गाजा, भारत, भगत सिंह और साम्राज्यवादी दमन के खिलाफ उग्र विद्रोह का अधिकार
विचार-विमर्श माइकल डी येट्स
––माइकल डी येट्स
गाजा
इजराइल ने गाजा की जनता के खिलाफ नरसंहार युद्ध छेड़ दिया है, जिसमें 40,000 से अधिक लोगों की हत्या हुई है और लगातार बमबारी के कारण मलबे के नीचे दबकर इससे कहीं ज्यादा लोग मारे गये हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ का मानना है कि यदि अप्रत्यक्ष मौतों–– भुखमरी, बीमारियों और अन्य कारणों से होनेवाली मौतों को ध्यान में रखा जाये, तो 1,86,000 तक मौतों का अनुमान है। 7 अक्टूबर के बाद से प्रति दिन कम से कम 90 बच्चे मारे गये हैं (यूक्रेन में युद्ध में यह संख्या 1 से भी कम है)। गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ इजरायल के नरसंहार युद्ध शुरू होने के बाद से 1,000 से अधिक बच्चे अपंग हो गये हैं। गाजा के 23 लाख निवासियों में से लगभग सभी लोग इजरायली हमले से “या तो मारे गये, या अपंग, अनाथ और विस्थापित” हो गये। अस्पतालों को नष्ट कर दिया गया हैय सैकड़ों चिकित्सा कर्मियों को गोली मार दी गयी या बम से उड़ा दिया गयाय पत्रकारों को निशाना बनाया गया और मार डाला गयाय फिलिस्तीनियों को भूखा मारना राज्य की नीति है। इजरायली रक्षा बलों (आईडीएफ) ने सीधे गोली मारकर छोटे बच्चों की हत्या कर दी है। ऐसी क्रूरता, निर्दयता, नस्लवाद और सामूहिक हत्या स्पष्ट रूप से नरसंहार की हकीकत और इसे करने की सरकार की मंशा दोनों को दर्शाती है। और इसका कोई अन्त नजर नहीं आता। यह इतिहास के एक सबसे भयानक अत्याचार के रूप में याद किया जाएगा। यदि इसी तरह की घटना संयुक्त राज्य अमरीका में होती, तो आबादी के अनुपात में अब लगभग सत्तर लाख लोग मारे गये होते और वह भी सिर्फ नौ महीनों में।
इजरायली राज्य की विचारधारा जायोनवाद है, जो 1880 के दशक में शुरू हुआ एक राजनीतिक आन्दोलन था। अपनी शुरुआत से ही इसका मकसद वर्तमान इजरायल में रहने वाले फिलिस्तीनी लोगों के ऊपर औपनिवेशिक वर्चस्व कायम करना था। तब से लेकर 1948 में शुरू हुए नकबा आआआआ९महविनश) के बीच, दुनिया के प्रमुख पूँजीवादी देश दक्षिणी गोलार्ध के देशों पर अपना नियंत्रण मजबूत करने में व्यस्त थे, पहले प्रत्यक्ष औपनिवेशिक डाकाजनी के जरिये और फिर अप्रत्यक्ष साम्राज्यवादी शोषक के रूप में। जायोनवाद के संस्थापकों ने, जिनमें इजराइल की स्थापना करने वाले भी शामिल हैं, इन साम्राज्यवादी देशों से बहुत कुछ सीखा। उन्होंने देखा कि अंग्रेज, जिनके राजनीतिक फैसले फिलिस्तीन को एक यहूदी एन्क्लेव के रूप में स्थापित करने में निर्णायक थे, उन्होंने आयरिश लोगों के साथ क्या किया, संयुक्त राज्य अमरीका ने मूल निवासी लोगों और काले गुलामों के साथ क्या किया, ब्रिटिश, जर्मन, बेल्जियन, इटालियन और डच ने अफ्रीका में क्या किया। उन्होंने खुद हिटलर से भी सीखा।
इजराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री, बेंजामिन नेतन्याहू, लिकुड पार्टी के नेता हैं, जो धुर दक्षिणपंथी है और शुरुआती इजराइली पार्टियों की उत्तराधिकारी है। इतिहासकार लॉरेंस एच शौप नेतन्याहू की सरकार का उद्धरण प्रस्तुत करते हैं जो इजराइल के इतिहास के फासीवादी चरित्र को पुष्ट करते हैं––
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने बाइबिल के एक सन्दर्भ का हवाला देते हुए कहा, “उन्हें मत छोड़ो, पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और शिशुओं को मार डालो।”
राष्ट्रपति इसहाक हर्जाेग ने फिलिस्तीनी नागरिकों पर हमले को न्यायसंगत बताते हुए सेना को हरी झण्डी दे दी, “इसके लिए पूरा देश जिम्मेदार है––– नागरिकों के जागरूक न होने और इसमें शामिल न होने के बारे में बकवास सही नहीं है––– वे साथ खड़े हो सकते हैं।”
इजरायली सेना के मेजर जनरल घासन एलियान ने धमकी दी, “गाजा में, न बिजली होगी और न पानी, सिर्फ तबाही होगी। तुम नरक चाहते थे, तुम्हें नरक मिलेगा।”
रक्षा मंत्री योव गैलेण्ट ने कहा, “मैंने गाजा पट्टी की पूरी तरह घेराबन्दी का आदेश दिया है। न बिजली होगी, न भोजन, न र्इंधन।––– हम मानव पशुओं से लड़ रहे हैं और हम उसी हिसाब से काम करेंगेय हम सब कुछ खत्म कर देंगे।”
यदि हम स्वीकार करते हैं कि इजराइल एक कब्जा किया हुआ–– उपनिवेशवादी राज्य है, जिसने अवैध रूप से वह सब ले लिया है जो उसका नहीं है और बेपनाह हिंसा के दम पर अपने उपनिवेश पर नियंत्रण बनाये रखा है, तो हम फिलिस्तीनी लोगों के विरोध के अधिकार के बारे में क्या कह सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, आइए पहले उपनिवेशीकरण के एक अन्य मामले की जाँच करें, जिसमें एक बड़ी विदेशी ताकत की मौजूदगी तो थी, लेकिन वहाँ के लोग कोई कब्जा जमाये हुए लोग नहीं थे, यानी भारत।
ब्रिटिश शासन के अधीन भारत
भारत के ब्रिटिश उपनिवेश बनने से पहले, यह एक निजी निगम, ईस्ट इण्डिया कम्पनी (ईआईसी) द्वारा एक सदी से भी अधिक समय से लूट का शिकार हो चुका था, जो शेयर जारी करने वाले पहले व्यवसायों में से एक था। ब्रिटेन की महारानी और वहाँ के राजनेताओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्धों तथा बड़ी रिश्वत के दम पर, ईआईसी का संसद में भारी प्रभाव था। उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों तक जहाजों सहित ब्रिटिश हथियारों के समर्थन से, कम्पनी ने कुछ लाख सैनिकों की अपनी सेना बना ली थी। भरपूर रिश्वत के जरिये, कुछ भारतीय समूहों के प्रति कुछ पक्षपात दिखाकर, जिन्होंने तब कम्पनी का समर्थन किया और यहाँ तक कि उसकी सेना में भी काम किया, साथ ही धमकियों और वास्तविक हिंसा के जरिये, यह मुगल अभिजात वर्ग की शक्ति को पूरी तरह से पराजित करने में सक्षम था जिसने भारत के अधिकांश हिस्से पर विजय प्राप्त कर ली थी। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में तीव्र गिरावट का दौर शुरू हो गया था। ईआईसी ने यातना, हत्या और भुखमरी सहित हिंसा के कई कुकृत्य किये। उदाहरण के लिए, 1857 में शुरू हुए कम्पनी के खिलाफ विद्रोह के दौरान भारतीयों की मौत का कुछ अनुमान 8,00,000 तक था, जिसमें युद्ध के विनाश के परिणामस्वरूप अकाल और बीमारियों से मौत भी शामिल थी। इसके अलावा, ईआईसी ने भारतीय उपमहाद्वीप को डाकुओं की तरह लूटा (अक्सर सचमुच, जहाजों पर सीधे सोना और अन्य प्रकार की सम्पत्ति लादकर जो ग्रेट ब्रिटेन के लिए रवाना होते थे)। नकदी लगान ने बड़े और छोटे किसानों को गुजारे की खेती की जगह नकदी फसलों की खेती करने के लिए मजबूर किया। भारतीयों को वस्त्र जैसी विनिर्मित वस्तुओं का उत्पादन बन्द करने के लिए मजबूर किया गया, घरेलू उत्पादन की जगह ग्रेट ब्रिटेन से आयातित माल ने ले ली। इन साम्राज्यवादी फरमानों के परिणाम गम्भीर थे–– मौतों के अलावा, जीवन प्रत्याशा गिर गयी, स्वास्थ्य बिगड़ गया, गरीबी बढ़ गयी और भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की किस्मत खराब हो गयी और अन्तत:, ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी पर कब्जा कर लिया और वह भारत की प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासक बन गयी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद को कम हिंसक के रूप में लगातार प्रचारित किया गया है। वास्तव में, इसे एक “सभ्यता मिशन” के रूप में देखा गया है, जो दुनिया के सबसे गरीब देशों की असभ्य जनता के लिए प्रगति और समृद्धि ला रहा है। जैसा कि विद्वान डायलन सुलिवन और जेसन हिकेल बताते हैं––
हाल के वर्षों में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अतीत की यादों में पुनरुत्थान देखा गया है। नियाल फर्ग्यूसन की “एम्पायर : हाउ ब्रिटेन मेड द मॉडर्न वर्ल्ड” और ब्रूस गिली की “द लास्ट इम्पीरियलिस्ट” जैसी हाई–प्रोफाइल पुस्तकों ने दावा किया है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद भारत और अन्य उपनिवेशों में समृद्धि और विकास ले आया। दो साल पहले, यूगोव सर्वेक्षण में पाया गया कि ब्रिटेन में 32 प्रतिशत लोग देश के औपनिवेशिक इतिहास पर बहुत ज्यादा गर्व करते हैं।
वे आगे लिखते हैं, “उपनिवेशवाद की यह गुलाबी तस्वीर नाटकीय रूप से ऐतिहासिक रिकॉर्ड के साथ टकराती है।” नरम शब्दों में बयान करना! भारत में ब्रिटिश शासन क्रूर और हिंसक था और भारतीय जनता के साथ यह व्यवहार सीधे तौर पर साम्राज्यवाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़ा था। औपनिवेशिक शासकों ने भारतीयों पर भारी कर लगाया और फिर इस कर राजस्व का उपयोग ग्रेट ब्रिटेन के लिए जरूरी भारतीय सामान खरीदने के लिए किया। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत से ब्रिटेन में आयात का भुगतान भारतीयों द्वारा किया जाता था, जिन्हें करों का भुगतान करने के लिए नकदी फसलों का उत्पादन करना पड़ता था, जिसके परिणामस्वरूप ग्रामीण स्वास्थ्य में और कमी आती थी। कुछ मामलों में, नमक की तरह, साम्राज्यवादी शक्ति का वस्तु पर एकाधिकार था और इस पर अप्रत्यक्ष कर का भुगतान भी भारतीय नमक उपभोक्ताओं को करना पड़ता था। भारत को स्थानीय स्तर पर उत्पादित कपड़ा उत्पादों का भी आयात करना पड़ा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और कमजोर हो गयी। ग्रेट ब्रिटेन के लिए, भारत वस्तुत: सोने की खान था। भारत से औपनिवेशिक सत्ता के केन्द्र तक इतनी मात्रा में सम्पत्ति पहुँची जिस पर विश्वास करना मुश्किल है। इतना ही नहीं––
ब्रिटेन ने कर–वित्तपोषित बेमोल वस्तुओं–– कपड़ा 1840 के दशक तक (जब ब्रिटिश सरकार द्वारा कपड़ा आयात पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था), चावल, शोरा, नील, कच्चा कपास, जूट–– की लगातार बढ़ती आमद देखी, जो जरूरत से कहीं अधिक थी। इस अतिरिक्त माल को अन्य देशों में पुन: निर्यात किया गया।
इस पुनर्निर्यात ने कुछ यूरोपीय देशों के साथ ब्रिटेन के व्यापार घाटे को कम करने में मदद की और अतिरिक्त आयात के कुछ हिस्से ने ब्रिटेन को अपनी औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्ति का विस्तार करने में मदद की। भारतीयों के शोषण से उत्पन्न धनराशि ब्रिटिश सरकार के खर्चों को भी वित्तपोषित कर पाती थी, जिनमें से कुछ साम्राज्यवाद के लिए मेहनतकश वर्ग का समर्थन हासिल करने में भी मदद करती थी।
अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक और अन्य विद्वानों ने, जिसे ग्रेट ब्रिटेन में भारतीय धन का “बहाव” कहते हैं उसका अनुमान लगाया है––
एक आर्थिक इतिहासकार के रूप में उत्सा पटनायक ने इसका उत्तर ढूँढना शुरू किया और 2017 में अपना शोध प्रकाशित किया जिसमें यह स्थापित किया गया कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने 1765 से 1938 तक भारत से लगभग 45,000 अरब डॉलर (आज के डॉलर भाव में) लूटा। यह राशि ब्रिटेन के वर्तमान वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद का 15 गुना है। अगर वह चाहे भी, तो भारत को इतना पैसा नहीं लौटा सकता, जो उसने न केवल खुद को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए लूटा था, बल्कि आज के विकसित विश्व में अधिकांश विकास के लिए धन जुटाने के लिए भी लूटा था।
लूट की इतनी भारी रकम के ब्रिटेन की ओर बहाव के दो अपरिहार्य परिणाम सामने आये। सबसे पहले, इस तरह का आश्चर्यजनक शोषण हिंसा के बिना हासिल नहीं किया जा सकता था, या तो सीधे कारावास, यातना और हत्या के रूप में या परोक्ष रूप से मौत और खराब स्वास्थ्य के माध्यम से, जो भुखमरी का परिणाम था। पुलिस और सैनिक लगातार गिरफ्तार और जेल में बन्द लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते थे। लोगों को पेड़ की शाखाओं से लटकाया गया, गर्म सलाखों से दागा गया, आँखों और गुप्तांगों में मिर्च डाली गयी, लाठियों (लोहे से जड़े बांस के डण्डों) से पीटा गया, लम्बे समय तक एकान्त में रखा गया, पानी में डुबो कर प्रताड़ित किया गया, अप्राकृतिक यौनाचार किया गया, बलात्कार किया गया, हाथ–पाँव बाँध कर तपती धूप में छोड़ दिया गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने भारतीय प्रजा–जनों से कर वसूलने के लिए यातना का इस्तेमाल किया। अपने एक निबन्ध में भगत सिंह ने, जिनके बारे में आगे इस लेख में बताया गया है, लिखा था कि ब्रिटिश–संचालित अदालत में मुकदमे के दौरान उन्हें बुरी तरह पीटा गया था!
अंग्रेजों द्वारा बड़ी संख्या में भारतीयों की हत्या कर दी गयी। 1857 के युद्ध के दौरान प्रत्यक्ष मौतों का उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं। 1919 में निहत्थे प्रदर्शनकारियों का एक कुख्यात नरसंहार हुआ, जिसे जलियाँवाला बाग नरसंहार के रूप में जाना जाता है––
13 अप्रैल 1919 को, दो स्वतंत्रता सेनानियों की गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़े पैमाने पर शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अमृतसर के एक बाग में हुआ, जो कभी एक बगीचा था और पास के सिख गुरुद्वारा स्वर्ण मन्दिर में आने वाले लोगों के लिए विश्राम का क्षेत्र था। ब्रिटिश जनरल आरईएच डायर ने अपने सैनिकों को भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसके परिणामस्वरूप सैकड़ों लोग मारे गये और एक हजार से अधिक घायल हो गये। आज, वहाँ मृतकों के सम्मान में एक स्मारक स्थल का निर्माण किया गया है। यह भीषण नरसंहार ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों के आक्रोश को गहरा करने और स्वतंत्रता आन्दोलन को तेज करने वाली एक महत्वपूर्ण घटना थी।
ऐसे कई अन्य उदाहरण हैं जिनका हवाला दिया जा सकता है, लेकिन तब से आज तक, अंग्रेजों ने अप्रत्यक्ष रूप से असंख्य भारतीयों को मार डाला। ब्रिटेन ने द्वितीय विश्व युद्ध के खर्च का बोझ भारत के लोगों, विशेषकर गरीबों पर डालने की योजना बनाकर एशिया में अपने उस खर्च का वित्तपोषण किया। जिस प्रकार से इस मंसूबे को अंजाम दिया गया उसका सबसे अधिक प्रभाव भारतीय प्रान्त बंगाल के निवासियों पर पड़ा। महान अर्थशास्त्री, जॉन मेनार्ड कीन्स, ब्रिटिश सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार थे। उन्होंने युद्ध की लागत को ग्रेट ब्रिटेन से हटाकर भारत पर डालने का उपाय ढूँढा। भारतीय अमीरों पर कर लगाने से कोई फायदा नहीं होता क्योंकि पूरब में युद्ध का खर्च उठाने के लिए भारतीय पर्याप्त अमीर नहीं थे और गरीबों पर कर लगाने से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन होने की सम्भावना थी। इसलिए, उन्होंने एक गोलमोल रास्ता और कुटिल कार्रवाई, यानी मुद्रास्फीति की सिफारिश की। ब्रिटेन ने युद्ध के दौरान सैनिकों की जरूरत पूरा करने के लिए भारत में केवल नोट छापे। इससे कीमतें आसमान छूने लगीं और चावल की कीमत 300 प्रतिशत तक बढ़ गयी। कहने की जरूरत नहीं है कि गरीबों की आय अपेक्षाकृत स्थिर रही, जिससे उन्हें अपनी खपत में भारी कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे उत्पादित माल और स्थानीय स्तर पर खपत के बीच के अन्तर को ब्रिटिश सेना द्वारा हड़पने की अनुमति मिल गयी। जिन भारतीय व्यापारियों ने ऊँची कीमतों से अप्रत्याशित लाभ कमाया, उन पर भी ब्रिटेन द्वारा कर लगाया गया, जिससे युद्ध को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ। बंगाल में, गरीबों की पहले से ही कसी हुई कमर को जबरन कसने के परिणामस्वरूप अकाल पड़ा, जिसमें कम से कम 30 लाख लोग मारे गये। इच्छुक पाठकों को महान भारतीय फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे की ‘अशनि संकेत’ फिल्म देखनी चाहिए, कीन्स ने बंगाल के लोगों पर जो प्रभाव डाला यह फिल्म उसमंे इनसान की तबाही को दर्शाती है। जेसन हिकेल ने अकाल का सारांश इस प्रकार दिया है––
मित्र राष्ट्रों के उद्देश्य के नाम पर, कीन्स और चर्चिल द्वारा थोपी गयी नीतियों के कारण 30 लाख से अधिक लोग मारे गये–– जो ब्रिटेन और अमरीका द्वारा पूरे युद्ध के दौरान मारे गये सैनिक और नागरिक हताहतों की कुल संख्या से कई गुना अधिक है। इस त्रासदी के पैमाने का अनुमान लगाना लगभग असम्भव है। यदि सिर से पैर तक लाशें रखी जायें, तो पीड़ितों की लाशें डोवर से स्कॉटिश सीमा तक इंग्लैण्ड की लम्बाई से लगभग 10 गुना अधिक लम्बी हो जाएँगी।
ऊपर उल्लिखित हिकेल और सुलिवन के निबन्ध में, 1880 और 1920 के बीच भारतीय लोगों की बेहिसाब मौतों की गणना की गयी है, जो अंग्रेजों के भारत में प्रवेश करने से पहले उपलब्ध आँकड़ों के औसत से कहीं ज्यादा थी। यह वह समय था जब ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति अपने चरम पर थी। लेखकों का अनुमान है कि ये बेहिसाब मौतें 10 करोड़ होंगी और वे बताते हैं कि यह कम करके आँका गया अनुमान है। 1880 और 1920 के बीच का मध्य बिन्दु 1900 है। उस वर्ष, भारत की जनसंख्या लगभग 24 करोड़ थी, जो यह दर्शाती है कि मृत्यु दर कितनी ज्यादा थी।
प्रतिरोध और हिंसा का प्रश्न
बेइन्तहाँ शोषण के तथ्य का दूसरा परिणाम उन लोगों का प्रतिरोध है जो असहनीय दुर्व्यवहार सहते हैं। जबकि ऐसे भारतीय थे जिन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के आगे समर्पण कर दिया था और कुछ हद तक उससे लाभ भी उठाया था, किसानों और मजदूरों ने विदेशियों द्वारा उन पर किये गये जुल्मों का जमकर मुकाबला किया। आगे लिखी गयी बातों के लिए, मैं उस पुस्तक पर भरोसा करता हूँ जिसे भगत सिंह के जीवन और लेखन पर जानेमाने लेखक चमन लाल और मैंने सम्पादित किया है, जिसका शीर्षक है ‘द पॉलिटिकल राइटिंग्स ऑफ भगत सिंह’। अगर अलग से उल्लेख न किया गया हो तो सभी उद्धरण इसी पुस्तक से हैं।
हलाँकि उस दौरान भारत के अधिकांश लोग किसान और छोटे भूमिस्वामी थे, वहाँ मजदूरी करने वालों का एक बड़ा वर्ग था। रेलवे कर्मचारी, सड़क सफाई कर्मचारी, मिल मजदूर और कई अन्य लोगों ने हड़ताल की, जिससे कभी–कभी काम करने की बेहतर स्थिति और अधिक वेतन हासिल हुआ।
ब्रिटिश शासन के ज्यादातर प्रतिरोध संघर्षों का नेतृत्व गाँधी ने किया था, जिन्हें कई लोग भारतीय स्वतंत्रता का “बापू” मानते हैं। वह अहिंसक संघर्ष पर अपने आग्रह के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं, उन्होंने मान्यताओं और नियमों के एक समूह को दर्शाने के लिए ‘सत्याग्रह’ शब्द गढ़ा, जिसका उपयोग अहिंसक कार्यों को जारी रखने के लिए किया गया था, जैसा कि गाँधी का मानना था, अंग्रेजों को भारत छोड़ने और देश के लोगों को स्वशासन के लिए स्वतंत्र करने पर मजबूर होना होगा। इसका अक्सर इस्तेमाल किया जाने वाला एक उदाहरण किसानों द्वारा अन्यायपूर्ण लगान का भुगतान करने से शान्तिपूर्ण इनकार करना था। दूसरा, अधिक महत्वपूर्ण, असहयोग आन्दोलन था, जो 1920 में गाँधीजी द्वारा शुरू किया गया था। भारत की जनता अंग्रेजों और उनके द्वारा किये गये किसी भी सुधार के साथ सहयोग करने से इनकार कर देगी––
भारतीयों को ब्रिटिश शासकों के साथ असहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए 1920 में गाँधी ने आन्दोलन शुरू किया। वे अब ब्रिटिश “सुधारों” का समर्थन नहीं करेंगे, स्व–शासन हासिल करने के उद्देश्य से स्कूलों सहित ब्रिटिश शासन का समर्थन करने वाली किसी भी गतिविधि से श्रम वापस ले लेंगे, ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे, आदि। फरवरी 1922 में चैरी चैरा घटना की हिंसा के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन समाप्त कर दिया।
यह घटना उत्तर प्रदेश प्रान्त में स्थित चैरी चैरा में घटी थी। 4 फरवरी 1922 को असहयोग आन्दोलन में भाग ले रहे भारतीयों पर पुलिस ने गोलियाँ चलायीं। जवाब में, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिससे वहाँ मौजूद सभी लोग मारे गये। इसके बाद गाँधीजी ने आन्दोलन समाप्त कर दिया, जिसका उनकी कांग्रेस पार्टी के कुछ सदस्यों ने विरोध किया। यह घटना और इसके परिणामस्वरूप हुई फाँसी ने कई भारतीय राष्ट्रवादियों को वामपंथ की ओर प्रेरित किया।
उत्पीड़न को समाप्त करने के प्रयासों में अहिंसा एक शक्तिशाली हथियार रही है, जैसा कि अमरीकी नागरिक अधिकार आन्दोलन ने और साथ ही भारतीय स्वतंत्रता के लिए गाँधी के नेतृत्व में हुए संघर्ष ने प्रदर्शित किया है। हड़तालों, बहिष्कारों, सामूहिक प्रदर्शनों, मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं के जबरदस्त और भावनात्मक भाषणों, राजनेताओं को अपमानित करने, सत्ताधारी लोगों के घरों और व्यवसायों पर धरना देने के रूप में अहिंसात्मक आन्दोलन, काफी प्रभावी रहे हैं। हालाँकि, निरन्तर हिंसा के सामने, क्या प्रतिहिंसा उचित और आवश्यक है ? निश्चित रूप से यह सवाल जायज है कि क्या माओत्से तुंग और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले चीनी क्रान्तिकारी लम्बे समय तक हिंसक संघर्ष के बिना अपने देश को आजाद करा सकते थे ? या बोल्शेविक बिना सेना के सोवियत संघ का निर्माण कर सकते थे ? क्या हिंसक गुरिल्ला युद्ध के बिना वियतनामी जनता फ्रांसीसी और संयुक्त राज्य अमरीका दोनों को हरा सकती थी ? क्या अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस (एएनसी) की सैन्य शाखा की कार्रवाई के बिना दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद समाप्त हो पाता ?
शायद चिली हिंसक उपनिवेशवाद/साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की आवश्यकता को सबसे स्पष्ट रूप से दर्शाता है। साल्वाडोर अलेन्दे, बहादुर अडिग डॉक्टर, जो चिली के राष्ट्रपति बने, उन्होंने वामपंथ की दिशा में देश का सफलतापूर्वक नेतृत्व करना शुरू किया। उनका मानना था कि समाजवाद “मीडिओस पेसिफिकोस” यानी शान्तिपूर्ण तरीकों से हासिल किया जा सकता है। पीछे मुड़कर देखने पर यह मनभावन सोच साबित हुई। संयुक्त राज्य अमरीका के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाली प्रतिक्रियावादी चिली सेना की दगाबाजी के चलते, अलेन्दे वाशिंगटन डीसी में रचे गये तख्तापलट का शिकार हो गये और फासीवादी जनरल ऑगस्तो पिनोचे ने सितम्बर 1973 में सत्ता हड़प ली। पिनोचे ने सत्रह–साल तक एक क्रूर तानाशाही का नेतृत्व किया जिसमें हजारों लोगों को यातनाएँ दी गयीं और हत्याएँ की गयीं।
जब मैं “हिंसा” शब्द का प्रयोग करता हूँ, तो मेरा मतलब उन लोगों की मनमानी हत्या नहीं है जिनका आप विरोध करते हैं। बल्कि, मेरा तात्पर्य रेडिकल राजनीतिक कार्यक्रम में अन्तर्निहित हिंसा से है। यदि कोई राजनीतिक समूह कुछ औपनिवेशिक या साम्राज्यवादी नेताओं को निशाना बनाता है जो हत्या करके वहाँ के लोगों पर दुख बरसा रहे हैं, तो यह हिंसा का एक वैध उपयोग है। उदाहरण के लिए, यदि एएनसी की सैन्य शाखा ने रंगभेदी सरकार के नेताओं, या अफ्रीका को गुलाम बनानेवाले उपनिवेशवादियों को मार डाला, तो यह वैध हिंसा है।
भारत में ऐसे लोग थे जो गाँधी के अहिंसक दृष्टिकोण से नाखुश थे, भले ही वे अक्सर गाँधी की कांग्रेस पार्टी के साथ सहयोग करते थे और यहाँ तक कि कुछ कांग्रेस सदस्य, विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू, हिंसा का समर्थन करने वालों के प्रति सहानुभूति रखते थे। कांग्रेस की राजनीति का विरोध करने वालों का नेता भगत सिंह नाम का एक युवक था। उनका जन्म 28 सितम्बर, 1907 को लायलपुर के एक छोटे से गाँव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। जैसा कि उनके उपनाम सिंह से जाहिर है, वे एक सिख थे, जो उत्तर पश्चिम भारतीय क्षेत्र पंजाब में एक जातीय धार्मिक समूह था, पंजाब सिखों का ऐतिहासिक निवास स्थल है। सिख धर्म सभी के लाभ के लिए अपना जीवन जीने की आवश्यकता पर जोर देता है। विभिन्न अन्य धार्मिक समूहों द्वारा सिखों का जो उत्पीड़न किया गया, उसने कई सिखों का राजनीतिकरण कर दिया और आज भी सिख अक्सर रेडिकल राजनीतिक आन्दोलनों में सबसे आगे हैं।
भगत सिंह
भगत सिंह भारत के सबसे जानेमाने क्रान्तिकारी हैं। वह केवल तेईस वर्ष जीवित रहे, लेकिन उन्हें आज भी देश में किसी भी अन्य क्रान्तिकारी की तरह याद किया जाता है। भारत में पहले से ही गरीब किसानों की स्थिति काफी खराब थी, 2014 और 2022 के बीच किसानों की आत्महत्याएँ 1,00,000 से ऊपर हो गयीं, जो उनकी आर्थिक हताशा का एक स्पष्ट संकेत है। उनकी शक्ति को कमजोर करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा बनाये गये तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का एक बड़ा आन्दोलन अगस्त, 2020 में शुरू हुआ जिसमें दिल्ली की नाकाबन्दी भी शामिल थी जो सोलह महीने तक चली। पूरे विरोध प्रदर्शन के दौरान भगत सिंह की स्मृति बहुत जीवन्त थी। इन असाधारण घटनाओं के बारे में एक निबन्ध में, चमन लाल ने 2 फरवरी, 1931 को लिखे गये भगत सिंह के सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक निबन्ध, “नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं में नाम पत्र” के एक लम्बे उद्धरण के साथ शुरुआत की है––
असली क्रान्तिकारी सेनाएँ गाँवों और कारखानों में हैं, किसान और मजदूर। लेकिन हमारे बुर्जुआ नेता उनसे निपटने की हिम्मत नहीं करते और न ही कर सकते हैं। सोया हुआ शेर एक बार नींद से जाग गया तो हमारे नेताओं का लक्ष्य पूरा होने के बाद भी उसे वश में करना असम्भव हो जाएगा। 1920 में अहमदाबाद के मजदूरों के साथ अपने पहले अनुभव के बाद महात्मा गाँधी ने घोषणा की–– “हमें मजदूरों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। फैक्टरी सर्वहारा का राजनीतिक उपयोग करना खतरनाक है” (द टाइम्स, मई 1921)। तब से, उन्होंने कभी उनसे सम्पर्क करने की हिम्मत नहीं की। जहाँ तक किसान वर्ग की बात है, 1922 का बारदोली प्रस्ताव स्पष्ट रूप से उस भय को परिभाषित करता है जो नेताओं को तब महसूस हुआ जब उन्होंने विशाल किसान वर्ग को न केवल विदेशी सत्ता को बल्कि जमींदारों के जुए को भी उखाड़ फेंकने के लिए बढ़ते देखा।
बहरहाल, हम उन ताकतों पर चर्चा कर रहे थे जिन पर आप क्रान्ति के लिए निर्भर हो सकते हैं। लेकिन अगर आप कहते हैं कि आप किसानों और मजदूरों से उनका सक्रिय समर्थन हासिल करने के लिए सम्पर्क करेंगे, तो मैं आपको बता दूँ कि वे किसी भी भावनात्मक बातचीत से मूर्ख नहीं बनने वाले हैं। वे आपसे बहुत स्पष्ट रूप से पूछते हैं–– आपकी क्रान्ति से उन्हें क्या हासिल होने वाला है जिसके लिए आप उनके बलिदान की माँग करते हैं, इससे उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि लॉर्ड रीडिंग भारत सरकार के प्रमुख हैं या सर पुरूषोत्तमदास ठाकुरदास (एक बॉम्बे निवासी उद्योगपति और कांग्रेस नेता) ? अगर सर तेज बहादुर सप्रू (एक प्रमुख वकील और अमीर कांग्रेस नेता) लॉर्ड इरविन की जगह ले लें तो एक किसान के लिए इससे क्या फर्क पड़ेगा! उनकी राष्ट्रीय भावना की दुहाई देना बेकार है। आप अपने उद्देश्य के लिए उसका “उपयोग” नहीं कर सकतेय आपको गम्भीरता से विचार करना होगा और उन्हें यह समझाना होगा कि क्रान्ति उनकी होगी और उनकी भलाई के लिए होगी।
दस साल के भीतर क्रान्ति के युवा सपनों और एक साल में गाँधी के स्वराज (मोटे तौर पर स्व–शासन) के काल्पनिक वादों को एक तरफ रख दें। इसके लिए न तो भावना की आवश्यकता है और न ही मृत्यु की, बल्कि निरन्तर संघर्ष, पीड़ा और बलिदान से भरे जीवन की आवश्यकता है। पहले अपने व्यक्तित्व को कुचलो। व्यक्तिगत सुख–सुविधा के सपनों को झटक दो। फिर काम शुरू करो। इंच दर इंच तुम्हें आगे बढ़ना होगा। इसके लिए साहस, दृढ़ता और बहुत दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। कोई भी कठिनाई और कोई अभाव आपको हतोत्साहित नहीं करेगा। कोई भी असफलता और विश्वासघात आपको निराश नहीं करेगा। आप पर थोपी गयी कोई भी मुसीबत आपके अन्दर की क्रान्तिकारी इच्छाशक्ति को खत्म नहीं कर पाएगी। कष्टों और बलिदान की अग्नि–परीक्षा से आप विजयी होंगे। और ये व्यक्तिगत जीतें क्रान्ति की मूल्यवान सम्पत्ति होंगी।
एक अर्थ में गाँधीवाद अपने शान्तिवाद के प्रति–क्रान्तिकारी रास्ते के साथ क्रान्तिकारी विचारों के करीब पहुँचता है। क्योंकि यह सामूहिक कार्रवाई पर निर्भर करता है, हालाँकि सिर्फ जनता के लिए ही नहीं। उन्होंने अपने राजनीतिक कार्यक्रम के जरिये सर्वहारा क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त किया है, भले ही उन्होंने इसे कितना भी भौंडे और स्वार्थी तरीके से किया हो। क्रान्तिकारियों को चाहिए कि वे अहिंसा के दृष्टिकोण के महत्त्व को स्वीकार करें।
क्रान्तिकारियों को लक्ष्यहीन आक्रोश और व्यक्तिगत आत्मबलिदान के दुष्चक्र में इधर–उधर न धकेला जाये। अपने उद्देश्य के लिए मरना नहीं बल्कि उद्देश्य के लिए जीना, तथा उपयोगी और योग्य रूप से जीना ही हम सभी कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायक आदर्श होना चाहिए।
अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए राष्ट्रवादियों को चाहिए कि वे राष्ट्र की कार्रवाई में, विद्रोह में शामिल हों। और देश कांग्रेस का लाउडस्पीकर नहीं है–– भारत की 95 प्रतिशत से अधिक आबादी किसानों और मजदूरों की है। राष्ट्रीयकरण के आश्वासन पर ही राष्ट्र कार्रवाई के लिए आन्दोलित होगा। यानी––– साम्राज्यवादियांे और पूँजीपतियों की गुलामी से मुक्ति।
यहाँ भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता के बारे में गाँधी के दृष्टिकोण की कमजोरी को दर्शाते हैं। वह केवल प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन से भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता ही हासिल कर सकती है। यह एक राष्ट्रवादी कार्यक्रम है जो यहीं समाप्त होता है। भगत सिंह की हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) का गठन 1928 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के उत्तराधिकारी के रूप में किया गया था। हालाँकि बाद में उन प्रत्यक्ष कार्रवाइयों का विरोध नहीं किया गया था जिनमें हिंसा शामिल हो सकती है, जैसे कि ट्रेन डकैतियों की एक श्रृंखला, लेकिन यह पूरी तरह से क्रान्तिकारी दृष्टिकोण नहीं था। दूसरी ओर, एचएसआरए का रुख समग्रता में क्रान्तिकारी था।
एक अर्थ में, एचएसआरए को स्वतंत्रता आन्दोलन की वामपंथी धारा के रूप में देखा जा सकता है और इस तरह इसका गाँधी की कांग्रेस के साथ एक उतार–चढ़ाव भरा रिश्ता था। गाँधी खुद रेडिकल लोगों के प्रति सहानुभूति नहीं रखते थे, लेकिन अन्य लोग, खासकर नेहरू, उनके प्रति सहानुभूति रखते थे। नेहरू ने क्रान्तिकारियों को रूस जाने में मदद करने के लिए एक हजार रुपये दिये, लेकिन चन्द्रशेखर आजाद की शहादत के कारण ऐसी यात्रा कभी सम्भव नहीं हो सकी। सुभाष चन्द्र बोस और नेहरू दोनों भगत सिंह के व्यक्तित्व की बहुत सराहना करते थे। नेहरू ने युवा क्रान्तिकारी के साहस की प्रशंसा की।
अपनी किशोरावस्था के शुरुआती दिनों में, 1920 के दशक में, भगत सिंह पहले से ही भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल हो चुके थे। चूँकि वह एक प्रतिबद्ध क्रान्तिकारी, मार्क्स और लेनिन से गहराई से प्रभावित कम्युनिस्ट बन गये, इसलिए उनकी राजनीतिक विचारधारा ने हिंसा को अस्वीकार नहीं किया। इसमें वह निश्चित रूप से अकेले नहीं थे। अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के प्रयास कई दशकों से चल रहे थे और हालाँकि गाँधी के अनुयायी कम नहीं थे, लेकिन ऐतिहासिक रिकॉर्ड अंग्रेजों के खिलाफ हिंसा की कई कार्रवाइयों को दर्शाता है। और जब भगत सिंह ने अपने देश और स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों के बारे में कई बोधगम्य निबन्ध लिखे, तो उन्हें एहसास हुआ कि भारत में अधिकांश लोग साक्षर नहीं थे। पोस्टर और तस्वीरें जैसे प्रतीक किसान और श्रमिक जनता तक पहुँचने के महत्वपूर्ण तरीके बन गये। ट्रेन डकैतियों जैसे साहसी कृत्यों ने भी जनता का बहुत ध्यान आकर्षित किया। हालाँकि, भगत सिंह ने देखा कि कुछ विशेष रूप से शानदार कार्रवाइयाँ लोगों को क्रान्तिकारी सक्रियता के लिए प्रेरित कर सकती हैं।
ब्रिटेन की संसद के सात सदस्यों का एक समूह 1928 में राजनीतिक स्थिति की जाँच करने के लिए भारत भेजा गया था, विशेष रूप से यह पता लगाने के लिए कि पिछले सुधार प्रभावी क्यों नहीं हुए। भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के परिणामस्वरूप पहले ही मर चुके लाखों भारतीयों और उसके शासन की लोलुपता, जिसने देश की सम्पत्ति का नाश कर दिया, उसे देखते हुए, इस कदम की क्रूरता भारतीयों के लिए स्पष्ट थी। आश्चर्य की बात नहीं कि आयोग में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। तुरन्त विरोध शुरू हो गया। जैसा कि हमने अपनी पुस्तक में दर्ज किया है––
लाहौर में, युवाओं ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यन्त महत्वपूर्ण पंजाबी नेता लाला लाजपत राय को साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए मना लिया था, जो उन्होंने 30 अक्टूबर 1928 को आयोजित किया था। पुलिस ने जुलूस पर लाठी चार्ज किया और लाला लाजपत राय उसके शिकार हुए। पुलिस की बर्बरता, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट के आदेश पर डीएसपी सॉण्डर्स द्वारा लाठियों से उन्हें कई बार मारा गया। इस पिटाई के कारण लाला लाजपत राय की 17 नवम्बर 1928 को मृत्यु हो गयी। इस घटना के बारे में भगत सिंह ने घोषणा की थी कि ‘उनके शरीर पर पड़ी एक–एक लाठी भारत में ब्रिटिश शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी!’
इस क्रूर कृत्य ने भगत सिंह और एचएसआरए को एक ऐसे रास्ते पर खड़ा कर दिया, जो उनके भाग्य पर मुहर लगाने और भगत सिंह को भारत की स्वतंत्रता और क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए शहीद बना देने वाला था। उन्होंने जेम्स स्कॉट की हत्या की योजना बनायी। 17 दिसम्बर, 1928 को, उन्होंने अनजाने में उनके सहायक, जॉन सॉण्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि वह सॉण्डर्स ही था जिसने वास्तव में लाला लाजपत राय को मारा था। एचएसआरए ने उनकी हत्या का भरपूर प्रचार किया और अगले महीनों में, वे अधिक प्रत्यक्ष कार्रवाइयों में लगे रहे, जिसका लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को कटघरे में खड़ा करना था।
8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और उनके साथी बी के दत्त ने मजदूर विरोधी कानून के विरोध में दिल्ली के सेण्ट्रल असेम्बली में छोटे बम (बड़े पटाखों की तरह) फेंके। फिर उन्होंने हॉल में एक परचा फेंक दिया। इसका पहला वाक्य था “बहरों को सुनाने के लिए तेज धमाके की जरूरत होती है।” इसमें इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा भी शामिल था, जो उस समय से हमेशा भगत सिंह के नाम के साथ जुड़ा रहा है और जो भारत और पूरे दक्षिण एशिया में क्रान्तिकारियों के कानों में गूँजता रहा है।
बमों से कुछ मामूली चोटें आयीं लेकिन कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। दोनों साथियों और एचएसआरए ने सावधानीपूर्वक अपनी कार्रवाई की योजना बनायी थी, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी प्रमुख भारतीय मीडिया तस्वीरों और पर्चे की प्रतियों के साथ जो कुछ भी हुआ उसकी रिपोर्ट करेंगे। इससे भी अधिक, दोनों ने अपनी पिस्तौलें नीचे रख दीं और खुद को गिरफ्तार होने दिया। उसके बाद, भगत सिंह ने तय किया कि वे अपनी गिरफ्तारी और कारावास का उपयोग देश की जनता के बीच अपने उद्देश्य का प्रचार करने के लिए करेंगे, हलाँकि उनको आशंका थी कि पुलिस द्वारा उन्हें सॉण्डर्स की हत्या के लिए दोषी ठहराए जाने के बाद निश्चय ही मौत की सजा दी जाएगी। भगत सिंह को यातनाएँ दी गयीं, यहाँ तक कि अदालत की पेशियों में भी पीटा गया, लेकिन उन्होंने निडरता से विरोध किया, लम्बी भूख हड़ताल की, विरोध के अन्तहीन पत्र लिखे और, वास्तव में, अंग्रेजी शासन पर आरोप लगाया। यह सब व्यापक रूप से प्रचारित किया गया, जिससे लोग कार्रवाई के लिए प्रेरित हुए। उनकी मौत की सजा के खिलाफ दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन हुए। वह उत्पीड़न के विरुद्ध नि:स्वार्थ प्रतिरोध का एक प्रतीक बन गये थे और आज भी हैं। सैको और वेजेंटी की बात दोहराते हुए, भगत सिंह ने फाँसी पर चढ़ने से कुछ समय पहले कहा था––
यह देशभक्तों के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है और मुझे गर्व है कि मैं इसे पाने जा रहा हूँ। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन वे मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन वे मेरी आत्मा को नहीं कुचल पाएँगे। मेरे विचार अंग्रेजों को तब तक अभिशाप की तरह सताते रहेंगे जब तक वे यहाँ से भागने पर मजबूर नहीं हो जाते। मरने के बाद वाला भगत सिंह अंग्रेजों के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होगा।
यदि गाँधीजी की कांग्रेस एचएसआरए द्वारा जागृत शक्तियों के इर्द–गिर्द लामबन्द होती, यदि उन्होंने किसानों और श्रमिकों के तेवर को बेहतर ढंग से समझा होता, तो वे निर्णायक रूप से वामपंथ की ओर मुड़ गये होते। इसके बजाय, उन्होंने खुद को क्रान्तिकारियों और मुकम्मल क्रान्ति से ज्यादातर दूर रखा। इस प्रकार, जब अन्तत: 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त हुई, तब भी पूँजीवाद ने आर्थिक शक्ति हासिल की। और हाँ, कई वर्षों तक उदार लोकतंत्र और निजी हितों पर अंकुश लगाने तथा लोगों का कल्याण करने के प्रयास हुए। लेकिन हद से ज्यादा गरीबी कायम रही और साम्प्रदायिक शत्रुता अनियंत्रित रही। आज हम देखते हैं कि ऐसे मामलों में अक्सर क्या होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूप में धुर दक्षिणपंथ अब राजनीतिक परिदृश्य पर हावी है और देश में लगभग हर जगह वामपंथी बचाव की मुद्रा में हैं।
आइए, फिर से हिंसा के सवाल पर लौटते हैं। भारत में यथार्थ के विरुद्ध बहस करना कठिन है। इस पर एक हत्यारी साम्राज्यवादी शक्ति का कब्जा था। प्रत्येक ब्रिटिश सैनिक और पुलिसकर्मी, प्रत्येक “सिविल सेवक” और उस मामले के लिए, भारत में रहने वाला ब्रिटिश परिवार का प्रत्येक वयस्क सदस्य एक कब्जा करने वाली सेना का हिस्सा था। इन लोगों को ब्रिटिश कब्जे की दैनिक हिंसा के जवाब में हिंसक प्रतिक्रियाओं के निष्पक्ष खेल के रूप में देखा जा सकता है। भगत सिंह ने कभी भी तथाकथित नागरिकों को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने एक पुलिसकर्मी की हत्या में भाग लिया था, जिसने स्वयं एक व्यक्ति को पीट–पीटकर मार डाला था और वास्तव में, उसकी हत्या कर दी थी, क्योंकि लाला लाजपत राय पर हमले के तत्काल बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी थी। एचएसआरए एक वैध साम्राज्यवाद–विरोधी संगठन था और इस तरह, हत्या एक युद्ध का कार्य था और गिरफ्तार किये गये लोग वास्तव में युद्ध बन्दी थे, वे युद्ध के दौरान पकड़े गये किसी भी सैनिक से अलग नहीं थे। सॉण्डर्स की हत्या कोई सनसनीखेज तरीके से की गयी कार्रवाई नहीं थी, बल्कि लम्बे समय से पीड़ित भारतीय जनता को प्रेरित करने के उद्देश्य से की गयी कार्रवाई थी। भगत सिंह जैसा चाहते थे वैसा इतिहास नहीं बन पाया, इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।
इसी तरह, फिलिस्तीन में, इजरायली राज्य के विरुद्ध हिंसा के कार्य निश्चित रूप से उचित हैं। चाहे साम्राज्यवादी मीडिया हमें कुछ भी बताये, हमास मुक्ति आन्दोलन में लगी एक वैध राजनीतिक इकाई है। हाल ही में, चीन ने विभिन्न फिलिस्तीनी गुटों के एक सम्मेलन की मेजबानी की और एक निश्चित एकता पर सहमति बनी है। इससे इजरायल विरोधी हिंसा और भी अधिक उचित हो जाएगी। जैसा कि वकील और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता स्टैनली एल कोहेन स्पष्ट करते हैं, मैं इसे भी जोड़ सकता हूँ, फिलिस्तीनियों और अवैध कब्जे से पीड़ित सभी लोगों को अन्तरराष्ट्रीय कानून के तहत हिंसा सहित किसी भी आवश्यक तरीके से विरोध करने का कानूनी अधिकार है। हमें हमेशा नागरिकों की जानबूझकर हत्या की निन्दा करनी चाहिए, जैसा कि 7 अक्टूबर को इजराइल में रॉक संगीत समारोह में भाग लेने वाले लोगों के साथ हुआ। हालाँकि, मारे गये सैनिक वैध लक्ष्य थे। और यहाँ तक कि वयस्क बाशिन्दे भी, जो फिलिस्तीनी भूमि पर अवैध रूप से कब्जा करते हैं और यदि आप फिलिस्तीनी हैं, तो ये हथियारों से लैस लोग आपके लिए खतरनाक हैं।
एक औपनिवेशिक, साम्राज्यवादी शक्ति को उन लोगों के खिलाफ अपनी रक्षा करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है, जिनकी जमीन उसने चुरा ली है और जिनके लोगों को उसने मार डाला है, जिन्हें कोई कानूनी अधिकार नहीं है। लगातार इस बात पर जोर देने के बावजूद कि इजराइल आत्मरक्षा में लगा हुआ है, सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। इसका लक्ष्य केवल अपनी औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्ति को बनाये रखना है। मजबूत नैतिक और कानूनी आधार उन लोगों के पास है जो उत्पीड़ित हैं और इसमें खुद को मुक्त करने के लिए हिंसक साधनों का उपयोग करने का पूर्ण अधिकार शामिल है।
जैसा कि हमने तर्क दिया है, अहिंसक संघर्ष–– प्रदर्शन, मार्च, हड़ताल, भूख हड़ताल, बहिष्कार, आदि निश्चय ही उपयोगी है। फिर भी, आईडीएफ शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गोली मारता है, गिरफ्तार करता है और प्रताड़ित करता हैय हड़तालों को हिंसा से कुचल दिया जाता हैय भूख हड़ताल करने वालों को मरने के लिए छोड़ दिया जाएगाय और बहिष्कार से हत्याएँ नहीं रुकी हैं। हाँ, यदि संयुक्त राज्य अमरीका और उसके सहयोगियों ने इजरायली सरकार को हथियार देना बन्द कर दिया और उससे बदलाव की माँग की, तो बदलाव हो सकता है। लेकिन ऐसा होने से पहले ही हर फिलिस्तीनी जो आज जिन्दा है, वह मर जाएगा। इसका मतलब यह है कि फिलिस्तीन में उपनिवेशवाद–विरोधी संघर्ष में संगठित हिंसा निश्चित रूप से उत्तरोत्तर एक महत्वपूर्ण हथियार बनती जाएगी। इसकी निन्दा करने के बजाय, दुनियाभर के वामपंथियों को इसका बचाव करना चाहिए, जैसे हमने दुनिया भर में उचित सशस्त्र संघर्षों का बचाव किया है। और साथ ही, हमें सशस्त्र प्रतिरोध में शामिल लोगों को एक ऐसी विचारधारा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने का भरपूर प्रयास करना चाहिए जो साम्राज्यवाद का, पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था को टिकाये रखने वाले उसके एक अभिन्न अंग का कट्टर विरोधी है। और हमें अपने देश में रेडिकल जन संघर्ष की चिंगारी भड़काने के लिए यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
(माइकल डी येट्स मंथली रिव्यू प्रेस के सम्पादकीय निदेशक हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक द ग्रेट इनइक्वलिटी है। उनसे उपामकरलंजमे/उेदण्बवउ पर सम्पर्क किया जा सकता है।)
अनुवाद–– दिगम्बर
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