही संसदीय क्षेत्रों का परिसीमन किया जाता था। लेकिन 1976 में इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी गयी थी। माना गया था कि यह जनसंख्या नियन्त्रण की योजना से टकराती है। हर राज्य देश की संसद में अपना ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहता है, तो वह जनसंख्या नियन्त्रण क्यों करेगा।
उस समय जनसंख्या नियन्त्रण पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ा मुद्दा था। इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में भारत के शासकों ने भी जनसंख्या नियन्त्रण के लिए अभियान चलाया। कई राज्यों ने इसे मुस्तैदी से लागू करके जनसंख्या की बढ़ोतरी पर काबू पा लिया लेकिन देश के सारे राज्य, खास तौर पर उत्तर भारत के राज्य इसमें ज्यादा सफल नहीं हुए। इसलिए अब जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करके संसद में दक्षिण का प्रतिनिधित्व कम करने का मतलब है उसे केन्द्र की योजनाओं का सफल क्रियान्वयन करने की सजा देना।
उत्तर के शासकों की नाकामी में अब भाजपा को अवसर नजर आने लगा है। सभी जानते है कि उत्तर के हिन्दी भाषी राज्य भारत की राजनीति में भाजपा के वर्चस्व का आधार है। प्राकृतिक और मानवीय सम्पदा से सम्पन्न होने के बावजूद ये राज्य दक्षिण की तुलना में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े है। ज्यादा जनसंख्या होने के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद में इन राज्यों की हिस्सेदारी बेहद कम है। जाहिर है, इसका कारण यहाँ के निकम्मे राजनेता और उनकी सरकारें है। नयी परिसीमन नीति बेहतर करने वालों का संसद में प्रतिनिधित्व घटाकर उन्हें सजा देगी और इसमें नाकाम रहे लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर उन्हें इनाम देगी।
कई पार्टियाँ, जैसे–– कांग्रेस, डीएमके और एआईएडीएमके ने जनसंख्या आधारित परिसीमन के खिलाफ मार्च की शुरुआत में एक बैठक करके दक्षिण की संसदीय पार्टियों के बीच एकता कायम करने की कोशिश की है। पिछले कई महीनों से परिसीमन के मुद्दे को खूब राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। उत्तर बनाम दक्षिण की बहस शुरू हो चुकी है। उत्तर और दक्षिण दोनों की ही बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ इस मुद्दे को क्षेत्रीय भेदभाव का मामला बनाकर इसे एक विभाजनकारी मुद्दा मान रही हैं।
जनसंख्या लोकतान्त्रिक प्रतिनिधित्व का एकमात्र मापदण्ड नहीं है। क्षेत्र, धर्म जाति, जनजाति, लिंग, आदि विविधताएँ भी प्रतिनिधित्व का आधार हैं जो भारतीय समाज में रची–बसी हैं। कई नेताओं ने प्रतिक्रियावादी बयान देना शुरू कर दिया है। भाजपा के सहयोगी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू आंध्र वालों को ज्यादा बच्चे पैदा करने का सुझाव दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे कानून बनाएँगे जिससे दो से ज्यादा बच्चों वाले ही चुनाव लड़ पायेंगे। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्तालिन कह रहे हैं कि हमारे राज्य के लोग कम बच्चे पैदा क्यों करें? क्यों न हम 16 बच्चे पैदा करने का सोचें?
जनसंख्या आधारित परिसीमन अन्य राज्यों के लिए भी खतरा है। उत्तराखण्ड में पहाड़ी क्षेत्रों के जिलों से लोग देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार के मैदानी जिलों में लगातार पलायन कर रहे हैं। परिसीमन से पहाड़ी जिलों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट जाएगा।
परिसीमन अपने आप में कोई बुरा काम नहीं है लेकिन जब सत्ताधारी पार्टियाँ अपने तुच्छ राजनीतिक हित साधने के लिए इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं तो यह बहुत घातक हो जाता है। इसके दर्जनों उदाहरण हैं। असम में विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के बाद मुस्लिम मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका सिकुड़ गयी। पहले वे 29 सीटों पर बहुसंख्यक होने के चलते प्रभावी भूमिका में थे लेकिन परिसीमन के बाद यह स्थिति नहीं रही। आज असम की राजनीति में वे हाशिये पर फेंक दिये गये हैं।
यह स्पष्ट है कि भाजपा द्वारा की जा रही परिसीमन की माँग अपने विरोधियों पर चोट करने की दुर्भावना से भरी है। यह न केवल दक्षिण भारतीयों, बल्कि दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़े समाज के लोगों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन करेगी। यह भारत के संघीय ढाँचे को और ज्यादा नुकसान पहुँचाकर मोदी सरकार के हाथों में सत्ता का केन्द्रीकरण करने का एक साधन बन जाएगी।
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