मध्यपूर्व में अमरीका–इजरायल का ईरान के खिलाफ युद्ध ने दुनिया भर में एक भयावह ऊर्जा संकट का रूप ले लिया है। इसने भारत में भी तेल और गैस का संकट पैदा कर दिया है। प्रधानमन्त्री मोदी ने इजरायल को “पितृभूमि” घोषित कर साम्राज्यवाद को पूरा समर्थन दे रखा है। जब ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया, तब मोदी ने उन देशों सरकारों से फोन पर और सोशल मीडिया के जरिये चिन्ता जाहिर की। लेकिन ईरान के चोटी के नेताओं छोटी–छोटी बच्चीयों और सैंकडों नागरिकों की हत्या पर उनके मूँह से एक शब्द नहीं निकला। वे तब भी चुप रहे जब भारतीय जनता घरेलू गैस की किल्लत से भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। किसी सरकार ने उनके दुख–तकलीफ को नहीं पहचाना।

देश में सिलिण्डर के लिए भयानक मारामारी मच रही है। गैस एजेंसियों के सामने गरीब लोगों की लम्बी कतारें लग गयीं हैं। जमाखोरों ने ब्लैक में सिलिण्डर 4000 रुपय से ज्यादा का बेचा। ज्यादातर प्रवासी मजदूरों के पास स्थायी दस्तावेज न होने के चलते गैस कनेक्शन नहीं था। ब्लैक में सिलिण्डर खरीद नहीं सकते हैं। लकड़ी के चूल्हों पर मकान मालिक खाना बनाने नहीं देते। एक भयानक मंजार और भी नजर आया। कोरोना–महामारी के बाद एक बार फिर गैस की किल्लत के चलते प्रवासी मजदूर ट्रेनों–बसों में भरकर घर लौटने लगे।

कई उद्योग गैस की किल्लत के चलते ठप पड़ने की कगार पर आ चुके हैं। उत्तर प्रदेश के खुर्जा में सिरेमिक बर्तन बनाने वाले 25,000 मजदूरों और दार्जलिंग के चाय बागान उद्योग में 55,000 मजदूरों पर जीविका का खतरा मण्डरा रहा है। युद्ध के चलते आयात किया जाने वाला सिंथेटिक धागा भी महँगाई की चपेट में आ गया जिससे कई छोटे कारखाने बन्द हो गये और उनमें काम करने वाले लोग सड़क पर आ गये।

बड़ी दवाई कम्पनियों ने इस आपदा को अपने मुनाफे बढ़ाने का माध्यम बना लिया। 1 अप्रैल से कैंसर की दवाओं सहित 900 जरूरी दवाओं को महँगा कर दिया गया है। बताया गया कि मध्यपूर्व में चल रहे युद्ध से दवाई उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्लैटिनम और अन्य कच्चे माल भारत नहीं पहुँच पा रहे हैं, उसकी लागत दोगुनी हो चुकी है।

किसानों के लिए रासायनिक खाद के लाले पड़ गये हैं। यूरिया का उत्पादन कतर से मंगाई जाने वाली एलएनजी पर निर्भर है। साथ ही खाद, सल्फर और अमोनिया भी सीधा खाड़ी के देशों से मंगाया जाता है। आयात ठप पड़ जाने की वजह से खाद की स्थिति भयावह है। खाद के स्थानीय विपणन संस्थानों में बिचैलिये किसानों को लूट रहे हैं और सरकारी रेट पर खाद मिलना मुश्किल हो गया है।

सीमेंट, प्लास्टिक, हवाई जहाज र्इंधन, हाईवे चुंगी के दामों को धड़ल्ले से बढ़ा दिया गया है। इस बढ़ती महँगाई पर सरकार की न कोई राय है न कोई रोक–टोक। उल्टा गोदी मीडिया तेल की सरकारी कम्पनियों के नुकसान गिनवा रही है और लोगों को महँगे पेट्रोल और डीजल की मार झेलने के लिए तयार कर रही है। एपस्टीन मामले में बदनाम पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मार्च की शुरुआत में कहा कि “भारत में ऊर्जा संसाधनों की कोई कमी नहीं है।” यह जमीनी हकीकत को पूरी तरह नकारना है। भाजपा ने विपक्ष पर महँगाई को लेकर लोगों को भड़काने का इल्जाम लगाया। मार्च के अन्त में मोदी ने संसद में कोरोना महामारी जैसे संकट की तैयारी का आह्वान किया।

गैस की किल्लत और युद्ध के दौर में बेशर्मी से महँगाई बढ़ाना इस मुनाफाखोर व्यवस्था के ‘आपदा में अवसर’ के नारे को ठोस रूप से सामने लाता है। भारत सरकार की कमजोर विदेशी कूटनीति भी इसका कारण है। भारत ने रूस से कच्चा तेल न खरीदने का अमरीकी फरमान स्वीकार कर लिया था, पर होर्मुज जलडमरूमध्य  बन्द हो जाने के बाद भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए अमरीका के नेताओं ने फिर से 1 महीने की अनुमति दे दी। अमरीका से अनुमति लेना— देश को शर्मसार कर रहा है। ये एक भद्दा मजाक है। भारत की ऊर्जा जरूरत के लिए होर्मुज जल डमरूमध्य  का रास्ता महत्वपूर्ण है। भारत 60 प्रतिशत घरेलु एलपीजी गैस बाहर के देशों से मंगाता है जिसमें 90 प्रतिशत इस जलडमरूमध्य  से होकर गुजरता है।

त्राहिमाम चिल्लाती जनता को बताया जा रहा है कि यह संकट बाहरी कारणों से पैदा हुआ है। लेकिन इसी दौरान देश के बड़े पूँजीपति अम्बानी की रिलायंस इण्डस्ट्रीज ने ट्रम्प सरकार के साथ अमरीका के टेक्सस शहर में एक रिफाइनरी खोलने का समझौता किया है। इस हजारों करोड़ रुपये की रिफाइनरी में अम्बानी की कम्पनी मुख्य निवेशक रहेगी। देश में तेल और गैस की भयावह किल्लत चल रही है पर अम्बानी जैसे पूँजीपति को अपन कारोबार बढ़ाने का मौका कैसे मिल रहा है? रूस की सबसे बड़ी तेल और गैस कम्पनी रोसनेफ्ट द्वारा भारत में संचालित नयारा कम्पनी ने भी युद्ध शुरू होने के बाद बेतहाशा मुनाफा बटोरा।

रिलायंस और नायरा दोनों ही कम्पनियाँ गुजरात में रिफाइनरी चलाती हैं। ये रिफाइनरी ऐसी हैं जिससे अशुद्ध कच्चे तेल को शुद्ध किया जाता है। रूस से कच्चे तेल का आयात पहले के मुकाबले दो गुना हो चुका है और दोनों रिफाइनरी को इस आपदा में बेतहाशा मुनाफा कमाने का शानदार अवसर परोस दिया गया है। जो भी उत्पाद यहाँ पैदा होता है वह भारत के लिए नहीं बल्कि अमरीका और यूरोप के बाजारों में ऊँचे दाम पर बेचा जाता है। अम्बानी का जामनगर में बनी रिलायंस रिफाइनरी एक विशेष आर्थिक क्षेत्र, यानी ‘सेज’ का हिस्सा है जिसका मुख्य उद्देश्य निर्यात है। भारतीय जमीन पर, हमारे संसाधनों का इस्तेमाल कर दुनिया का सबसे अशुद्ध कच्चा तेल साफ किया जा रहा है, लेकिन वह हमारे घरों और हमारे वाहनों के संचालन में कोई मदद नहीं कर सकता। इस विडम्बना का प्रत्यक्ष कारण भारत पर 1991 में आईएमएफ और विश्व बैंक द्वारा थोपी गयी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति है। इस नीति के तहत देश का सार्वजनिक ऊर्जा सेक्टर निजी मुनाफे के लिए खोल दिया गया था। भारत का शासक वर्ग सीधे–सीधे साम्राज्यवाद का सहयोगी बन गया और यही वजह है कि भारत में बनाया गया शुद्ध पेट्रोल आज सबसे ज्यादा निर्यात किये जाने वाले माल में से एक है। ट्रम्प और अम्बानी का टेक्सस में रिफाइनरी खोलने का समझौता देशी–विदेशी पूँजीपतियों का साम्राज्यवादी गठजोड़ है जो हमारे देश की मेहनतकश जनता से निचोड़े गये मुनाफे से संचालित हो रहा है। लूट में कमाये इफरात धन–दौलत से अम्बानी पूरी दुनिया में अपने कारखाने लगा रहा है और देश की ज्यादातर आबादी के चूल्हे ठंड़े पड़ गये हैंै। ऐसी व्यवस्था में चन्द मुनफाखोर उद्योगपति मेहनतकश जनता का खून पी कर जिन्दा हैं। दुष्यन्त कुमार की गजल की ये पंक्तियाँ बेहद मौजू हैं–– “कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।”

अब भारत की जनता पर निर्भर है की वे ऐसे आदमखोरों का सामना कैसे करती है।