बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है इन्टरनेट पर वीडियो देखना
समाचार-विचार अपूर्वा तिवारीहाल ही में दिल्ली में प्रदूषण के बुरे हालात को देखते हुए ज्यादातर ऑफिसों मंे काम और स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई को ऑनलाइन कर दिया गया। हमारी जिन्दगी में इन्टरनेट कितना शामिल है, यह इसका छोटा–सा नमूना–मात्र है। आज हमें कहीं जाना हो, दवा–सब्जी–खाना–कपड़े मँगाना हो, किसी को तोहफा भेजना हो, या अब तो रक्षाबन्धन पर राखी और दिवाली पर दीये आदि भी इन्टरनेट के माध्यम से खरीदे–भेजे जा रहे हैं। छोटी–से–छोटी जानकारी, मनोरंजन, बातचीत सबके लिए हम मोबाइल फोन, लैपटॉप या कम्प्यूटर जैसी किसी–न–किसी स्क्रीन के माध्यम से इन्टरनेट पर आश्रित होते जा रहे हैं। कई बार इन्सान अपनी वास्तविक जिन्दगी से सन्तुष्ट न होने के कारण भी वर्चुअल दुनिया में अपनी सपनों की दुनिया जीने की कोशिश करने लगता है।
यह सच है कि तकनीक हमारे जीवन को आसान बना देती है, लेकिन तकनीक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हमें इसका गुलाम बना देता है। विषेशकर युवा और बच्चे जिनका इनसे ज्यादा साबका पड़ता है, इन्हें वे अपना आदी बना लेती है।
ऑस्ट्रेलिया की एक रिसर्च के अनुसार (स्रोत: 60 मिनट ऑस्ट्रेलिया) इन्टरनेट पर ज्यादा समय तक वीडियो देखने और ऑनलाइन गेम खेलने के कारण बच्चों को इसकी लत लग रही है। रिसर्च में वीडियो और ऑनलाइन गेम खेलने और इन्टरनेट का इस्तेमाल न करने वाले बच्चों के दिमाग के स्कैन निकाले गये, जिसमें ऐसा करने वाले बच्चों के दिमाग का एक हिस्सा इससे प्रभावित दिखायी पड़ रहा है। रिसर्च करने वाले डॉक्टरों के अनुसार यह लत दिमाग में बिलकुल वैसा ही असर डालती है, जैसा शराब, ड्रग्स या जुए की लत। यह भी एक प्रकार का नशा ही है। डॉक्टरों ने इसे स्क्रीन एडिक्शन और इन्टरनेट एडिक्शन सिन्ड्रोम जैसे नाम दिये हैं।
डॉक्टरों के अनुसार इससे पीड़ित बच्चों के व्यवहार में अन्तर देखा जा सकता है। यह बच्चों की भावनाओं पर, उनकी निर्णय लेने की क्षमता पर और उनके खुद पर नियंत्रण पर भी बुरा असर डालता है, जिससे स्क्रीन से दूर किये जाने पर बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं और रोने–चीखने लगते हैं। वहीं लगातार रील्स देखने से बच्चों मंे भावनाओं के प्रति भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है, क्योंकि कुछ ही सेकेण्ड में एक हँसी की रील, अगली कोई भावनात्मक रील तो अगली मार–धाड़ की रील हो सकती है। पल–पल में बदलने वाली भावनाओं के प्रति बच्चे कैसे प्रतिक्रिया करें, वह समझ नहीं पाते। इसका असर भी उनके कोमल दिमाग पर पड़ता है। हम अपने आस–पास, अपने घरों में लगभग रोज ही यह नजारा देखते ही होगंे।
दरअसल हमारे देश में जहाँ लोगों का जीवन–स्तर बहुत खराब है, वहाँ कुछ पल सुकून के पाने के लिए तो कभी बच्चे को बाहर के असुरक्षित माहौल में जाने से रोकने के लिए माता–पिता फोन या कम्प्यूटर का सहारा लेते हैं। धीरे–धीरे यह लत बन जाती है। यह लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ही बुरा असर नहीं डालती, बल्कि इससे पीड़ित बच्चों के समय पर खाना न खाने, दूसरी गतिविधियों में दिलचस्पी खोने के कारण, दूसरे बच्चों के साथ खेल–कूद न करने के कारण, उनके शारीरिक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
जब यह बीमीरी बढ़ जाती है तो इससे पीड़ित व्यक्ति को डिजिटल डिटॉक्स किया जाता है, जिसमें उसे कुछ दिनों के लिए ऐसी जगह पर रखा जाता है, जहाँ उसका इन्टरनेट और स्क्रीन से नाता पूरी तरह कट जाये, और उसे प्रकृति के साथ और लोगों के साथ सोशलाइज करने का समय मिले। उसे घर के बाहर की गतिविधियों में व्यस्त रख कर, इस लत को धीरे–धीरे छुड़ाया जाता है। कम लक्षण वाले व्यक्ति की स्क्रीन–काण्टैक्क के समय को धीरे–धीरे कम करके और उस समय में उसे बाहरी गतिविधियों में शामिल करके इस लत को कम किया जा सकता है।
आज के बच्चे और युवा जो हमारा भविष्य हैं, वे अपनी ही भावनाआंे और व्यवहार पर नियंत्रण खो देगें तो यह उनके लिए ही नहीं, पूरे देश और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक है। इसी खतरे को भाँपते हुए ऑस्ट्रेलिया की सरकार 16 वर्ष की आयु के कम के बच्चों के लिए इन्टरनेट बैन करने पर विचार कर रही है।
हमें पढ़ाई को ऑनलाइन होने से भी रोकना पड़ेगा। इससे न सिर्फ बच्चों का स्क्रीन काण्टैक्ट का समय घटेगा, बल्कि जिन बच्चों के माता–पिता बच्चों के लिए अलग से मोबाइल फोन और इन्टरनेट का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनकी पढ़ाई भी सुचारु रूप से चल पायेगी। अपने भविष्य और समाज को बचाने के लिए एक साझे प्रयास की जरूरत है, क्योंकि मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ युवा और बच्चे ही स्वस्थ समाज की नींव रख सकते हैं।
–अपूर्वा